कुआं व खाई के बीच फंसी अभिव्यक्ति

उदय केसरी
कई दिनों से मन में एक द्वंद्व है कि इस आजाद लोकतांत्रिक देश में जब सत्ता और संपत्ति, तमाम आचार-विचार-संवाद और जनविरोध-प्रदर्शन-भूख हड़ताल या अनशन से व्यवहारिक तौर पर बड़ी हो चुकी है, तब फिर अभिव्यक्ति की आजादी क्या कभी सत्ता एवं संपत्ति वानों की आत्मा जगा पाएगी?....नहीं ना!....तो फिर क्या यही अभिव्यक्ति जनता को उद्वेलित नहीं करेगी?...हां!...तो क्या यह सत्ता और संपत्ति वानों को कभी मंजूर होगा? नही ंना!....ऐसे में क्या सच को सच्चाई के साथ अभिव्यक्त करने वालों के समक्ष इससे-एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई-वाली स्थिति पैदा नहीं होती? दरअसल,

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