पत्रकारिता की नई धारा बहाने की कोशिश


आप सबों को यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि एडिटोरियल प्लस सफलता पूर्वक दो साल पूरा कर तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। फिर भी हम यह मानते हैं कि हमारा यह प्रयास काफी छोटा है। अभी मंजिल काफी दूर है। उसे पाने में आप सबों की हार्दिक शुभकामनाओं और महत्वपूर्ण सुझावों की अहम भूमिका होगी। मेहनत से किसी भी परिस्थिति में नहीं डिगने के संकल्प के साथ ही हमने एडिटोरियल प्लस की स्थापना की। हमारी कोशिश धारा के विपरीत बहते हुए उन मान्यताओं को तोड़ना है, जो पत्रकारिता की व्यापकता को सीमित करने की मंषा के चलते गढ़ दी गई हैं। पत्रकारिता को छह-आठ घंटे की नौकरी की अवधि में नहीं बांधा जा सकता, लेकिन आज विडम्बना है कि आप तब तक पत्रकार नहीं है, जब तक किसी अखबार या चैनल का ‘लोगो’ आपके माथे पर नहीं चिपका हो। इस दशा में एडिटोरियल प्लस की राह उस दिशा में नहीं जाती, जहां मीडिया संस्थान के गैरपत्रकार मालिक को एक जन्मजात पत्रकार को पत्रकार के रूप में स्वीकारने या नकारने का अधिकार दे दिया जाता है। खैर, हम अपनी बात करें, तो प्रिंट, वेब और इलेक्ट्रानिक मीडिया के विभिन्न संस्थानों में अनुभव लेने के बाद हमें लगा कि यह आकाश हमारे लिए छोटा है, हमारी परवाज यहां पूरी नहीं होगी। इस परवाज के लिए हमें हमारा फलक खुद फैलाना होगा। बस, यहीं से हमारा नया सफर शुरू हो गया। आज हम इस पड़ाव पर एक क्षण ठहरकर इसे ‘एंजाय’ कर रहे हैं। हौंसला पहले से दोगुना है, जिसे निश्चित ही हर पड़ाव पर बढ़ना है, यह विश्वास है। हम मिथ्य अभिमान नहीं करते, लेकिन यह भी एक सच है कि हम पत्रकारिता की एक नई धारा बहाने के लिए कृतसंकल्पित हैं। पत्रकारिता की तीनों धाराओं को हम एक संगम स्थल पर ले आये हैं और इसी त्रिवेणी का नाम है ‘एडिटोरियल प्लस’।

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