मुंबई में पाक आतंकी, तो सीमा पर पाक सेना की गोलीबारी

पीएम साहब खुद को ‘सिंह इज द किंग’ साबित करें, शीघ्र पीओके पर हमले का आदेश दें
उदय केसरी
सीधीबात पर प्रकाशित आलेख ‘पीएम साहब सेना को पीओके पर हमले का आदेश दें’ पर मिली टिप्पणियों में वैसे तो अधिकत्तर में मेरी मांग व राय का समर्थन किया गया, पर दो-एक टिप्पणी ऐसी भी मिलीं, जिनमें मेरी मांग व राय को बेवकूफी भरी बात व बचकानी बात कहा गया। मैं पहले तो इस आलेख को पढ़ने व इस पर टिप्पणी करने वाले सभी (पक्ष-विपक्ष दोनों) ब्लॉगर पाठकों को धन्यवाद देता हूं। चूंकि सभी को अपनी राय रखने की स्वतंत्रता है, भले कोई उससे सहमत हो या असहमत। फिर भी, मैं इस मुद्दे पर बुद्धिजीवी ब्‍लॉगर व पाठक भाइयों, खासकर असहमत भाइयों से कुछ और सीधीबात करना चाहता हूं। वह यह कि...

जिस समय (बुधवार रात से शुक्रवार रात तक) मुंबई में आतंकियों का कोहराम मचा था और उनकी अंधाधुंध गोलियों और हैंडग्रेनेडों से मुंबई लहूलुहान हो रहा था, उसी दौरान पाकिस्तानी सैनिक कश्‍मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास भारतीय चैकियों पर गोलीबारी कर रहे थे। चार साल पहले पाकिस्तान व भारत के बीच सीमा पर संघर्ष विराम का समझौता हुआ था। बावजूद इसके पाकिस्तानी सेना लगातार इस समझौते का उल्लंघन कर रही है। गुरुवार की रात करीब 9.00 बजे पुंछ ज़िले में नियंत्रण रेखा के पास तारकुंडी पट्टी पर की गई पाकिस्तानी गोलीबारी पिछले 24 घंटे में दूसरी दफा थी। जबकि इससे पहले बुधवार (मुंबई पर आतंकी हमले का दिन) को पाकिस्तानी सैनिकों ने जम्मू ज़िले में नियंत्रण रेखा के पास खौर सीमा पर भारतीय चौकी पर गोलियां चलाईं। यानी महज 24 घंटों में पाकिस्तानी सेना जब दो-दो बार अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष विराम समझौते की धज्जियां उड़ा सकती है, तो उनके लिए ऐसे समझौते कितने मायने रखते हैं, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। फिर भी यह उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी सेना ने इस साल जनवरी से अब तक 38 बार संघर्ष विराम समझौते का उल्लंघन किया है, जिनमें दर्जनों भारतीय जवान शहीद हो चुके हैं। इसके अलावा पिछले नौ महीनों में एलओसी पार से घुसपैठ की 132 से ज्यादा कोशिशें की गई, जिनमें 80 पाक उग्रवादी मारे गए।

यह तो सेना व पाक आतंकियों के स्तर पर पाकिस्तान के रवैये की बात हुई, अब जरा राजनायिक स्तर पर पाक के रवैये देखिए, जब मुंबई पर आतंकी हमला हुआ, तब पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी चार दिनों के भारतीय दौरे पर थे। और मुंबई की घटना के बाद जब आतंकियों के पाकिस्तानी होने के प्रमाण सामने आने लगे और भारत के प्रधानमंत्री व विदेशमंत्री ने भी जब अपने बयानों में इसकी चर्चा कर दी, तो पाकिस्तानी विदेशमंत्री ने अपनी प्रतिक्रिया में प्रेसवालों से कहा- ‘यकीन जानिए, मेरे पास भारत की ओर से ऐसा एक भी सबूत पेश नहीं किया गया है।’ जबकि, इस दौरान भारतीय न्यूज चैनल ही नहीं, दुनिया भर के मीडिया वाले आतंकी हथियारों, हथगोलों पर पाकिस्तानी कारखानों के छपे नाम समेत अन्य कई सबूत दिखाते-बताते रहे। क्या जनाब कुरैशी इस वाक्ये के दौरान टीवी नहीं देख रहे होंगे। लेकिन, इसके बाद भी उनका बेशर्म बयान था कि ‘भारत को बयान देने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। इससे दोनों देशों के रिश्‍तों में दोबारा खटास आ सकती है। भारत को ऐसे मौकों पर संयम बरतना चाहिए।’ क्या बात है! नौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। अपने गिरेबां में झांकने के बजाय जनाब कुरैशी भारत को संयम बरतने की सलाह देने लगे और भारत दौरा बीच में छोड़ पाक वापस लौट गए।

उधर, पकिस्तान एक तरफ आतंकवाद से लड़ाई में भारत का सहयोग करने के धकोसले बयान दे रहा है, दूसरी तरफ जब भारत ने मुंबई हमले की जांच में सहयोग के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से आईएसआई प्रमुख जनरल शुजा पाशा को दिल्ली भेजने की बात की, तो वे इससे मुकर गए। पाकिस्तान के दोहरे चरित्र की एक नहीं, हजारों कहानियां हैं। इसलिए बयानों से, बातचीत से या समझौतों से पाकजनित व प्रोत्साहित आतंकवाद का सफाया नहीं किया जा सकता। इसके लिए बिना देर किये भारत को पीओके में स्थित आतंकियों के अड्डों पर हमला बोल देना चाहिए।

बड़ी देर से जागी पाटिल साहब की नैतिकता
देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल को दिल्ली हमले के वक्त ही इस्तीफा दे देना चाहिए था, जब वे अपने कपड़े बदलने में व्यस्त थे।...शुक्र है देर से सही, देश की सुरक्षा के प्रति उनकी नैतिकता जागी कि अब वे गृहमंत्री के योग्य नहीं हैं। वैसे, उनकी कुर्सी पर जिन्हें बिठाया गया यानी पी. चिदम्बरम, वे इस लहूलुहान कुर्सी से लहू के दाग कैसे धोते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

बहरहाल, गृहमंत्री पाटिल के इस्तीफे के बावजूद, मुंबई जैसे अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के विरुद्ध प्रधानमंत्री से देश को इस बात की अपेक्षा अधिक है कि वे खुद को ‘सिंह इज द किंग’ साबित करें और जल्द से जल्द पीओके पर सेना को हमले का आदेश दें।...यकीन मानिए तब पूरा देश हो या न हो, देश के 70 फीसदी युवा ‘किंग’ के फैसले के साथ होंगे...और तभी हम तोड़ पायेंगे भारत के दुश्‍मन आतंकियों की कमर...

पीएम साहब सेना को पीओके पर हमले का आदेश दें

अब किस आतंकी हमले का इंतजार है?
उदय केसरी
अब बहुत हो गया...केवल यह कहकर कि अब और बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा या अब आर-पार की लड़ाई होकर रहेगी आदि-आदि शासकीय जुमलों से काम नहीं चलेगा। इन जुमलों के अंदर के भीरूपन को अब आम भारतीय ही नहीं, विदेशी आतंकवादी भी समझने लगे हैं। प्रधानमंत्री साहब अब कुछ कहने के बजाय तत्काल कुछ करने की जरूरत है। तत्काल जरूरत है कि भारतीय सेना को यह आदेश दिया जाए कि वह बिना देर किये पाकिस्तान अधिकृत कश्‍मीर (पीओके) पर हमला बोल दें। (जो असल में हमारी ही जमीन है) जहां भारत के अमन के दुश्‍मन हजारों आतंकवादी सालों से अड्डा जमाकर हमारे खिलाफ खुद को तैयार कर रहे हैं। वहीं से मुंबई पर हमले के लिए खूंखार आतंकी भेजे गए। विश्‍व के दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र की शान को तहस-नहस करने में इन आतंकियों ने अब कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।...

...तो आखिर कब तक भारत आतंकियों के हमलों को अपनी बदनसीबी मानकर भूलता रहेगा...संसद पर हमला, देश की राजधानी पर बार-बार हमला, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर एक से अधिक बार हमला, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, असम पर हमले...अब किस आतंकी हमले का इंतजार है भारत को जवाब देने के लिए...जबकि ये तो हाल के हमले हैं। इन दहशतगर्दों ने भारत के सिरमौर कश्‍मीर पर तो सालों आतंक के गोले बरसाये हैं।

यदि भारतीय सरकार को हमले से देश की प्रगति और विश्‍व समुदाय में अपनी प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ने की आशंका है, तो दुनिया का सबसे बड़े व्यावसायिक देश अमेरिका से भारत को थोड़ी सीख लेनी चाहिए, जहां 9/11 के बाद ताबड़तोड़ आतंक विरोधी अमेरिकी कार्रवाई से न उस देश की प्रगति रूकी और न ही उसकी प्रतिष्ठा पर कोई असर पड़ा है, बल्कि उस घटना के सात साल बाद भी कोई भी आतंकी संगठन अमेरिका के खिलाफ दोबारा किसी कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाया। यही नहीं, सात सालों बाद भी अमेरिका का आतंकवाद विरोधी अभियान अब भी अफगानिस्तान और पाकिस्तान के उत्तरी कबायली इलाकों में जारी है। इससे आतंकवादियों के बीच अमेरिकी खौफ का अंदाजा लगाया जा सकता है।...तो फिर भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता ?...यदि भारत आतंक विरोधी अमेरिकी हमलों के खिलाफ है, तो फिर भारत को अमेरिका से किसी भी तरह की दोस्ती (परमाणु करार भी) नहीं करनी चाहिए।

दरअसल, ऐसी कोई समस्या नहीं है। समस्या यहां की सत्ता चलाने वाले नेताओं की सोच में है, जो देश और अपने निजी घर को एक नजर से कभी देख नहीं पाते। जब उनके घरों में आतंकी घुसकर तबाही मचाने लगे तभी उन्हें देश के किसी हिस्से में आतंकियों से होने वाली तबाही का दर्द महसूस होगा। यदि ऐसा नहीं होता...तो अपने देश को 1999 में कंधार विमान अपहरण जैसा शर्मनाक मामला नहीं देखना पड़ता। नवभारत टाइम्स डॉट कॉम पर प्रकाशित एक आलेख में श्री प्रदीप कुमार की पंक्तियां यहां उल्लेखनीय है कि भारत के दुश्‍मनों को यकीन हो चुका है कि भारत की राज्यसत्ता में उन्हें तबाह कर डालने का संकल्प नहीं है। गहन प्लानिंग, स्थानीय समर्थन और सटीक भौगोलिक जानकारी के बगैर 26 नवंबर जैसे हमले नहीं हो सकते। स्थानीय और राष्ट्रीय खुफिया तंत्र को इस सबकी भनक तक नहीं लगी। सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी स्पष्ट है। लेकिन क्‍या इसके लिए केवल वही जिम्मेदार हैं? इस प्रश्न का उत्तर बहुत ईमानदारी से तलाश नहीं किया गया, तो आतंकवादियों का काम लगातार आसान होता रहेगा। हर हादसे के बाद खुफिया एजेंसियों पर उंगली उठाने, प्रशासन को निकम्मा साबित करने और बलि के बकरों की तलाश करते रहने से बीमारी लाइलाज बनी रहेगी। पिछले करीब दो महीने से मुंबई पुलिस वह काम ठीक तरह से नहीं कर रही थी, जो उसे अच्छी तरह केंद्रित होकर करना चाहिए। मराठी-गैर मराठी विवाद की आग भड़काई गई। मालेगांव विस्फोट में एटीएस की कार्रवाई पर राजनीति होने लगी। एटीएस का काम जिनके प्रतिकूल जा रहा था, वे उसकी नीयत पर सरेआम शक करने लगे। उसी एटीएस पर, जिसका चीफ हेमंत करकरे 26 नवंबर को आतंकवादियों से लड़ने के लिए बेधड़क दौड़ पड़ा और बहादुरी के साथ आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गया।

कहने का आशय है कि भारत में राष्ट्रहित से उपर पार्टी और राजनीतिक हित हो चुके हैं। इसलिए सिमी को साथ देने या भगवा आतंकवाद को बढ़ावा देने में जब देश के राजनेताओं को शर्म नहीं आती है, तो विदेशी आतंकियों के हमले से क्या उनका दिल दहलेगा?

बहरहाल, देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह से मेरा आग्रह है कि अब कुछ ही महीने में लोकसभा चुनाव होना है, जिसके बाद पता नहीं आप दोबारा प्रधानमंत्री बने या न बने...इसलिए सत्‍ता के इस आखिर घड़ी में देश के दुश्‍मनों के खिलाफ पीओके पर हमले का फैसला करके आप कम से कम एक ऐसा काम करते जाएं, जिससे भारत को भी अपनी ताकत दिखाने का मौका मिले और उसे कमजोर समझने वाले मुट्ठी भर आतंकियों को जीवनभर के लिए सबक सिखाया जा सके...कि भारत को केवल मरना या बचाव करना ही नहीं, घुसकर मारना भी आता है...ताकि आतंक में मरे सौकड़ों निर्दोषों की आत्मा को शांति मिले और तमाम भारतीयों का सीना गर्व से चैड़ा हो जाए...

आतंकी साये में दहशतजदां हिन्‍दुस्‍तान...

उदय केसरी
हर रोज की तरह बुधवार की रात लगभग नौ-सवा नौ बजे ‘एडिटोरियल प्लस’ से घर के लिए निकला। घर पहुंचते ही आदतन लाइट जलाने के साथ ही टीवी का बटन भी हम दबा देते हैं...स्टार न्यूज पर मोटे अक्षरों में मुंबई में अज्ञात लोगों द्वारा फायरिंग की खबर आ रही थी...सिरफिरों की हरकत मान उस पर खास ध्यान नहीं दिया...न्यूज चैनल वाले भी शुरू में यही बोल रहे थे...पर यह क्या, कुछ ही पलों बाद जैसे ही आईबीएन-7 का बटन दबाया...तो यह खबर...कुछ बड़ी दिखने लगी...इस खबर में आईबीएन-7 के पास सबसे अधिक तस्वीरें व लाइव पीटीसी थे...सो नजर हैरत के साथ टीवी पर चिपक गई...हर पल खबर बड़ी होती जा रही थी...सिरफिरों की करामात आतंकी वारदात में और फायरिंग बम धमाकों में बदलने लगे...एक साथ मुंबई के कई जगहों से फायरिंग, बम धमाके और इससे हुई तबाही की खबरें आने लगीं...जैसे मुंबई को उठाकर आतंकियों ने बारूद के किसी ढेर पर रख दिया हो और किसी को पता तक नहीं चला...ऐसे भयावह हालात में दाद तो इस न्यूज चैनल के रिपोर्टरों व कैमरामैन की हिम्मत को देनी चाहिए, जिनकी आंखों से पूरे देश के ज्यादातर लोग पहली बार ऐसे दृश्‍य देख पाये होंगे...ये दृश्‍य विचलित करने वाले थे, पर मेरे विचार से अपने देश के लोगों को इसे दिखाना जरूरी है। इसकी जरूरत क्यों है? इसका जवाब मैं बाद में दूंगा।...ताज होटल में घुसे आतंकियों ने जब ग्रेनेड फेंका और उसकी आवाज टीवी के जरिये सुनी, तो स्तब्ध रह गया...ताज होटल के गुंबद से धुआं उठने लगा।...इसी बीच आईबीएन7 के एक रिपोर्टर के साथ कुछ मिनटों पहले हुआ एक वाक्या, जिसमें उसका सामना अचानक एक भागते हुए आतंकी से हो गया। आतंकी ने अपने अत्याधुनिक हथियार (संभवतः एके-47) की नाली उसके सिर पर टिका दी।...ईश्‍वर का शुक्र था कि प्रेस वाला बताने पर आतंकी एक झटके से उसे छोड़ भाग निकला। सोचिए! कैसा दहशत भरा वह पल होगा उस रिपोर्टर के लिए...लेकिन फिर भी वह रिपोर्टर, अपने काम पर लगा रहा।...दूसरे और भी रिपोर्टर घटनास्थलों के पास से पल-पल की खबरें व दृश्‍य बता व दिखा रहे थे...खबरें बोलते-बोलते रिपोर्टरों की सांसें फूल रही थीं...युद्ध स्थल से रिपोर्टिंग करना जितना खतरनाक होता है, उससे कम खतरनाक नहीं था इस बहुकोणीय आतंकी कार्रवाई की लाइव रिपोर्टिंग करना।...रात 10 से कब 12 बज गया पता भी नहीं चला...मुंबई की बेचारगी पर मन दुख से जब भर उठा, तो करीब 2 बजे टीवी बंद कर दिया...गुरुवार की सुबह उठते ही दूध लेने डेयरी की दुकान पहुंचा...वहां पड़े अखबार ‘पत्रिका’ पर नजर पड़ी... ‘मुंबई में आतंकी हमला, 78 मरे’, 200 से अधिक घायल, एटीएस प्रमुख सहित 9 पुलिसकर्मी शहीद...।

गुरुवार को भोपाल में 13वीं विधानसभा चुनाव के लिए मतदान था...यानी छुट्टी का दिन। मगर, मुंबईवासियों के लिए मातम मनाने का दिन...पुलिस व सेना के जवानों के लिए आतंकियों को खोजने, मारने और उनसे बदला लेने का दिन...और अवसरवादी नेताओं के लिए बयानबाजी करने का दिन... इस आतंकी हमले में आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख हेमंत करकरे, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त अशोक काम्टे और वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक विजय सालस्कर, जिन्होंने 100 से अधिक अपराधियों को विभिन्न मुठभेड़ों में मार गिराया था, ताज महल और ट्राइडेंट होटल में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गये।
वहीं इसमें सौ से अधिक लोगों की जानें गईं और 200 से अधिक लोग जख्मी हो गए। गुरुवार शाम तक आ रही खबरों के मुताबिक कई लोग अब भी होटल में फंसे हुए हैं और आतंकियों से पुलिस की मुठभेड़ जारी है।...

हाल के महीनों में देश की राजधानी, आर्थिक राजधानी समेत प्रमुख शहरों में एक के बाद एक बड़े आतंकी वारदातों से ऐसा नहीं लगता, कि भारत में भी कट्टरपंथी इस्लामिक देशों की सी हालत पैदा हो रही है...मुंबई की यह वारदात इराक, अफगानिस्तान और इजरायल आदि देशों में आये दिन होने वाली वारदातों जैसी है। कहा जा रहा है कि इस हमले में विदेशी या कहें पाकिस्तानी आतंकियों का हाथ है। इससे पहले, खबर यह भी निकली कि डेक्कन मुजाहिदीन ने एटीएस को ईमेल भेज कर इसकी जिम्मेदारी ली है। डेक्कन मुजाहिदीन क्या इंडियन मुजाहिदीन का सिक्वल है? दिल्ली समेत देश के कई शहरों को हाईअलर्ट कर दिया गया है।

लेकिन, इस मातम की घड़ी में एक बार फिर देश के सामने यह सवाल नहीं खड़ा हो जाता है- क्या भारत की सुरक्षा-व्यवस्था फेल हो चुकी है? यदि हां, तो हमें आतंकियों की हुकूमत में दहशत की जिन्दगी जीने के लिए अभी से ही खुद को तैयार करना शुरू कर देना चाहिए। या फिर अपने देश के निकम्मे व बुजदिल शासक राजनेताओं को घर बिठाकर युवाओं को आगे आने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।...नहीं तो...हिन्दुस्तान को इराक, अफगानिस्तान, इजरायल बनने से वर्तमान शासक व राजनेता रोक नहीं पायेंगे।

म.प्र. में भाजपा को 79 व कांग्रेस को 70 सीटें !

चुनावी आंकलनः मध्यप्रदेश, राजस्थान व दिल्ली में किसी को बहुमत मिलने के आसार नहीं
मध्यप्रदेश, राजस्थान व दिल्ली में मतदान की घड़ी करीब है। इसलिए प्रायः की तरह राजनीति में रूचि रखने वाले इन राज्यों के पाठकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, ब्लॉगरों समेत ठंड में भी पसीना बहा रहे विभिन्न पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं में मतगणना पूर्व यह जिज्ञासा काफी तीव्र होगी कि जनता का फैसला क्या होगा? किसे मिलेगा सत्ता का ताज और कौन होगा बेताज? एडिटोरियल प्लस डेस्क, भोपाल द्वारा इस जिज्ञासा पर ठोस विश्‍लेषण के लिए अपनी संपर्क सूची के वरिष्ठ राजनीतिक विश्‍लेषकों, लेखकों व पत्रकारों से विश्‍लेण मंगवाये गये। प्राप्त विश्‍लेषणों में भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्‍लेषक श्री विनोद तिवारी के शोधपरख विश्‍लेषण को सीधीबात पर प्रकाशित किया जा रहा है। इस विश्‍लेषण में मध्यप्रदेश के चुनावी नतीजों पर खासकर बात की गई है, जबकि राजस्थान व दिल्ली के नतीजों पर अनुभवी विचार व्यक्त किये गए हैं। श्री तिवारी ने मध्यप्रदेश के लगभग 200 से अधिक पत्रकारों और सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बातचीत के आधार पर विस्तार से नतीजों का आंकलन किया है। इस चुनावी आंकलन में कितना दम है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के एक सर्वे और इसी राज्य के खुफिया तंत्रों के आंकलन से प्राप्त नतीजे भी श्री तिवारी के चुनावी आंकलन के लगभग आसपास हैं।

पहले : मध्यप्रदेश के चुनावी हालात
जनता को शिवराज पर तो भरोसा, पर शिवगणों पर नहीं
लोकतंत्र के यज्ञ में आहुति देने का समय नजदीक (27 नवंबर) है। लेकिन परिणाम को लेकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में संशय की स्थिति बनी हुई है। ऊपरी तौर पर भले ही कुछ भी दावें किये जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत से सब वाकिफ हैं। भाजपा की बात हम करें, तो उनके सभी बड़े महारथी कड़कती ठंड में भी माथे से पसीना पोछने को मजबूर हैं। दरअसल, प्रदेश की जनता को शिवराज पर तो भरोसा है, लेकिन जिनको शिव का गण यानी विधायक चुना जाना है, उनसे न सिर्फ जनता नाराज है, बल्कि उसकी नजर में ये गण विश्‍वासघाती भी हैं। यही वजह है कि अंकों का गणित सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के गणितज्ञों को उलझन में डाले हुए है। यहां सभी शिवगण अब मोदी स्टाइल में शिवराज के भरोसे हैं। वहीं शिवराज भी ‘मैं हूं न’ का भरोसा दिलाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के लिए भले यह अच्छी बात हो सकती है कि शिवराज को सुनने लोग आ रहे हैं, लेकिन उमा भारती की सभाओं की भीड़ कम नहीं है। यह भाजपा को सरकार बनाने में सबसे बड़े रोड़े के रूप में दिख रही है। उमा की बगावत या यूं कहें कि घर से निकालने के बाद इस साध्वी राजनेता ने भाजपा को पूरी तरह उखाड़ फेंकने की कसम खाई है। और जैसा कि जंग में सब जायज होता है, उमा भारती ने भी बिना किसी परहेज के न सिर्फ जातिवाद, बल्कि समाजवादी पार्टी के कर्ताधर्ता अमर सिंह के मार्फत कांग्रेस से भी गुप्त समझौते में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उमा भारती के बारे में इस बात का जिक्र इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि साध्वी के पास उड़न खटोले में घूमने और चुनाव में खर्च करने के लिए करोड़ों रुपये आखिर कहां से आये? यह सिर्फ हमारा ही जिक्र नहीं है, राजनीतिक गलियारों में यह बात आमतौर पर सवाल खड़ी कर रही है। भाजपा के लिए बागियों की बात अब पुरानी होती जा रही है, क्योंकि वह जिसे बागी मान रही है, दरअसल वे भाजश के उम्मीदवार हैं। और जब कोई नेता पार्टी बदल लेता है, तो वह बागी नहीं रह जाता।
एक अंधा एक कोढ़ी की तर्ज पर कांग्रेस
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बात करें तो, वह ‘राम मिलाये जोड़ी, एक अंधा-एक कोढ़ी’ की तर्ज पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है। बचपन के एक लंगड़े व दूसरा अंधे दोस्तों की एक कहानी मुझे याद है, जिसमें लंगड़ा राह दिखाता और अंधा आगे चलता। समझना सहज है कि कांगेस में कौन लंगडा है और कौन अंधा। हम यहां बसपा का जिक्र करना नहीं भूलेंगे, जो बहुजन हिताय के नारे से सर्वजन हिताय के नारे में तब्दिल हो गई। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के विज्ञापनों में एक लाइन खासतौर पर डाली जाती है-सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय-इसका मतलब साफ है कि जिस मनुवादी व्यवस्था के नाम पर बसपा के संस्थापक काशीराम आगे बढ़े थे, उसे न सिर्फ मायावती ने ध्वस्त कर दिया, बल्कि सर्वणों को दुत्कारने और उन्हें अपमानित करने के राजनीतिक पाप को धोने के लिए माया ने मनुवादियों से गलबहियां कर ली। ब्राह्मणों और दलितों में गठजोड़ फार्मूला से ही माया को उत्तर प्रदेश में सत्ता मिली। उसी फार्मूले को वह अब मध्यप्रदेश में सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचने के लिए लागू कर रही हैं। वहीं, समाजवादी पार्टी को मध्यप्रदेश में अब फिर से नयी जमीन तलाशने की जरूरत है।
कोई भी दल अकेले सरकार बनाने की स्थिति में नहीं
दलवार संभावित सीटें : भाजपा-79, कांग्रेस-70, बसपा-9, भाजश-7, सपा-2, गोंगपा-2, जदयू-1 व अन्य-12। शेष 57 सीटों पर बहुकोणीय मुकाबला। कुल सीट सं. 230
खैर, मध्यप्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर हमने, जो आंकलन किया है, वह चैंकाने वाला है। हमारे आंकलन के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल अभी की स्थिति में सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत जुटाने में सफल नहीं होगा। क्षेत्रवार विश्‍लेषण के अनुसार भाजपा को 79, कांग्रेस को 70, बसपा को 9, भाजश को 7, सपा को 2, गोंगपा को 2 तो जदयू को 1 और अन्य को 12 सीटें मिलती दिख रही हैं। शेष 57 सीटें ऐसी हैं, जिनपर त्रिकोणी, बहुकोणी और सीधा मुकाबला है। और ये 57 सीटें ही किसी भी राजनीतिक पार्टी के भविष्य का फैसला करेंगी।
शिवराज, उमा, कमलनाथ, सुरेश पचैरी, दिग्विजय आदि के प्रभाव-अप्रभाव
मोटे तौर पर जहां बुंदेलखंड भाजश प्रमुख उमा भारती के प्रभाव में है, वहीं ग्वालियर-चंबल क्षेत्र को ग्वालियर राजघराना अपने कब्जे में करता हुआ नजर आ रहा है। बुंदेलखंड में पिछली बार जहां 24 सीटें भाजपा और 2 सीटें कांग्रेस के पास थीं, उनमें इस बार 10-12 सीटें ही भाजपा की झोली में आ सकती हैं। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि दो विपरीत दिशाओं के आदिवासी जिले मंडला और झाबुआ में भाजपा की पकड़ बेहद मजबूत है। हालांकि, कांग्रेस के भविष्य राहुल गांधी झाबुआ में सभा कर कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा 34 में से 22 सीटों पर फिलहाल काबिज है, पर यह संख्या इस बार घटकर 15-16 होने के आसार हैं। विंध्य क्षेत्र में मिश्रित जनादेश सभी पार्टियों के गणित को बिगाड़ रहा है, वहीं महाकौशल में कमलनाथ की आन पर बन आई है। कमलनाथ महाकौशल में बहुमत की उम्मीद में मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोये हुए हैं, जिसकी झलक उनके भाषणों में साफ है। मालवा क्षेत्र में भाजपा अभी भी मजबूत स्थिति में दिख रही है, लेकिन नर्मदा के दोनों किनारों की जनता भाजपा से दूर होती नजर आ रही है। खरगौन में चुनाव हारने के बाद से भाजपा के संघी नेता कृष्णमुरारी मोघे की रूचि अब निमाड़ में नहीं है। उनके निष्क्रिय होने से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुभाष यादव का हौसला बुलंद है। एक खास सीट झाबुआ का जिक्र करना जरूरी है, जहां राहुल गांधी के पसंदीदा उम्मीदवार जेबियर मेंड़ा चुनाव लड़ रहे हैं। यदि मेंड़ा चुनाव हारते हैं, तो केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भुरिया की राजनीति को पलीता लग सकता है। सुरेश पचैरी कहने को तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में उनकी स्थिति यह कह सकने की नहीं कि वे किस कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, क्योंकि प्रदेश में दिग्विजय कांग्रेस, कमलनाथ कांग्रेस, सुभाष कांग्रेस, अर्जुन कांग्रेस और ज्‍योतिरादित्‍य कांग्रेस का वर्चस्व है। ऐसे में, श्री पचैरी की स्थिति समझना सहज है।
अब जरा 2003 के नतीजों पर एक नजर
भाजपा-173 सीट , कांग्रेस-38 सीट, शेष-19 सीट अन्य दलों को। कुल सीट-230

अब राजस्थान के चुनावी हालात
जातिगत जुगाड़ से सत्ता जीतने की कोशिश
राजघरानों के लिए मशहूर राजस्थान की चुनावी जंग इस बार पिछड़ों और दलितों के इर्द-गिर्द घूम रही है। राजपूताना विरासत के राजाओं के वंशजों की प्रभावशून्यता जहां राजनीतिक पार्टियों के पोस्टरों पर दिख रही है। वहीं जातिगत समीकरणों में नये क्षत्रपों के दम पर लोकतंत्र के अश्‍वमेध को जीतने की जुगाड़ लगाई है। जुगाड़ शब्द का नाता राजस्थान से बहुत पुराना है। वैज्ञानिक प्रो. यशपाल के शब्दों में जुगाड़ राजस्थान के ग्रामीण परिवहन की रीढ़ है। (राजस्थान में सामान्य लकड़ी की पहियेदार ट्राली में कोई भी डीजल इंजन रखकर गाड़ी बना ली जाती है और परिवहन विभाग में उसका कोई रजिस्ट्रेशन भी नहीं होता और वहां के ग्रामीण जीवन में यह बहुत ही लोकप्रिय है) इसी जुगाड़ की तरह जातीय समीकरण राजस्थान की राजनीतिक सड़कों पर बगैर रजिस्ट्रेशन के दौड़ लगा रहे हैं।
बागियों को मना पाई तो लंगड़ी सरकार बना सकती है भाजपा
चुनाव की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए जातियों के बड़े नेताओं ने रातोंरात गद्दी संभालने की कवायद में जातिभेद के संघर्ष शुरू किये। इसमें आधा सैकड़ा निरीह जानें बेवजह बलि चढ़ गईं और कर्नल बैसला नेता बन गए। भौतिक विज्ञान के आकर्षण और प्रतिकर्षण के सिद्धांत का असर राजस्थान में भी हुआ और सरकार के खिलाफ शुरू हुआ यह संघर्ष मीणा और गुर्जरों के बीच की लड़ाई बनकर रह गया। जिस राजस्थान को महाराणा प्रताप, राणा संगा जैसे वीर जवानों और हल्दी घाटी की लड़ाई के लिए जाना जाता है, वहां तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने के लिए जिस तरह मीणा और गुर्जरों में संघर्ष करवाया गया, वह शर्मनाक है। अब वही लोग राजस्थान के कर्णधार बनने के लिए चुनावी समर में हैं। हम ऊपर आपको बता ही चुके हैं कि राजस्थान पूरी तरह से बिहार और उत्तर प्रदेश की तरह जातीयता में उलझ चुका है। मीणा नेता कीरोड़ीलाल का मुख्यमंत्री वसुंधरा से झगड़ा और उसके बाद उनकी बगावत भाजपा के लिए 13 फीसदी मीणा वोटरों में सेंध लगाने के लिए काफी है। वहीं 6.5 फीसदी गुर्जरों से उम्मीद लगाये बैठी भाजपा को शायद यह नहीं मालूम कि कर्नल बैसला से पहले कांगेस के सचिन पायलट गुर्जरों के बड़े नेता हैं। ऐसे में, भाजपा की स्थिति दो पाटों के बीच फंसने जैसी है, जहां से बचना मुश्किल ही होता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के लिए यह सबकुछ आसान है, क्योंकि पांच साल पहले अशोक गहलोत के सत्ता से जाने के बाद कांगेस का संगठन आजतक बिखरा ही हुआ है। ऐसी स्थिति में भगवान भरोसे सरकार बनने का सपना या कहें भाजपा सरकार के इंकम्बैंसी फैक्टर के भरोसे मुख्यमंत्री की गद्दी की आशा बंधी हुई है। भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि यदि मतदान से पहले वह बागियों को मना पाई तो लंगड़ी टांग से सरकार बना सकती है।
अंततः संक्षेप में दिल्ली के चुनावी हालात
किसी को बहुमत की गारंटी नहीं
दिल्ली की सरकार पर सिलिंग लगी हुई है। वर्तमान मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता शीला दीक्षित सिलिंग से मुक्त होने की कोशिश में दिन-रात एक कर रही हैं, लेकिन भाजपा के विजय कुमार मल्होत्रा और इसबार उन्हें मायावती के हाथी से पंजे को कुचलने का भी डर बहुत ज्यादा सता रहा है। 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा के चुनाव में कोई भी दल दावे से यह नहीं कह सकता कि हम 30 सीटें हासिल कर पायेंगे। विश्‍वस्तरीय आर्थिक मंदी में जिस तरह शेयर ब्रोकरों ने चुप्पी साध ली है, वही हाल दिल्ली के मतदाताओं का भी है। वैसे भी चुप्पी बड़ी ताकत होती है।...और जब चुनाव हो, तो मतदाता की यह चुप्पी महाशक्ति बन जाती है। फिर महाशक्ति जिसके साथ होगी, जीत तो उसी की होगी। कहने का मतलब यह है कि दिल्ली के जो हालात हैं, उनमें बड़ी पार्टी के रूप में भाजपा के आने की संभावना तो दिख रही है, लेकिन बहुमत की गारंटी नहीं है। तब राजनीति के कारपेट पर सरकार बनाने के लिए किसी छोटे दल का पैबंद लगाना जरूरी होगा।

क्या धार्मिक तानाशाही का युग फिर लौट रहा है?

क्या धार्मिक तानाशाही का युग फिर लौट रहा है? यह सवाल उठाया है एक प्रतिष्ठित विचारक श्री गिरिराज किशोर ने। यह वाकई में विचारणीय है। 19 नवंबर को सीधीबात पर प्रकाशित आलेख शांतिप्रिय हिन्‍दू भाई भगवा आतंकवाद से सावधान पर आई प्रतिक्रियाओं को पढ़कर कम से कम ऐसा ही लगता है। इस आलेख के पक्ष में एक-दो प्रतिक्रियाओं को छोड़ दें तो, ज्‍यादातर में भगवा आतंकवाद के प्रति आंखें मूंद कर अपना पक्ष रखा गया तथा लेखक के प्रति रोष प्रकट किया गया है। यह वाकई में निष्‍पक्ष भारतीय बौद्ध्‍किता के लिए चिंता का विषय है। इस चिंता पर श्री गिरिराज किशोर के विचार और सवाल हमें सचेत करते हैं...इसे आप भी पढ़ें....
भारत जैसे धर्मपरायण देश में हिंदू हों या मुसलमान, सिख हों या ईसाई, सबके पास धर्म का ऐसा आधार है कि अपनी-अपनी हर समस्या का समाधान वे उसमें तलाश कर लेते हैं। टीवी देखना एक धर्म में कुफ्र है, दूसरे में मुखौटा लगाकर नाचना धर्म विरुद्ध है, तीसरे में धर्म बदलने की आजादी पाप है। क्या हम धर्म को सवोर्परि मानते हैं? उसमें क्या श्रेष्ठ है और क्या नहीं, इस विषय पर विद्वत् जन सामूहिक विचार करना नहीं चाहते या ऐसा करने से डरते हैं? क्या धार्मिक तानाशाही का युग फिर लौट रहा है? अगर ऐसा हुआ तो देश मुश्किल में पड़ जाएगा। यहां इतने धर्म हैं, तो आखिर कितनों की तानाशाही बर्दाश्त करनी होगी? धर्म तानाशाह नहीं होता। कर्मकांड तानाशाही करता है। उसकी व्याख्या यानी इंटरप्रेटेशन में तानाशाही का अंदाज होता है। यह उचित यह अनुचित, यह पाप यह पुण्य। वेदों को कितने लोग जानते हैं? कुरान पाक के कितने आलिम फाजिल हैं? यह एक दूसरी तरह की अनभिज्ञता है जो धर्म का गुलाम बनाती है। जो हम समझते नहीं और उस पर विश्वास करते हैं तो यह दूसरा गुलामी का दरवाजा है। गुरुओं से कौन पूछे कि आपने यह कैसे फतवा दिया। 'ऊपर' वाला तो डंडा चलाएगा नहीं, बाकी सब उसका डंडा संभाले हैं। लेकिन लगता है कि उनका आपस में कुछ अनुबंध है। शंकराचार्य बनने के बारे में वे मनमानी कर सकते हैं। शहर काजी के बारे में उनकी राय मुख्तलिफ हो जाती है और अपने आपको लोग काजी घोषित करने में कुछ भी गलत नहीं समझते। ये बातें इसलिए जेहन में आती हैं कि आम आदमी अपनी आदमियत साबित करना चाहे तो उसे इन्हीं मुल्ला मौलवियों और पंडितों के पास जाना पड़ेगा। लगता है कि धर्म ज्यादा ताकतवर हुए हैं। 15 नवंबर को एक निजी चैनल पर वाराणसी के धर्मगुरुओं की सभा के महामंत्री बता रहे थे कि स्वामी दयानंद पांडे उर्फ अमृतानंद को उस सभा ने शंकराचार्य नहीं बनाया। उनमें एक दो लोगों ने जबर्दस्ती पीठ भी बना दी और उन्हें शंकराचार्य भी घोषित कर दिया। यही कहानी ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद स्वर्ण मंदिर में घटित हुई थी। यह क्या है? आधिकारिक प्रवर समिति दयानंद जी को शंकराचार्य मानती नहीं, राजनीति मानती है। उसकी सुविधा और नीति को वे सूट करते हैं। इतने साधु अनाचार में पकड़े जाते हैं लेकिन उनके बारे में बात करना राजनीति के लिए लाभकारी नहीं। दयानंद और प्रज्ञा साध्वी, यहां तक कि कर्नल पुरोहित उनके उद्देश्य की सिद्धि में फिट बैठ रहे हैं। हिंदूवादी संगठन कह रहे हैं कि सरकार सेना और साधुओं को अपमानित कर रही है। अपने हित में अपमानित होने वालों का उन्होंने एक युग्म बना लिया। मजे की बात है कि इस युग्म में एक स्वामी, एक अदद साध्वी और फिलहाल एक कर्नल है। तोगडि़या आदि फतवा दे रहे हैं कि पूरा साधु समाज और पूरी सेना अपमानित हो गई, जबकि इन पर क्रिमिनल चार्जेज लगे हैं। साबित होना बाकी है। हो सकता है वे बेगुनाह हों, लेकिन जांच तो हो जाने दीजिए, फिर कहिए। गेरुआ वस्त्र धारण करने से कोई व्यक्ति जुर्म से निरापद नहीं हो जाता, न वर्दी पहन लेने से। देश के सामाजिक ढांचे में इधर मूलभूत परिवर्तन हुए हैं। एक क्रांतिकारी परिवर्तन तो मंडल कमिशन के लागू होने से हुआ है। दूसरा आरक्षण से, जिसने समाज का परंपरागत ढांचा बदल दिया। जिनकी पहचान नहीं थी उन्हें पहचान मिल गई। नतीजतन पहले जातिगत राजनीतिक पार्टियां बनीं। जातिगत वर्चस्व की जोर-आजमाइश सबसे अधिक राजनीति में हुई। फिर माया-मिश्रा समीकरण ने सत्ता के लिए सोशल एंजीनियरिंग के फंडे द्वारा अन्य जातियों को ताश के पत्तों की तरह बांटना शुरू किया। इस प्रक्रिया ने सवर्ण को राजनीतिक खानाबदोश की स्थिति में ला दिया। जो वर्ग सदियों शासक और नियामक रहा हो, वह कुछ कहे या न कहे लेकिन आहत तो होगा। मुसलमानों ने देश पर कई सौ साल राज किया था, जब अंग्रेज आए तो उनके मन में अपनी प्रजागत स्थिति से सालों तक असंतोष रहा। 1857 में उनके बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के पीछे एक यह भी कारण था। देशभक्ति की बात रही होगी या नहीं, पर अंग्रेजों के प्रति उनका आक्रोश था, वे उन्हें तख्त से तख्ते पर ले आए थे। सवर्ण भी सदियों की उस पीड़ा को कैसे भूल जाएंगे। हालांकि उनके द्वारा कथित निमन् जातियों पर किए गए अत्याचारों का उनके पास कोई रेकॉर्ड नहीं है, लेकिन अपने वर्चस्व के जाने का उनमें मलाल जरूर है। उसका प्रतिकार वे राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखकर करना चाहते हैं। उसके लिए धर्म और संतों का वर्चस्व बनाए रखने का तरीका ही शायद उनके पास है। पहले हिंसा फुटकर स्तर पर होती थी। जैसे उड़ीसा में नन के साथ सामूहिक बलात्कार और उसे जलाना, विदेशी फादर और उसके बच्चों की जलाकर हत्या करना। उस वक्त भी हिंदूवादी वर्ग ने हत्यारों का बचाव किया था। लेकिन जैसे समाचार आ रहे हैं और यदि वे सही हैं, तो लगता है कि तालिबान और पड़ोसी देश के आतंकवादियों की तरह अपने देश में भी संगठित आतंकवाद की संभावना की तलाश शुरू हो गई है। क्या इससे धर्म की श्रेष्ठता या सवर्ण-वर्चस्व स्थापित होगा? हिंदू धर्म के देवी-देवता भले ही विभिन्न आयुधों से संपन्न नजर आते हों, पर बेकसूरों के लिए नहीं। इसका उदाहरण है कि तुलसी ने मानस में शंबूक प्रकरण को नहीं रखा। वह जानते थे यह प्रकरण समाज के हित में नहीं है। हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था के कारण बहुत जहर फैला है, अगर धर्मगत संगठित हिंसा का आरंभ हो गया और सारे धर्म इस रास्ते पर उतर आए तो न धर्म बचेंगे न धर्म मानने वाले। जो साध्वी या साधु या राजीतिज्ञ ऐसा सोचते हैं, वे कभी न समाप्त होने वाले सिविल वार को निमंत्रण दे रहे हैं। ऐसे लोगों का मन परिवर्तन करने की आवश्यकता है। साधु संत उनका मन परिवर्तन करके उन्हें शांति के गोल में ला सकते हैं। राजनेता तो इधर भी आग सेकेंगे उधर भी। संतों, ये देश बेगाना नहीं।
साभार: नवभारत टाइम्‍स डॉट कॉम

शांतिप्रिय हिन्‍दू भाई भगवा आतंकवाद से सावधान

उदय केसरी
भगवा आतंकवाद पर मैं पहली बार कुछ लिख रहा हूं। पिछले कई दिनों से टीवी व अखबारों में भगवा आतंकवाद के चेहरे के रूप में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, ले. कर्नल श्रीकांत पुरोहित और स्वामी अमृतानंद देव उर्फ सुधाकर द्विवेदी उर्फ दयानंद पांडेय को गिरफ्तार किया गया है। इन पर मालेगांव बम धमाके के अलावा समझौता एक्सप्रेस धमाके में भी शामिल होने या उनमें मास्टरमाइंड की भूमिका होने के आरोप लगाये जा रहे हैं।

ये आरोप किसी मुस्लिम संगठन या भाजपा या भगवा विरोधी राजनीतिक दल या नेता ने नहीं लगाये हैं, बल्कि जांच-पड़ताल के आधार पर देश के आतंकवाद निरोधक दस्ता (एटीएस) द्वारा लगाये जा रहे हैं। एटीएस की जांच में पिछले कुछ दिनों से लगातार नये-नये राजफाश के दावे किये जा रहे हैं। इस खोज में एक तरफ एटीएस के धुरंधर अफसरों की टीम सक्रिय है, तो दूसरी तरफ मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के धुरंधर पत्रकार लगे हुए हैं। इसलिए भगवा आतंकवाद का राजफाश करने की एटीएस व मीडिया में होड़ सी मची है। मीडिया कभी एटीएस की वाहवाही करता है, तो कभी उसे झूठा करार देता है। वहीं, एटीएस भी अपनी किसी गलती को मानने के बजाय शातिर नेताओं की तरह अपने बयान से पलटने में भी देरी नहीं करती। खैर, इस जांच-पड़ताल व खोज की होड़ में सच क्या है और गलत क्या है, इसका औपचारिक फैसला तो न्यायालय करेगा।

लेकिन, फिलहाल अनौपचारिक सच या आमजन में भगवा आतंकवाद को लेकर उठते सवालों व उनमें बनती-बिगड़ती धारणा ज्यादा विचारणीय है। जिस तरह मुस्लिम समुदाय के बीच आतंकवाद का बीजारोपण करने वाले कुछ विध्वंसक प्रवृत्‍ति के लोगों ने धर्म के नाम पर जेहाद का हथकंडा अपनाया और आतंकवाद का इस कदर विस्तार किया कि पूरी दुनिया में आतंकवाद मुस्लिम समुदाय का पर्याय सा बन गया । यही नहीं, जिन देशों में आतंकी वारदातों को अंजाम दिया गया, वहां तो हर मुस्लिम को उस देश के लोग शक की नजर से देखने लगे हैं। लंदन और अमेरिका इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। इसी तरह अब कुछ विध्वंसक प्रवृत्‍ति के लोगों द्वारा हिन्‍दू समुदाय के बीच भगवा आतंकवाद का विस्‍तार करने की कोशिश की जा रही है।

भगवा आतंकवाद, हालांकि फिलहाल आमजन के लिए नया व चैंकाने वाला है, पर इसकी जड़ों को बहुत पहले से विध्वंसक तत्‍वों व संगठनों द्वारा खाद-पानी दिया जाता रहा है। धर्मपरिवर्तन, सांस्कृतिक संक्रमण, हिन्दू राष्ट्र, मंदिर-मस्जिद, बहुसंख्यकवाद आदि के नाम पर कारसेवा तो दंगा-फसाद चलाया जाता रहा है। पर, बम विस्फोट और तथाकथित इस्लामी आतंकवाद के नक्‍शे-कदम पर भगवा आतंकवाद का विस्तार किया जाना वाकई में देश व दुनिया के उदार व शांतिप्रिय हिन्दुओं के लिए चैंकाने वाला है। और यदि यह कहें कि हिन्दुत्व के नाम पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से राजनीति करने वाले संगठनों से दूर भारत समेत दुनिया के अधिकतर हिन्दू भगवा आतंकवाद के पक्षधर नहीं हो सकते, तो शायद गलत नहीं होगा। क्योंकि हिन्दू धर्म में कट्टरता व हिंसा का कोई स्थान नहीं। यहां तो उदारता व सहिष्णुता सर्वोच्च है।

लेकिन जैसे मुस्लिम समुदाय में अन्य धर्मों के खिलाफ नफरत के बीज बोये गए, उसी तरह हिन्दू समुदाय के बीच दूसरे धर्मों के खिलाफ नफरत भरना आसान नहीं है। वजह एक नहीं अनेक हैं। अन्यथा कम से कम भारत के तमाम हिन्दू आरएसएस, विश्‍व हिन्दू परिषद, बजरंग दल आदि के सदस्य होते। 1925 में गठित आरएसएस की उम्र 83 साल हो चुकी है, पर अब तक इसके सक्रिय सदस्यों की संख्या लगभग 45 लाख है, जबकि देश की पूरी आबादी में 80.5 फीसदी यानी करीब 85 करोड़ लोग हिन्दू हैं। और फिर आरएसएस, जो कट्टर हिन्दूवादियों का सबसे बड़ा संगठन है, के सक्रिय कार्यकर्ताओं की संख्या जितनी ही संख्या बाकी कट्टर हिन्दूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की भी मान लें, तो भी आठ दशक से अधिक के कालखंड में ये हिन्दूवादी संगठन अपने ही धर्मभाइयों को प्रभावित कर पाने में क्यों सफल नहीं हुए हैं? जवाब साफ है, हिन्दू संस्कार वृहद मानसिकता का निर्माण करता है, न कि संकीर्ण व विध्वंसक। मुस्लिम समुदाय में भी निर्दोषों के खून बहाने और अमानवीय व्यवहार की मनाही है, पर धर्म के प्रति आस्था में नियमों व मौलानाओं के हुक्मों की सख्ती उदारता को बहुत करीब आने नहीं देती। फिर, अशिक्षा, खान-पान व गरीबी के कारण वे हमेशा नफरत के सौदागरों के लिए नरम चारा होते हैं। तभी तो, वे रुपये के वास्ते आत्मघाती बम बनने तक के लिए तैयार हो जाते हैं।

फिर भी, भगवा आतंकवाद के जहर का पता चलना चिंता का विषय है। हिन्दू आबादी के उदार व शांतिप्रिय संस्कार के भरोसे ही हम इससे बेपरवाह नहीं हो सकते। देश व दुनिया के हिन्‍दुओं को ही ऐसे आतंकी तत्वों के खिलाफ धर्म की मर्यादा के खातिर विरोध का स्वर बुलंद करना चाहिए, जो हिन्दुत्व के नाम पर असल हिदुत्व की हत्या करने की कोशिश कर रहे हैं।

महाराष्ट्र ‘देश’ का ‘देशद्रोही’ और इंडिया का ‘दोस्ताना’

उदय केसरी
रिलीज से पहले दो फिल्में इन दिनों काफी चर्चा में हैं-पहली ‘देशद्रोही’, दूसरी ‘दोस्ताना’। चर्चा में क्यों है? संभवतः आप सब जानते होंगे। फिर भी, मैं अपनी तरह से स्पष्ट कर देता हूं। ‘देशद्रोही’ में महाराष्ट्र के खिलाफ और भारत के पक्ष में आवाज बुलंद की गई है। वहीं ‘दोस्ताना’ में एडवांस इंडिया (गे-कल्चर) के पक्ष में कहानी गढ़ी गई है।...

वैसे, फिल्मी कहाहियों की दृष्टि से इन दोनों फिल्मों की कथावस्तु में नया कुछ भी नहीं है। क्रांतिवीर, तिरंगा आदि कई फिल्में देशभक्ति पर बनीं, वहीं गे-कल्चर (समलैंगिकता) पर फायर जैसी फिल्म भी पहले ही आ चुकी है।...इन दोनों फिल्मों में ‘दोस्ताना’ के रिलीज होने में किसी विरोध का संकट नहीं है और वह 14 नवंबर को शान से मुंबई व महाराष्ट्र के अलावा भारतभर में रिलीज होने जा रही है। उधर, ‘देशद्रोही’ को भारत के फिल्म सेंसर बोर्ड से तो रिलीज की अनुमति मिल गई है, मगर महाराष्ट्र ‘देश’ के एकछत्र राजा राज ठाकरे की अनुमति का इंतजार है, इसलिए इस फिल्म के रिलीज की तारीख शायद अभी पक्की नहीं हो पा रही है। अब मैं यहां भारत और महाराष्ट्र के बीच भेद और विवाद के जनक राज ठाकरे की राजनीति की चर्चा नहीं करना चाहता। इस पर पिछले कई हफ्तों से लिखा-कहा जा चुका है, पर किसी के कान जूं तक नहीं रेंगी, न देशमुख सरकार के और न ही मनमोहन सरकार के। अलबत्ता, नीतीश सरकार ने अपनी पार्टी के पांच सांसदों (जिनका कार्यकाल अब कुछ महीनों का ही बचा था) की बलि देकर अपना क्रोध शांत कर लिया।

खैर, मेरा सवाल यह है कि महाराष्ट्र ‘देश’ के राजा बाबू को ‘देशद्रोही’ के कथावस्तु व संवादों पर आपत्ति है...चलो मान लिया...सच सुनने व समझने की शक्ति ऐसे विध्वंसक तत्‍वों में नहीं होती। लेकिन वे खुद को हिन्दुत्व के भी तो पैरोकार बताते हैं, तो क्या उन्हें समलैंगिकता पर आधारित ‘दोस्ताना’ के कथावस्तु व संवादों तथा देहदिखाऊ दृष्यों पर आपत्ति नहीं है? क्या इससे उनके हिन्दुत्व की भावना को कोई चोट नहीं लगती?

राज ठाकरे के अब तक के दंगे-फसाद और बयानों से आपको इतना तो समझ में आ गया होगा कि वह मराठियों के हित के नाम पर मुंबई में ही दंगा-फसाद, आगजनी और आतंक फैला रहे हैं। इसके कारण वहां बसे बिहार व यूपी वाले तो आक्रांत हो रहे हैं...पर क्या मराठियों का दैनिक जीवन दूभर नहीं हो रहा है? दंगा-फसाद से क्या उनका दैनिक कामकाज प्रभावित नहीं हो रहा? बेशक हो रहा है। और यदि मैं मुंबई के अपने कुछ मराठी साथियों के विचारों को दोहराऊं, तो राज ठाकरे जिन मराठियों की बात करते हैं, वे निकम्मे हैं। उन्हें नौकरी मिल भी जाए, तो भी वे काम नहीं करेंगे। यह तो राज ठाकरे की भ्रष्ट व भय की राजनीति है, नहीं तो ऐसा नहीं कि मुंबई में मेहनतकश मराठी मानुष बिहारियों व अन्य बाहरियों के मुकाबले बेकार बैठे हैं।

बहरहाल, मैं भारत, महाराष्ट्र और इंडिया के दर्शकों के लिए रिलीज होने को तैयार ‘देशद्रोही’ और ‘दोस्ताना’ की बात कर रहा था। ये फिल्में आज न कल रिलीज तो होगी ही, पर इसके पहले छोटी बजट और नये व छोटे कलाकारों को लेकर बनी ‘देशद्रोही’ को बिना खर्च के इतनी पब्लिसिटी मिल गई है, जितनी करोड़ों खर्च करके भी नहीं मिलती।...

मेरे देश में तरह-तरह के बम

दीपावली से पहले के धमाकों के जख्मों को देश अभी इस दीपावली की परंपरागत खुशी के मरहम से भर भी नहीं पाया था कि इसके तीसरे ही दिन असम दहल उठा। 13 धमाके, 70 से अधिक मौतें व 470 से अधिक जख्मी लोग। मैं छुट्टी में अपने घर पर था। इसलिए, तब सीधीबात के जरिये अपनी संवेदना नहीं प्रकट कर सका। पर सच मानिए, अपने देश की दशा पर दुःख बहुत हुआ। आज ही लौटा हूं, भोपाल। मेरे साथी मीतेन्‍द्र नागेश ने देश की दशा पर कुछ अलग ही तरह से विचार व्यक्त किया है, जो वाकई में हमें सोचने पर मजबूर करता है।......

एक बंटवारा आज़ादी के समय हुआ था। विभाजन का दंश क्या होता है? यह कम से कम वे लोग तो नहीं बता सकते, जो भौतिकरूप से इससे दूर रहे हों या कहें विभाजन से सीधेतौर पर प्रभावित न हुए हो। इस दर्द को तो भलीभांति वही जानते हैं, जिनके सीने पर सरहद की लकीर खींच दी गई। घर छूटा, अपने छूटे और जन्मभूमि पराई हो गई। अखण्ड भारत खंडित हो गया। हालांकि बाद में सरदार पटेल जैसे नेताओं ने अनेक देशी रियासतों को समेटकर एक नया भारत बनाया। जिसे पूरी तरह अखंड तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसके करीब तो है ही।
लेकिन उस बंटवारे को बीते अभी महज साठ साल ही हुए हैं कि अब भारत फिर से बंटवारे की दहलीज पर खड़ा दिखने लगा है। ये बंटवारे कई तरह के हैं। हम धर्मों में बंट रहे हैं। हम जातियों में बंट रहे हैं। हम क्षेत्रों में बंट रहे हैं। और इस तरह हम बंटवारे की घटिया राजनीति के शिकार होते जा रहे हैं। क्या हम आज यह कहने की स्थिति में हैं कि ‘हम सब एक हैं, हमारा भारत एक है।’ क्या यह वाक्य केवल एक नारा बनकर नहीं रह गया है?

मेरे देश में मिलेंगे तरह-तरह के बम
दाढ़ी वाले बम, चोटी वाले बम।
कार वाले बम, हार वाले बम।
मानव बम, मुर्दा बम।

मेरे देश में मिलेंगे कई भाषा, धर्म व क्षेत्र के बम
मराठी बनाम हिन्दी, हिन्दू बनाम मुस्लिम/ईसाई बम, तो
जेहादी बनाम काफिर, पाक बनाम भारत बम

मेरे देश में मिलेंगे कई वाहनों में बम
ट्रेन में, बस में, मोटरसाइकिल में तो,
साइकिल में, यहां तक कचरे के डब्बों में।

इन बमों को तो पहचान लेते हैं हम पर,
उनका क्या, जो दिलों में बारूद और
तन पर ओढ़े रहते हैं झूठा अमन

कैसा हो गया! अपना यह चमन
कैसा हो गया! अपना यह वतन

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