अखबार का लिंग परिवर्तन

उदय केसरी
आपने हाल के एक-आध सालों में मीडिया में आये नाटकीय परिवर्तन पर गौर किया है? अखबार के पन्‍ने ही नहीं बढ़े हैं. यह (पत्र) से पत्रि‍का में तब्‍दिल होता जा रहा है. समाचार फीचर का रूप धरते जा रहे हैं...तब पत्रकारों की भावभंगिमा बदलना तो स्‍वाभाविक है, सो वे अब पत्रकार से कलाकर होते जा रहे हैं...अब तो पत्रकारिता पुरानी बात होती जा रही है, नयी बात अघोषित ही सही ‘पत्रि‍काकारिता’ हो गई है. अव्‍वल तो यह कि एक बड़े अखबार का नाम ही पत्रि‍का रख लिया गया है.
पत्रों के पत्रि‍का बनने से सबसे बड़ा नुकसान वास्‍तव में मासिक, पा‍क्षिक व साप्‍ताहिक पत्रि‍का प्रका‍शित करने वालों को हुआ है. उनका सर्कुलेशन घटने लगा है. उनके संवाददाताओं, उपसंपादकों व संपादकों को बिकनेवाला मसाला तैयार करने में इतना सर खपाना पड़ रहा है कि वे इससे बेहतर किसी अखबार को ही जॉइन कर लेना समझने लगे हैं...पिछले दिनों खबर लगी कि आउटलुक हिन्‍दी के संपादक श्री आलोक मेहता ने नईदुनिया अखबार समूह जॉइन कर लिया...और फिर ऐसा क्‍यों न करें जमाने के साथ बदलना तो पड़ता ही है. खादी का कुर्ता-पैजामा और थैले वाला दौर कैसे खत्‍म हुआ, वैसे ही सिंपल शर्ट-पैंट और हल्‍की दाढ़ी का दौर भी अवसान की ओर है. अब कारपोरेट लुक चाहिए, क्‍योंकि अखबार (यानी पत्रि‍का) के मालिक रातोंरात प‍त्रकारिता के मर्म समझने लगे हैं. मर्म यह कि पाठकों को केवल खबर नहीं, मनोरंजन भी चाहिए. भले ही इससे अखबार के मूल्‍य के साथ प‍त्रकारिता के मूल्‍य भी पेंदी छूने लगे. आप कहीं पेज थ्री के दौर पर तो नहीं सोचने लगे, वह भी पुराना हो चला है उसमें अब केवल पेज नंबर थ्री ही नहीं अन्‍य कई पेज और पुलआउट के रूप में अन्‍य कई पेजों की संख्‍या भी जुड़ गई है. खैर, इतना सब बदलने पर भी आपका सवाल हो सकता है कि क्‍या पत्रकार नहीं बदले?...क्‍यों नहीं बदले...बदलकर कुछ कलाकार हो गए और कुछ कुढ़कर बेकार. कलाकार हुए सो तर गए...कैसे? यह मत पू‍छिए, यह बस अब दे‍खिए...खबरिया चैनलों पर...चेहरे पर मेकअप, कीमती कोट व टाई में बायें हाथ की कोहनी से टिककर एक से बढ़कर एक अंदाज में ‘खबर’ परोसते हुए. खबर की शक्‍ल में अपराध, सनसनी, अंधविश्‍वास, रहस्‍य, रोमांच और अब चुटकुले व मनोरंजन टीवी कार्यक्रम के रियलिटी शो भी बेचते हुए. यदि आप वास्‍तव में खबर पर विचार करेंगे, तो आपके सामने बरबस यह सवाल आ खड़ा होगा- 24 घंटे के खब‍रिया चैनलों पर कितने घंटे खबर? खैर, मैं बात कर रहा था अखबार के तेवर, कलेवर में आये बदलाव की...तो जैसा कि जमाने भर में ‍महिलाओं का वर्चस्‍व बढ़ रहा है, अखबार जगत में भी महिलाएं पुरूषों से कदम से कदम मिलाकर ही नहीं, एक कदम आगे चल रही हैं. शायद यह भी एक वजह हो सकती है कि पत्र अपना लिंग बदलकर पत्रि‍का हो गया है. इसलिए पत्रि‍का में छपने वाली चीजें अब पत्र या अखबार में छपने लगी हैं...मोहक तस्‍वीरें देखने और गॉसिप पढ़ने के लिए महीना-पंद्रह दिन या सप्‍ताह भर इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं...हर रोज सुबह हसीन हो पाठकों की...तभी अखबार की सार्थकता है और गलाकाट अखबार बाजार की मांग...ऐसे में कोई अखबार यदि विकास पत्रकारिता का झंडा बुलंद करने की कोशिश करता है, तो उसकी गति या दुर्गति की कल्‍पना करना स्‍वाभाविक है...तो क्‍या पाठकों का स्‍वाद बदल गया है? .....
...तो क्‍या पाठकों का स्‍वाद बदल गया है?
कह सकते हैं, क्‍यों‍कि नहीं कहने का आधार धूमिल हो गया है। उसी तरह जैसे अफीम या चरस का धंधा करने वाले पहले तो युवाओं को अफीम या चरस मुफ्त में देते हैं, फिर आदत में शामिल होते ही उसे बेचने लगते हैं और इसकी आदत बुरी तरह से लग जाने पर धंधेबाज अफीम या चरस के मनमाने दाम वसूलने लगते हैं और एक वक्‍त ऐसा आता है जब अफीम या चरस के आदि हो चुके लोग इस नशे में पूरी तरह से बर्बाद हो जाते हैं. और फिर स्‍थिति ऐसी हो जाती है कि हम इस बर्बादी का दोष उस धंधेबाज को कम, इसमें पड़कर बर्बाद होने वाले को ज्‍यादा देते हैं. हमारी कलयुगी आदत लकीर पीटने की ज्‍यादा रही है, जिम्‍मेदार सांप को पकड़ने या उसे कुचलने की कम. हमारी यह भी आदत रही है कि ऐसे सांप जब बड़े और भयंकर हो जाते हैं तो उनकी पूजा भी करने लगते हैं. यानी ऐसे सांप के कृत्‍य सामाजिक परंपरा सदृश्‍य हो जाते हैं. फिर अखबार जगत की परंपरा में परिवर्तन लाने वाले सांपों को हम कैसे दोष दे सकते है, बल्कि यही कहेंगे कि पाठकों का ही स्‍वाद बदल चुका है. वह भी इतना बदल चुका है कि न्‍यूज चैनल वाले अनसेंसर्ड चित्र तक दिखाने के लिए बेकाबू हुए जा रहे हैं. फिल्‍म के बाद अब खबरों में भी सेक्‍स और नारीदेह सबसे अधिक बिकाऊ आइटम हो चुका है. ऐसा कुछ मिलते ही न्‍यूज चैनल वाले तमाम सामाजिक मर्यादा भूल कर मंजे हुए दलालों की तरह टूट पड़ते हैं ऐसी खबरों को परोसने और सबसे अधिक टीआरपी बटोरने में. तो फिर क्‍या अखबार वालों के कृत्‍यों को अलग से समझने की जरूरत है...नहीं. अंतर बस इतना है कि यहां टीआरपी का नाम बदलकर सर्कुलेशन हो जाता है, बाकी सारे हथकंडे वैसे ही है जैसे न्‍यूज चैनलों के. और इसीलिए अखबार को अपने मौलिक चरित्र से समझौता करना पड़ा है यानी पत्र से पत्रि‍का का रूप धरना पड़ा है...तो फिर कौन करायेगा अखबार को उसके मौलिक चरित्र या फिर पुरूषत्‍व का अहसास...जो पाठकों के स्‍वाद को ही नहीं, उनके चरित्र को भी प्रदूषित कर रहा है...ईश्‍वर जाने!!! (धन्‍यवाद)

कौन लेगा खबरपालिका की बदहाली की खबर?

अनाम साहब

अखबार की दुनिया इन दिनों खासी बेचैन है । बाजार के दबाव और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच उलझी अखबारी दुनिया नए रास्तों की तलाश में है । तकनीक की क्रांति, अखबारों का बढ़ता प्रसार, संचार के साधनों की गति ने इस समूची दुनिया को जहां एक स्वप्नलोक में तब्दील कर दिया है वहीं पाठकों से उसकी रिश्तेदारी को व्याख्यायित करने की आवाजें भी उठने लगी हैं । ज्यादा पृष्ठ और ज्यादा सामग्री देकर भी आज अखबार अपने पाठक से जीवंत रिश्ता जोड़ने में स्वयं को क्यों असफल पा रहे हैं, यह मीडियाकर्मियों के सामने एक बड़ा सवाल है । क्या बात है कि जहां पहले पाठक को अपने 'खास' अखबार की आदत लग जाती थी । वह उसकी भाषा, प्रस्तुति और संदेश से एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता था, अब वह आसानी से अपना अखबार बदल लेता है । हिन्दी क्षेत्र में समाचार पत्र विक्रेता मनचाहा अखबार दे देते हैं और अब उसका पाठक किसी खास अखबार की तरफदारी में खड़ा नहीं होता । क्या हिंदी क्षेत्र के अखबार अपनी पहचान खो रहे हैं, क्या उनकी अपनी विशिष्टता का लोप हो रहा है-जाहिर है पाठक को सारे अखबार एक से दिखने लगे हैं। 'जनसत्ता' जैसे प्रयोग भी अपनी आभा खो रहे हैं। बात सिर्फ यहीं तक नहीं है, हिन्दी क्षेत्र में पत्रकारिता आज भी 'मिशन' और 'प्रोफेशन' की अर्थहीन बहस के द्वन्द से उबरकर कोई मानक नहीं गढ़ पा रही है। जबकि बदलती दुनिया के मद्देनजर ऐसी बहसें अप्रांसगिक और बेमानी हो उठी हैं। आज अखबार के प्रकाशन में लगने वाली भारी पूंजी के चलते इसने उद्योग का रूप ले लिया है। ऐसे में उसमें लगने वाला पैसा किस प्रकार मिशनरी संकल्पों का वाहक बन सकता है। यह तंत्र अब सीधा अखबार प्रकाशक के हित लाभ से जुड़ गया है। करोड़ों की पूंजी लगाकर बैठे किसी अखबार मालिक से धर्मादा कार्य की अपेक्षा नहीं पालनी चाहिए। व्यवसायीकरण का यह दौर पत्रकारिता के सामने चुनौती जरूर दिखता है, पर रास्ता इससे ही निकालना होगा। पत्रकारिता का भला-बुरा जो कुछ भी है वह मुख्यतः समाचार पत्र के प्रकाशक की निर्धारित की नई रीति-नीति पर निर्भर करता है। ऐसे में समाचार-विचार के संदर्भ में अखबार मालिक की रीति-नीति को चुनौती भी कैसे दी जा सकती है। समाचार पत्रों काप्रबंधन यदि संपादक की संप्रभुता को अनुकुलित कर रहा है तो आप विवश खड़े देखने के अलावा क्या कर सकते हैं। यह बात भी काफी हद तक काबिले गौर है कि पत्रकार अपनी भूमिका और दायित्वों पर बहस करने के बजाए समाचार पत्र मालिक की भूमिका के बारे में ज्यादा बातें करते हैं। हम देखें तो पता चलता है कि अखबार की घटती स्वीकार्यता एवं संपादक के घटते कद ने मालिकों की सीमाएँ बढ़ा दी हैं । अखबार अगर वैचारिक अधिष्ठान का रास्ता छोड़कर बाजार की हर सड़ी-गली मान्यताओं को स्वीकारते जाएंगे तो यह खतरा तो आना ही था । आज मालिक-संपादक के रिश्तों की तस्वीर बदल चुकी है। आज का रिश्ता प्रतिस्पर्धा और अविश्वास का रिश्ता है। अवमूल्यन दोनों तरफ से हुआ है । हिंदी पत्रकारिता पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि वह आजादी के बाद अपनी धार खो बैठी। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में आए अवमूल्यन का असर उस पर भी पड़ा जबकि उसे समाज में चल रहे सार्थक बदलाव के आंदोलनों का ससाथ देना था। मूल्यों के स्तर पर जो गिरावट आई वह ऐतिहासिक है तो विचार एवं पाठकों के साथ उसके सरोकार में भी कमी आई है। साधन सम्पन्नता एवं एक राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति के रुप में विकसित होने के बावजूद पत्रकारिता का क्षेत्र संवेदनाएं खोता गया,जो उसकी मूल पूंजी थे। उसकी विश्वसनीयता और नैतिक शक्ति भी लगाता घटी है। यही कारण है कि लोग बीबीसी की खबरों पर तो भरोसा करते हैं पर अपने अखबार पर स उन्हें भरोसा कम हुआ है। हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी जैसे तमाम यश्स्वी पत्रकारों की बनाई जमीन पर खड़ी है, पर इन नामों और इनके आदर्शों को हमने विसरा दिया । अपने उज्जवल और क्रांतकारी अतीत से कटकर अंग्रेजी पत्रकारिता की जूठन उठाना और खाना हमारी दिनचर्या बन गई है। हिन्दी में 'विचार दारिद्रय' का संकट गहराने के कारण पत्रकारिता में 'अनुवादी लालों' की पूछ-परख बढ़ गई है। आजादी के पूर्व हमारी हिन्दी पट्टी की पत्रकारिता सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलन से जुड़कर ऊर्जा प्राप्त करती थी। आज वह जनांदोलनों से कटकर मात्र सत्ताधीशों की वाणी एवं सत्ता-संघर्ष का आईना भर रह गई है। ऐसे में अगर अखबारों एवं पाठकों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं तो आश्चर्य क्या है ? अगर आप पाठकों एवं उनके सरोकारों की चिंता नहीं करते तो पाठक आपकी चिंता क्यों करेगा ? ऊंचे प्रतिष्ठानों, विशालकाय छपाई मशीनों, विविध रंगो तथा आकर्षक प्रस्तुति के साथ छपने के बावजूद अखबार अपनी आभा क्यों खो रहे हैं, यह सवाल हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। अकेला आपातकाल का प्रसंग गवाह है कि कितने पत्रकार पेट के बल लेट गए थे। इस दौर में जैसी रीढ़ विहीनता और केंचुए सी गति पत्रकारों ने दिखाई थी उस प्रसंग को हम सब भले भूल जाएं देश कैसे भूल सकता है ? सारे कुछ के बावजूद अखबार कभी सिर्फ उद्योग की भूमिका में नहीं रह सकते । व्यापार के लिए भी नियम और कानून होते हैं व्यापार के नाम पर भी अपने ग्राहक को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता । आजादी के बाद हमारे अखबार अपनी सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से दूर हटे हैं। स्वतंत्रता मिलने मिलने के बाद राजनीतिक नेताओं, अफसरों, माफिया गिरोहों की सांठगांठ से सार्वजनिक धन की लूटपाट एवं बंदरबांट में देश का कबाड़ा हो गया, पर हिंदी के अखबारों की इन प्रसंगों पर कोई जंग या प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती । उल्टे ऐसे घृणित समूहों-जमातों के प्रति नरम रूख अपनाने एवं उन्हें सहयोग देने के आरोप पत्रकारों पर जरूर लगे। सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति ऐसी समर्पण भावना ने न सिर्फ हिन्दी क्षेत्र में पत्रों की गरिमा गिराई वरन पूरे व्यवसाय को कलंकित किया। इसी के चलते अखबारों में आम जनता की आवाज के बचाए सत्ता की राजनीति और उसके द्वन्द्व प्रमुखता पाते हैं। अखबारों की बड़ी जिम्मेदारी थी कि व आम पाठकों के पास तक पहुंचते और उनसे स्वस्थ संवाद विकसित करते । कुछ समाचार पत्रों ने ऐसे प्रयास किए भी किंतु यह हिंदी क्षेत्र की पत्रकारिता की मूल प्रवृत्ति न बन सकी। मुख्यधारा की हिंदी पत्रकारिता ने मूलतः शहरी मध्यवर्ग के पाठकों को केन्द्र में रखकर अपना सारा ताना-बाना बुना। इसके चलते अखबार सिर्फ इन्हीं पाठकों के प्रतिनिधि बनकर रह गए और आज का एक बड़ा तबका जो गरीभी, अत्याचार एवं व्यवस्था के दंश को झेल रहा है । अखबारोंकी नजर से दूर है। ऐसे में अखबारों की संवेदनात्मक ग्रहणशीलता पर सवालिया निशान लगते हैं तो आस्चर्य क्या है ? इस संदर्भ में आप अंग्रेजी अखबारों की तुलना हिन्दी अखबारों से करके प्रसन्न हो सकते हैं और यह निष्कर्ष बड़ी आसानी से निकाल सकते हैं कि हम हिन्दी वाले उनकी तुलना में ज्यादा संवेदनाओं से युक्त हैं। परंतु अंग्रेजी पत्रकारिता ने तो पहले ही बाजार की सत्ता और उसकी महिमा के आगे समर्पण कर दिया है। अंग्रेजी के अपने 'खास' पाठक वर्ग के चलते उनकी जिम्मेदारियां अलग हैं। उनके केन्द्र में वैसे भी 'मनुष्य' तो नहीं ही है। किन्तु भारत जैसे विविध स्तरों पर बंटे देश में हिंदी अखबारों की जिम्मेदारी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि अगर हम व्यापक पाठक वर्ग की बात करते हैं तो हमारी जिम्मेदारीयां भी अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले बड़ी हैं। वस्तुतः हिंदी अखबारों को अपनी तुलना भाषाई समाचार पत्रों से करनी चाहिए। जो आज स्वीकार्यता के मामले में अपने पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। यहां अंग्रेजी पत्रों का वैचारिक योगदान जरूर हिंदी पत्रों के लिए प्रेरणा बन सकता है। इस पक्ष पर हिंदी के पत्र कमजोर साबित हुए हैं। हिंदी अखबारों में वैचारिकता एवं बौद्धिकता का स्तर निरंतर गिरा है। अब तो गंभीर समझे जाने वाले हिंदी अखबार भी अश्लील एवं बेहूदा सामग्री परोसने में कोई संकोच नहीं करते और यह सारा कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के आतंक में हो रहा है। इस आतंक में आत्मविश्वास खोते संपादक एवं उनके अखबार कुछ भी छापने पर आमादा हैं। सनसनी, झूठ और अश्लीलता उन्हें किसी भी चीज से परहेज नहीं है। सत्ता से आलोचचनात्मक विमर्श रिश्ता बनाने एवं जनता की आवाज उस तक पहुंचाने के बजाए अखबार उनसे रिश्तेदारियां गाठंनें में लगे हैं। प्रायः अखबारों पर उसके पाठकों के बजाय विज्ञापनदाताओं एवं राजनेताओं का नियंत्रण बढ़ाता जा रहा है। खबरपालिका की अंदरूनी समस्याओं को हल करने एवं उनके बीच से रास्ता निकालने के बजाए 'आत्म-समर्पण' जैसी स्थितियों को विकल्प माना जा रहा है। ऐसे में पाठक और अखबार के रिश्ते मजबूत हो सकते हैं ? कोई अखबार या उसकी आवाज कैसे पाठकों के दिल में उतर जाएगी ? उत्पाद बन चुका सुबह का अखबार तभी अपनी आभा खोकर शाम तक रद्दी की टोकरी में चला जाता है। अखबार सार्वजनिक सवालों पर बहस का वातावरण बनाने में विफल रहे हैं । भाषा के सवाल पर भी हिंदी अखबार खासे दरिद्र हैं। सहज-सरल भाषा के प्रयोग का नारा पत्रकारों के लिए शब्दों के बचत की प्रेरणा बन गया है। ऐसे में तमाम शब्द अखबारों से गायब हो गए हैं । इसका एक बहुत बड़ा कारण भाषा के प्रति हमारा अल्पज्ञान एवं उसके प्रति लापरवाही है। दूसरा बड़ा कारण हमारा बौद्धिक कहा जाने वाला वर्ग अखबारों से कट सा गया है। उसने अखबारों को बेवजह की चीज माने लिया । हिंदी पत्रकारिता में विचारशीलता के लिए कम हो आई जगह से पाठकों को वैचारिक नेतृत्व मिलना बंद हो गया। इस बौद्धिक नेतृत्व के अभाव ने भी पाठक एवं अखबार के रिश्तों को खासा कमजोर किया । संवेदनाएं कम हुईं, राग घटा एवं शब्दों की महत्ता घटी। बौद्धिकों ने हिंदी क्षेत्र की पत्रकारिता पर दबाव बनाने के बजाए इस क्षेत्र को छोड़ दिया। फलतः आज हमारे पास सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, राजेन्द्र माथुर, श्रीकांत वर्मा, प्रभाष जोशी जैसे संपादकों का दौर अतीत की बात बन गयी है। यह बात खासी महत्वपूर्ण है कि हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक अधिष्ठान एवं श्री गणेश ऐसा है कि वह जनसंघर्षों में ही फल-फूल सकती है। अब रास्ता यही है कि अखबार की पूंजी से घृणा करने के बजाए ऐसे रिश्तों का विकास हो, जिसमें देश का बौद्धिक तबका भी अपना मिथ्याभिमान छोड़कर अखबार की दुनिया का हम सफर बने। क्योंकि तकनीकी चमक-दमक अखबार की प्रस्तुति को बेहतर बना सकती है उसमें प्राण नहीं भर सकती । हिंदी क्षेत्र में एक नए प्रकार के पाठक वर्ग का उदय हुआ है जो सचेत है और संवाद को तैयार है। वह तमाम सूचनाओं के साथ आत्मिक बदलाव वाला अखबार चाहता है। वह सच के निकट जाना चाहता है। इसलिए चुनौती महत्व की है और यह जंग हिंदी अखबारों को पाठकों के साथ जुड़कर ही जीतनी होगी । क्योंकि लाख नंगेपन से भी अखबार इलेक्ट्रानिक मीडिया का मुकाबला नहीं कर सकता । इसके लिए उसमें एक संवेदना जगानी होगी जो अपने पाठकों से संवाद करे, बतियाए, उन्हें रिक्त न छोड़े। अपने युग की चुनौतियों, बाजार के गणित का विचार करते हुए अखबार खुद को तैयार करें यह समय की मांग है। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नैतिक एवं सांस्कृतिक आंदोलन ही इस शून्य को भर सकता है।
साभार : कैफेहिन्दी डॉट कॉम

Sexual obscenity on the wheel

Soumyajit Ghose
One of the most attention grabbing view while riding on a two-wheeler is watching couples expressing their abundance of love on the bike itself. This is in itself a very spectacular view from the point of view of an amateur onlooker. Considering the fact what you are viewing right on the road, the sight creates ripples in your mind as to what has occurred to these couples so as to express such profound love while on the bike and more so on the road.
We (I and my friend) were returning on the bike after attending the special classical programme of famous singer Shubha Mudgal on the evening of the Independence Day at Ravindra Bhawan, Bhopal. Under the spell of classical music (with constant rendition by the singer) and discussing the same, it so happened that suddenly we came across a couple who were profusely busy in an obscene act of love on the bike itself. The sight could be well distracting for anyone riding so close. Immediately another bike with two young lads was seen viewing the same act with utmost interest. They made some ugly remark which was smartly ignored by the couple. The incident was really an eye-opener as it revealed the intricacies of it and the ensuing acts.
The attitude of the couple can be described as an act of public notoriety causing inconvenience to others. With the law banning public obscenity, the couple seems to be consciously engaged in the act knowing the lackadaisical attitude of the law keepers. The couple was mindless of the consequences of such act that seem trivial to them while having the potential to blow into a crime. Such small act of unprovoked illustration of love amounts to sending wrong signals to the onlookers. They seem to view it as an open invitation to the privacy of the couples. This open invitation is quickly transformed into an eve-teasing act with young lads finding it easy to eve-tease the couple. With a little more provocation, the act turns ugly with molestation and sexual abuse. Such acts of eve-teasing are very common in the city streets considering the high numbers of couples engaging in public obscenity.
Such incidents increase in number with the profile of the city. With the huge amount of eve-teasing in the city streets, both registered and unregistered, it is not surprising that the figures of cases involving sexual abuse, molestation and rape are very high. With the police too busy in curbing the acts of terrorism, such incidents are considered a minor thing until it transforms into a major incident.
What is really disturbing is the people’s reaction to such obscenity and their stance on the issue. The couples engaged in the act consider it to be their conjugal freedom while the onlookers seem pleased at teasing them in the public. The fact missing is restraint, both on the part of the onlookers and by the couples. The couples on their part do not want to restrict such act to their privacy while the spectator seems to be free to eve-tease anyone on the street. The question lies as to who should exercise restraint? - the Couple or the spectator.

आज़ादी के बदलते मायने

उदय केसरी
आज़ादी के ६१ वर्ष गुज़र चुके हैं। इस दौरान हमने अपने प्राण से प्यारे वतन को शनै:-शनै: प्रगति के पथ पर डग भरते देखा है. इस पथ की बाधाएं भी हमने देखी या सुनी हैं और उन बाधाओं के कारणों से भी हम कमोबेश वाकिफ हैं. फ़िर भी हमारा देश रुका नहीं, डग भरता रहा है और इसी तरह गुजरते-गुजरते छः दशक से भी अधिक निकल चुके हैं. पर सवाल है कि क्या हम अपने देश की गति और प्रगति से संतुष्ट हैं?....हाँ तो, विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के अंतहीन सिलसिले के बारे में क्या कहेंगे? देश के कई हिस्सों से अब भी आने वाली भूखमरी की खबरों का क्या जवाब देंगे? ये सवाल तो बस एक बानगी हैं....सच तो और भी भयावह हो सकता है....और फ़िर यदि आप देश की प्रगति से असंतुष्ट हैं, तो देश की प्रगति के नीति-नियंताओं के चुनाव में अपनी भूमिका के बारे में क्या कहेंगे? ख़ुद की प्रगति और देश की प्रगति के बीच सबसे अधिक समय आप किसकी प्रगति पर लगते है? और भी कई ऐसे सवाल हैं, जो देश की जनता को भी कठघरे में खड़ा कर सकते हैं, जिसका जब तक हम माकूल जवाब नहीं देंगे, तब तक देश की प्रगति पर सवाल भी करने का हमें कोई नैतिक हक़ नहीं बनता। फ़र्ज़ करें कि आज से ७०-८० साल पहले देश की जनता का रवैया वैसा ही होता जैसा आज है, तो क्या हमें यह आजादी होती?...यदि नहीं तो केवल 'सिस्टम ख़राब है' या 'देश की प्रगति से मेरा क्या' कहने से किसी का भला नहीं हो सकता. और न ही प्रगति पथ पर डगमग बढाते देश की गति में इजाफा होगा, बल्कि इस रवैये से देश में अब शेष बचे असल कर्णधारों की संख्या घटती जायेगी, जिनके बूते यह देश कम से कम प्रगति पथ पर गतिमान तो है. ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या ऐसी ही आजादी के वास्ते देश के असंख्य वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी? देश के अमर शहीदों ने क्या कभी सपने में भी सोचा होगा कि आने वाली पीढी न केवल उन्हें, बल्कि आज़ादी का मतलब भी भूल जायेंगे. क्या आज़ादी का मतलब १५ अगस्त पर सरकारी संस्थानों, कार्यालयों, स्कूलों व कालेजों में तिरंगा ध्वज फहरा देना ही है?आप कहेंगे गुलामी के दौर और आज के दौर में बहुत फर्क है, इसलिए हम जनता में आज़ादी को लेकर वैसी आस्था और कर्तव्य की आशा नहीं कर सकते....तो शायद आपको अपना सामान्य ज्ञान ठीक करने की ज्यादा दरकार है. क्या आपको मालूम है- एक सर्वे के मुताबिक दुनिया के ३० सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में एक अपना देश भारत भी है और विश्व बैंक के एक अध्ययन की चेतावनी मानें तो भारत में भ्रष्टाचार की गहरी होती खाई को रोका नहीं गया, तो तेजी से बढती भारतीय अर्थव्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह जाएगा....और भी कई तथ्य हैं, जिन्हें थोड़ा ध्यान देकर देखें तो इसके लिए जिम्मेदार भ्रष्ट लोग गुलाम भारत के बेरहम अंग्रेजों जैसे ही प्रतीत होंगे, जो भारत को खोखला बनाकर ख़ुद के तरक्की पसंद थे. ऐसे में क्या आज की जनता की जिम्मेदारी गुलामी के दौर की जनता से किसी मायने में कम लगती है?... दरअसल, आज़ादी के बाद न केवल आज़ादी के मायने बदले हैं, बल्कि भोली-भाली कही जाने वाली जनता या फ़िर जागरूक वर्ग की कर्तव्यहीनता भी बढ़ी है. आज आजादी के मायने बदल कर व्यक्तिगत जीवनशैली की आज़ादी, स्वछंद जीवन, अपसंस्कृति से आलिंगन और राष्ट्रीय गौरवगाथा से विस्मृति हो गए हैं. ग्लोब्लाइजेशन के नवाचार ने आज़ादी के और कई नए मायने गढ़ दिए हैं. ऐसे में, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के मूलमंत्र सत्य व अहिंसा के बल पर प्राप्त इस आज़ादी के मायने की बात करना बेमानी है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अदम्य व वतनपरस्त साहस से प्रेरणा लेने के लिए देश के युवाओं का आह्वान करना निरर्थक लगता है. आज़ादी के बाद से देश में चौथी पीढी जवान हो रही है. लेकिन ऐसा लगता है कि मोबाइल, कंप्यूटर और पिज्जा वाली २१वीं सदी की पीढी केवल परीक्षा पास करने के लिए आज़ादी के दीवानों और स्वतंत्रता के लिए जन न्योछावर करने वालों के बारे में पाठ्यपुस्तकों में पढ़ी है. कारपोरेट संस्कृति और कैरियर के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में देश की युवा पीढी के लिए न केवल आज़ादी के मायने बदल गए हैं, बल्कि वे यह भी भूलते जा रहे हैं कि किसी देश की आन, बान और शान की सुरक्षा व विकास में उस देश के युवाओं की भूमिका अहम् होती है. अब देश की राजनीतिक दृष्टि से युवाओं को वास्ता लगभग ख़त्म होता जा रहा है. इसकी वजह राजनीतिक गलियारे बेलौस पनपते भ्रष्टाचार, अपराध और बेमानी का बोलबाला है, जिसका ताज़ा मिसाल पिछले माह केन्द्र के राजनीतिक गलियारे में घटी एक से बढ़कर एक घटनाएँ हैं, जिनमें एक संसद में रूपये की गड्डी लहराए जाने की घटना भारतीय संसद की मर्यादा के अबतक की तमाम सीमाओं को तिलांजलि देने वाली थी...इसे देख शायद अपने देश की युवा भावनाओं में राजनीति के प्रति घृणा और भी बढ़ गई होगी....लेकिन सवाल है कि क्या भारतीय लोकतंत्र की दशा व दिशा तय करने वाली भारतीय राजनीतिक गलियारे के प्रति युवाओं के दायित्व की इति श्री केवल इस कारण हो गई, क्योकि यह गलियारा मुट्ठी भर पखंडियो और भ्रष्ट राजनीतिकों के सडांध से बजबजाने लगा है?....क्या ऐसे राजनीतिकों के आगे ईमानदार समझी जाने वाली युवा पीढी कमजोर हो चुकी है? यदि हाँ तो, ऐसी युवा पीढी विदेशी दुश्मनों से देश की सुरक्षा कैसे कर पाएंगी?....तो क्या यह मान लेना चाहिए कि देश और दशकों के खून-पसीने से पाई गई आज़ादी का भगवान ही मालिक है!...


यहां सेक्स टैबू है, स्त्री के लिए

अनुजा रस्तोगी
सेक्स को हमारे यहां हमेशा से ही टैबू माना गया है। सेक्स पर बात करना। उसे जग-ज़ाहिर करना या आपस में शेयर करना। हर कहीं सेक्स प्रतिबंधित है। सेक्स का जिक्र आते ही क्षणभर में हमारी सभ्यता-संस्कृति ख़तरे में पड़ जाती है। मुंह पर हाथ रखकर सेक्स की बात पर शर्म और गंदगी व्यक्त की जाती है। सेक्स को इस कदर घृणा की दृष्टि से देखा जाता है, मानो वो दुनिया की सबसे तुच्छ चीज हो।
खुलकर सेक्स का विरोध करते हुए मैंने उन सभ्यता-संस्कृति रक्षकों को भी देखा है जिन्हें सड़क चलती हर लड़की में 'गज़ब का माल' दिखाई देता है। जिन्हें देखकर उनके हाथ और दिमाग न जाने कहां-कहां स्वतः ही विचरण करने लगते हैं। जिन्हें रात के अंधेरे में नीली-फिल्में देखने में कतई शर्म नहीं आती और नीली-फिल्मों के साथ रंगीन-माल भी हर वक्त जिनकी प्राथमिकता में बना रहता है। परंतु रात से सुबह होते-होते उनका सेक्स-मोह 'सेक्स-टैबू' में बदल जाता है।
यह सही है कि हम परिवर्तन के दौर से गुज़र रहे हैं। हर दिन, हर पल हमारे आस-पास कुछ न कुछ बदल रहा है। हम आधुनिक हो रहे हैं। यहां तक कि टीवी पर दिखाए जाने वाले कंडोम, केयरफ्री, ब्रा-पेंटी के विज्ञापनों को भी हम खुलकर देख रहे हैं। एक-दूसरे को बता भी रहे हैं। मगर सेक्स को स्वीकारने और इस पर अधिकार जताने को अभी-भी हमने अपनी सभ्यता-संस्कृति के ताबूतों में कैद कर रखा है। हमें हर पल डर सताता रहता है कि सेक्स का प्रेत अगर कहीं बाहर आ गया तो हमारी तमाम पौराणिक मान्यताएं-स्थापनाएं पलभर में ध्वस्त हो जाएंगीं। हम पश्चिमी भोगवाद के शिकार हो जाएंगें। इसलिए जितना हो सके कोशिश करो अपनी मां-बहनों, पत्नियों को सेक्स से दूर रखने और उन्हें अपनी इच्छाओं से अपाहिज बनाने की।
हमारे पुराणों तक में लिखा है कि यौन-सुख स्त्री के लिए वर्जित, पुरुष के लिए हर वक्त खुला है। पुरुष आजाद है हर कहीं 'मुंह मारने' के लिए। यही कारण है स्त्री को अपना सेक्स चुनने की आजादी हमारे यहां नहीं है।
गज़ब की बात यह है स्त्री-सेक्स पर प्रायः वे लोग भी अपना मुंह सींये रहते हैं जो स्त्री-विमर्श के बहाने 'स्त्री-देह' के सबसे बड़े समर्थक बने फिरते हैं। स्त्री जब अपने सुख के लिए सेक्स की मांग करने लगती है तो परंपरावादियों की तरह उनके तन-बदन में भी आग-सी लग जाती है। इन स्त्री-विमर्शवादियों को सेक्स के मामले में वही दबी-सिमटी स्त्री ही चाहिए जो मांग या प्रतिकार न कर सके।
पता नहीं लोग यह कैसे मान बैठे हैं कि हम और हमारा समाज निरंतर बदल या विकसित हो रहा है। आज भी जब मैं किसी स्त्री को दहेज या यौन शोषण के मामलों में मरते हुए देखती हूं तो मुझे लगता है हम अभी भी सदियों पुरानी दुनिया में जी रहे हैं।
मुझे एक बात का जवाब आप सभी से चाहिए आखिर जब पुरुष अपने बल पर अंदरूनी और बाहरी सारे सुख भोगने को स्वतंत्र है तो यह आजादी स्त्रियों को क्यों और किसलिए नहीं दी जाती?
क्या इच्छाएं सिर्फ पुरुषों की ही गुलाम होती हैं, स्त्रियों की नहीं?
(बरेली की रहने वालीं अनुजा, एक शिक्षिका हैं। उनहोंने पत्र-पत्रिकाओं में कभी नहीं लिखा। अभी तक जो भी लिखा अपने ब्लॉग पर ही लिखा। बिंदास लिखना ही उन्हें पसंद है। समझौते के बगैर।)

साभार: तहलका हिन्दी डॉट कॉम

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