आज़ादी के बदलते मायने

उदय केसरी
आज़ादी के ६१ वर्ष गुज़र चुके हैं। इस दौरान हमने अपने प्राण से प्यारे वतन को शनै:-शनै: प्रगति के पथ पर डग भरते देखा है. इस पथ की बाधाएं भी हमने देखी या सुनी हैं और उन बाधाओं के कारणों से भी हम कमोबेश वाकिफ हैं. फ़िर भी हमारा देश रुका नहीं, डग भरता रहा है और इसी तरह गुजरते-गुजरते छः दशक से भी अधिक निकल चुके हैं. पर सवाल है कि क्या हम अपने देश की गति और प्रगति से संतुष्ट हैं?....हाँ तो, विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के अंतहीन सिलसिले के बारे में क्या कहेंगे? देश के कई हिस्सों से अब भी आने वाली भूखमरी की खबरों का क्या जवाब देंगे? ये सवाल तो बस एक बानगी हैं....सच तो और भी भयावह हो सकता है....और फ़िर यदि आप देश की प्रगति से असंतुष्ट हैं, तो देश की प्रगति के नीति-नियंताओं के चुनाव में अपनी भूमिका के बारे में क्या कहेंगे? ख़ुद की प्रगति और देश की प्रगति के बीच सबसे अधिक समय आप किसकी प्रगति पर लगते है? और भी कई ऐसे सवाल हैं, जो देश की जनता को भी कठघरे में खड़ा कर सकते हैं, जिसका जब तक हम माकूल जवाब नहीं देंगे, तब तक देश की प्रगति पर सवाल भी करने का हमें कोई नैतिक हक़ नहीं बनता। फ़र्ज़ करें कि आज से ७०-८० साल पहले देश की जनता का रवैया वैसा ही होता जैसा आज है, तो क्या हमें यह आजादी होती?...यदि नहीं तो केवल 'सिस्टम ख़राब है' या 'देश की प्रगति से मेरा क्या' कहने से किसी का भला नहीं हो सकता. और न ही प्रगति पथ पर डगमग बढाते देश की गति में इजाफा होगा, बल्कि इस रवैये से देश में अब शेष बचे असल कर्णधारों की संख्या घटती जायेगी, जिनके बूते यह देश कम से कम प्रगति पथ पर गतिमान तो है. ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या ऐसी ही आजादी के वास्ते देश के असंख्य वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी? देश के अमर शहीदों ने क्या कभी सपने में भी सोचा होगा कि आने वाली पीढी न केवल उन्हें, बल्कि आज़ादी का मतलब भी भूल जायेंगे. क्या आज़ादी का मतलब १५ अगस्त पर सरकारी संस्थानों, कार्यालयों, स्कूलों व कालेजों में तिरंगा ध्वज फहरा देना ही है?आप कहेंगे गुलामी के दौर और आज के दौर में बहुत फर्क है, इसलिए हम जनता में आज़ादी को लेकर वैसी आस्था और कर्तव्य की आशा नहीं कर सकते....तो शायद आपको अपना सामान्य ज्ञान ठीक करने की ज्यादा दरकार है. क्या आपको मालूम है- एक सर्वे के मुताबिक दुनिया के ३० सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में एक अपना देश भारत भी है और विश्व बैंक के एक अध्ययन की चेतावनी मानें तो भारत में भ्रष्टाचार की गहरी होती खाई को रोका नहीं गया, तो तेजी से बढती भारतीय अर्थव्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह जाएगा....और भी कई तथ्य हैं, जिन्हें थोड़ा ध्यान देकर देखें तो इसके लिए जिम्मेदार भ्रष्ट लोग गुलाम भारत के बेरहम अंग्रेजों जैसे ही प्रतीत होंगे, जो भारत को खोखला बनाकर ख़ुद के तरक्की पसंद थे. ऐसे में क्या आज की जनता की जिम्मेदारी गुलामी के दौर की जनता से किसी मायने में कम लगती है?... दरअसल, आज़ादी के बाद न केवल आज़ादी के मायने बदले हैं, बल्कि भोली-भाली कही जाने वाली जनता या फ़िर जागरूक वर्ग की कर्तव्यहीनता भी बढ़ी है. आज आजादी के मायने बदल कर व्यक्तिगत जीवनशैली की आज़ादी, स्वछंद जीवन, अपसंस्कृति से आलिंगन और राष्ट्रीय गौरवगाथा से विस्मृति हो गए हैं. ग्लोब्लाइजेशन के नवाचार ने आज़ादी के और कई नए मायने गढ़ दिए हैं. ऐसे में, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के मूलमंत्र सत्य व अहिंसा के बल पर प्राप्त इस आज़ादी के मायने की बात करना बेमानी है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अदम्य व वतनपरस्त साहस से प्रेरणा लेने के लिए देश के युवाओं का आह्वान करना निरर्थक लगता है. आज़ादी के बाद से देश में चौथी पीढी जवान हो रही है. लेकिन ऐसा लगता है कि मोबाइल, कंप्यूटर और पिज्जा वाली २१वीं सदी की पीढी केवल परीक्षा पास करने के लिए आज़ादी के दीवानों और स्वतंत्रता के लिए जन न्योछावर करने वालों के बारे में पाठ्यपुस्तकों में पढ़ी है. कारपोरेट संस्कृति और कैरियर के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में देश की युवा पीढी के लिए न केवल आज़ादी के मायने बदल गए हैं, बल्कि वे यह भी भूलते जा रहे हैं कि किसी देश की आन, बान और शान की सुरक्षा व विकास में उस देश के युवाओं की भूमिका अहम् होती है. अब देश की राजनीतिक दृष्टि से युवाओं को वास्ता लगभग ख़त्म होता जा रहा है. इसकी वजह राजनीतिक गलियारे बेलौस पनपते भ्रष्टाचार, अपराध और बेमानी का बोलबाला है, जिसका ताज़ा मिसाल पिछले माह केन्द्र के राजनीतिक गलियारे में घटी एक से बढ़कर एक घटनाएँ हैं, जिनमें एक संसद में रूपये की गड्डी लहराए जाने की घटना भारतीय संसद की मर्यादा के अबतक की तमाम सीमाओं को तिलांजलि देने वाली थी...इसे देख शायद अपने देश की युवा भावनाओं में राजनीति के प्रति घृणा और भी बढ़ गई होगी....लेकिन सवाल है कि क्या भारतीय लोकतंत्र की दशा व दिशा तय करने वाली भारतीय राजनीतिक गलियारे के प्रति युवाओं के दायित्व की इति श्री केवल इस कारण हो गई, क्योकि यह गलियारा मुट्ठी भर पखंडियो और भ्रष्ट राजनीतिकों के सडांध से बजबजाने लगा है?....क्या ऐसे राजनीतिकों के आगे ईमानदार समझी जाने वाली युवा पीढी कमजोर हो चुकी है? यदि हाँ तो, ऐसी युवा पीढी विदेशी दुश्मनों से देश की सुरक्षा कैसे कर पाएंगी?....तो क्या यह मान लेना चाहिए कि देश और दशकों के खून-पसीने से पाई गई आज़ादी का भगवान ही मालिक है!...


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