इसबार भी नये साल में एक दर्द के साथ प्रवेश...

उदय केसरी  
2009 के अवसान पर अंतिम पोस्‍ट के रूप में कुछ लिखने का मन किया, लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि क्‍या लिखूं। सोचा, बस सबसे सुखद और सबसे दुखद की चर्चा कर आप सभी ब्‍लॉगर बंधुओं और सुधी पाठकों को नये साल का मुबारकबाद देते है।... 26/11 के दर्द को साथ लेकर आया साल 2009 के 12 महीनों में फिर कोई आतंकी हमला नहीं हुआ, यह सबसे सुखद याद है और इसके लिए गृहमंत्री पी। चिदंबरम को जरूर बधाई देनी चाहिए। वहीं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अमेरिकी राष्‍ट्रपति के पद पर पहली बार किसी अश्‍वेत बराक ओबामा की ताजपोशी का ऐतिहासिक दृश्‍य यादगार है। इन दोनों के अलावा दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी और कुछ इतना सुखद नहीं, जिसे यहां जोड़ूं।
हां, दुखद याद पर दिमाग घुमाते ही सबसे दुखद मुझे 26/11 के गुनहगारों के खिलाफ हमारे देश की धीमी कार्रवाई है, जो आज भी अंडर प्रोसेस है। दूसरी सबसे दुखद याद है महंगाई, जो 2009 के प्रारंभ से ही मुंह फैलाना शुरू की और साल के अंत तक सुरसा के मुंह को भी मात दे गई। और इसबार भी नये साल 2010 में प्रवेश एक दर्द या कहें बोझ के साथ होगी।
खैर, भविष्‍य को खुशहाल बनाने के लिए सदा सुखद यादों को याद रखनी चाहिए, इसलिए मैं इस साल अंतिम लेख में ज्‍यादा कड़वी बातें नहीं कर रहा हूं।....और आपको 2009 के चर्चित शादियों की सूची के साथ नव वर्ष की ढ़ेरों शुभकामनाएं देते जा रहा हूं। इस सूची में सबसे अंतिम पायदान पर आपको एक नाम मेरी शादी का भी मिलेगा, जिसे मैंने बस, स्‍वांत: सुखाय के लिए इसमें शामिल कर दिया। हां, इन नामों पर क्लिक करना न भूलें, शायद, ये नवविवाहित जोड़े आपको न्‍यू ईयर विश करना चाहते हों....
2009 की चर्चित शादियांशिल्‍पा शेट्टी संग राज कुंद्रा
और....अब

क्‍या आपके मन में रोष उत्‍पन्‍न नहीं होता?

उदय केसरी  
महंगाई खतरे के निशान के ऊपर
खाने की वस्तुओं की महंगाई खतरे के निशान के ऊपर जा रही है। नवंबर '09 के आखिरी हफ्ते में जारी थोक मूल्य सूचकांकों से पता चलता है कि पिछले दस वर्षों में कभी इतनी तेजी से महंगाई नहीं बढ़ी। इधर दालों की कीमत में 42 प्रतिशत, सब्जियों की कीमत में 31 प्रतिशत और आलू की कीमत में 102 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मंत्रियों को मुफ्त हवाई यात्रा भत्ता बढ़ाने संबंधी विधेयक पेश
मंत्रियों को खर्च में कटौती की नसीहत देने वाली सरकार ने अब उन्हें अपने नाते-रिश्तेदारों और साथियों को भी मुफ्त हवाई सफर कराने की छूट दे दी है। यही नहीं, देश के वित्त मंत्री रहे मौजूदा गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने मंत्रियों को मिलने वाली मुफ्त हवाई यात्रा भत्ता सुविधा बढ़ाने संबंधी विधेयक की आलोचनाओं को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया कि इससे सरकार पर कोई वित्तीय बोझ नहीं बढ़ेगा। --------------------------------------------------------------------------------------
उपर्युक्‍त दोनों खबरों को पढ़कर क्‍या आपके मन में रोष उत्‍पन्‍न होता है? हां और न भी। ज्‍यादातर का यही जवाब होगा। कुछ ही लोग कहेंगे इन खबरों को पढ़कर मेरा मन रोष से इतना भर उठता है कि ऐसी सरकार और ऐसे मंत्रियों को फिर कभी वोट न दूं, इनका खुलकर विरोध करूं, इनके खिलाफ लोगों को जागरूक करूं। लेकिन ऐसा रोष यदि आगे भी कुछ ही लोगों के मन में उठता रहा, तो वे चिल्‍लाते रह जाएंगे और महंगाई महामारी का रूप धारण कर लेगी। लोग मरेंगे, खाये बगैर या सड़े-गले खाकर। तब हवाई जहाज से यही मंत्री आयेंगे उन्‍हें देखने और आश्‍वासन देकर फिर चले जाएंगे हवाई जहाज से उड़कर मुफ्त में मिले अपने आलीशान बंगले में। आप कहेंगे हमने तो अपने क्षेत्र से उसे सांसद बनाया था मंत्री तो वह अपने तिकड़म से बना। तो आपको यह भी मालूम होगा कि संसद भवन परिसर में इन करोड़‍पति-अरबपति सांसदों को शानदार खाना मात्र 10-15 रूपये प्‍लेट में मिलता है। मं‍त्री-सांसदों को कम से कम पांच साल तक आप भूखमरी और महंगाई का एहसास तो नहीं करा सकते। यह एहसास तो आप-हम को करना है और दाल की जगह माढ़ और चावल की जगह खुद्दी (चावल के टुकड़े) खाना है।

केंद्र सरकार ने तो हाथ खड़े कर दिये हैं। बोल दिया, बारिश हुई नहीं, तो कहां से खाद्यान्‍नों की कीमतों को नियंत्रित करें। यह तो राज्‍य सरकारों को करना चाहिए। केंद्र सरकार की पूरी चिंता कोपेनहेगन में आयोजित जलवायु परिवर्तन को लेकर सम्‍मेलन पर है, या फिर अमेरिका से नए-नए समझौते करने पर है। मानों, घर की चिंता करने की जिम्‍मेदारी केंद्र नहीं, राज्‍यों की है! एक पुरानी कहावत है- न रहिये जी तो क्‍या खैहिये घी। अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बड़े-बड़े समझौते करके क्‍या वर्तमान में कोई बदलाव होने वाला है? नहीं न। तो बताइये, जब घर के लोग महंगाई से त्रस्‍त हों, तब केंद्र सरकार को खाद्यान्‍न आयात करने पर विचार करना चाहिए। तो नहीं, इसके जवाब में सरकार कहती है, अभी ऐसी परिस्थिति नहीं आई है। तो जब लोग मर ही जाएंगे तब उनके के लिए खाना आयात करने से क्‍या होगा? एक और बयान सरकार की तरफ से आता है कि वित्‍तीय बोझ अधिक है। तो ऐसी परिस्थिति में सरकार करीब तीन सौ मिलियन विदेशी मुद्रा भंडार को संजो कर क्‍या कर रही है?

क्‍या अब भी आपके मन में रोष उत्‍पन्‍न नहीं होता? देश की ऐसी स्‍ि‍थति के बावजूद माननीय गृह मंत्री पी। चिदंबरम मंत्रियों को मिलने वाली मुफ्त हवाई यात्रा भत्ता सुविधा बढ़ाने संबंधी विधेयक की आलोचनाओं को सिरे से खारिज करते हुए दावा करते हैं कि इससे सरकार पर कोई वित्तीय बोझ नहीं बढ़ेगा। आखिर इस बंदरबांट के एक हिस्‍सेदार वो भी तो हैं। एक और खबर आ रही हैं कि केंद्र सरकार देश में विशिष्ट लोगों के लाने-ले जाने के लिए तीन-तीन सौ करोड़ की लागत से एक दर्जन हेलिकाप्‍टर खरीदने की तैयारी कर रही है। अरे भाई, समझे नहीं, देश में महामारी होगी तो बड़े-बड़े नेता-मंत्री क्‍या पैदल आपको देखने आयेंगे। उसके लिए उड़नखटोला चाहिए कि नहीं। आप ही के लिए तो यह सब किया जा रहा है! आप पहले महामारी के शिकार तो होईये, देखियेगा कैसे ये नेता-मंत्री आपको देखने हेलिकाप्‍टर नहीं आते हैं!

मैं बस यही बताना चाहता हूं कि इस महंगाई और सरकारी लूट से हम-आप को कोई बचा नहीं सकता। हमें खुद ही इसके लिए खड़ा होना होगा। जब तक आपके पास दोगुने-तीनगुने-चारगुने दामों पर भूख मिटाने के स्रोत है, तब तक आपको तो कोई वैसी चिंता नहीं होगी, जैसी एक गरीब परिवार को हो रही है, लेकिन जरा सोचिए, आपके स्रोत कब तक आपका साथ देंगे? कभी अपने से नीचे स्‍तर पर जीवन बसर करने वालों के बारे में तो सोचिए, जो बेचारा आवाज भी नहीं उठा सकता। उसके मन में जरूर रोष का तूफान उठता होगा, लेकिन वह घर की भूख मिटाने के लिए मजदूरी करने जाए या विरोध का विगुल फूंके। ऐसे में, इन गरीबों से कुछ उपर वाले लोगों को ही तो आगे आना होगा। आखिर कब तक आप किसी नेता के आश्‍वासनों के फलीभूत होने के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे?

चुटकी का खेल बना पूर्वजन्‍म की यात्रा!

उदय केसरी  
पिछले एक हफ्ते से एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित रियलिटी शो ‘राज पिछले जन्‍म का’ पर पता नहीं क्‍यों मुझे विश्‍वास नहीं होता। कोई कैसे आधे घंटे के शो में किसी को उसकी एक नहीं दो-दो पूर्वजन्‍मों की याद दिला सकता है और वह भी फिल्‍म के दृश्‍य व कहानियों की तरह स्‍पष्‍ट। क्‍या आपको विश्‍वास होता है? ...मैंने इस शो के तीन-चार एपिसोड देखे हैं, जिसने मेरे जहन में अनेक सवाल खड़े कर दिये। इस शो में पूर्वजन्‍म की यात्रा कराने वाली डा. तृप्‍ती जैन के पास आखिर ऐसी कौन सी विद्या है, जो किसी आदमी को इतने कम समय में सैकड़ों साल पीछे ले जाती है? और फिर यदि यह मान भी लें कि आदमी को पिछले जन्‍मों में ले जाया सकता है, तो क्‍या पिछले जन्‍म की चेतना में प्रवेश कर चुका आदमी अपने इस जन्‍म की भाषा-बोली में सैकड़ों साल पुरानी बातें बता सकता है? सबसे आश्‍चर्यजनक यह कि डा. जैन सामने लेटे व्‍यक्ति से कभी-कभी ऐसे सवाल करती हैं, मानो पूर्वजन्‍म में सामने लेटा आदमी नहीं, खुद डा. जैन विचरण कर रही हों, जैसे भोपाल की एक महिला के मामले में डा. जैन जोर देकर पूछती हैं- देखो मृत पड़े सेलर के हाथ में एक घड़ी है, देखो उसमें क्‍या समय हुआ है? पिछले दिन मोनिका बेदी के मामले में भी ऐसा ही आश्‍चर्य हुआ- वह अचेतावस्‍था में अपने पिछले जन्‍म में विचरण कर रही थीं, पर जब उससे उसके पति का नाम पूछा गया, उसकी शक्‍ल-सूरत बताने को कहा गया, तो मोनिका ने बताने से मना कर दिया और कहा ‘बताना नहीं चाहती’, मानों वह अचेतावस्‍था में भी यह समझ रही हो कि इस सवाल का जवाब देने से उसकी वर्तमान जिंदगी में कोई प्रभाव पड़ सकता है। इन सब के अलावा एक बड़ा सवाल कि क्‍या मानव का पुनर्जन्‍म मानव रूप में ही होता है?

मेरे सवालों का सार यह है कि यदि पूर्वजन्‍म की यात्रा करना इतना आसान है, तो इसकी प्रामाणिकता का आधार क्‍या है? इससे तो विभिन्‍न धर्म ग्रंथों में उल्‍लेखित पूर्वजन्‍म व पुनर्जन्‍म संबंधी मान्‍यताओं पर भी सवाल खड़ा हो जाता है। मसलन, हिन्‍दू धर्मग्रंथों की मान्‍यताओं के मुताबिक चौरासी लाख यौनियों में जीवन पूरा करने के बाद ही किसी जीव को ईश्‍वर की कृपा से मानव शरीर प्राप्‍त होता है। इसीतरह, पूर्वजन्‍म पर विश्‍वास रखने वाले बौद्ध, जैन, सिख, तावो आदि धर्मों की भी अपनी-अपनी मान्‍यताएं हैं, जिसमें ज्‍यादातर हिन्‍दू धर्म की तरह ही कर्मफल पर आधारित हैं कि- अच्‍छे कर्म से अगला जन्‍म मानव रूप में संभव है, तो फिर राज पिछले जन्‍म के एक शो में कलाकार लिलिपुट के मामले को देखें, तो उसके बारे में कहा गया कि उसने पिछले जन्‍म में दो-दो लड़कियों के साथ प्‍यार का फरेब करके उनका दैहिक शोषण किया, तो ऐसे जीव का पुनर्जन्‍म मानव रूप में ही कैसे हुआ?

देखिये, पूर्वजन्‍म की अवधारणाओं के बारे यह मेरी सामान्‍य जानकारी है, जिसकी चर्चा करके मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरी समझ से एनडीटीवी के प्रोग्राम ‘राज पिछले जन्‍म का’ पर मुझे विश्‍वास नहीं होता है। और यदि वाकई में यह दर्शकों को धोखा देने वाला कार्यक्रम है, तो क्‍या इसे इस तरह से प्रसारित किया जाना चाहिए? क्‍या इससे अंधविश्‍वास को बढ़ावा नहीं मिलता? इस शो के होस्‍ट अभिनेता रविकिशन एक एपिसोड में यह कह रहे थे कि ‘सांप को मारने का श्राप पीढ़ी दर पीढ़ी भुगतना पड़ता है।'...इसे क्‍या कहेंगे?

अब एक और बात आपसे कहना चाहता हूं कि मैंने इस विषय पर यह पोस्‍ट लिखने से पहले इंटरनेट पर डा. तृप्‍ती जैन के बारे में पढ़ा- उन्‍होंने हैदराबाद के एक प्रसिद्ध पास्‍टलाइफ रिग्रेशन थेरेपिस्‍ट डा. न्‍यूटन कोंडावेती के अधीन रहकर यह विद्या या कहें सम्‍मोहन विद्या सीखी है। इस विद्या के माध्‍यम से प्राय: मा‍नसिक रोगियों का इलाज किया जाता है। डा. न्‍यूटन ने खुद किसी विदेशी थेरेपिस्‍ट से यह विद्या प्राप्‍त की है और अब हैदराबाद में अपनी लाइफ रिसर्च अकादमी चला रहे हैं। इस अकादमी का दावा है कि यहां मात्र चार दिनों में पूर्वजन्‍म की यात्रा कराने की विद्या सिखी जा सकती है। इनकी वेबसाइट का पता http://www.liferesearchacademy.com/ है। यानी पूर्वजन्‍म की यात्रा करना काफी आसान है! जब मैंने इंटरनेट पर थोड़ी और खोजबीन की, तो पाया कि इंटरनेट पर दर्जनों ऐसी वेबसाइट हैं, जो आपको पूर्वजन्‍म में ले जाने का दावा करती हैं, बस आप डॉलर में उन्‍हें पहले ‘पे’ कर दें। कुछ एक वेबसाइट तो ऐसी हैं, जिस पर बस जन्‍म की तारीख, महीना व साल पूछा जाता है और दूसरे ही पल में आपके पूर्वजन्‍म का विवरण आपके सामने होता है।...तो किसी वेबसाइट पर सीडी बेची जा रही है कि- आप घर बैठे सीडी सुनकर पूर्वजन्‍म की यात्रा करें। वाह! कितना आसान है यह सब! लेकिन जब मैंने इन वेबसाइटों के अंदर जाकर टर्म एंड कंडिशंस के पन्‍नों को पढ़ा, तो वहां लिखा पाया कि इसके घोषित परिणाम पूरी तरह सत्‍य हो यह जरूरी नहीं है। यह अलग-अलग व्‍यक्तियों पर अलग प्रभाव डाल सकता है। किसी भी बुरे प्रभाव के लिए आप खुद जिम्‍मेदार हैं। यही नहीं एक-दो वेबसाइटों पर तो इसे एक कंप्‍यूटर प्रोग्रामिंग का परिणाम बताया गया और यह भी कि यह परिणाम केवल आपके मनोरंजन के लिए है। ऐसे वेबसाइटों के लिंक मैं यहां चिपका रहा हूं, आप भी इनकी सच्‍चाई का पता लगा सकते हैं-

क्‍या आपका अखबार धोखेबाज नहीं?

उदय केसरी  
आज सुबह चाय के साथ अखबार के पन्‍ने उलटते ही जिन खबरों पर नजरें गईं, वे खबर नहीं थीं, बल्कि खबरों की शक्‍ल में विज्ञापन थे। वह भी एक नहीं अनेक। अखबार था दैनिक भास्‍कर, देश का सबसे तेज बढ़ता अखबार और जो अब डीबी कॉर्प यानी कारपोरेट कंपनी है, जिसका आईपीओ जारी होने वाला है। इन झूठी खबरों पर बात करने से पहले एक और बात बता दूं कि घर से निकलकर जब मैं ऑफिस पहुंचा, तो वहां पहुंचने वाले अखबार के भी एक से अधिक पन्‍ने ऐसी ही नकली खबरों से अटे हुए थे। अखबार था पत्रिका, जो राजस्‍थान पत्रिका समूह का अखबार है और हर बात पर दूसरों को पत्रकारिता की दुहाई देता रहता है। यही नहीं इस अखबार ने भोपाल में प्रकाशन शुरू करने के साथ ही भोपाल की आवाज उठाने का दावा किया और एक बड़ा समारोह आयोजित कर खबरों की शक्‍ल में विज्ञापन छापने का विरोध किया था।
खबर के रूप में विज्ञापनों को छापने की यह बात कोई नई नहीं है। सर्वाधिक प्रसार का दावा करने वाले दैनिक जागरण व अन्‍य नामी अखबार भी कमाई के इस धूर्त तरीके में शामिल हैं। फर्क बस इतना है कि कोई इन नकली खबरों के नीचे बारिक अक्षरों में फीचर लिखता है, तो कोई इम्‍पैक्‍ट फीचर, तो कोई Advt. । प्राय: ऐसी नकली खबरें चुनावों के वक्‍त ज्‍यादा नजर आती हैं। वैसे, अब विभिन्‍न उत्‍पादों की कंपनियां भी ऐसी नकली खबरें अपने उत्‍पाद के प्रचार के लिए छपवाने लगी हैं। इससे अखबारों को जहां वर्गसेंटीमीटर के भाव पैसे मिलते हैं, वहीं विज्ञापनदातों को अखबार की खबरों के प्रति पाठकों के भरोसा को आसानी से खरीदने का मौका। अब ऐसी नकली खबरों का कैसा प्रभाव पाठकों पर पड़ता होगा...इसकी फिकर न अखबार को है, न विज्ञापनदाताओं और न ही बुद्धिजीवी पत्रकारों को।

भोपाल में निकाय चुनाव चल रहा है। इसमें खड़े विभिन्‍न दलों के प्रत्‍याशियों के दौरे, जनसंपर्क, सभाओं की खबरें अखबारों में छप रही हैं, लेकिन कौन सी खबर विज्ञापन है और कौन सी अखबार के संवाददाताओं द्वारा कवर की हुई, समझना मुश्किल है। खासकर भोली-भाली जनता के लिए तो यह समझना बिल्‍कुल ही मुश्किल है कि ‘इम्‍पैक्‍ट फीचर’ या ‘फीचर’ का मतलब विज्ञापन होता है। जिस पार्टी का प्रत्‍याशी, जितना अधिक पैसा खर्च कर रहा है, उसकी खबरें उतनी बड़ी छप रही हैं। हर साइज की खबरें छपवाने का बाजार गर्म है। अब इन सबके बीच कोई पत्रकारिता की पवित्रता की बात करे, तो उसे तो पागल ही समझा जाएगा न! अरे अबला हो चुकी सच्‍ची प‍त्रकारिता से किसी को क्‍या मिलने वाला है! जब जनता/पाठकों के विश्‍वास के साथ नकली खबरों के जरिये खुलेआम की जा रही धोखाधड़ी पर किसी को एतराज नहीं, तो सच्‍ची प‍त्रकारिता की चिंता किसे होगी। सच्‍ची पत्रकारिता की हालत तो वैसी है, जैसे गांधी बाबा के विचारों की। जिनकी तस्‍वीर तो हर सरकारी दफ्तरों में लगी होती है, पर उसी के नीचे भ्रष्‍टाचार धड़ल्‍ले से फलता-फूलता रहता है।

अब ‘समझदार जनता’ के लिए क्‍या लिखें?

उदय केसरी  
 करीब सवा दो महीने बाद आप सबों से मुखातिब हो रहा हूं। इस दौरान व्‍यस्‍तताएं तो थीं, पर इतनी भी नहीं कि अपने विचार लिखने के लिए समय न निकाल पाया, बल्कि सच बताऊ तो लिखने की इच्‍छा नहीं हुई। देश व समाज में इस दौरान कई घटनाएं भी घटीं, फिर भी नहीं।...खबरें सुनकर, पढ़कर मन में कई बार विचार उत्‍पन्‍न होते रहे, पर उन पर लिखने की कभी इच्‍छा नहीं हुई।... महाराष्‍ट्र में विधानसभा चुनाव में मनसे की जीत और शिवसेना की शिकस्‍त, हिन्‍दी में शपथ पत्र पढ़ते सपा विधायक अबू आजमी पर मनसे विधायकों का हमला, झारखंड के पूर्व मुख्‍यमंत्री मधु कोड़ा के महाघोटाले का पर्दाफाश, जयपुर में आग आदि कई घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं मेरे मन में उत्‍पन्‍न हुई और उसे अपने साथियों के बीच विभिन्‍न चर्चाओं में व्‍यक्‍त भी किया, सीधीबात पर लिखने की इच्‍छा नहीं हुई।...न जाने क्‍यों ऐसा लगता है कि महज लिखने से अब देश में कुछ नहीं होता...और फिर ब्‍लॉग पर लिखने से और भी कोई फर्क नहीं पड़ता, जिन्‍हें हम अपने विचारों से प्रभावित और जागरूक करना चाहते हैं, उन तक आपके विचार पहुंच ही नहीं पाते, या पहुंचते हैं तो वे पढ़ते नहीं है और यदि पढ़ते हैं, तो इसे वे महज एक ब्‍लॉगर की भड़ास मान कर परे रख देते हैं।...कोई कुछ करता नहीं...‍और जब िप‍छले दिनों श्री प्रभु चावला को आजतक न्‍यूज चैनल के एक इंटरव्‍यू प्रोग्राम सीधीबात के लिए बेस्‍ट एंकर का अवार्ड और आजतक को लगातार नौवीं बार बेस्‍ट न्‍यूज चैनल का अवार्ड मिला, तो लगा जैसे अब तो कुछ लिखने की जरूरत ही नहीं है। जब भारत की जनता श्री चावला के सवालों को समझने में सक्षम है और आजतक की सबसे तेज खबरों पर भरोसा है, तो उनके पास लेटलतीफ विचारों, प्रतिक्रियाओं को पढ़ने के लिए फुर्सत कहां होगी। जनता तो आजतक के बाद इंडिया टीवी पर ज्‍यादा विश्‍वास करने लगी है, जो हर महीने किसी न किसी बहाने महाप्रलय की भविष्‍यवाणी करता रहता है। और यदि आपको डर, भय, विनाश, तबाही के पर्यायवाची शब्‍दों, राक्षसों के नामों को प्रभावी तरीके से वाक्‍यों में प्रयोग सीखना हो, तो इंडिया टीवी जरूर देखें, निश्चित फायदा होगा।...इससे पहले आईबीएन7 के मराठी न्‍यूज चैनल के दफ्तर पर शिव‍सैनिकों के हमले की घटना भी हुई, जिसे पत्रकारिता की स्‍वतंत्रता पर हमला कहा गया...सही ही कहा गया। इस खबर को आईबीएन7 समेत अन्‍य न्‍यूज चैनलों ने चलाया, लेकिन आईबीएन7 को छोड़कर किसी अन्‍य न्‍यूज चैनल ने अपनी खबर में उस चैनल के नाम का जिक्र नहीं किया। शायद अन्‍य चैनलों की पत्रकारिता उन्‍हें अपने प्रतिद्वंद्वी चैनल का नाम बताने की इजाजत नहीं देती।...‍ लेि‍कन शायद देश की जनता काफी समझदार हो चुकी है, वह नाम की जगह ‘एक न्‍यूज चैनल’ से खुदबखुद समझ लेती है। तो बताइये ऐसे में हमारे-आपके विचार किसी पर कैसे प्रभाव डाल पायेंगे? आप कहेंगे हम यह कैसी निराशाभरी उलटी बातें कर रहे हैं। सीधी समझ वाले लोग भी तो हैं इस देश में। हां हैं, सब समझते हैं, पर चुपचाप। कुछ करते नहीं। क्‍यों करें, उन्‍हें भी तो अपने घर चलाने हैं, इस महंगाई के दौर में। जब लोग ‘झूठ’ व ‘चालाकी’ को सोने के भाव खरीद रहे हैं, तो कोई उनके ‘सच’ को कितना खरीदेंगे।

पत्रकारिता की नई धारा बहाने की कोशिश


आप सबों को यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि एडिटोरियल प्लस सफलता पूर्वक दो साल पूरा कर तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। फिर भी हम यह मानते हैं कि हमारा यह प्रयास काफी छोटा है। अभी मंजिल काफी दूर है। उसे पाने में आप सबों की हार्दिक शुभकामनाओं और महत्वपूर्ण सुझावों की अहम भूमिका होगी। मेहनत से किसी भी परिस्थिति में नहीं डिगने के संकल्प के साथ ही हमने एडिटोरियल प्लस की स्थापना की। हमारी कोशिश धारा के विपरीत बहते हुए उन मान्यताओं को तोड़ना है, जो पत्रकारिता की व्यापकता को सीमित करने की मंषा के चलते गढ़ दी गई हैं। पत्रकारिता को छह-आठ घंटे की नौकरी की अवधि में नहीं बांधा जा सकता, लेकिन आज विडम्बना है कि आप तब तक पत्रकार नहीं है, जब तक किसी अखबार या चैनल का ‘लोगो’ आपके माथे पर नहीं चिपका हो। इस दशा में एडिटोरियल प्लस की राह उस दिशा में नहीं जाती, जहां मीडिया संस्थान के गैरपत्रकार मालिक को एक जन्मजात पत्रकार को पत्रकार के रूप में स्वीकारने या नकारने का अधिकार दे दिया जाता है। खैर, हम अपनी बात करें, तो प्रिंट, वेब और इलेक्ट्रानिक मीडिया के विभिन्न संस्थानों में अनुभव लेने के बाद हमें लगा कि यह आकाश हमारे लिए छोटा है, हमारी परवाज यहां पूरी नहीं होगी। इस परवाज के लिए हमें हमारा फलक खुद फैलाना होगा। बस, यहीं से हमारा नया सफर शुरू हो गया। आज हम इस पड़ाव पर एक क्षण ठहरकर इसे ‘एंजाय’ कर रहे हैं। हौंसला पहले से दोगुना है, जिसे निश्चित ही हर पड़ाव पर बढ़ना है, यह विश्वास है। हम मिथ्य अभिमान नहीं करते, लेकिन यह भी एक सच है कि हम पत्रकारिता की एक नई धारा बहाने के लिए कृतसंकल्पित हैं। पत्रकारिता की तीनों धाराओं को हम एक संगम स्थल पर ले आये हैं और इसी त्रिवेणी का नाम है ‘एडिटोरियल प्लस’।

ऐसे उटपटांग समुदाय के लिए भारत में कोई जगह नहीं

उदय केसरी
दुनिया में यह कैसा उटपटांग समुदाय बनता जा रहा है। विकसित देशों में धनाड्यों के पास मौज-मस्ती व खेल के तरीके कम पड़ते रहते हैं। वे इसके नये-नये तरीके खोजते रहते हैं। कभी पानी के अंदर जाकर सुहागरात मनाना, तो कभी कीचड़ में साइकिल रेस खेलना। प्रतिदिन अखबारों व टीवी में ऐसी उटपटांग हरकतों वाली खबरें आती रहती हैं। ऐसा करने वाले गरीब-बेरोजगार या मेहनतकश लोग नहीं होते, बल्कि बाप-दादा व आवश्यकता से अधिक की कमाई पर ऐश करने वाले होते हैं। ऐसे शौक वालों की ही उत्पत्ति है यह समलैंगिक समुदाय। कैलिफोर्निया आदि दुनिया के कुछ हिस्सों में भले ही इस समुदाय को सामाजिक स्वीकृति मिल गई है, लेकिन अधिकतर देशों में इसे अस्वाभाविक व अप्राकृतिक ही माना जा रहा है।
लेकिन, आश्चर्य यह है कि दिनों-दिन इस समुदाय में लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। और तो और, यह समुदाय अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर वार्षिक गौरव दिवस मनाने लगा है। इन सबके बीच सबसे आश्चर्यजनक यह कि यह समुदाय अब भारत में उत्पन्न हो चुका है, जिसका गौरव परेड पिछले रविवार को दिल्ली में भी निकाली गई। परेड के जरिये समलैंगिक लोग सरकार से भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को खत्म करने की मांग कर रहे थे। इस धारा के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता है। दिल्ली की परेड में शामिल समलैंगिकों के तख्तियों पर लिखा था-अंग्रेज चले गए...धारा 377 छोड़ गए। विदित है कि भारतीय दंड संहिता में कई सारी धाराएं अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लागू दंड संहिता से हू-ब-हू ले ली गई हैं। 377 भी ऐसी ही एक धारा है। वैसे, सवाल यहां इस दंड प्रावधान को बनाने वालों का नहीं है। अंग्रेजी दंड संहिता से भारतीय दंड संहिता में लिये गए प्रावधानों में भारतीय समाज, संस्कृति, परंपरा व संस्कार को ध्यान में रखा गया था। इसके आधार पर भारत में आज भी यह धारा उतना ही प्रासंगिक है, जितना कल था। मगर ऐयाश और अप्राकृतिक यौन प्रवृति से ग्रसित लोगों की मांग पर सरकार इस धारा को खत्म करने पर कैसे विचार कर सकती हैं? आखिर इस समुदाय के लोगों की तादाद ही कितनी है। ऐसा यदि किया जाने लगा तो देखादेखी एक दिन एक और नया समुदाय खड़ा हो सकता है, जो धारा 376 को भी अमानवीय कहकर इसे खत्म करने की मांग करने लगेगा। ऐसे, बहशी लोगों की भी संख्या कम नहीं हैं।
समलैंगिक संबंधों को जायज ठहराने वाले और इस समुदाय के लोग समलैंगिकता को मानवाधिकार और व्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं तो क्या ये लोग यह बताएंगे कि भारत में इनकी कितनी आबादी है? जितनी भी होगी पर एक अरब में इनकी संख्या उंगलियों पर गिनने के लायक ही होगी। फिर क्या उन्हें भारतीय समाज व संस्कृति की मान्यताएं मालूम हैं? उनके परिवार व पूरखों में किसी ने खुलेआम ऐसा काम किया? फिर भी यदि वे नई धारा बहाना चाहते हैं तो क्या वे भारतीय समाज से अलग रहना पसंद करेंगे? क्योंकि हमारे देश में जब संतान हद से ज्यादा शैतान हो जाए तो उसे घर से बाहर भी कर दिया जाता है।
यदि इन सवालों के जवाब ‘नहीं’ है, तो एक संस्कारवान व मूल्यवान भारत का नागरिक होने के नाते मैं ऐसे समुदाय को देश में पनपने के पक्ष में कभी मत नहीं दूंगा और मैं समझता हूं कि देश के बहुसंख्यक नागरिक भारत में इस समुदाय को कभी मान्यता नहीं देंगे।
भारत में ऐसे विकृत शौक और मानसिकता को बढ़ावा देने में बालीवुड की एक भूमिका है। इसे भी तत्काल रोकने की जरूरत है। अन्यथा, लीक से हटकर और कमाऊ फिल्म बनाने की होड़ में ‘फायर’, ‘दोस्ताना’ जैसी फिल्में समाज में विकृति पैदा करती रहेगी। वैसे, सच तो यह भी है कि बालीवुड में भी इस समुदाय के सदस्यों की कमी नहीं है, तभी तो सिनेमा बनाने वाले कभी-कभी अपने समाज पर आधारित फिल्मों में ऐसे चरित्रों को भी शामिल करते रहते हैं।
दूसरी भूमिका नवधनाड्य परिवारों की है, जिनके औलाद विदेशों में सुविधाओं के बीच पढ़ते-बढ़ते हैं। ऐसे औलाद विदेश जाकर भारतीय मान्यताओं को इसकदर भूल जाते हैं कि लौटने के बाद भी उन्हें वे मान्याताएं याद नहीं आतीं और आती भी तो उसे वे पिछड़े भारतीयों की मानसिकता कहकर खारिज कर देते हैं। परिणामस्वरूप उन जैसे के बीच ऐसे उटपटांग संबंध बनने लगते हैं। और जब उनके अजीब शौक पर सामाजिक, कानूनी मान्यताएं भारी पड़ने लगती है तो तब उन्हें ध्यान आता है कि यह तो उनकी स्वतंत्रता और मानवाधिकार का हनन है। पर उन्हें कभी यह अहसास नहीं होता कि उनके कृत्य भारतीय मूल्यों का हनन है। ऐसे लोगों के किसी भी स्तर के समुदाय को भारत में कभी मान्यता नहीं मिलनी चाहिए।

देश के आंतरिक मामलों में अमेरिकी दखल नाजायज

उदय केसरी
पहले भारत दौरे पर आये अमेरिका के विदेश उप मंत्री विलियम बनर्स ने कहा कि कश्मीरियों की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता फिर से शुरू होनी चाहिए। फिर एक खबर आई कि अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) की एक टीम जून-जुलाई में भारत का दौरा करने वाली है। यह अमेरिकी आयोग अपनी टीम की रिपोर्ट के आधार पर यह तय करेगा कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के क्या हालात हैं। इन दो खबरों से ऐसा नहीं लगता कि अमेरिका हमारे देश के आंतरिक मामलों में कुछ ज्यादा ही दखल देने की कोशिश कर रहा है? आखिर अमेरिका को यह अधिकार किसने दे दिया कि वह किसी भी देश के अंदर-बाहर के मामलों में हस्तक्षेप करे?

वैसे, अमेरिका के बारे में यह बात पूरा विश्व समझता है कि वह कोई भी हस्तक्षेप, विरोध या समर्थन अपने स्वार्थ को केंद्र में रखे बिना नहीं करता। कश्मीर और धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में अमेरिका का स्वार्थ विश्व पटल पर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में इकलौता नाम भारत की बढ़ती ख्याति की गति को कमजोर करना तथा पाकिस्तान का पक्ष लेकर उसे अपने दुश्मन नंबर एक ओसामा बिन लादेन और उसके संरक्षक तालिबान का सफाया करने के लिए इस्तेमाल करना हो सकता है। चाहें इसके लिए भारत में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से ऑंखें ही क्यों न मूंदनी पड़े। अभी मुंबई हमले के घाव भरे भी नहीं है और न ही इसके लिए दोषी आतंकियों को सबक सिखाया जा सका है , अमेरिका भारत को कश्मीर मुद्दे पर बातचीत शुरू करने की नसीहत देने लगा है। यानी भारत की संप्रभुता और अस्मिता पर आतंकियों के हमले, अमेरिका के टविन टावर पर हुए हमले के आगे कोई महत्व नहीं रखते हैं, जिसके बदले की आग सात साल बाद भी अमेरिका के सीने में धधक रही है।

दरअसल, अमेरिका की आदत वैसे धनाड्य की तरह है, जो धन के बल पर पूरी दुनिया को अपना नौकर बनाना चाहता है और जिसे अपने अभिमान के आगे दूसरे के स्वाभिमान की कोई परवाह नहीं। अश्वेत होने के बावजूद अमेरिका का राष्ट्रपति निर्वाचित होकर इतिहास रचने वाले बराक ओबामा एक तरफ तो दुनिया के मुसलमानों को पटाने कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरह, उनके विदेश उप मंत्री विलियम बनर्स को कश्मीर की जनता की चिंता होने लगी है। इसका हल उन्हें भारत-पाक शांति वार्ता को आगे बढ़ाने में दिखता है। अमेरिका को कश्मीर में आतंकवाद की समस्या नहीं दिखती। उसे कश्मीर में सक्रिस आतंकी संगठनों के बारे में मालूम नहीं कि वे कहां से और कैसे संचालित हो रहे हैं? फिर भी यदि अमेरिकी नजर में भारत-पाक वार्ता से ही कश्मीर मुद्दे का हल निकल सकता है, तो यह भी साफ तौर पर जाहिर है कि कश्मीर में आतंकवाद की समस्या पाकिस्तान की देन है और ऐसे में वार्ता तभी संभव हो सकती है, जब पाकिस्तान अपने आतंकियों को पूरी तरह से निष्क्रिय करे।...जो पाकिस्तानी सरकार के बस की बात नहीं है, क्योंकि वहां सत्ता का केंद्र संसद ही नहीं, सेना और आईएसआई भी है। पाकिस्तानी शासन व्यवस्था की यह हास्यास्पद स्थिति अब गोपनीय नहीं रह गई है।

अमेरिका का दूसरा हस्तक्षेप भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का मूल्यांकन है। इसके लिए अमेरिकी टीम को भारत में सर्वे करने की अनुमति यूपीए से पहले किसी सरकार से नहीं मिली। पर, परमाणु करार के बाद भारत-अमेरिकी संबंधों में आई मधुरता का परिणाम है कि यूएससीआईआरएफ की टीम को भारत दौरे की अनुमति मिल गई। लेकिन इससे देश के हिन्दूवादी संगठनों को मिर्ची लग गई हैं, जबकि ईसाई संगठनों ने इसका स्वागत किया है। इस मुद्दे पर हिन्दूवादी और ईसाई दोनों ही संगठनों की प्रतिक्रिया क्या सही है? यदि केवल अमेरिकी टीम के आने की खबर पर ही एक उसका विरोध करे और दूसरा स्वागत, तो असमानता तो यहीं दिख जाती है। यानी दोनों धर्म के ठेकेदारों को इससे कोई मतलब नहीं कि अमेरिका दूसरे देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की जांच करने के नाम पर कैसे अपनी दादागिरी साबित कर रहा है, बल्कि आपसी भेदभाव की तुष्टी किस मुद्दे से होती है, केवल इससे मतलब है, ताकि उनकी धर्म की ठेकेदारी बदस्तूर चलती रहे।

खैर, यह स्मरणीय है कि अमेरिका के यूएससीआईआरएफ के कमिश्नारोँ की नियुक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति करते हैं और दुनिया के देशों में मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता पर बनने वाली अमेरिकी नीति में इस आयोग की रिपोर्ट खासी मायने रखती है। यह आयोग हर साल रिपोर्ट जारी करता है और अमेरिकी विदेश विभाग इस आधार पर कार्रवाई करता है। इसी कमिशन की रिपोर्ट के आधार पर गुजरात के मुख्यमंत्री को 2005 में अमेरिका का वीजा नहीं मिला था। 2009 के लिए 1 मई को जारी रिपोर्ट में आयोग ने दुनिया के 13 देशों-जिनमें चीन, नॉर्थ कोरिया और पाकिस्तान शामिल हैं को कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न (सीपीसी)की कैटगरी में रखा है। कमिशन के संविधान के मुताबिक सीपीसी की श्रेणी में उन देशों को रखा जाता है जहां किसी खास धर्म या मत के अनुयायियों (मानने वालों) को हिंसा का शिकार बनाया गया हो । पिछले 10 सालों में कमिशन की यह सबसे विस्तृत रिपोर्ट है।

आस्ट्रेलिया बनाम मुंबई और बाहरी छात्रों पर हमला

उदय केसरी
आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर नस्ली हमले से शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे नाराज हैं। उन्होंने इसके बदले में आईपीएल से आस्ट्रेलियाई टीम को बाहर करने और भारत में निवेश कर रही आस्ट्रेलियाई कंपनियों को चेताने की मांग की है। ठाकरे साहब का यह बयान कुछ हजम नहीं होता। जब मुंबई में किसी बिहारी छात्र को बाहरी होने के कारण बुरी तरह से पीटा जाता है। तब ठाकरे साहब इसके प्रायोजक अपने भतीजे राज ठाकरे के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाते हैं? क्या यह नस्ली हमला नहीं है? आस्ट्रेलिया में किसी भारतीय छात्र पर हमले से जो दर्द उस छात्र व उसके भारत में रहने वाले परिजनों को हो रहा है, क्या बिहार के छात्र व उसके परिजनों को नहीं होता?
होता है? मगर मुंबई में बाहरी छात्रों पर हमले के वक्त पार्टी का राजनीतिक स्वार्थ मानवीय संवेदना से ज्यादा अहम हो जाता है। वैसे, अभी तक इस मामले पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे की प्रतिक्रिया नहीं आई है। वह तो अपने चाचा जी के बयान में दो-चार और धमकी जोड़कर भारत में आस्ट्रेलियाई नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग कर सकते हैं। लेकिन सवाल है कि भाषावाद व क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली शिव सेना व मनसे को आस्ट्रेलिया के उपद्रवियों और अपने कार्यकर्ताओं में वैचारिक दृष्टि से क्या अंतर दिखता है?

पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले की खबर पढ़कर मुझे तो बार-बार मुंबई में रेलवे की परीक्षा देने गए एक बिहारी छात्र के साथ बेरहमी से की गई मारपीट की घटना याद आती है। मन में यही सवाल उठता है कि आस्ट्रेलिया के उपद्रवी लोग मुंबई के मनसे कार्यकर्ताओं जैसी हरकत क्यों कर रहे हैं? कहीं राज ठाकरे राजनीति की पाठशाला लेने आस्ट्रेलिया तो नहीं चले गए! या फिर आस्ट्रेलिया के उपद्रवियों को हाल में मुंबई में बिहारी छात्रों के साथ मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा की गई मारपीट इतनी पसंद आ गई कि उसी राह पर चल पड़े।
अपने मुख पत्र सामना में बाल ठाकरे ने आईपीएल के मालिकों विजय माल्या, प्रीति जिंटा व शाहरूख खान को राष्ट्रवाद की नसीहत देते हुए कहा है कि उन्हें राष्ट्रवाद की खातिर आईपीएल से आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को निकाल देना चाहिए।...क्या यह दोहरी बात नहीं लगती? अपने देश में भेद-भाव हो तो कोई बात नहीं, गैर देश में तो बुरी बात।

दरअसल, मैं यह सब बातें कर आस्ट्रेलिया के उपद्रवियों को सही ठहराने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। यह तो सर्वथा गलत और संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है। जिन भारतीय छात्रों पर हमले हो रहे हैं, उनसे आस्ट्रेलियाई स्कूल, कालेजों व विष्वविद्यालयों को भारी आय भी होती है। और फिर यदि वहां की सरकार को भारतीय छात्रों के आने से कोई दिक्कत नही है ंतो वहां के उपद्रवियों को पहले अपनी सरकार से लड़ना चाहिए। वैसे, आस्ट्रेलियाई उपद्रवियों को यह समझ लेना चाहिए कि अपने घर-परिवार से दूर भारतीय छात्रों पर हमले करना कोई बहादुरी नहीं, कायरता है। यह बात वहां की सरकार को भी समझनी चाहिए कि ऐसी घटनाओं से दुनिया भर से पढ़ाई करने के लिए आस्ट्रेलिया आने वाले छात्रों व परिजनों के बीच उनके देश की छवि धूमिल हो रही है, जो इस मंदी के दौर में नुकसान की एक बड़ी वजह बन सकती है।
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सीधीबात पर प्रकाशित होने के दूसरे दिन यानी 10 जून 09 को हिन्दी दैनिक अमर उजाला, दिल्ली में साभार प्रकाशित यह लेख। इसकी कॉपी हमें भेजा ब्लॉगर साथी श्री रामकृष्ण डोंगरे ने ...धन्यवाद!




...उतने परमाणु बम तो भारत के पास भी हैं

उदय केसरी
अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट को भारत के लिए चिंता का सबब बताया जा रहा है। खबर यह है कि पाकिस्तान के पास करीब 60 परमाणु बम हैं और इनमें ज्यादातर के निशाने पर भारत के प्रमुख शहर हैं। यह भी कि पाकिस्तान और परमाणु बम बनाने के लिए विखंडनीय सामग्री तैयार करने में लगा है।...क्या वाकई में यह खबर जम्बो मंत्रिमंडल वाली केंद्र की यूपीए-2 सरकार की चिंता बढ़ा सकती है?...अगर ऐसा होता तो अब तक इसपर भारत की प्रतिक्रिया भी आ जाती।

दरअसल, परमाणु बम केवल पाकिस्तान के पास ही नहीं हैं। एक अनुमानित सूची के मुताबिक भारत के पास भी करीब 60 परमाणु बम हैं। बस उन बमों के निशाने पर कौन है, यह गोपनीय तथ्य है। इसी तरह बाकी प्रमुख देशों के पास भी परमाणु बम उपलब्ध हैं। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट भारत से अधिक विश्व समुदाय के लिए चिंताजनक है कि परमाणु अप्रसार संधि आदि कई प्रयत्नों के बाद भी पाकिस्तान जैसे देश, जिसकी अर्थव्यवस्था सालों से कर्ज के पहिये पर चल रही है, वह भारत के खिलाफ भारत जितने ही परमाणु बम बना रखे हैं। इस पर चिंता तो अमेरिका अधिक होनी चाहिए, जिससे कर्ज और अनुदान के रूप में अरबों डालर लेकर पाकिस्तान विश्व विध्वंशक हथियार जुटाने में लगा है। जबकि अमेरिका आतंक से लड़ने के नाम पर पाकिस्तान को आर्थिक मदद करता रहा है।

दरअसल, शीत युद्ध के एक-डेढ़ दशक बाद से पूरे विश्व में परमाणु बम बनाने की होड़ मची है। इसके परिणामस्वरूप विश्वभर में 23,300 से अधिक परमाणु बम बन चुके हैं। इनमें 8190 से अधिक बम तत्काल इस्तेमाल के लिए तैयार हैं, जिनमें 2200 बम तो अमेरिका और रूस के पास उपलब्ध हैं। विभिन्न देशों में उपलब्ध परमाणु बमों की वास्तविक संख्या तो गोपनीयता का प्रश्न है, फिर भी जो सूचनाएं लीक होकर आती रही हैं, उसके मुताबिक एक अनुमान के आधार पर विश्व में परमाणु बमों की स्थिति इस प्रकार है-
देश परमाणु बमों की संख्या
रुस 13000
अमेरिका 9400
फ्रांस ३००
चीन 240
यूके 185
इजरायल 80
पाकिस्तान 60
भारत 60
नार्थकोरिया 10
अब ऐसी दशा में क्या फर्क पड़ता है किस बम का मुंह किधर है। भारत जानता है कि बंटवारे के बाद से पाकिस्तान का रवैया भारत के प्रति भीतरघात का रहा है। और यह इसमें कोई दो राय भी नहीं है। पाकिस्तान के रावलपिंडी में 1965 से परमाणु कार्यक्रम शुरू हो चुका था, जो लगातार जारी है। जब पाकिस्तान को अपने देश की शासन व्यवस्था व विकास पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए था, तब से वह भारत के खिलाफ घातक से घातक हथियार जुटाने में लगा रहा है। उसी का परिणाम है कि आज सबसे अधिक मंदी, गरीबी व भूखमरी और अस्थिर शासन व्यवस्था का शिकार पाकिस्तान है।
लेकिन आश्चर्य यह कि गठन से लेकर अब तक पाकिस्तान के हुक्मरानों को अपने देश में स्थायी शांति व्यवस्था व सरकार की चिंता नहीं हुई है। पाकिस्तान की अधिकांश ऊर्जा अब तक भारत विरोधी गतिविधियों और साजिशों में खर्च होती है। इसलिए अमन पसंद भारत के लिए भी यह जरूरी है कि पाकिस्तान के सिरफिरे हुक्मरानों को काबू में रखने के लिए उनके हरेक सवाल का जवाब तैयार रखे।

....पर देश की जय युवा पीएम से ही होगी

उदय केसरी
कांग्रेस की तो जय हो गई, लेकिन सर्वाधिक युवा आबादी वाले इस देश की जय युवा पीएम के हाथों की हो सकती है। जैसा कि मैं पहले भी कहता रहा हूं (युवा भारत की डोर क्‍यों न हो युवा हाथों में?) कि राहुल गांधी में वह तेवर परिलक्षित होता है, जिसकी जरूरत हिन्दुस्तान को है। बेशक राहुल गांधी फिलहाल की भारतीय राजनीति में एक पाक।साफ दामन वाले युवा नेता हैं, जिनकी बातों में युवा सोच समझ व सर्वोपरि राष्ट्रीयता के मूल्य प्रतिध्वनित होते हैं। बिल्कुल अपने पिता स्व राजीव गांधी की तरह।

15वीं लोकसभा चुनाव के जनादेश पर भी यदि गौर फरमाएं तो मनमोहन की विनम्रता से अधिक राहुल गांधी का भरोसा जनता को अपनी तरफ खीचने में कामयाब रहा है। इसे एक युवा की निष्कपट कोशिश का जादू कह सकते हैं, जिसका प्रतिफल उम्मीद से ज्यादा है। देश की जनता ने चूहे-बिल्ली का खेल खेलने वाली नेताओं व उनकी पार्टियों को औकात बता दिया है। खासकर गरीबी व बुनियादी परिवर्तन की बस बात करने वाले वाम दलों को इस चुनाव में जनता ने पूरी तरह से खारिज कर यह बता दिया है कि उन्हें बहुत देर तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। वहीं, लालू यादव, रामविलास पासवास, मुलायम सिंह यादव सरीखे अवसरवादियों को भी जनता ने झटक दिया है।

वामपंथी राज्यों केरल व पश्चिम बंगाल में वाम दलों का सफाया हो जाना, कोई साधारण बात नहीं। कहते हैं इन राज्यों की जनता बाकी राज्यों से अधिक जागरूक व शिक्षित हैं, तो वामदलों को अब यह समझ लेना चाहिए कि उनके सिद्धांत और व्यवहार के बीच के अंतर पर डला हुआ लाल रंग का पर्दा उठ चुका है। जनता जान चुकी है लाल झंडे वालों की कथनी और करणी में फर्क। देश की जनता को राजनीतिक स्थितरता चाहिए, जिससे ही विकास की उम्मीद की जा सकती है।

राजनीतिक स्थिरता की कसौटी पर कांग्रेस को छोड़ बाकी सभी दल बेकार साबित हो चुके हैं। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बीजेपी को भी जनता मौका देकर देख चुकी है। वह भी एक से अधिक बार। और अब बीजेपी में तारणहार नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी नहीं हैं। इसलिए उसे तो मुंह की खानी ही थी। पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी को तो टिकट कटवानी ही नहीं चाहिए थी। क्योंकि 15वीं लोकसभा चुनाव की जनता एक्सप्रेस पर विकास पुरुषों को टिकट कनफर्म होना तय था। बाकी लौहपुरुषों के लिए इस ट्रेन में कोई जगह नहीं थी, लेकिन वह इतने अनुभवी व बूढ़े राजनीतिक होने के बावजूद नहीं समझ पाये।

खैर, इस चुनाव परिणाम के बाद हिन्दुस्तान की जनता को भोली-भाली समझने वाले नेता भी सावधान हो जाएं। वोट प्रतिशत केवल आबादी बढ़ने से नहीं बढ़ा है। जनता में जागरूकता भी बढ़ी और अब वह भी नेताओं के चाल, चरित्र व चतुराई को समझने लगी है। वोटरों में युवाओं की संख्या भी बढ़ी है, जिनमें भरोसा जगाया है राहुल गांधी सरीखे ईमानदार युवा नेताओं ने।

राहुल गांधी द्वारा भारतीय राजनीति में युवा ब्रिगेड बनाने की पहल सराहनीय है। देश को प्रगति की रफ्तार प्रदान करने के लिए इसकी बेहद जरूरत भी है। बेहतर तो यह होगा कि इस पहल से अन्य राष्ट्रीय दल भी सबक लें। लेकिन इसकी संभावना बेहद कम नजर आती हैए क्योंकि राजनीति में जड़ जमाकर बैठे बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार करना इतना आसान नहीं है। इसके लिए देश के युवा मतदाताओं को ही कुछ करना होगा।

शायद देश के युवा मतदाता इसी दिशा में बढ़ रहे हैं कम से कम इस चुनाव परिणाम से तो ऐसा ही प्रतीत होता।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का विद्रूप चेहरा और चंद इतर बातें

चंद इतर बातें
वाकई में विवाह व्यक्ति को व्यवस्थित बनाता है। वरना, मैं तो इससे पूर्व पूरी तरह से अव्यवस्थित व अराजक जीवन शैली में मस्त था। व्यवस्थितों को देख मुझे थोड़ा अजीब लगता था। सोचता कि लोग क्यों अपना इतना वक्त और पैसा फालतू की व्यवस्था पर खर्च करते हैं। क्या बिन पर्दे के कमरे में नहीं रहा जा सकता, डायनिंग टेबल, महंगी क्राॅकरी में खान-पान किये बगैर जिंदगी नहीं चलती। अरे भई चलती है, मगर खानाबदोसों की तरह। और अब तो खानाबदोस भी काफी कुछ व्यवस्थित हो गए है। उनकी तो पूरी गृहस्थी एक वाहन पर सजी रहती है। बस, छांव देखकर उन्हें ब्रेक लगाना होता है।

खैर, छोड़िए, आप सोच रहे होंगे आज यह उदय केसरी कैसी बातें कर रहा है।... तो आदरणीय ब्लाॅगर बंधुओं व सीधीबात के पाठकों, हित-परिजनों व आप सबों की शुभकामनाओं के फलस्वरूप अब मेरा भी बैचलर्स या कहें अव्यवस्थित व अराजक जीवन शैली से मोहभंग हो गया है। हाल में विवाह संपन्न होने के बाद से किराये की नई फलैट में गृहस्थी संवारने के हर आवश्यक वस्तुओं की जुगाड़ व खरीद में लगा हूं। रसोई, जैसा कि हर गृहस्थी का सबसे अहम विभाग होता है। हमारे लिए भी है, जहां से हर रोज नीत-नये डिमांड के पर्चे जारी होते रहते हैं। कभी, ऐसे-ऐसे मसालों के नाम पर्चें में होते हैं,जिनका मेरे वक्त की रसोई में कोई उपयोगिता नहीं थी। वहीं टीवी, फ्रीज, कूलर व वाशिंग मशीन भी गृहस्थी के अभिन्न अंग हैं। यह भी समझ में आ गया।...पर एक बात कहूं...यह सब शादी से पूर्व सुनकर अजीब जरूर लगता है, पर शादी बाद पैसे जोड़-जोड़कर एक-एक चीज खरीदने में काफी खुशी मिलती है। लगता है जैसे हरेक चीज कोई वस्तु नहीं, जीवन का सुकून है। कम से कम मैं तो ऐसा ही महसूस कर रहा हूं।...

जीवन के एक नये सत्र में प्रवेश के कारण सीधीबात के लिए लेखन से काफी दिनों तक दूर रहा। पारिवारिक व्यस्तताओं के कारण राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों व घटनाक्रमों से भी लगभग अछूता रहा। पर अब लौटकर जब से एडिटोरियल प्लस आया हूं।...आप सबों से फिर सम-सामयिक मुद्दों पर बातचीत करने की इच्छा प्रबल हो गई है...

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का विद्रूप चेहरा
आज अधिकतर अखबारों में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का बयान प्रकाशित हुआ है, जो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विद्रूप चेहरे को बेनकाब करता है। हालांकि इस बात का खुलासा पहले भी होता रहा है। लेकिन खुद पाकिस्तान द्वारा यह स्वीकार करना कि तालिबान को खड़ा करने में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के साथ ही पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने मदद की थी, सनसनीखेज है।

कहते हैं साजिशकर्ता कभी-न-कभी अपनी ही साजिश का शिकार भी बनता है। अमेरिका और पाकिस्तान के साथ ऐसा ही हुआ। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ मोर्चा लेेने के लिए अमेरिका ने एक साजिश के तहत तालिबान को खड़ा किया, लेकिन जब ओसामा बिन लादेन के अल-कायदा का अफगानिस्तान में तालिबान से गठबंधन हो गया और इसके पश्चात अमेरिका के खिलाफ 9/11 जैसी अप्रत्याशित घटना को अंजाम दिया गया, तो अमेरिका भौंचक रह गया। परिणामरूवरूप अल-कायदा व तालिबान अमेरिका का नंबर वन दुश्मन बन गया।

अब इधर, पाकिस्तान में जब तक परवेज मुशर्रफ का राज रहा, तालिबानियों से पाकिस्तान की छनती रही। मगर जैसे ही मुशर्रफ हटे, नयी सरकार से तालिबान की पटरी नहीं बैठ सकी। परिणामस्वरूप, स्वात घाटी पर कब्जा और एक के बाद एक बम धमाकों से पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार घबरा गई। उधर, अमेरिका को भी पाकिस्तान की गद्दी से मुशर्रफ के जाने के बाद ही शायद असलियत का पता चला कि उससे अलकायदा व तालिबान से लड़ने के नाम पर धन लेने वाला पाकिस्तान कैसे अंदर-ही-अंदर उसे धोखा दे रहा है। नतीजा यह हुआ कि, अमेरिका ने धन देने में आनाकानी शुरू कर दी।...

ऐसे में अब यदि जरदारी पत्रकारों के समक्ष विभिन्न किताबों के हवाले से यह दावा कर रहे हैं कि अमेरिका ने ही तालिबान को खड़ा किया है, तो यह भी एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का हथकंडा ही है, ताकि अमेरिका पाकिस्तान को धन मुहैया कराने में आनाकानी न करे, क्योंकि तालिबान अब पाकिस्तान का भी दुष्मन हैैै...यही नहीं, यदि अमेरिकी आनाकानी जारी रही तो पाकिस्तान दुनिया के सामने उसकी पोल खोलने में बाज नहीं आएगा।

जीवन की नई कड़ी, नया सफर

मीतेन्द्र नागेश
ब्लॉगर बंधुओं व दोस्तों, इस पोस्ट में मुद्दा न राष्ट्रीय है और न अंतरराष्ट्रीय। क्षेत्रीय भी नहीं है और न ही स्थानीय। मुद्दा है व्यक्तिगत। मुद्दा है एक से दो होने का। दो के बाद का मुद्दा अभी प्रासंगिक नहीं है।...आप शायद समझ गए होंगे, लेकिन फिर भी मैं बताना चाहूंगा...

एक स्वतंत्र पत्रकार राजीखुशी से अपनी स्वतंत्रता खोने जा रहा है। वैसे, उसके दिल की चोरी पहले ही हो चुकी थी, पर पिछले 12 दिसंबर को तब इस चोरी का औपचारिक रूप से खुलासा हुआ, जब उसने दिल चुराने वाली को अपनी मर्जी का छल्ला पहना दिया।...इसके बाद यह चोरी, चोरी नहीं रही, बल्कि लाइफलांग डील में परिवर्तित हो गई।

अब इस डील पर अंतिम मुहर लगने की घड़ी नजदीक आ गई है...वह शुभ घड़ी है 27 अप्रैल, जब अपने गांव बरही में दोनों पक्षों की उपस्थिति में धूम-धड़ाके के साथ यह शुभ डील होगी...जिसके सांक्षी होंगे दोनों पक्षों के रिश्‍तेदार, मित्र व परिचित....जिसमें आप भी सादर आमंत्रित हैं।...

अब आपकी सबसे अहम जिज्ञासा दूर करता हूं कि यह स्वतंत्र पत्रकार है सीधीबात के प्रमुख लेखक उदय केसरी और दिल चुराने वाली हैं एक टीचर संगीता केसरी, ये दोनों मूलतः एक ही जगह यानी बरही (हजारीबाग), झारखंड के निवासी हैं।

बहरहाल, कुदरत के संयोग भी निराले होते हैं। इन दोनों को एक ही शहर, एक ही मोहल्ले में भेजा, लेकिन मिलाया इतने सालों बाद...।

यूं तो,
एक बार मिलता है जीवन,
लेकिन इस एक बार के जीवन में,
बार-बार जुड़ती रहती है,
जीवन की नई-नई कड़ियां।
और,
फिर शुरू होता है जीवन का
एक और नया सफर।
-पत्थर नीलगढ़ी

...तो क्या देश की व्यवस्था भ्रष्टाचारियों का पोषक है?

उदय केसरी
हालांकि टाइटलर को क्लीनचीट, चिदंबरम को जूता व वरूण के जहरीले भाषण के मुकाबले काले धन की देश वापसी का मुद्दा फिलहाल नरम पड़ गया है। लेकिन अन्य मुद्दों की गर्मी तात्कालिक है, काले धन की देश वापसी का मुद्दा अहम और विचारणीय है। यह मुद्दा हमारे देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, जिसमें सेंध लगाने वाले देश के भ्रष्ट नेताओं और बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के अरबों रुपये स्विस बैंकों के गोपनीय खातों में जमा हैं। यह मुद्दा नया नहीं, पुराना है। आजादी के बाद से ही स्वीट्जरलैंड के बैंकों में भारत से काला धन जमा होने का सिलसिला शुरू हो चुका था। स्वीस बैंकों में साल-दर-साल भारतीय खातों की संख्या बढ़ती गई। यानी भारत से काले धन की आमद लगातार बढ़ती रही।

हालांकि भारतीय खातों और उनमें जमा रकम के बारे में वास्तविक स्थिति की जानकारी भारत को नहीं है, क्योंकि ये खातें स्वीस बैंकों की नीति के तहत अत्यंत गोपनीय रखे जाते हैं, फिर भी स्वीस बैंकिंग एसोसिएशन की सालाना रिपोर्ट के जरिये इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इस एसोसियेशन की 2008 की रिपोर्ट के मुताबिक स्वीस बैंकों में काला धन जमा करने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत का स्थान 1891 अरब डालर की रकम के साथ सबसे ऊपर है। शेष चार देशों में दूसरे नंबर पर रूस (610 अरब डालर), तीसरे नंबर पर चीन (213 अरब डालर), चौथे नंबर पर यूके (210 अरब डालर) व पांचवें नंबर पर यूक्रेन (140 अरब डालर) हैं। वहीं बाकी दुनिया के देशों को मिलाकर स्वीस बैंकों में महज 300 अरब डालर ही जमा हैं।

अब यदि इस रिपोर्ट को सच मान लिय जाए तो भारत के खातों में जमा धन (1891 अरब डालर ) का आंकड़ा क्या चैकाने वाला नहीं है? यदि इसे 45 रूपये प्रति डालर के ही भाव से रूपांतरित करें तो यह आंकड़ा 85,09500 करोड़ रुपये के करीब होगा। वैसे अभी डालर का भाव मुद्रा बाजार में 49 रूपये चल रहा है।...तो क्या कहेंगे अपने देश की कमाई के बारे में?...क्या अपना देश वाकई में गरीब है? या इसे भ्रष्टाचारियों ने गरीब बनाकर रखा है?

खैर, इन सवालों पर विचार करने से पहले इस भारी-भरकम काले धन की क्षमता पर विचार करके देखें तो पायेंगे कि यदि देश के तमाम बैंकों में जमा रकम को इकट्ठा कर दिया जाए तो भी वह स्वीस बैंकों में भारत के खातों में जमा कुल रकम के बराबर नहीं होगा। यही नहीं, मसलन, यह रकम भारत की रक्षा मद पर वर्ष 2008-09 में खर्च हुई राशि 1,05600 करोड़ रूपये से भी करीब 85 गुणा अधिक है।
काले धन के बारे में इन आंकड़ों की विशालता से क्या ये सवाल नहीं खड़े होते कि भारतीय शासण व प्रशासन की व्यवस्था भ्रष्टाचारियों का पोषक है? भ्रष्टाचार के विरूद्ध, जो भी कानून हैं, वह केवल छोटे लोगों के लिए सशक्त हैं?...तो क्या देश की अर्थव्यवस्था में सेंध लगाने वालों को कभी नहीं रोका जा सकता? कम से कम बोफोर्स, चारा, प्रतिभूति, दवा, स्टाम्प आदि-आदि अनेक घोटालों में आरोपियों पर अबतक जो कार्रवाइयां हुई है, उससे तो ऐसा ही लगता है।

खैर, यदि केंद्र में प्रतिपक्ष के नेता और पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी की बात करें, जिन्होंने ठीक चुनाव के वक्त काले धन का मुद्दा उठाया है, तो क्या इतने वृद्ध पुरुष को पिछले 50-55 सालों से जारी इस काले कारनामें पर पहले कभी ध्यान नहीं गया? भाजपा नेतृत्व की एनडीए की सरकार में उपप्रधानमंत्री रहते हुए भी नहीं। अब कांग्रेस तो भ्रष्टाचारियों का सबसे सेफ पार्टी रही है, लेकिन इतने बड़े मुद्दे को लेकर भाजपा ने पहले से कोई बवाल क्यों नहीं किया?....जिन गरीबों के हक मार कर स्वीस बैंक में काला धन जमा किये गए, उनकी मौत और तबाही की चिंता पहले नहीं हुई?

दरअसल, जैसा कि पहले भी कह चुका हूं कि ये काले धन भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट आईएएस, आईपीएस, आईआरएस अधिकारियों द्वारा जमा कराये गए हैं, जबकि ये ही हमारे देश के नीति-नियंता भी है,,,तो आखिर कोई आवाज उठाये भी, तो इनके खिलाफ कार्रवाई कौन करे? वैसे भी ईमानदार नेता व अधिकारी इस देश में अल्संख्यकों से भी कम रह गए हैं, तो फिर क्या गारंटी है कि एक बार किसी तरह से स्वीस बैंकों से काले धन को वापस ले भी आया जाए, तो उस धन को फिर काला बनाकर वापस स्वीस बैंकों में जमा नहीं कराया जाएगा?....बंधुवर, भारत में दो तरह के मुद्दे होते हैं,एक राजनीतिक चुनाव जीतने वाले, जिसे चुनाव जीतने के बाद भूल जाने की परंपरा है और दूसरा, मुद्दा विकास व सुधार करने वाले, जिसे अक्सर गैर-राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता उठाते हैं और जिसपर सालों-साल संघर्ष करने पर सफलता हाथ लगती है। सच कहें तो वर्तमान परिस्थिति में दूसरे तरह के मुद्दे भी राजनीतिकों के अपने नफा-नुकसान की शर्त ही सफल होते हैं।

बहरहाल, अंत में मैं आमीर खान का नारा ‘सच्चे को चुनें, अच्छे को चुनें’ बुलंद करते हुए कहना चाहूंगा कि चुनावी मुद्दों पर पाखंडी नेताओं के क्षणिक जोश में कतई न आएं, थोड़ा गौर से सफेदपोशों के अंदर झांक कर भी देख लें, सफेद कपड़ों पर काले धब्बे जल्द ही नजर आ जाते हैं।

एक उम्मीद हमें भी

मीडिया को चौथी दुनिया और इसके क्रिया-कलाप को पूर्णतः प्रोफेशनल करार देते हुए श्री नीलेश द्विवेदी ने इस दुनिया के पत्रकारों के कुछ नाजायज उम्मीदों का व्यंग्य रूपांतरण किया है। वर्तमान में मीडियाकर्मियों के लिए यह लेख वाकई में आईना दिखाने वाला है।
'एक उम्मीद' कितना अच्छा ध्येय वाक्य है। सुनकर और सोचकर बांछें खिल जाती हैं और मन में मिश्री सी घुलने लगती है कि उम्मीद अब पूरी हुई कि तब। लेकिन इंसानी उम्मीदें हैं कि पूरी ही नहीं होतीं न पहली दुनिया (विकसित देश) में न दूसरी दुनिया (विकासशील देश) में। तीसरी दुनिया (अविकसित देश) में तो इसके पूरा होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। शायद इसीलिए जाने-माने शायर कैफी आज़मी ने लिखा था, 'इन्सां की ख्वाहिशों की कोई इंतेहा नहीं, दो गज जमीं भी चाहिए दो गज कफ़न के बाद।' लेकिन कैफी आज़मी ने जब लिखा था तब चौथी दुनिया (पत्रकारिता) का स्वरूप कुछ अलग था। इस दुनिया का हर बाशिंदा किसी न किसी मिशन में लगा रहता था। सो, उस समय इस दुनिया के लोगों की उम्मीदें भी अधूरी रह जाती थीं लेकिन अब तो चौथी दुनिया का पूरा मामला ही पूरी तरह 'प्रोफेशन' पर आ टिका है। लिहाजा, यहां हर शख्स अपनी दबी-कुचली उम्मीदों (इसे कुण्ठा पढ़ें) को पूरा करने में लगा है। सो, भैया अब हमारी (मेरी) भी उम्मीद या कहिए कि उम्मीदें इन दिनों ठाठें मार रही हैं। आखिर हम (मैं) भी इसी दुनिया के बाशिंदे हैं तो फिर हम पीछे क्यों रहें भला?

उम्मीद है, हम भी कि किसी दिन किसी अखबार या चैनल में खोजी पत्रकार के तौर पर स्थापित हो जाएं और कुछ विश्वसनीय-अविश्वसनीय से स्टिंग ऑपरेशन करके दाम कमा लें। जहां दाम न मिले वहां नाम मिलना तो तय है ही। किसी मीडिया संस्थान में भारी-भरकम से राजनीतिक सम्पादक टाइप के कुछ हो जाएं और जब भी चुनाव आएं तो अगले पांच साल के लिए अपने और अपने बीवी-बच्चों के खाने-खर्चे का इन्तजाम कर लें। आजकल वैसे भी राजनीतिक दलों और ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने इस सत्य को तहे-दिल से स्वीकार कर लिया है कि चुनाव के दौरान राजनीतिक खबरों को छापने-रोकने के एवज में पैसों का आदान-प्रदान तो होना ही है।

लिहाजा, दोनों ही पक्ष म्यूचुअल अन्दार्स्तान्डिंग के तहत लेने-देने के लिए एकदम तैयार हैं। तो हम इस बहती गंगा में हाथ क्यों न धोएं? फिर जब अपनी अण्टी में पैसे पर्याप्त हो जाएं तो किसी राजनीतिक दल से सैटिंग कर राज्यसभा में दाखिला ले लें। कम से कम जिन्दगी भर की पेंशन तो बंध जाएगी। इस जगह पहुंचकर सम्मान-वम्मान तो हाथ का मैल है, आते-जाते ही रहेंगे इसलिए हमें इनकी ज्यादा फिक्र भी नहीं और फिर इनमें रकम भी कुछ ज्यादा नहीं मिलती, लाख-दो लाख बस! कहीं कहीं तो 25-50 हजार में ही टरका देते हैं इसलिए इसकी ज्यादा चिन्ता करना, हमारे हिसाब से, मुनासिब नहीं।
हमें तो उम्मीद है कि किसी चैनल का सर्वेसर्वा बन जाएं, फिर चाहे वह कोई क्षेत्रीय या स्थानीय चैनल ही क्यों न हो। अब कोई पूछेगा कि इससे क्या फायदा? तो भैया इसके तो फायदे ही फायदे हैं। चैनल का कैमरा और डण्डा (माइक) तो ऐसी चुम्बक है जिसे देखते ही मुफ्त की दारू और लडक़ी का इन्तजाम यूं खिचा आता है मानो गुड़ से मक्खी! तो छककर भोगेंगे, ससुरी दोनों को। पैसे के इन्तजाम की तो चिन्ता ही मत करिए भैया! अपने चैनल में काम करने वाले लडक़े-लड़कियों से कह देंगे कि जाओ-कमाओ-खाओ और हमें भी खिलाओ। ज्यादा हुआ तो अपने चैनल की कुछ सन्दर सी लड़कियों को छोटे-छोटे कपडों में (कभी मौका लगा तो बिना कपड़ों के भी) मॉडलिंग रैम्प पर 'बिल्ली चाल' चलवा देंगे। जुगाड़ लग गई तो 'नैकेड न्यूज' टाइप का कोई कार्यक्रम शुरू करवा देंगे। पैसे अपने-आप बरस पड़ेंगे और देखने वालों को नयनसुख मिलेगा सो अलग।
उम्मीद है कि चैनल के न बन पाएं तो किसी बड़े अखबार के ही सम्पादक-वम्पादक टाइप का कुछ बन जाएं। अपने संस्थान के कर्मचारियों- चाहे वे महिला हों या पुरुष- पर जमकर अपनी अकड़ दिखाएं और मनमानी करें। जब चाहे उन्हें हाथ पकडक़र धक्के-देकर बाहर निकाल दें, बिल्कुल किसी सिरफिरे अफसर की तरह। जो हमारे खिलाफ आवाज उठाए उसकी तो अपने रसूख का फायदा उठाकर मट्टी-पलीत ही कर डालें ताकि दोबारा कभी और कोई भी हमारे खिलाफ सिर या आवाज न उठा सके। पैसे का बन्दोबस्त तो हम यहां भी कर लेंगे गुरू! अब पूछो कैसे? बहुत आसान है। जो हमारी मुखालफत करेंगे उनके साथ सुहानुभूति जताते हुए कुछ दीगर संस्थानों के लोग भी उनके साथ हो लेंगे और हमारे विरुद्ध टीका-टिप्पणी करेंगे। बस यहीं धर लेंगे इन लोगों को, लगा देंगे मानहानि का मुकदमा और मांग लेंगे 10-15 लाख रुपए। अब ये तो हम ही जानते हैं न कि हमारा मान-वान तो कुछ रहा नहीं फिर हानि कैसी, दूसरा थोड़े ही न जानता है?

हमें भैया, न्यायाधीश की भूमिका निभाने की भी उम्मीद है। लेकिन यह भी तभी हो सकता है, जब हम किसी ऊंचे पद पर पहुंच जाएं। फिर हम अपने हिसाब से खबरों को खबर सरीखा न दिखाकर फैसलों सरीखा दिखाया करेंगे। जिसे मर्जी आए उसे जहरीला कह देंगे और जिसको इच्छा हुई उसे साम्प्रदायिक करार देंगे। जिसका चाहेंगे उसका अच्छा ही अच्छा पक्ष दिखाएंगे और जिसका चाहेंगे सिर्फ बुरा ही बुरा। सबको बढ़-चढक़र बताएंगे कि जो हमने दिखाया-सुनाया या लिखा उसे पढऩे-देखने वाला प्रभावित हो रहा है और इससे एक ओपिनियन तैयार हो रही है। हालांकि ऐसा होता-वोता कुछ नहीं है, यह भी हमारे जैसे लोगों के अलावा ज्यादा कोई जाानता नहीं, तो चिन्ता कैसी?

पर पूरी सच्चाई और ईमान से कहूं तो हमारे अन्दर एक ज़मीर जैसी कोई चीज़ है चीख-चीखकर भगवान से मना रही है कि हमारी ये उम्मीदें कभी पूरी न हों। और हम भी ठण्डे दिमाग से सोचते हुए अपने ज़मीर की आवाज़ के साथ आवाज़ मिलाकर खुदा से कह रहे हैं....आमीन, आमीन, आमीन! शुम्मामीन

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लेखक का पत्रकारिता में एक लंबा अनुभव है। उन्होंने लोकमत समाचार, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों में अपनी सेवा दी है और फिलहाल, राजस्थान पत्रिका, जयपुर में स्पेशल सेल में सीनियर सब एडिटर हैं।

सत्ता की राजनीति में सब जायज है!

उदय केसरी
बीमारी से संघर्ष कर लौटे मितभाषी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने लोकसभा चुनाव की चुनौती है। यह चुनौती केंद्र की राजनीति करने वाले राजनीतिकों के लिए सबसे बड़ी होती है। इसमें जीत के लिए वे साम-दाम-दंड-भेद यानी तमाम हथकंडे अपनाते हैं। चाहे उन्हें इसके लिए अपने मौलिक स्वभाव से ही समझौता क्यों न करना पड़े। अपने परंपरागत रिश्तों को ही क्यों न भूलना पडे़। नैतिकता या स्वाभिमान की तिलांजलि क्यों न देनी पड़े। कहते हैं-सत्ता की राजनीति में सब जायज है। तो फिर क्यों न मितभाषी मनमोहन सिंह भी अपने प्रतिद्वंद्वी को जवाब उसी के जुबान में दें।...सो जब प्रमुख विपक्षी पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी ने पीएम की कुर्सी के लिए मनमोहन सिंह को अयोग्य करार दिया, तो मनमोहन ने भी इसके जवाब में कह दिया, आडवाणी की उपलब्धि बाबरी मस्जिद विध्वंस और कंधार विमान अपहरण मामले में ससम्मान आतंकियों को लौटाया जाना है।

तभी, मितभाषी मनमोहन सिंह की यह प्रतिक्रिया मीडिया वालों को उनके स्वभाव के उलट लगी। लेकिन आखिर कब तक कोई अपने स्वभाव के बंधन में पड़कर प्रतिद्वंद्वी की सुनता रहेगा। सत्ता की राजनीति जब भाजपा निष्कासित व भारतीय जनशक्ति पार्टी प्रमुख उमा भारती को उस आडवाणी का भक्त बना सकती है, जिसके लिए उमा ने महज चार महीने पहले ही मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान एक साक्षात्कार में कसम खाई थी कि वह किसी भी कीमत पर आडवाणी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देगी, तो फिर यहां कुछ भी होना असंभव नहीं है। ऐसी ही एक खबर की एक लाइन यहां फिट बैठती है कि-बात से पलटने का यदि कोई नोबल पुरस्कार होता, तो यह पुरस्कार हर बार भारतीय नेताओं को ही मिलता।

सत्ता की राजनीति यदि ऐसी है, तो धर्मनिरपेक्ष परिवार और पशु प्रेम का अलख जगाने वाली मां के एक नौजवान बेटे वरूण गांधी के मुख से जहरीला भाषण दिया जाना भी आष्चर्य की बात नहीं है। यह तो आज के राजनीतिक धंधे की कथित मांग है। ऐसी मांगों के आगे सांप्रदायिक सद्भाव, भाई-चारा, सामाजिकता जैसे मूल्यों की क्या विसात-बकौल वरूण- ‘कोई एक गाल पर चाटा मारे, तो दूसरा गाल भी आगे बड़ा देना चाहिए’ (महात्मा गांधी का आदर्श) इससे बकवास बात मैंने आज तक नहीं सुनी। यदि कोई आपको चाटा मारे, तो उसका हाथ काट देना चाहिए, ताकि वह फिर कभी किसी के साथ ऐसा नहीं कर सके।’ यह आदर्श राजनीतिक बाजार की मांगों से कुप्रेरित वरूण गांधी का है। जिसका बखान हाल में उन्होंने पीलीभीत में किया। अब चाहे इसकी वजह से उनकी उम्मीदवारी खतरे में पड़ती दिख रही हो, पर ऐसी कुप्रेरणा जहां से मिली, वे उनके कांधे पर जय श्री राम की बंदूक धरकर तो चला ही रहे हैं। राजनीतिक भगवा के एक बड़े महात्मा बाल ठाकरे तो संपादकीय लिखकर वरूण के इस कुकृत्य को कुशलता करार दे रहे हैं।

ऐसे राजनीतिक वातावरण में चतुर चाणक्य लालू प्रसाद यादव के फरमान की कौन परवाह करे, चाहे वह अपने जीजा ही क्यों न हो। सो उनके साले साहब साधु यादव ने चुनाव की टिकट के लिए बगावत कर दी, जिसे राजनीति का ककहरा जीजाजी ने सिखाया। और अव्वल तो यह कि रिश्ते और पार्टी से बगावत करने वाले साधु यादव को तत्काल कांग्रेस ने टिकट दे दी। मानों, ऐसे ही लोग वर्तमान राजनीति में काम के होते हैं।

बहरहाल, ऐसे राजनीतिक हालात में भी मुंबई में कांग्रेस की उम्मीदवार प्रिया दत्त और लखनऊ से सपा उम्मीदवार संजय दत्त के बीच भाई-बहन का रिश्ता सत्ता की राजनीति की बलि नहीं चढ़ा है। प्रिया दत्त ने पिछले दिन एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जरूरी हुआ तो वह अपने भाई के लिए चुवाव प्रचार भी करेगी और वह कहेंगी, तो भाई संजय भी उनके लिए प्रचार करेंगे। भाई-बहन का रिश्ता राजनीति से बहुत बड़ा है।...यह अच्छी बात है। दुआ करें कि देश के बाकी राजनीतिकों को भी अपने अंदर परंपरागत रिष्ता, सम्मान, स्वाभिमान, नैतिकता, सांप्रदायिक सद्भाव व राष्ट्रीयता को सत्ता की राजनीति से बड़ा बनाने की सीख मिले।

...जाने कब कौन पिचकारी, बंदूकों सी तन जाए

उदय केसरी
सीधीबात के सुधी पाठकों व ब्‍लॉगर बंधुओं को होली की हार्दिक शुभकामनाएं!!!

होली पर कुछ खास कहने को नहीं है। देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व की तिथियों की घोषणा हो चुकी है, तो देश के बाहर पाकिस्तान के नाबालिग लोकतंत्र की हत्या होने वाली है। तालिबान का भय और बेकाबू लश्‍कर आतंकियों का रोना रोककर पाकिस्तान अमेरिका, हिन्दुस्तान समेत पूरी दुनिया को गुमराह करने में लगा है, ताकि मुंबई पर हमले के दोषियों पर कार्रवाई के लिए उस पर दबाव नहीं बनाया जाए। इस देश के चालाक शासकों को पाकिस्तान के अमन-चैन से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बस, उनकी भय की सत्ता कायम रहे, यही चाहते हैं वे। श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला भी महज एक ड्रामा है। उस आतंकवाद से खुद की बेबसी दुनिया को दिखाने के लिए, जिसे खुद पाकिस्तान ने ही पाला-पोसा है।

खैर, छोड़िए आतंकवाद और पाकिस्तान के दोहरे चरित्र की कहानी अभी चलती रहेगी। इस सवाल का जवाब फिलहाल उर्दू की एक चलताऊ शेर ही हो सकता है- इब्तदा-ए-इश्क़ है रोता है क्‍या, आगे आगे देखिए होता है क्‍या।

इस बरस की होली हिन्दुस्तान के सैकड़ों घरों में फीकी रहेगी। वजह, आप सबों को मालूम है-आतंकवाद, जिसने देश के कई शहरों में बम विस्फोटों के रूप में कहर बरपाये हैं। इसके शिकार सैकड़ों भारतीयों के परिवारों में तो कम से कम होली का रंग फीका रहेगा।....हमें भी उनके प्रति कम से कम सहानुभूति बनाए रखना चाहिए और कुछ करने की इच्छा हो, तो आगामी लोकसभा चुनाव में ऐसी सरकार बनाने की मुहिम में शामिल होना चाहिए, जो देश व देशवासियों की सुरक्षा करने में दमदार भूमिका अदा करने के लायक हो। मैं तो पहले से ही युवा नेतृत्व की आवाज उठाता रहा हूं। कम से कम देश के युवाओं को तो इस पर विचार करना ही चाहिए कि आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा की समस्या से लड़ने के लिए युवा जोश व सोच की देश को जरूरत है। यह तभी होगा जब देश के युवा जागेंगे।

इस होली पर मेरे दोस्त पत्थर नीलगढ़ी की यह पंक्तियां यहां मौजूं हैं-

आतंक के इस माहौल में,
इस बार की होली फीकी है।
अबीर की छुअन कटीली है,
रंगों की गंध भी तीखी है।

जंगल में टेशू की सूरत,
खून में भींगी लगती है।
जलती होली की हर लकड़ी,
इंसानों सी लगती है।

इन हालातों में फिर होली,
कैसे रंग जमायेगी।
जाने कब कौन पिचकारी,
बंदूकों सी तन जायेगी।
-पत्थर नीलगढ़ी

क्या अंग्रेजी में झुग्गी बस्ती के बच्चों को डॉग कहते हैं?

उदय केसरी
फिल्म जगत के अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों को जीतकर खास चर्चे में आई फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ (Slumdog Millionaire) के नाम, कहानी व फिल्म डायरेक्टर को लेकर कई बार मन में कई सवाल खड़े हुए, पहले कुछ लिखना अच्छा नहीं लगा। सोचा, लोग कहेंगे-हम जैसों को तो कभी अच्छाई दिखती ही नहीं। दुनियाभर में भारतीय संगीतकार की जय की खुशी बांटने के बजाय, लगे बाल की खाल खींचने। इसलिए पहले मैं यहां बता दूं कि ए.आर. रहमान की जीत वाकई में गर्व की बात है अपने देश व देशवासियों के लिए।

लेकिन इस खुशी के मद में उन सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती है, जो हमारे देश व देशवासियों के सम्मान, मर्यादा, परंपरा व संस्कृति से जुड़े हों। सवाल हैं कि क्या पिछले 27 सालों के दौरान बॉलीवुड में स्लमडॉग मिलेनियर से बेहतर एक भी फिल्म नहीं बनी? यदि यह फिल्म विकास स्वरूप के उपन्यास ‘क्यू एंड ए’ पर आधारित है, तो उसका नाम ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ क्यों रखा गया, स्लमबॉय मिलेनियर क्यों नहीं? आखिर इस नाम में ‘डॉग’ शब्द क्यों है? स्लम (Slum) का हिन्दी अर्थ ‘झुग्गी बस्ती’ तो चलो ठीक है। तो क्या अंग्रेजी में झुग्गी बस्‍ती के बच्चों को डॉग यानी कुत्ता कहा जाता है?

सवाल यह भी है कि जिस फिल्म का डायरेक्टर व प्रोड्यूसर विदेशी (ब्रिटिश) हैं, उसे बॉलीवुड की फिल्म कैसे माना जाए? फिल्म जगत का यह सबसे बड़ा अवार्ड किसी भारतीय निर्माता-निर्देशक की फिल्म को क्यों नहीं मिलता? क्या अमेरिका या अन्य देशों में भारत से बड़ा दर्शक वर्ग है? चूंकि दुनिया में अकेले बॉलीवुड की फिल्मों में ही गानें व संगीत कहानी के हिस्से होते हैं, तो क्या इसीलिए ऑस्कर की जूरी को केवल हमारे गानें व संगीत ही पसंद आते हैं? ताकि आगे भी भारतीय गानों व संगीत को हायर करके विदेशी निर्माता-निर्देशक फिल्म बनाने का धंधा चमका सकें?

यदि ये सवाल बेवजह लगते हैं, तो जरा इन पर विचार करके देखें-ताजा ऑस्कर आवार्ड के 27 साल पहले 1982 में जिस फिल्म को इस बार की तरह ही ऑस्कर के आठ अवार्ड मिले, उसका नाम था ‘गांधी’। गांधी की जीवनी पर आधारित इस फिल्म के डायरेक्टर का नाम था-रिचर्ड एटेनबरोफ यानी विदेशी। इस फिल्म का निर्माता भी भारत का नहीं था। इसमें अमरीशपुरी समेत बस दो-तीन कलाकर बॉलीवुड के थे। इस तथ्य से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऑस्कर की जूरी को भारतीय निर्माता-निर्देशक कितने पसंद हैं? यदि शॉर्ट डाक्युमेंट्री फिल्म ‘स्माइल पिंकी’ को मिले ऑस्कर की भी बात करें, तो इसकी डायरेक्टर मेगान मिलान भी एक अमेरिकी महिला है।

अब जरा, देश व विदेश, खासकर अमेरिका में स्लमडॉग मिलेनियर के कारोबार पर नजर डालें- इस फिल्म को बनाने में कुल जमा लागत आई 51 करोड़ रुपये। वहीं इस फिल्म से अमेरिका में कमाई हुई पांच अरब रुपये, जबकि भारत में मात्र 30 करोड़ की कमाई हुई। अब विचार करके देखें कि भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म भारतीय दर्शकों को कितनी पसंद आई और अमेरिकन को कितनी। ऑस्कर के लिए नामितभर होकर रह गई फिल्म ‘लगान’ के सामने क्या आप स्लमडॉग मिलेनियर को पांच स्टार दे पायेंगे? यदि आप भी झुग्गी के बच्चों को कुत्ता कहते होंगे, तो जरूर यह फिल्म लगान से बेहतर लगेगी। पर, यदि नहीं, तो आखिर क्यों विदेशियों (खासकर ब्रिटिश व अमेरिकन) को लगान पसंद नहीं आई? कहीं इसलिए तो नहीं, कि उसमें भारत का दीन-हीन चेहरा नहीं था? कहीं इसलिए तो नहीं कि उस फिल्म की कथा, जो महज कोरी कल्पना नहीं थी, से उनका ऐतिहासिक इगो चोटिल होता था।...तो फिर महज कोरी व यथार्थ से कोसों दूर कल्पना पर बनी फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर क्यों पसंद आ गई? इसके गाने व संगीत क्यों भा गए। लगान के गानें व संगीत क्यों नहीं? इसमें भी तो एआर रहमान ने ही संगीत दिया था।

आदरणीय ब्लागर बंधुओं व सुधी पाठकों

नमस्कार,

सीधीबात ब्लाग पर प्रकाशित होने वाले विविध आलेखों (पोस्ट) को पढ़कर व अपनी टिप्पणियां भेजकर आपने हमेशा से हमारी पहल को प्रोत्साहित किया है। इसके लिए आप सभी को हार्दिक धन्यवाद।

सीधीबात ब्लाग महज छह महीने में आपके बीच इस स्थिति में है, जबकि अबतक इस ब्लाग पर किसी अन्य को सीधे कोई पोस्ट करने का अधिकार नहीं दिया गया।

लेकिन कुछ ब्लागर साथियों के सुझाव पर एडिटोरियल प्लस डेस्क ने अब सीधीबात पर कुछ लेखकों को सीधे पोस्ट करने का अधिकार देने का निर्णय लिया है।

हमें उम्मीद है कि सीधीबात ब्लाग के आलेख-विषय और लेखन शैली से आप सभी अवगत ही होंगे।

अतः सीधीबात के जरिये अपनी बात कहने के लिए आपका हार्दिक स्वागत है।

सीधीबात पर सीधे पोस्ट करने का अधिकार प्राप्त करने के लिए कृपया, एक ताजा पोस्ट के साथ अपने बारे में चंद शब्द लिखकर हमें uday.kesari@gmail.com पर मेल करें।

उदय केसरी, एडिटोरियल प्‍सल डेस्‍क के लिए

युवा भारत की डोर क्‍यों न हो युवा हाथों में?

उदय केसरी
कांग्रेस में युवा नेताओं को अधिक टिकट देने तथा कांग्रेस व युवा नेताओं के बीच की दीवार ध्वस्त करने की बात कर राहुल गांधी ने यह साफ कर दिया है कि शीर्ष राजनीति में बुजुर्ग नेताओं ने नाजायज कब्जा जमा रखा है। इस कब्जे का नतीजा देश को भुगतना पड़ रहा है। दरअसल, अपने देश में पार्टी चाहें जो कोई भी हो, राजनीतिक मूल्य सबके एक जैसे ही हैं। नतीजतन, आम युवाओं में राजनीति के प्रति रूझान लगभग खत्म हो चुका है। मठाधीश नेताओं के चाल, चरित्र व चतुराई ने राजनीति का मतलब बदलकर रख दिया है। काम की दृष्टि से राजनीति गाली का पर्याय बन गई, जिसमें प्रवेश की शर्तें भी काफी उल्टी-सीधी हो चुकी है, जिससे हम-सब वाकिफ हैं।

बेशक, राहुल गांधी फिलहाल की भारतीय राजनीति में एक पाक-साफ दामन वाले युवा नेता हैं, जिनकी बातों में युवा सोच, समझ व सर्वोपरि राष्ट्रीयता के मूल्य प्रतिध्वनित होते हैं। बिल्कुल अपने पिता स्व. राजीव गांधी की तरह। हालांकि उनकी बातों में ऐसी स्पष्टता की एक वजह उनका गांधी परिवार से होना भी है। अन्यथा, बीते विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी में बुजुर्गों की मठाधिशी और भ्रष्टाचार पर बोलते ही कांग्रेस की वरिष्ठ नेता माग्रेट अल्वा को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता। मगर, बाकी पार्टियों में परिवार है, तो राहुल नहीं है और राहुल है, तो परिवार नहीं। नतीजतन, भारतीय राजनीति में (निजी फायदे के लिए ही सही) ऐसा करने की हिम्मत करने वाले युवा नेताओं को बागी बता कर हाशिये पर डाल देने की परंपरा है।

भारतीय राजनीति के लिए इससे बड़ी विडंबना और कुछ नहीं है कि जिस देश में युवाओं की तादाद सबसे अधिक है, उस देश की बागडोर ज्यादातर बुजुर्गों के हाथों में रही है। युवाओं ने बस सरहद पर कुर्बानियां दी हैं। या फिर बेरोजगारी से तंग आकर अपराध के मार्ग चुन लिये हैं। देश के बुजुर्ग नेताओं ने न कभी युवाओं में नेतृत्व क्षमता के विकास पर बल दिया और न ही कोई राष्ट्रीय युवा नीति बनाई, ताकि देश की प्रगति में युवा सूझ-बूझ का भी फायदा लिया जा सके। क्या देश के बुजुर्ग नेताओं को युवाओं की अक्लमंदी और नेतृत्व क्षमता पर भरोसा नहीं है? यदि नहीं, तो सरकारी क्षेत्र जिसका नेतृत्व बुर्जुगों के पास है और निजी क्षेत्र, जिसका नेतृत्व युवाओं के पास है, के बीच प्रगति की तुलना करके देख लें। सरकारी उद्योग-धंधे जहां घाटे का इतिहास बना रहे हैं, वहीं निजी क्षेत्र हर साल सफलता के सोपान तय कर रहा है। मसलन, स्व. धीरूभाई अंबानी व उनके पुत्र अनिल व मुकेश अंबानी, जेआरडी टाटा, एलएन मित्तल, एनआर नारायणमूर्ती, सुभाष चंद्रा, विजय माल्या, अजीम प्रेमजी आदि कई ऐसे नाम हैं, जिनकी युवा सोच, साहस व दृढ़संकल्प ने ही उद्योग व व्यापार के क्षेत्र में भारत को विश्‍वपटल पर प्रतिष्ठित किया है।

आगामी लोकसभा चुनाव में युवा उम्मीदवारों को बढ़ावा देने की रणनीति बनाकर राहुल गांधी ने तो युवा वोटरों की ओर एक बेहतर लक्ष्य साधने की कवायद शुरू कर दी है, पर क्या इस कवायद को कांग्रेस के मठाधिशों का सच्चा समर्थन प्राप्त होगा? यह कहना मुश्‍िकल है। हालांकि कांग्रेस के पास आगामी आम चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए राहुल के अलावा कोई और ऐसा चेहरा नहीं है, जो मतदाताओं में कोई बड़ी उम्मीद जगाने में सफल हो। ऐसे में, युवा राहुल की रणनीति कांग्रेस की बूढ़ी़ हो चुकी छवि को सुधारने और बुजुर्ग दीवारों के आगे निराश व निष्क्रिय हो चुके युवा कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार कर सकती है। यह जरूरी भी है।

वर्तमान राजनीति में ज्यादातर पार्टियां जाति व धर्म के आधार पर अपनी चुनावी रणनीति बनाती रही हैं। नतीजतन, देश-समाज में जातीय व धार्मिक विद्वेष को बढ़ावा मिला है। देश की दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा भी हिन्दू कार्ड के जरिये ही बड़ी हुई है। बाकी पार्टियों ने भी कहीं-न-कहीं किसी जाति विशेष का कार्ड खेल कर अपनी राजनीति चमकाई है। मगर, किसी पार्टी ने अब तक युवा वर्ग को अपनी चुनावी रणनीति का मूल आधार नहीं बनाया। यही वजह है कि भारतीय राजनीति की शीर्ष पंक्ति में युवा नेताओं की उपस्थिति न के बराबर है। राजनीति में युवाओं की भागीदारी बस मठाधीश बुजुर्ग नेताओं की युवा औलादों की मोहताज हो चुकी है। हालांकि, राहुल गांधी समेत सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुप्रीया सुले आदि भी इसी परंपरा की उत्पत्ति हैं। लेकिन राहुल गांधी के साथ देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू व पहले युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सद्चरित्रों का प्रभाव भी है। तभी तो वह अपनी ही पार्टी में बुजुर्ग दीवारों को गिराने की वकालत करने की हिम्मत कर रहे हैं। आखिर कभी उनके पिता ने भी तो अपनी ही सरकार में यह कहने का साहस किया था कि केंद्र से भेजा जाने वाला एक रुपया गांव तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसे में तब्दील हो जाता है। इसलिए राहुल गांधी द्वारा भारतीय राजनीति में युवा ब्रिगेड बनाने की पहल सराहनीय है। देश को प्रगति की रफ्तार प्रदान करने के लिए इसकी बेहद जरूरत भी है। बेहतर तो यह होगा कि इस पहल से अन्य राष्ट्रीय दल भी सबक लें। लेकिन इसकी संभावना बेहद कम नजर आती है, क्योंकि राजनीति में जड़ जमाकर बैठे बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार करना इतना आसान नहीं है। इसके लिए देश के युवा मतदाताओं को ही कुछ करना होगा। उन्हें ही जाति, धर्म व क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर राहुल गांधी सरीखे युवा नेताओं को विजय बनाकर केंद्र में भेजना होगा, तभी शीर्ष राजनीति में नाजायज कब्जा जमा रखे बुजुर्ग नेताओं के हाथों से देश की बागडोर अपने हाथ में लेना संभव हो सकेगा।

अब एक और नापाक सेना और फिर जागा ‘गुंडा-राज’

उदय केसरी
यह आलेख लिखने से पहले मन में कई बार आया कि इस मुद्दे पर नहीं लिखा जाना चाहिए... क्योंकि राम सेना प्रमुख प्रमोद मुतालिक और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे जैसे देश के सफेदपोश आतंकी यही चाहते हैं कि बस मीडिया में उनका प्रचार होता रहे, वह चाहे उनकी आलोचना, निंदा, भर्त्‍सना के रूप में ही क्यों न हो।...फिर भी मन नहीं माना। सोचा, जैसे 26/11 की घटना के बाद बाहरी आतंकी हमलों व आंतरिक सुरक्षा पर देश के नेताओं के निराशाजनक रवैये के खिलाफ पूरे देश की जनता के व्यापक रोष ने सत्तासीन नेताओं के होश उड़ा दिये। वैसे ही, घर के सफेदपोश आतंकियों के खिलाफ कभी-न-कभी जरूर जनता सड़क पर उतरेगी और तब इन घर के आतंकियों को हमेशा-हमेशा के लिए ‘बड़े-घर’ पहुंचा दिया जाएगा।

सवाल यह भी है कि ऐसे सफेदपोश आतंकियों के समर्थक भी तो हैं। चाहें वे जितनी भी संख्या में हों, पर हैं तो, तभी तो मुतालिक व राज के नापाक इरादों को अंजाम दिया जाता है। आखिर उन्हें राम धर्म और भारतीय संस्कृति की कौन सी घुट्टी पिलाई गई है कि वे मर्यादा पुरोषोत्तम के नाम पर अमर्यादा की सारी हदें पार कर रहे हैं। विविधता में एकता वाली भारतीय संस्कृति और नृत्य-संगीत व प्रेम के उत्कृष्ट मूल्यों से अटी भारतीय परंपरा को भूलकर मंगलोर शहर के एमनीशिया पब में युवतियों के साथ मारपीट की जाती है। प्रेम के प्रतीक वेलेंटाइन-डे पर प्रेमी-युगलों को खदेड़ा जाता है।...यदि इन सब का कोई मानवीय आधार नहीं है, तो यह कहना गलत नहीं है कि जैसे अफगानिस्तान व पाकिस्तान के वजीरिस्तान व बलुचिस्तान में तालिबान इस्लाम के नाम पर मुस्लिमों पर अत्याचार कर रहा है, वैसी ही कोशिश भारत में ये हिन्दुत्व के कथित ठेकेदार कर रहे हैं, जिन्हें हिन्दू तालिबान कहना भी गलत न होगा।

मुंबई पर 26/11 को बाहरी आतंकियों के हमले के दौरान राज के आतंकी आंख-कान बंद कर गहरी नींद में सोये हुए थे। देश के लगभग मोबाइल यूजर द्वारा तब राज को बुरी तरह से ललकराने वाले एसएमएस मिले, पर राज ठाकरे की नींद नहीं खुली। अब उसकी नींद 26/11 के दो महीने बाद टूटी है, उसी गैर-मराठी के जहरीले अलाप के साथ। गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर नासिक के एक स्कूल में चल रहे भोजपुरी कार्यक्रम में मनसे कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ व मारपीट की। इस दौरान उन्होंने मुंबई हमले में शहीद हुए सेना व पुलिस के जवानों की तस्वीरों को भी नहीं बख्सा। चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करते हुए मनसे के आतंकी मुंबई हमले के दौरान बाहरी आतंकी भाइयों के समर्थन में पहले सोये रहे और अब बाहरी आतंकियों का दहशत कम होता देख, फिर से दहशत फैलाना शुरू कर दिये हैं।

दरअसल, ऐसे सफेदपोश घर के आतंकियों का कोई धर्म-ईमान नहीं होता। होती है, तो बस दहशत की राजनीति, जिसके बल पर वह सत्ता में आना चाहते हैं।...ऐसे सफेदपोशों को धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह करना खूब आता है।...धर्म के प्रति अगाध आस्था रखने वाली देश की जनता की अस्था का ऐसे नेता नाजायज फायदा उठाते हैं। ऐसे सफेदपोशों के निशाने पर गरीबी व बेरोजगारी से विवश लोग भी होते हैं, जिन्हें वे आसानी से नफरत से भरे भाषावाद व क्षेत्रवाद की घुट्टी पिलाने में कामयाब हो जाते हैं।...मगर इसका बुरा नतीजा भी उसी गरीब व बेरोजगार तपके को भुगतना पड़ता है।...

A Squirrel’s Death

With the advent of modern life, emotions and love for fellow beings are fading out with professional attitude becoming the welcome order of the day. People have slowly but steadily lost all love and regard for other beings. In these circumstances, love for small animals is least expected from selfish human beings. Expressing his sentiments about animal love, My friend Soumyajit Ghose narrates his painful experiences about a Squirrel, who despite being highly agile, died while crossing the road.

Death or demise of any person, animal or living being evokes gloomy feelings and thoroughly calls for a small show of regard for the being that is no more existent in the world. Somehow this small regard for the death of other beings is fading from the human populace with the influx of modern lifestyle that leaves no time for one’s own self. It is our new ways of lifestyle that has transformed us into overtly insensitive and selfish beings.

Our insensitiveness can be attributed to the fact that we no longer have regards for our fellow beings death owing to our so called schedules that leaves no space for excuses. Man has already put this disregard into practice with deaths becoming a common sight. Being a journalist and witnessing deaths everyday had evolved such a feeling in me also. However, I was ignorant of the disastrous extent to which this practice has gripped our fellow beings.

It happened that I was returning from office at about 9.15 in the night. I usually take a small ride on the city bus before descending at my stop. I have to cross both the up and down roads on the square in order to reach my place located on the other side of the road. The stop has wide roads and requires me to watch the lights before I move across. I crossed the first half and reached out for the second part as I waited for the lights to turn red. As I was crossing the second half of the road, I was watching my steps - a regular habit of mine - when suddenly I came across a Squirrel who seemed to have become a victim of the modern traffic.

Being busy in my thoughts, I raised my foot so as to trample the small animal when suddenly my eyes caught sight of the Squirrel and I just leaped out of the way. I moved on quickly to the other side of the road with the light just remaining red for some seconds. After I had reached the other side of the road safely, I began to look back at the small animal that seemed to have caught my attention. It was not moving and I had to move on.

Feeling hungry at this point of time and worried about the fact that food is scarcely available after 9.30 P.M at my place, I started to move hurriedly in the direction of my place. Despite all this thoughts troubling me, I could not get over the intense feeling of returning back and picking up the small animal to safety. My feeling intensified with the positive reflections that the Squirrel might only be injured and alive… After a brief walk, I halted and gave a second thought. My intrinsic quality to help someone took over my thoughts and before I realized, I was moving back towards the same road. While I was walking, I imagined the animal to be injured and alive and started reflecting over the prospects of me quickly crossing the roads while picking up the animal considering the traffic.

As I moved towards the edge of the road, I could clearly view the Squirrel on the road and my heart pounded hard over each passing vehicle. They somehow missed the small animal. When I reached at the edge of the road, I saw that the traffic lights were green and the vehicles were moving speedily across the road. I was keeping an eye over the Squirrel which showed no signs of movement. As the lights slowly approached red, the vehicles drove fast to avoid being stuck by the traffic signal. I was beginning to become increasingly doubtful over my belief that the small animal was still injured and alive. I moved a little closer and watched it when suddenly, a bus speedily drove by….over its remains. I lost all my hopes as I watched the other vehicles stop over the red light.

The animal did not move a bit and more so I was now scared to view it. I was stuck at the spot out of sheer shock of not being able to pull it to safety. My heart, dejected at the thought of not being able to help the animal, was feeling gloomy. I was absolutely down when I suddenly viewed a two wheeler stop by the carcass of the Squirrel. The rider looked at it and being unmoved by the sight waited for the lights to turn green. I started to seriously hope that the two-wheeler did not crush the carcass of the Squirrel as it lay in the line of its tyres. The lights turned green, the vehicles moved, the two-wheeler also moved but without missing the carcass of the animal. The two-wheeler crushed the carcass like a sponge as the Squirrel’s head lifted up owing to the pressure of the tyres and fell as the two-wheeler moved ahead. The carcass was crushed twice by the two tyres of the two-wheeler.

While I watched the whole thing, I could do nothing. I was trembling with pain and utter ‘disregard’ for the person who despite viewing the carcass, left no chance of trampling it.

My views about man’s intrinsic quality to be emotional and sensitive were battered like anything. I could not believe that man can be so insensitive to the carcass of a small animal, a carcass that lied dead on the middle on the road. May be if human beings can be insensitive to its own fellow beings, this is only a small animal.

I have never viewed the death of a Squirrel in such a manner as the animals are said to be very agile and athletic in their behaviour. May be their agility was beaten by the speed of the vehicles with perfect schedules that run faster than the Squirrel’s effort to cross the road.

As I was returning back, I had a quick overlook of my second thoughts about the sight of the animal lying on the road. I thought that if the Squirrel was breathing its last, I could at least carry it to a safe place and let it die peacefully without further pain. My thoughts just vanished with the view of the rider trampling the carcass of the Squirrel. I reflected that may be one day man is fated to die a similar death with his corpse being crushed on and on repeatedly by time schedules of nature.

भारतीय गणतंत्र जितना सबल उतना निर्बल भी

उदय केसरी
भारतीय गणतंत्र अब 60वें साल में प्रवेश कर चुका है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी, कूटनीतिक व सामरिक दृष्टि से भारत अब काफी सक्षम भी हो गया है। विदेशी पूंजी निवेश का दरवाजा खुलने या कहें उदारीकरण की नीति से तो भारत में जबरदस्त बदलाव आया है। सूचना क्रांति, सेवा क्षेत्र का विस्तार, अंतरिक्ष विज्ञान में प्रगति, खाद्यान्न उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भरता, सैन्य ताकत में विकसित राष्ट्रों से बराबरी आदि बीते सालों की उपलब्धियां हैं। लेकिन इन सालों में जिस गति से अपना देश सबल हुआ, उसी गति से निर्बल और असुरक्षित भी हुआ है।

कश्‍मीर समस्या का आज तक कोई हल नहीं निकाला जा सका और पकिस्तान आज भी भारत से निरंतर दुश्‍मनी निकाल रहा है। इस समस्या से अब न केवल कश्‍मीर बल्कि पूरा देश प्रभावित है। पाकिस्तान व बांग्लादेश से लगी भारतीय सीमा क्षेत्रों में आतंकियों की घुसपैठ जारी है।

इन सालों के दौरान जहां एक तरफ, भारत में विदेशी पूंजी निवेश व निजी क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, तो दूसरी तरफ, देश में बेरोजगारी विकराल रूप में विद्यमान है। गरीबी का ग्राफ अब भी ऊंचाई पर है। गांवों, कस्बों व छोटे शहरों में आज भी बुनियादी समस्याएं सबसे बड़ी है।

काफी मशक्कत और बड़ी देर से हमें सूचना का अधिकार तो मिल गया है, पर रोजी-रोटी का अधिकार नहीं मिला है। तो फिर सरकारी शिक्षा, उच्च शिक्षा व जागरूकता अभियान से सफलता की कैसे उम्मीद की जा सकती है। पेट की भूख मिटाने की पुख्ता व्यवस्था किये बिना क्या ऐसे अभियान को कभी सफलता मिल सकती है?

ये संक्षेप में पिछले उनसठ सालों के भारतीय गणतंत्र की बस झलक है। यदि विस्तार में देखेंगे तो आपको भारत की तस्वीर काफी दयनीय दिखेगी। लेकिन यह तस्वीर महानगरों व बड़े शहरों में बैठकर देश के विकास की नीति गढ़ने वाले राजनेता व नौकरशाहों को नहीं दिखती। या फिर दिखती है तो जैसा कि मैंने पिछले आलेख ‘ओबामा की लोकप्रियता और अमेरिकीयों की देशभक्ति अनुकरणीय’ में भी कहा था-भारतीय राजनीति की नीति गरीबों, निर्धनों को बस जीने लायक बनाए रखने की हो गई है, क्‍योंकि वे यदि संपन्न, समझदार व जागरुक हो गए, तो नाकाबिल व भ्रष्‍ट राजनेताओं की दुकानदारी खतरे में पड़ जाएगी।

भारत के संविधान के अनुसार नागरिकों को समानता का अधिकार तो प्राप्त है, लेकिन इसके विपरीत सरकार में शामिल राजनेता एक ही देश में अलग-अलग कानून लागू करवाकर भेदभाव को बढ़ावा देते रहे हैं। संविधान के मूल स्वरूप में अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है। लेकिन बाद में राजनेताओं ने अपनी सुविधा और राजनीतिक लाभ के वास्ते संविधान संशोधन कर इतने छोटे-बड़े कानून लागू करवा दिये कि पूरे देश की जनता धर्म, क्षेत्र, भाषा, जाति आदि में बंटकर रह गई। और जिसका दुष्परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश का बाबरी मस्जिद विवाद, महाराष्ट्र का गैर-मराठी विवाद, असम का बाहरी-भीतरी विवाद आदि इसी के नतीजे हैं।

ऐसे में, जब हम हर साल 26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र के प्रति आस्था के संकल्प दोहराते हैं, तो कहीं न कहीं भारतीय संविधान और उससे मिले संविधान संशोधन के अधिकार का नाजायज फायदा उठाने वाले संकीर्ण राजनेताओं के प्रति आस्था की बात करते हैं, जिन्हें भारतीय संविधान की मूल भावना से कोई सरोकार नहीं। परिणामस्वरूप भारतीय प्रजातंत्र की प्रजा में अपने संविधान के प्रति निराशा के भाव पैदा होना स्वाभाविक है।

भारत के समुचित विकास, सुरक्षा व अमन की जिम्मेदारी संभालने वाले राजनेताओं की संकीर्णता के लिए भारतीय लोकतंत्र की शासन प्रणाली भी शायद जिम्मेदार है। भारत के सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री का चुनाव क्या जनता करती है? इस सवाल का सैद्धांतिक जवाब भले ही ‘हां’ हो, पर व्यावहारिक जवाब ‘नहीं’ है। जब से भारत में राजनीतिक पार्टी और सत्ता राष्ट्र से ऊपर हो गई है, तब से हम भारत के लोग राष्ट्र चलाने के वास्ते अपना प्रतिनिधि तो चुनते हैं, लेकिन बाद में इस बात पर कम ही ध्यान देते हैं कि वह अपनी बोली कहां लगवा रहा है।...हमारे मतों से जीत कर जाने वाले प्रतिनिधि किस दल के हाथों बिककर हमारे मतों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

इस मामले में अमेरिकी शासन प्रणाली जरूर अनुकरणीय है, जहां कम से कम अपने देश के सर्वशक्तिमान नेता या कहें राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता के मतों से होता है। और तभी तो कभी अमेरिका में नफरत का पर्याय बन चुके, वहां के अश्‍वेतों के बीच से निकला एक शख्‍स बराक ओबामा अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाता है। भारत में यदि कोई ओबामा जनप्रतिनिधि बन भी जाता है, तो यह जरूरी नहीं कि वह राज्य या राष्ट्र का नेता भी बन जाए, क्योंकि उसे अन्य प्रतिनिधियों के मत भी प्राप्‍त करने होते है, जो इतना आसान नहीं होता...इसके लिए तो पहुंच, ताकत व पैसे का पुल बनाना पड़ता है।...जिस पुल को बनाते-बनाते यहां का ओबामा या तो राजनीति छोड़ देता है या जनता का विश्‍वास बेचने लगता है।

ओबामा की लोकप्रियता और अमेरिकीयों की देशभक्ति अनुकरणीय

उदय केसरी
आपने खबरों में देखा-पढ़ा होगा। नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह की शान-औ-शौकत। यह अश्‍वेत राष्ट्रपति के कारण ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि नागरिक लोकप्रियता की दृष्टि से भी बेजोड़ माना जा रहा है। यह अमेरिका के प्रत्यक्ष लोकतंत्र का कमाल ही है कि 30 करोड़ आबादी वाले अमेरिका के बेमिसाल नये राष्ट्रपति के स्वागत में जबदस्त भीड़ उमड़ी। वाशिंगटन डीसी के नेशनल मॉल में 20 लाख के करीब लोग पहुंचे अपने नये राष्ट्रनेता के दीदार को। वह भी अपनी जेब से खर्च करके। इस मॉल की पांच हजार सीटों के लिए जारी टिकट की बिक्री की रफ्तार भी ऐतिहासिक थी। महज एक मिनट में लगभग सारी टिकटें बिक गईं।

वाकई में, बराक ओबामा की लोकप्रियता और अमेरिकी नागरिकों की राष्ट्रभक्ति आज के भारतीय नेता व जनता दोनों के लिए बेहद अनुकरणीय है।...क्या आपको ऐसा महसूस नहीं होता, बराक ओबामा की ताजपोशी की खबरें जानकर? आजाद भारत में प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पं. जवाहरलाल नेहरू की ताजपोशी के बाद किसी दूसरे प्रधानमंत्री की ताजपोशी समारोह में क्या कभी ऐसा जन-सैलाब उमड़ा? फिर, क्यों भारतीय जनता में नेताओं की लोकप्रियता उत्तरोतर घटती गई? भारत में तो नेताओं को अपनी रैलियों के लिए लोगों को बहला-फुसलाकर, खिला-पिलाकर, कुछ देकर गाड़ियों में भरकर लाना पड़ता है। ऐसे में तो भारतीय नेताओं के मंत्री-प्रधानमंत्री बनने पर जनता में स्वाभाविक जश्‍न की कल्पना ही बेकार है। जो कुछ होता है, वह नेता से संबंधित पार्टी का जश्‍न भर होता है।...आखिर भारत में ऐसा क्यों है? इस पर यदि विचार करें, तो इसके लिए खुद नेताओं के कृत्य तो जिम्मेदार हैं ही, पर राष्ट्र के प्रति जनता की कर्तव्यविमुखता भी कम जिम्मेदार नहीं है। हम भारत के लोग राष्ट्र चलाने के वास्ते अपना प्रतिनिधि तो चुनते हैं, लेकिन बाद में इस पर कम ही ध्यान देते हैं कि वह अपनी बोली कहां लगवा रहा है।...हमारे मतों से जीत कर जाने वाले प्रतिनिधि किस दल के हाथों बिककर हमारे मतों की धज्जियां उड़ा रहा है।

वैसे, मेरे विचार से तो इस विशाल भारत में अप्रत्यक्ष लोकतंत्र होना ही नहीं चाहिए। जब महज तीस करोड़ आबादी वाले अमेरिका के लोग मिलकर अपने देश के लिए इतने काबिल व ऐतिहासिक राष्ट्रपति या नेता चुन सकते हैं...तो फर्ज कीजिए, एक अरब आबादी वाले भारत के लोग जब देश के प्रधानमंत्री का सीधे चुनाव करते, तो इस पद के दावेदारों को कितना चमत्कारिक छवि वाला होना पड़ता।...हमारा लोकतंत्र तो भारत में ब्रिटेन की विरासत जैसा है, जिसे हम गले लगाकर राजनीतिक व्यवस्था चला रहे हैं...जिसमें जनता का विश्‍वास दोयम दर्जे का है। इसमें जनता जिस पर विश्‍वास करती है, वह निजी फायदे के लिए किसी और पर विश्‍वास व्यक्त करता है।...ऐसी व्यवस्था में विकास तो प्रभावित होगा ही। सो, पिछले 50-55 सालों में देख ही रहे हैं। राजनीतिक दलों के चुनावी मुद्दे विकास से अधिक दंगा-फसाद, भ्रष्टाचार, घोटाला आदि के होते हैं। आखिर जनता के पास दो जून की रोटी-दाल का जुगाड़ सुनिश्चित हो, तब तो वह नेताओं की काबिलियत और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों पर कुछ विचार कर पायेगी।...सच कहें तो, भारतीय राजनीति की नीति यह हो गई है कि गरीबों, निर्धनों को बस जीने लायक बनाए रखो...उसे संपन्न, समझदार व जागरुक नहीं बनने दो...इसी में अपनी राजनीतिक दुकानदारी की प्रगति है।

इन बातों के अलावा यदि भारत की वर्तमान शासन व्यवस्था को देखें, तो हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विश्‍वास भी कहीं और (सोनिया गांधी) गिरवी प्रतीत होता है। फिर भी, देश की मनमोहन सरकार अमेरिका से कुछ खासा ही प्रभावित है।...मसलन, परमाणु करार के लिए सत्ता तक की बाजी लगा दी गई।...मगर देश की संप्रभुता को सामने खड़े होकर ललकार रहे आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देने में यह सरकार पिछड़ गई। जानते हैं क्यों? क्योंकि अमेरिका ऐसा नहीं चाहता। दूसरे देशों के साथ अमेरिकी बनियागिरी के लिहाज से भारत द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई फायदेमंद नहीं है। आखिर, अमेरिका विरोधी आतंकवाद के सफाये के लिए पाकिस्तान को दिये गए अरबों डॉलर का क्या होगा। पाकिस्तान ये पैसे कहीं भारत के खिलाफ युद्ध लड़ने में न खर्च कर दे। इसलिए...अमेरिका द्वारा भारत को धैर्य रखकर दबाव बनाने की नसीहते दी जाने लगीं।...आपने देखा, अपने देश के फायदे-नुकसान के प्रति कितनी चतुर होती है अमेरिकी नीति। एक तरफ, भारत से परमाणु करार कर दोस्ती का हाथ मिलाया, दूसरी तरफ, भारत के दुश्‍मन से भी दोस्ती के सौदे में केवल मुनाफे पर नजर है।

बहरहाल, कहने का आशय है कि वर्तमान विश्‍व में जनता की राष्ट्रभक्ति और उससे पैदा हुए नेतृत्व/राष्ट्रनेता की निस्वार्थ करनी व कार्यकुशलता पर ही किसी राष्ट्र की प्रगति निर्भर करती है। इस संदर्भ में अमेरिकीयों की देशभक्ति और उससे उत्पन्न हुए अब्राहम लिंकन से लेकर वर्तमान के बराक ओबामा जैसे नेतृत्व से उस देश को मिली और मिलने वाली प्रगति भारत के लिए खासकर अनुकरणीय है।

मीडिया पर तानाशाही का काला कानून लादने की कोशिश नापाक

उदय केसरी
स्वतंत्र भारत में पहली बार कांग्रेस सरकार में ही 1975 में प्रेस की स्वतंत्रता पर सेंसरशिप जैसा काला कानून लादा गया था और अब एक बार फिर कांग्रेस सरकार में ही ऐसा कानून मीडिया पर लादने की गुपचुप तैयारी चल रही है। हालांकि इस कानून के जरिये सरकार के निशाने पर अखबार से अधिक न्यूज चैनल हैं, जिससे केंद्र सरकार ही नहीं, भारत के लगभग सभी घाघ राजनीतिक खार खाये हुए हैं। बेशक, इस काले कानून के पक्ष में सरकार के पास कई तर्क होंगे। देश की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के नाम पर अनेक दलील होंगे। पर, क्या जिस राष्ट्र में मीडिया गुलाम हो, वहां स्वस्थ लोकतंत्र मुमकीन है? यदि नहीं, तो केंद्र सरकार की यह कोशिश, कुछ न्यूज चैनलों की चंद नादानियों के आधार पर लोकतंत्र की धड़कन यानी मीडिया पर तानाशाही कायम करना है, ताकि सरकारी नाकामियों और सत्तासीनों के भ्रष्ट आचरण की सूचना जनता तक पहुंच ही न सकें।

तो क्या अब मीडिया गुलाम और राजनेता स्वतंत्र होंगे?
तो क्या मीडिया अब सरकारी जुबान बन कर रह जायेगा? क्या मीडिया आम आदमी की आवाज़ नहीं रह पायेगा? बल्कि यह राजनेताओं की कटपुतली होगा? क्या सरकार द्वारा मीडिया को नियंत्रित करने के लिए बनाया जा रहा कानून 1975 में इंदिरा गांधी सरकार की तानाशाही में लगी सेंसरशिप का विस्तार अथवा दोहराव है? यह जान लेने के बाद कि केन्द्र सरकार मीडिया को नियंत्रित करने वाला कानून बनाने जा रही है, उक्त सवालों का उठाना लाजमी है। यह सीधेतौर पर संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है, जिसका अस्तित्व मीडिया की स्वतंत्रता पर ही निर्भर है। इस कानून के पैरोकार भले ही यह दावा करे कि कानून आतंकी हमले, सांप्रदायिक दंगे, हाईजैकिंग और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं के कवरेज के लिए मीडिया को नियंत्रित करेगा, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि सत्ता पक्ष इस कानून का उपयोग अपने फायदे के लिए नहीं करेगा। इस कानून के तहत उक्त घटनाओं में वही फुटेज दिखाये जा सकेंगे, जो सरकार जारी करेगी। यानी मीडिया वही दिखा पायेगा, जो सरकार चाहेगी, तो फिर मीडिया के होने का क्या मतलब रह जाएगा?

क्या अमेरिकी मीडिया की स्वतंत्रता से वाकिफ नहीं सरकार?
कोई शक नहीं कि मुंबई हमले के बाद कुछ चैनलों ने अतिउत्साह में कमांडो कार्रवाई, होटल में मौजूद महत्वपूर्ण व्यक्तियों सहित कई ऐसे कवरेज प्रसारित किये, जिससे आतंकियों को मदद मिली। लेकिन इसके आधार पर पूरे मीडिया जगत पर एक तानाशाही कानून लादना क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया है? मुंबई की घटना के बाद एनबीए ने मीडिया के आत्मनियंत्रण की आवश्‍कता को समझते हुए अपने दिशा-निर्देश जारी किये। क्या यह रास्ता सही नहीं है? तो क्‍या अमेरिकी नीतियों के प्रसंशक देश की कांग्रेस सरकार अमेरिकी मीडिया की स्वतंत्रता से वाकिफ नहीं है?

भारतीय मीडिया का प्रधान संपादक होगा सत्तासीन राजनेता
मीडिया को अगर किसी कानून में बांध दिया गया, तो राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर मीडिया को इस हद तक नियंत्रित किया जा सकता है कि वह पूरी तरह असहाय हो जाये। हालांकि इसमें काफी समय लगेगा, लेकिन इस कानून के पास होने के साथ ही इसकी शुरूआत जरूर हो जायेगी। फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाद वेब मीडिया और फिर प्रिंट मीडिया को भी इस दायरे में लाया जायेगा। या कहें कि इस कानून के पूरी तरह से लागू होने के बाद भारतीय मीडिया का प्रधान संपादक सत्तासीन राजनेता होगा और पत्रकार उनके अधीन काम करने वाले कर्मचारी।

फिर पाकिस्तान और भारत की मीडिया में क्या अंतर रह जायेगा?
मुंबई हमले में गिरफ़्तार आतंकी अजमल कसाब पाकिस्तान का है। जब पाकिस्तान के एक न्‍यूज चैनल ने कसाब के पाकिस्तानी होने से संबंधित खबर प्रसारित किया, तो पाक हुक्मरानों ने उस चैनल पर देशद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया। सोचिए, जब भारत में यह कानून बन जायेगा, तो क्या किसी घटना को लेकर भारत सरकार इस तरह का कदम नहीं उठायेगी? पाक में मीडिया को उतनी स्वतंत्रता नहीं है, जितनी होनी चाहिए, तो क्या इस कानून के बाद भारत में भी मीडिया की स्थिति पाक जैसी हो जायेगी? रिचर्ड रीड उर्फ अब्दुल रहीम की आतंकी गतिविधियों के मामले की जांच के सिलसिल में अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल 2002 में कराची गया था, जिसका अपहरण करने के बाद हत्या कर दी गई। जानते है क्यों? क्योंकि वह अल कायदा और आईएसआई के बीच संबंधों को उजागर करने की कोशिश में लगा था। इसमें कोई शक नहीं कि यह पाकिस्तान के हुक्मरानों की सह पर हुआ।

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