महाराष्ट्र ‘देश’ का ‘देशद्रोही’ और इंडिया का ‘दोस्ताना’

उदय केसरी
रिलीज से पहले दो फिल्में इन दिनों काफी चर्चा में हैं-पहली ‘देशद्रोही’, दूसरी ‘दोस्ताना’। चर्चा में क्यों है? संभवतः आप सब जानते होंगे। फिर भी, मैं अपनी तरह से स्पष्ट कर देता हूं। ‘देशद्रोही’ में महाराष्ट्र के खिलाफ और भारत के पक्ष में आवाज बुलंद की गई है। वहीं ‘दोस्ताना’ में एडवांस इंडिया (गे-कल्चर) के पक्ष में कहानी गढ़ी गई है।...

वैसे, फिल्मी कहाहियों की दृष्टि से इन दोनों फिल्मों की कथावस्तु में नया कुछ भी नहीं है। क्रांतिवीर, तिरंगा आदि कई फिल्में देशभक्ति पर बनीं, वहीं गे-कल्चर (समलैंगिकता) पर फायर जैसी फिल्म भी पहले ही आ चुकी है।...इन दोनों फिल्मों में ‘दोस्ताना’ के रिलीज होने में किसी विरोध का संकट नहीं है और वह 14 नवंबर को शान से मुंबई व महाराष्ट्र के अलावा भारतभर में रिलीज होने जा रही है। उधर, ‘देशद्रोही’ को भारत के फिल्म सेंसर बोर्ड से तो रिलीज की अनुमति मिल गई है, मगर महाराष्ट्र ‘देश’ के एकछत्र राजा राज ठाकरे की अनुमति का इंतजार है, इसलिए इस फिल्म के रिलीज की तारीख शायद अभी पक्की नहीं हो पा रही है। अब मैं यहां भारत और महाराष्ट्र के बीच भेद और विवाद के जनक राज ठाकरे की राजनीति की चर्चा नहीं करना चाहता। इस पर पिछले कई हफ्तों से लिखा-कहा जा चुका है, पर किसी के कान जूं तक नहीं रेंगी, न देशमुख सरकार के और न ही मनमोहन सरकार के। अलबत्ता, नीतीश सरकार ने अपनी पार्टी के पांच सांसदों (जिनका कार्यकाल अब कुछ महीनों का ही बचा था) की बलि देकर अपना क्रोध शांत कर लिया।

खैर, मेरा सवाल यह है कि महाराष्ट्र ‘देश’ के राजा बाबू को ‘देशद्रोही’ के कथावस्तु व संवादों पर आपत्ति है...चलो मान लिया...सच सुनने व समझने की शक्ति ऐसे विध्वंसक तत्‍वों में नहीं होती। लेकिन वे खुद को हिन्दुत्व के भी तो पैरोकार बताते हैं, तो क्या उन्हें समलैंगिकता पर आधारित ‘दोस्ताना’ के कथावस्तु व संवादों तथा देहदिखाऊ दृष्यों पर आपत्ति नहीं है? क्या इससे उनके हिन्दुत्व की भावना को कोई चोट नहीं लगती?

राज ठाकरे के अब तक के दंगे-फसाद और बयानों से आपको इतना तो समझ में आ गया होगा कि वह मराठियों के हित के नाम पर मुंबई में ही दंगा-फसाद, आगजनी और आतंक फैला रहे हैं। इसके कारण वहां बसे बिहार व यूपी वाले तो आक्रांत हो रहे हैं...पर क्या मराठियों का दैनिक जीवन दूभर नहीं हो रहा है? दंगा-फसाद से क्या उनका दैनिक कामकाज प्रभावित नहीं हो रहा? बेशक हो रहा है। और यदि मैं मुंबई के अपने कुछ मराठी साथियों के विचारों को दोहराऊं, तो राज ठाकरे जिन मराठियों की बात करते हैं, वे निकम्मे हैं। उन्हें नौकरी मिल भी जाए, तो भी वे काम नहीं करेंगे। यह तो राज ठाकरे की भ्रष्ट व भय की राजनीति है, नहीं तो ऐसा नहीं कि मुंबई में मेहनतकश मराठी मानुष बिहारियों व अन्य बाहरियों के मुकाबले बेकार बैठे हैं।

बहरहाल, मैं भारत, महाराष्ट्र और इंडिया के दर्शकों के लिए रिलीज होने को तैयार ‘देशद्रोही’ और ‘दोस्ताना’ की बात कर रहा था। ये फिल्में आज न कल रिलीज तो होगी ही, पर इसके पहले छोटी बजट और नये व छोटे कलाकारों को लेकर बनी ‘देशद्रोही’ को बिना खर्च के इतनी पब्लिसिटी मिल गई है, जितनी करोड़ों खर्च करके भी नहीं मिलती।...

2 comments:

  1. अच्छा विश्लेशन..

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  2. राज ठाकरे को यदि लगता है कि उत्तर भारतीयों को मारकर वे सही कर रहे है तो देशद्रोही फ़िल्म में जो दिखाया गया है उस सच को महाराष्ट्र में दिखाने से क्यो डर रहे है,सही मायने में कहा जाए तो राज ठाकरे में अपनी बुरे सुनने कि हिम्मत ही नही है !सर जैसा आपने कहा है कि ‘देश’ के एकछत्र राजा राज ठाकरे ,राज ठाकरे कभी मुंबई का राजा हो ही नही सकता और देश के बारे में वो सोच भी नही सकता!वो देश्द्रोही है और मेरी नजर में हमेशा रहेगा.जय अखंड भारत

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