कविताएं

बरस बीते बरस-बरस के
बरस बीते बरस-बरस के,
भींगे तो कभी डूबे डगर-डगर पे,
सावन आए झूम-झूम के,
खिले तो कभी फिसले चल-चल के,
फागुन बीते रंग-रंग के,
उड़े गुलाल तो कभी रंग जीवन के,
शरद आए तरह-तरह के,
धूप मिली सदा छांव से लड़के,
ग्रीष्म भी गुजरे तप-तपा के,
बहाए पसीने खून जलाके,
बरस बीते बरस-बरस के।
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ऋतुओं के इन मोड़ पे यारो,
सदा संभले हम गिर-गिर के,
लम्हों को जिया या सिया मैंने,
अब क्या बताए क्या किया मैंने।
 
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 13 जुलाई  2012 
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खूब उड़ा वह पक्षी......
खूब उड़ा वह पक्षी गनन में
भरके कल्पनाओं की  उड़ान
घटाओं ने कुचक्र रचा जब
विलख उठा सारा आसमान।

बरसे बादल उमड़-घुमड़कर
भींगा सावन आंसुओं से तर
बसंत में बाग हो गए वीरान
ये कैसे बिखरे सारे अरमान।

मुसाफिर है वो कठिन पथ का
सफर ही जीवन है अब उसका
मंजिल दूर कहीं बादलों के पार
कब होंगे उसके सपने साकार?
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 15 जून  2012
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मेरे मौला मुझे कहते हैं...

मेरे मौला मुझे कहते हैं तू सबर कर....
वक्त बदला भी लेगा उनसे चुनचुनकर,
तू थकना न कभी पथ पे इंमां के चलकर,
तू रुकना न कभी तेरी दुष्वारियों से डरकर,
मंजिल तो मिलती है प्यारे यूहीं कष्ट सहकर।
मेरे मौला मुझे कहते हैं तू सबर कर....
आग है तेरे अंदर उसको शोला बनने दे,
देख तू गौर से, दुनिया को चाल चलने दे,
वक्त होता नहीं यहां किसी का सगा प्यारे,
बेईमानों को जरा मुक्कमल बेईमान बनने दे।
पलट के वक्त उन्हें तेरे कदमों पे गिराएगा,
वक्त की मार से कब तक कोई बच पाएगा।
मेरे मौला मुझे कहते हैं तू सबर कर....

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 15 मई 2012
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सियासत ढा रहा सितम...
सियासत ढा रहा सितम मजलूमों पर,
अनाज सड़ रहे मंडियों के दलानों पर,
अफसोस है भूखों से पटे इस देश पर,
खाली पेट सोते हैं बच्चे कई यहां रातभर,
क्यों न हो अफसोस ऐसे बंपर पैदावार पर,
मर रहे हैं किसान महज बोरियों की मांग पर,
अनाजों को नसीन नहीं है छत गोदामों पर,
रो रहा अनाज भी कूपोषित बच्चों की आह पर,
ये सियासत गर्म है बेबस किसानों की चाह पर?

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 10 मई 2012

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दौर बदला और...

दौर बदला और बिगड़ता गया पर
वक्त के साथ हमने दोस्ती न की,
फलों से लदे पेड़ झुकते गए पर
बेईमानों की कुदाल न रूकी।
फूल मुरझाने लगे चमन में देखकर,
कागजी फूलों के इठलाते जलवे,
ईमां घबराने लगे मनमें देखकर
मेहनतकशों के टूटते सपने।
उन्नति चाटने लगी चापलूसी के तलवे,
झूठे होने लगे सब जीवन के फलसफे।
ये सब हो चुकी अब बस किताबी बातें,
बस, स्वार्थ पर टिक गए ये दिन और रातें। 


--उदय केसरी 'अक्षत'/ 6 मई 2012
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मानो दौलत की रखैल...

मानो दौलत की रखैल बन गई है पत्रकारिता,
पत्रकारों की योग्यता बस रह गई है चटुकारिता।
ज्ञान, बुद्धि, विद्या, विवेक सब अर्निंग का खेल है,
न्यूजरुम मानो बेरोजगार बुद्धिजीवियों का जेल है।
हर सिर के ऊपर जहां लटकी रहती हैं तलवार,
हर शख्स एक-दूसरे पे करते रहते हैं भीतरवार।
शब्दों में नैतिकता बांचते थकती नहीं हैं उंगलियां,
हर कद्दावर यहां नोचते हैं अधिनस्थों की बोटियां।
सत्य है इस कारपोरेट युग में चलती नहीं सदाचारिता,
मानो पूंजीपतियों की आवाज बन गई है पत्रकारिता।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 18 अप्रैल 2012
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बेगैरत हो चले हैं...

बेगैरत हो चले हैं उसूल इंसानियत के सारे
फलक है हैरान, आफरीन कर रही है इशारे,
ऐसे वालिदों से अच्छा है, मर जाना यहां रे।
वे पूछते हैं इस जहां से क्या जुर्म थे हमारे,
फिर भी दहेज दानवों को यहां शर्म है कहां रे
कैसा मतिभ्रम है, बेटियां बेटों से क्या कम हैं
आह भरते हैं रिश्ते, आंखें उसूलों के नम हैं।
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 15 अप्रैल 2012
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 हिन्दोस्तां की हवाओं में...
 हिन्दोस्तां की हवाओं में ये कैसी तब्दीली आई है,
धनवानों की सोच में देखों घोर गरीबी छाई है।
स्कूल, काॅलेज और अस्पताल, कहां नहीं यह खाई है,
इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी फरमान सुनाई है।
शिक्षा के अधिकार ने मानो खोलके रख दी सच्चाई है,
गरीब के बच्चों की संगत पर अमीरों ने शंकाएं जताई है।
बहक रहे हैं नवधनाड्य, ये कैसी दौलत पाई है,
हिन्दोस्तां की हवाओं में ये कैसी तब्दीली आई है,
धनवानों की सोच में देखों घोर गरीबी छाई है।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 14 अप्रैल 2012
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जलन है सीने में तो ...

जलन है सीने में तो जुबां पे क्यों लाते हो,
अपनी बर्बादियों को खुद क्यों गले लगाते हो।
जलके कुंदन बनो, यह सभ्यता का तकाजा है,
रोड़े भी कबतक किसी पथिक को रोक पाता है।
मीलों है चलना क्यों जिंदगी को झुलसाते हो,
आसमां को ही उल्टे क्यों अहंकार दिखाते हो।
इसपे कहां हैं कब्जे, जमीं के टुकड़ों की तरह,
चाहे कोई किनती उड़ान भर ले पक्षियों की तरह।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 11 अप्रैल 2012
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चुपचाप दर्द सह लेने का...

चुपचाप दर्द सह लेने का हमें तजुर्बा है पुराना,
चीन हो या पाक हमें तो करना है याराना।
दर्द-ओ-गम पर लगाते हैं वक्त का मरहम,
वार्ता कर लेने से ही भूल जाते हैं सारे गम।
दिल के मामले में बादषाहत दुनियाभर में हमारी,
जख्म आतंकियों का खाकर भी करते हैं हम यारी।
करगिल के बाद मुशर्रफ, मुंबई के बाद जरदारी,
ऐसे अतिथियों का हम करते हैं खूब खातिरदारी।
खुदा भी उनकी जमीं पर जिन्हें नहीं सुनते,
हमारी जमीं पर उनकी भी होती है दुआ पूरी।
वाह रे, आज के हिन्दुस्तान और सियासतदान,
शायद भूल गए अतीत के सारे आन, बान व शान!

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 09 अप्रैल 2012
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यादों की उम्र बहुत....

यादों की उम्र बहुत छोटी हो चुकी है दोस्तो,
जिंदा रहना है तो जरूरत अपनी बनाके रखना।
मुकाम एक नहीं कोई मुकम्मल इस जहां में,
बिकना है बाजार में तो सोच भी बदलते रहना।
तेरे औलाद भी नहीं पूछेंगे गर नहीं बदले,
अपनी कीमत को सदा उन्हें बताके रखना।
मिजाज बदला है जहां का कुछ ऐसा दोस्तो,
मरने से पहले अपनी अरथी सजा के रखना।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 06 अप्रैल 2012
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वजूद अपना हमें...

वजूद अपना हमें आए दिन डराता है,
गुनाह क्या किया समझ में नहीं आता है।
मेहनत से मुंह कभी चुराया नहीं फिर भी,
हौसला बरबस ही साथ छोड़ जाता है।
मिसालें हैं बहुत गिर-गिरकर संभलने के पर,
मजबूरियों के आगे बस कितना चल पाता है?
दुष्वारियां आती हैं इस राह-ए-इंमां पे इतनी,
दिलो-दिमाग पे एक धुंध सा छा जाता है।
कदम-कदम पे यहां बसे हैं बेईमानों की बस्ती,
तेरे गिरने की बस यहां राह तका जाता है।
वजूद अपना हमें आए दिन डराता है,
गुनाह क्या किया समझ में नहीं आता है।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 03 अप्रैल 2012
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बड़े कमजर्फ हो गए हैं...

बड़े कमजर्फ हो गए हैं सत्ता के सारे पाए,
तेज सियासत में शक है कहीं चुनाव न हो जाए।
मीडिया की सुर्खियांे में है बस घोटाले और भ्रष्टाचार,
महंगाई के बीच भंवर में कहीं निपट न जाए सरकार।
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 30 मार्च 2012
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मुश्किलों में ही अक्सर...

मुश्किलों में ही अक्सर इंकलाब जवां होता है,
आस्तीनों से सांपों को निकलना ही होता है।
सच की राह पर तो कम ही दोस्त मिलते हैं,
कभी-कभी तो खुद से ही लड़ना होता है।
जनरल के इमां को शायद लगा है चोट कोई,
ऐसे दिलों से टीसों को निकलना ही होता है।
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 30 मार्च 2012
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नौजां हो गर...

नौजां हो गर इस देश के तो,
बस खुद से ही मतलब करो,
हम नेता बड़े घाघ है सिस्टम के,
हमंे यूं छेड़ने की कोशिश न करो।
भूल जाएंगे हम पार्टी-एजंेडे सभी,
हमारी जमात को न टारगेट करो।
असभ्यता हमारी जमात में ही अलाउड है,
ऐसे बोलना है तो पहले चुनाव लड़ो।
ये जनता तुम्हारे साथ आती हैं तो आए,
इनकी वोटों से तुम पहले खेलता तो सीखो।
ये आदी हो चुकीं, हम जैसों के वादांे के,
इन्हें जुटा के तुम हमें यूं आंखें न तरेरो,
इन्हें बहला-फुसलाके बस तुम चुनाव लड़ो।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 27 मार्च 2012
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चोर की दाढ़ी में.....

चोर की दाढ़ी में.....न कहें तो और क्या कहें,
सदन में जो यूं बदले, तो उसे और क्या कहें।
हम चुप रहे जो साल भर तो क्या नहीं कहें,
जो बोलें दो कड़वा सच तो बिलबिला गए।
सच जो हो इतना नंगा, खून क्यों न खौले,
भगत भी कभी विवश थे, सदन में धमाके किए।
गर न खौले लहू जो इस जंग-ए-भ्रष्टाचार में,
तो वे कैसे डरेंगे जिनकी जगह है कारागार में।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 25 मार्च 2012
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हर किसी के पीछे...

हर किसी के पीछे खड़ा लेके खंजर कोई,
दफ्तर हो या हो देश, हर जगह मंजर यही।
बद से बुरा भी हो गया हो इंमां यहां जैसे,
राजनीति भी अपनेआप पे रो रही हो जैसे।
बुलबुले की तरह अन्ना-अन्ना कह गए बहुत,
बेईमानों की चाल के आगे कहां गए सब दूत।
नाटक फिर मंचित हो रहा है लोकपाल लाने का,
अन्ना भी हुंकार भर रहे हैं ये मंच गिराने का।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 23 मार्च 2012
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तंग कोठरी से....

तंग कोठरी से निकलती आह से
क्योंकर हो कोई बवास्ता यहां,
बुतों से अटे पड़े हैं महल सारे,
रहता नहीं कोई धड़कता यहां।
गरीबी मिट नहीं पाई तो क्या?
इसे मिटाना तो है सस्सा यहां।
रेखाएं खीचो इतनी नीची कि
आह भी न भर सके कोई,
ऐसे भी जीना, क्या जीना यहां!

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 20 मार्च 2012
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ऐतबार है, पर....

ऐतबार है, जुत्सजू भी, पर हासिल नहीं,
जानते हैं लोग मुझे, पर कोई वाकिफ नहीं।
जज्बात दफन है सीने में, अभी वह मरा नहीं,
माना ये इंतां है सितारों का, पर वाजिब नहीं। 
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 18 मार्च 2012
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दंभ है पत्ते को...

दंभ है पत्ते को,
लहराने की ऊंचाई में,
जिसकी जड़ें हैं
जमीं की गहराई में।
दंभ में लहराता है तो,
जरा इसे छोड़ के बता,
हवाओं का रूख जरा,
खुदी से मोड़ के बता।
आस्था पर किसी के तू
इतनी खिल्ली न उड़ा।
भ्रम में कोशिश न कर,
किसी को आजमाने की,
जमीं पे ही पनाह मिलेगी,
जब पड़ेंगे थपेड़े जमाने की।

--उदय केसरी 'अक्षत'/ 16 मार्च 2012
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हवाओं में ही कोई....

हवाओं में ही कोई शैतान घुल गया हो जैसे,
ईमां वालों के लिए यह जहां कब्रिस्तां हो जैसे।
फर्ज को बेचने के जो यहां नहीं हैं काबिल,
जीना दूभर उनका यहां हो गया हो जैसे,
पानी हो गए हैं आंसुओं के कतरे-कतरे,
बेशर्म हो गई हैं पुतलियां इन आंखों की जैसे।
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 10 मार्च 2012
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 उंगलियां पकड़कर जिनके हम चले...
 उंगलियां पकड़कर जिनके हम चले,
गिरने का डर उनपर छोड़ हम संभले,
डांट और दुलार से जिन्होंने हमें गढे़,
पहले गुरू को आज कैसे न याद करें ?
खुद्दारी व ईमान से डिगना न था मंजूर,
प्रेम व आदर पर था सर्वस्व न्योवच्छावर,
अंत समय तक कर्म पथ पर वह डटे रहे,
जब सत्यचक्र पूरा, वह ईश्वर थे उन्हीं में मिले।
यह पहली होली है, हम उनसे नहीं मिले.....
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 08 मार्च 2012
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शब्दों के कारोबार में....

शब्दों के कारोबार में बारहां सीखा कुछ ‘नया’
नया, नया नहीं, महज पुराने का है धु्रत भैया,
शब्दों के अर्थ नही, ‘अर्थ’ तो है रुपया,
सच की सच्चाई से नहीं, उगाही से अधिक है धिया,
अब क्या बताए, इस कारोबार में क्या कुछ है ‘नया’ 
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 05 मार्च 2012 
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दिल है गर ....

दिल है गर तो मोह से कैसे बचे कोई,
अपनों से दूर रहे तो क्या, दिल तो था,
मुद्दतें लूटाते रहे जो मुकद्दर बनाने में,
मिली मोहलतें कई बार, तो क्या कम था,
दिए इंतहां ताजिंदगी, फैसला नहीं आया,
मुश्किलें झेलें, तो क्या ये जज़्बा कम था।
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 03 मार्च 2012

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वाकिफ कौन नहीं....
वाकिफ कौन नहीं है वक्त की फितरतों से,
हर अनुभवों के बदले वक्त-ए-उम्र लेता है।
मेहनत से इसे बदलने का भ्रम भले कर लो,
यह तेरे मुकद्दर के इशारों पर ही डोलता है।
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 29 फरवरी 2012 
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एक छत के नीचे ...
एक छत के नीचे रहने से केवल घर, नहीं बनता,
सपनें और उसे चाहने से सिर्फ, मुकद्दर नहीं बनता.
कोई तकता है जब राह और तेरी आहत समझती है,
दिनभर की थकान किसी की किलकारिओं से मिटती है.
जोड़कर दो-दो पैसे जहाँ हसरतें संवारती हैं,
कुछ हम कमाते हैं तो कुछ वह बचाती है.
उसकी नन्ही हरकतों के मायने जहाँ खूब लगते हैं,
उसी की आँखों में हम जीतें हैं, तो जिन्दा से लगते हैं.
--उदय केसरी 'अक्षत'/ 26 फरवरी 2012

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