ब्लैक जर्नलिज्म

पत्रकारिता के बदलते मायने

मीतेन्द्र नागेश

पत्रकारिता मिशन या व्यवसाय? बहुत बड़ा और शर्मनाक प्रश्न है न जाने कितने व्याख्यान, संगोष्ठी, बहस और सभाएं हो चुकी है इस बात पर की आज पत्रकारिता आख़िर है क्या? अफ़सोसजनक है की आज सुनना पड़ता है- पत्रकारित अब मिशन नही रही यह रूपांतरण पत्रकारिता को गर्त में ले जा रहा है और हमने इसे मौन स्वीकृति दे दी है दूसरी तरफ़ हम 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' यानी 'फ्रीडम ऑफ़ प्रेस' की बहुत बात और बहस करते हैं यह बहस लम्बी चलती रहेगी लेकिन यहां चन्द प्रश्न नए और अहम् हैं जब हम अधिकार की बात करते हैं, तो कर्त्तव्य की बात क्यों नहीं करते? प्रश्न यह है कि स्वतंत्रता के अधिकार के हो-हल्ला में कर्त्तव्य 'स्वतंत्रता का सम्मान' को क्यो भुला दिया जाता हैं? प्रश्न यह है कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से पहले क्या पत्रकारिता को एक विशेष वर्ग की गुलामी से आजाद करवाना प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? यानी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से पहले 'प्रेस की आज़ादी' की बात की जानी चाहिए
पत्रकिरिता में जिस प्रकार का बदलाव आया है, उससे इसके मायने ही बदल गए हैं गंभीर, शोधात्मक खबरें, आम जनता के हितों का ध्यान, समाज को दिशा देने की कला-जैसे पक्षों को पहले तो पीत पत्रकारिता की चुहलबाजी का अर्द्धग्रहण लगा और आज की उद्देश्य विहीन 'ब्लैक जर्नलिज्म' की परछाई इस पर पूरी तरह छा जाने की कोशिश में है 'ब्लैक जर्नलिज्म' यानी बिना उद्देश्य के अंधकार में भटकने वाली पत्रकारिता 'ब्लैक जर्नलिज्म' यानी जो रात के साये में होती है, जिसका उद्देश्य अंधकार में छिपा होता है ख़ुद पत्रकार को भी पता नहीं होता कि वह इस तरह की पत्रकारिता आख़िर क्यों कर रहा है और कब तक इस अंधेरे में सनसनी खोजता रहेगा 'ब्लैक जर्नलिज्म' यानी खबरों के एवज में ब्लैकमनी बनाना, काले धंधों पर परदा डालना चौबीस घंटे समाचार की बाध्यता और देर रात तक दर्शकों को स्क्रीन से चिपकाये रखकर टीआरपी बढ़ाने की दौड़ ने इस 'ब्लैक जर्नलिज्म' को जन्म दिया हैं इसी का अनुकरण प्रिंट मीडिया भी कर रहा है
अब पत्रकारिता आम जनता की आवाज़ नहीं रही अब पत्रकारिता के श्रीमुख से पूंजीपतियों की तूती बोलती है किसी पूंजीपति ने विदेशी कम्पनी को हथिया लिया या भोग-विलास का सबसे सस्ता उत्पाद बाज़ार में उतार दिया, तो यह सबसे बड़ी ख़बर होती है, लेकिन अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा आम आदमी अब मीडिया के टीजी (टारगेट ग्रुप) के काबिल भी नहीं रहा देश के कई बड़े और नामी-गिरामी अखबारों का टीजी है- उच्च मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग और विदेश में अपनी ऊर्जा झौक आए एनआरआई गरीब की बस्ती की समस्या की ख़बर से ज्यादा वजनी ख़बर है कि फलां क्लब ने 'पानीपुरी खाओ' प्रतियोगिता का आयोजन किया मिसेज़ 'पूंजीपति' ने एक मिनट में सबसे ज्यादा 'पानीपुरी' खाकर खिताव जीत लिया एसी बैतुकी ख़बरों को बड़े-बड़े फोटो के साथ अखबारों में चिपकाया जाता है इधर रोज़ रोटी की जंग जीतने की चुनौती का सामना करने वाली महिला मजदूरों की ख़बर महज़ विज्ञापन के कारण रोक दी जाती है चैनल एक भूत की मनगढ़ंत कहानी के सहारे घंटों ख़राब करते रहते हैं
लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है, शासन की योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है इस पर आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है अगर मीडिया के मध्यम से आवाज़ उठती है, तो वह भी किसी राजनीतिक दल के खिलाफ अथवा समर्थन में एजेंडा सेट करने के उद्देश्य से उठती है माहौल इस कदर बिगड़ा है कि पत्रकारिता के मूल्यों की बात करने वालों को फ्रसटेड करार दे दिया जाता है जो कुछ लोग मूल्यों पर चल रहे हैं. उन्हें इसके लिए क्या कहना पड़ रहा है, यह वही जानते हैं सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकार पर दबाव बनाया जाता है कि अपनी ख़बर को रोक दो और सामने वाले से डील करके पैसा बना लो, जिसमें मालिक और संपादक का हिस्सा भी होगा मीडिया के दफ्तरों में अब पत्रकार नाम की चीज़ ज़हनीतौर पर सुप्त अथवा मृत अवस्था में पाई जाती है और जो थोड़ी-बहुत साँस लेने की हिम्मत कर रहे हैं, उन्हें 'कामा-बिंदी' की गलतियों पर औकात दिखा दी जाती है-'क्या लिखते हैं आप, मैं क्या यहाँ प्रूफ़ रीडिंग के लिए बैठा हूँ' संपादक महोदय का इस बात से कोई लेना-देना नही क्या खबर जाने लायक है, बल्कि ध्यान इस बात पर होता है कि 'दुकानदारी' की कोई ख़बर छुट न जाए
हर एक मीडियाकर्मी इस असलियत से वाकिफ है और रोना भी रोता है, मगर कोई आवाज़ नही उठाता चन्द लोगों को छोड़कर कोई कोशिश नहीं करता इस पूंजीपति केंद्रित पत्रकारिता के समांतर असली पत्रकारिता की इमारत खड़ी करने की पत्रकारों की एक अच्छी-खासी ज़मात को चन्द पूंजीपति अपने इशारों पर नचाकर हित साध रहे हैं यह पत्रकारिता का कला युग है, जहाँ पत्रकार गुलाम हो चुका है और जो ख़ुद गुलाम हो, वह आम आदमी की आवाज़ कैसे उठाएगा वह तो अंधकार में दौड़ रहा है और पूंजीपति उसे हांक रहे हैं उसे नहीं मालूम कि उसकी इस 'ब्लैक जर्नलिज्म' से किस का भला हो पा रहा है...?

पत्रकारिता बनाम पवित्रता

एक पत्रकार के छोटे से पत्रकारिता जीवन की दास्ताँ
वाकई में संसार बदल चुका है. वह जमाना बीती बात हो गयी, जब यह संसार सत्कर्म की धुरी पर चलता था. अब भी धुरी तो वही है, पर संसार की चाल बिगड़ गयी है. सत्कर्म कमजोर और अपकर्म ताक़तवर हो चुका है. ऐसे में सामाजिक और मीडिया के मूल्यों के वजूद की बात करना ही अपने-आप में हास्यास्पद प्रतीत होता है. फिर भी मैं इस मुद्दे पर कुछ कहने की हिमाकत कर रहा हूँ. जो कुछ भी कहूँगा वह मेरे अनुभव और मन की टीस का शब्दों में रूपांतरण कह लें, तो ज्यादा सही होगा.पहली बार एक अंग्रेजी अखबार के लेटर टू एडिटर कॉलम के लिए पत्र लिखा. वह पत्र जब मेरे नाम के साथ प्रकाशित हुआ, तो मैं जितना खुश हुआ, वैसी खुशी शायद उसके बाद कभी महसूस नहीं पाया. पत्रकारिता जब तक पवित्रता का पर्याय लगी, तब तक इसके आगोश में सब कुछ भूलकर समाता गया. मुफ्फसिल संवाददाता से प्रशिक्षु पत्रकार और फ़िर उपसंपादक तक का सफर. इस दौरान कई ऐसे शख्स मिले, जिनसे पत्रकारिता की पवित्रता बरक़रार होने का आभास मिलता रहा. दूसरी तरफ़, ऐसे मस्त भी मिले, जिनसे पत्रकारिता के बदलते स्वरुप, नाम व अर्थ का भान भी होता रहा. पर इस बदलाव को तब गंभीरता से नहीं लिया. पत्रकारिता या पवित्रता को दामन से लगाये रखा और इसमें जितना डूबता गया, जिज्ञासा उतनी ही बढती गई. यह भी सच है कि जिज्ञासा के पीछे बचकाने में लिया गया एक संकल्प ज्यादा हावी था-संकल्प कि 'बहुत बड़ा पत्रकार होकर इस देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरेंगे।'
एक नामी विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया-पत्रकारिता की गहराई मापने की चाह में. पर पहली ही कक्षा में मिली चेतावनी भरी सलाह-'यदि पत्रकारिता करके समाज बदलने की बात सोचते हैं, तो बेहतर होगा यह पाठ्यक्रम अभी ही छोड़ दें, नहीं तो आपका कैरियर तबाह हो सकता है. यदि एक प्रोफेशनल पत्रकार बनने के लिए मन लगाकर पढ़ना चाहते हैं तभी यहाँ बने रहें.' पहले यह सब अजीब लगा, पर धीरे-धीरे ख़ुद को अध्ययन में रमाने लगा. कक्षाओं में अतिथि प्राध्यापक भी आते थे. उनमें कुछ पुराने ज़माने के, तो कुछ नए ज़माने के वरिष्ठ पत्रकार. कोई पत्रकारिता की पवित्रता और इसकी तपस्या से सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर, तो कोई इसके ठीक विपरीत सोच और सीख देने वाले. लेकिन मेरे बचकाने संकल्प पर नए-पुराने प्राध्यापकों की शिक्षा का विचार के स्तर पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा. विचारों में सेंध लगना वैसे भी कोई आसन नहीं होता. मगर परिस्थितियां बदलती हैं, तो विचारों को कुपोषित होना पड़ता है. यह तब महसूस हुआ, जब जेब खाली होने लगी. घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर एक अनजान शहर में खाली जेब गुजारा करना उतना ही मुश्किल है, जितना किसी वीराने में अकेले भटकना. पहला समझौता किया अपने आप से. छोटी सी नौकरी कर ली. नए शहर में ज्यों-ज्यों दिन बीते समझौतों का सिलसिला चलता रहा. विश्वविद्यालय की पहली कक्षा की चेतावनी सही प्रतीत होने लगी. एक के बाद दूसरी, फ़िर तीसरी नौकरी का सफर तय करने लगा. पत्रकारिता की पवित्रता अब नोट के हरे पत्तों में आंकने की मनोदशा बनने लगी, क्योकि इन पत्तों की जितनी मोटी गद्दी पर जो बैठे थे, उसे उतनी ही अधिक पूछ और पॉवर प्राप्त थे. अखबार अब लोकतंत्र के बाकी आधार स्तंभों के नक्शे कदम पर चलने लगे हैं. अब यह सिर्फ़ काले व रंगीन अक्षरों का कारोबार बनके रह गया है. यही नहीं अक्षरों के रंग-ढंग भी काफी बदल गए हैं. अव्वल तो यह कि अब अपढ़-अशिक्षित भी अखबार पलटने लगे हैं. फोटो जर्नलिज्म में बिंदास परिवर्तन आया है.
खैर, अख़बार की दुनिया से निकलकर मीडिया यानी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की दुनिया में भी जाने का मौका मिला. माया नगरी मुम्बई की मायावी दुनिया में कदम रखा, तो यहाँ हर रोज एक नए अनुभव हुए. ख़ुद को अनुकूल बनाते-बनाते एक माह लगे. लेकिन जिस मीडिया होउस में नौकरी करने गया था, उसके अनुकूल छः-सात महीने बाद भी नहीं बन सके. मुम्बई में दलाली का रोजगार सर्वाधिक लोकप्रिय है. यहाँ इसे किसी भी तरह से बुरा या अपमानजनक नहीं माना जाता, बल्कि नौकरी, व्यवसाय में बेहतर कमाई कर लेने वाले भी दलाली खाने के किसी मौके को हाथ से नहीं जाने देते. तभी तो शायद यहाँ के दलाल स्ट्रीट में देश की अर्थव्यवस्था की आत्मा बसती है. मुम्बई में दलाली कमाने की एक नहीं, अनगिनत गलियां हैं. आप अपनी शर्म व हया के चोले को उतार फेंकने को तैयार हैं, तो यह कमाई करने की दृष्टि से आदर्श नगर है. जिस मीडिया होउस में मुझे काम मिला था. उसे पत्रकारिता के 'प' से कम सट्टेबाजी के 'स' से अधिक मतलब था. सटोरियों को उनके नफा-नुकसान से सचेत करने वाली खबरें बेचने का कारोबार. यहाँ के जर्नलिज्म को सिर्फ़ सटोरियों से सरोकार था. बाकी सरोकारों से किसी को कोई मतलब नहीं, जैसे देश की सत्तर फीसदी आबादी सटोरिये हो और शेष आबादी धनी बिजनेस मैन. खैर, छोडिये कब तक इस माहौल में ख़ुद के साथ समझौते करता, ख़ुद को मरता रहता. वेतन/पैसे तो ठीक-ठाक थे, तो क्या सब कुछ यही तो नहीं होता. मायानगरी से तौबा कर ली और वापस लौट आया अपने पुराने ठिकाने. वही पुराना शहर, जहाँ पत्रकारिता के कई रंग-ढंग सीखे थे. इन तमाम अनुभवों का जोड़-घटाव करने के पश्चात् अब पत्रकारिता तो कर रहा हूँ, लेकिन किसी पूंजीपति/सेठ के अखबार में उनकी मुनाफ़ाखोर शर्तों पर नहीं, बल्कि ख़ुद के मीडिया होउस में, जो हालांकि पत्रकारिता को नए ढंग से परिभाषित करता है, लेकिन अपनी पवित्रता से समझौता नहीं करता.....अब देखते हैं पत्रकारिता की पवित्रता के साथ इस बदले संसार में कितनी दूरी तक चल पाते हैं...

आतंक का अंतहीन दौर

हृदयनारायण दीक्षित
मनुष्य ही नहीं कीट-पतंगा भी आत्मरक्षार्थ युद्ध करते है। आत्मरक्षा जीवमान राष्ट्र का भी प्रथम कर्तव्य है, लेकिन भारतीय राष्ट्र-राज्य आक्रमण पर भी हथियार नहीं उठाता। राष्ट्र एक अंतहीन युद्ध की गिरफ्त में है। हुक्मरान इसे आतंकवाद कहते है। मुस्लिम संगठन इसे 'जेहाद' कहने पर आपत्ति जताते हैं। सभी सत्तारूढ़ ऐसे हमलों को 'कायराना' बताते है और अपनी कोरी बयानबाजी को पराक्रम समझते है। भारतीय शासक युद्ध लड़ने का साहस नहीं दिखाते। जयपुर रक्तरंजित हुआ, करीब 70 लोग मारे गए, 150 जख्मी हुए। इसी दिन रक्षामंत्री एके एंटनी ने घुसपैठ बढ़ने की पुष्टि की। उन्होंने मौसम विभाग की तर्ज पर आतंकी घटनाओं का अंदेशा जताया। सुप्रीम कोर्ट ने घुसपैठ को राष्ट्र पर आक्रमण बताया था। केंद्र मौन रहा। आखिर घुसपैठिए वोट बैंक बनते है। जयपुर पहला आक्रमण नहीं है। मनमोहन सिंह के राज में ही दिल्ली, वाराणसी, मुंबई, मालेगांव, हैदराबाद, अजमेर, फैजाबाद, वाराणसी, लखनऊ, लुधियाना में आतंकी हमले हुए। संप्रग राजग पर आरोप लगाता है, वारदात और मृतक संख्या पर बहस करता है, राजग संप्रग पर नरम रुख अपनाने का आरोप जड़ता है, पोटा खात्मे का तर्क भी देता है। दु:खद आश्चर्य है कि हजारों नागरिकों की हत्या के बावजूद राजनीति इसे 'राष्ट्र के विरुद्ध युद्ध' नहीं मानती।
इंटेलिजेंस ब्यूरो के संयुक्त निदेशक रहे केंद्र सरकार के निवर्तमान वरिष्ठ अधिकारी मलयकृष्ण धर के निष्कर्ष तथ्यपरक है-''भारत अंतरराष्ट्रीय जेहाद के निशाने पर है। यह भी समझ लेना चाहिए कि यह खिलाफत आंदोलन का दोहराया जाना नहीं है। यह जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर जैसे धर्मयुद्ध की घोषणा है।'' धर याद कराते हैं- ''याद करिए जब बाबर राणा सांगा की सेनाओं से घिर गया तो उसने सेना के जवानों से कहा शराब छोड़ो, सांगा से जेहाद करो। उसके बाद धार्मिक नेता शाहवली उल्लाह (1703-1762) ने अब्दाली को मराठों के खिलाफ जेहाद का न्यौता दिया कि अल हिंद में इस्लाम का गौरव लौटाया जा सके।'' धर कट्टरपंथी नहीं, वरिष्ठ आईपीएस है। वह आधुनिक जेहाद को इसी पुरानी विचारधारा का विस्तार मानते हुए लिखते है कि बाबर और वलीउल्लाह की वह कड़ी इन जेहादियों में बनी हुई है। देश को इससे निपटने के लिए जल्दी से तैयार हो जाना चाहिए। दरअसल सभ्यता और सांस्कृतिक विस्तार के दो ही मार्ग है। एक मार्ग युद्ध का है। अरब की विस्तारवादी जेहादी विचारधारा युद्धप्रिय है। प्रीति, प्यार, ममत्व और विचार प्रवाह का दूसरा मार्ग है। भारत प्राचीन काल से इसी मार्ग का प्रतिनिधि है। कबायली अरबी सभ्यता अपने जन्मकाल से ही आक्रामक है। दुनिया पर वर्चस्व उसका मकसद है। जेहादी आतंकवाद एक युद्धपिपासु मुकम्मल विचारधारा है। जमायत-ए-इस्लामी आतंकवादी संगठन नहीं माना जाता। इंदिरा गांधी ने 1975 में इस पर प्रतिबंध लगाया था। इसके संस्थापक मौलाना मौदूदी सिमी के 'ख्याले आजम' हैं। मौदूदी ने 'जेहाद फीस बिल्लाह' में समझाया-''इस्लाम सिर्फ एक मजहबी अकीदा (आस्था) नहीं है। यह संपूर्ण जीवन पद्धति है। यह पार्टी अपने जिंदगी मकसद के लिए जेहाद शुरू कर देती है कि वह गैर-इस्लामी निजाम की हुक्मरानी को मिटाने की कोशिश करे।''
सिमी का जेहादी ऐलान गौरतलब है-''वक्त की मांग है कि कुरान पाक की रोशनी में दुनिया को शैतानी पंजों से मुक्त कराने, दीनी (इस्लामी) व्यवस्था को सर्वोपरि लाने के लिए मुस्लिम युवक संघर्ष करें।'' आतंकी संगठन सैकड़ों है, नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। सभी जेहादी संगठनों के मकसद एक है। सब हमलावर है, युद्धरत हैं। केंद्र सरकार प्रत्येक वारदात में आतंकी संगठन का नाम पता लगाकर खुश हो जाती है। सुरक्षा बल जान की बाजी लगाकर उन्हे गिरफ्तार भी करते है, उन पर सामान्य कानूनों में मुकदमा चलता है, उनके विरुद्ध गवाह नहीं मिलते। कई साक्ष्य के अभाव में छूट भी जाते है। सुरक्षा बल निर्दोष मुसलमानों को सताने का घटिया आरोप झेलते है। जेहादी बेखौफ हमलावर होकर आते है, उन्हे मारे जाने पर जन्नत की गारंटी है। वे धर्मयोद्धा है, वे किसी को भी मार देते हैं-बच्चों को, महिलाओं को, वृद्धों को। वे मंदिर या आस्था केंद्रों को ही निशाना बनाते है, खून बहाते है। वे बहुधा पाकिस्तानी, बांग्लादेशी भी होते हैं, कभी-कभी इसी देश के भी, लेकिन हर वारदात में उनकी मदद 'देसी जेहादी'' ही करते है। देसी लोग उन्हे घर टिकाते है, मौका-ए-वारदात तक ले जाते है, भाग जाने का रास्ता दिखाते है। वे युद्ध करने ही आते हैं, बावजूद इसके वे संभ्रांत नागरिक की तरह न्याय व्यवस्था का लाभ लेते है और उनके देसी सहयोगी मौज में रहते है। छद्म सेकुलर राजनीति देसी संदिग्धों की खोजबीन, तफ्तीश, तहकीकात की हिम्मत नहीं जुटाती। वोट बैंक बाधा बनता है।
भारत उदार है, आर्थिक नीतियों का भूमंडलीकरण है, अमीरी, गरीबी और महंगाई वैश्विक है। अर्थव्यवस्था में उछाल है। जेहादी विचारधारा की मांगें जन्मकाल से ही वैश्विक हैं। भारत उनका स्वागतकर्ता है। महात्मा गांधी जैसे घोर राष्ट्रवादी ने भी खिलाफत जैसे घोर सांप्रदायिक आंदोलन को गले लगाया और खिलाफत के सत्याग्रही भी बने। मो. बिन कासिम (सातवीं सदी) के हमले से लेकर गजनी, गोरी, बाबर सहित अफजल के हमले तक भारत के ही लोग किसी न किसी रूप में विदेशी जेहादी हमलों के प्रत्यक्ष-प्रछन्न सहायक बने। संप्रति जेहादी आतंकवाद का भूमंडलीकरण है। भारत के सभी राज्यों में, सभी जिलों और सभी क्षेत्रों में जिहादी आतंकवादी विचारधारा है। अमेरिका में आतंकी की सुनवाई फौजी न्यायालय करते है, उन्हे वकील की सुविधा नहीं मिलती। अमेरिका ने आतंकवाद को युद्ध और हमला माना है। भारत की नीतियों में यह सामान्य अपराध है। यह युद्ध रणनीति या युद्ध कौशल कदापि नहीं है। हमला तो कतई नहीं। आतंकी बिगडै़ल अतिथि है। कानून उनका सम्मान करता है। कोर्ट सजा भी सुनाती है तो केंद्र 'अनुकंपा अर्जी' के लिए तैयार और तत्पर है। आतंकवाद की सभी घटनाओं का एक केंद्रीय विचार है। सरकारे खंडों में सोचती है। जयपुर कांड में हुजी पर शक किया जा रहा है। हुजी का गठन 1980 में जमायत-ए-इस्लाम और तबलीगी जमात ने रूस के विरुद्ध अफगान मुजाहिदीन की मदद के लिए किया था। अमेरिका इस लड़ाई का मददगार था। अलकायदा और आईएसआई ने उसे भारत और बांग्लादेश के लिए तैयार किया। आईएसआई ने ही लश्कर-ए-तोयबा बनवाया था। जैश-ए-मोहम्मद को मौलाना मसूद अजहर ने खड़ा किया।
भारत विश्व के सभी जेहादी आतंकियों का निशाना है। यह इस विचारधारा का युद्धस्थल है। यहां हिंदू बहुसंख्यक हैं, यहां मंदिर है। मंदिरों के आस-पास उन्हे जेहादी विचारधारा से इनकार करने वाले 'स्थाई शत्रु' मिल जाते है। पाकिस्तान, बांग्लादेश की खुफिया एजेंसियां उन्हे मदद करती है। भारत में घुसपैठ कराती है, लेकिन उन्हे दोष देने का कोई फायदा नहीं। केंद्र स्वयं ही घुसपैठियों का स्वागत करता है और आतंकियों को सहूलियत देता है। पोटा इसीलिए हटाया गया। इसीलिए आतंकवाद के 'स्थानीय सहयोगियों' पर सरकारी रुख में नरमी है। युद्ध और हमलों को भी नजरअंदाज करने के जज्बात कोई भारत सरकार से सीखे।..लेकिन राष्ट्र क्षुब्ध, आहत और बेहद गुस्से में भी है।
साभार : जागरण डॉट याहू डॉट कॉम

चरित्रहीनता मे डूबे राजनेता

सुनीता देवी प्रकरण पर सीधी बात
कांग्रेसी विधायक सुनीता देवी पर लगे अंगरक्षक के यौन शोषण के आरोप ने राजनेताओं के 'रासरंग' की चटकारे वाली चर्चा शुरू करा दी है। इस बहाने नेताओं के 'पति, पत्नी और वो', 'महिला मित्र' या फिर कुर्सी से जुड़ी रंगरेलियों पर नए सिरे से बहस हो रही है। ऐसे कई गंभीर सवाल अवाम की जुबान पर हैं कि 'आखिर राजनेता किस हैसियत से समाज का पथ प्रदर्शक होने का दावा करते है; इन रवैयों से समाज को कौन-सी दिशा मिलती है?'
दरअसल सुनीता देवी प्रकरण पहला और आखिरी नहीं है। लंबी दास्तान। कई ने पारिवारिक विवशता के चलते संबंध बनाए यानी बाकायदा दूसरी शादी की। लेकिन सर्वाधिक मामलों में पहली पत्नियों ने 'स्मार्ट सौत' की मौजूदगी में स्वयं को जबरिया 'एडजस्ट' कर रखा है। चर्चा इस बात की हो रही है कि कैसे मुख्य धारा के लगभग पचपन राजनीतिज्ञ [विशेषकर विधायक] दो या इससे अधिक पत्नियों के पति है। पत्नियां प्रताड़ित है किंतु लोक-लाज या भय से मुंह नहीं खोलतीं। सर्वाधिक वही राजनेता भटके, जो गंवई माहौल से निकल अचानक चकाचौंध की हैसियत में पहुंचे। सत्ता के दलाल या सरकार गिराओ- बचाओ के नियामक इस भटकाव को और बढ़ाते है।
मगर दुर्भाग्य से ऐसे मामले यहां मजाक के विषय भर है। अखंड बिहार की आखिरी विधानसभा में तत्कालीन आदिवासी कल्याण मंत्री बागुन सुम्ब्रई ने जब विदाई में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से छठी पत्नी मांगी, तो सदन में जोरदार ठहाका गूंजा। कुछ और उदाहरण-लघु सिंचाई मंत्री रहे मंगनी लाल मंडल की दूसरी शादी पर विधानसभा में भी हंगामा हुआ। अलकतरा घोटाला के आरोप में पथ निर्माण मंत्री मो. इलियास हुसैन जब जेल गए तो उनके समर्थकों ने उनकी पत्नी को मंत्री बनाने की मांग उठाई किंतु मामला इस सवाल पर फंसा कि आखिर उनकी तीन पत्‍ि‌नयों में कौन मंत्री बनेंगी? केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पुरानी शिकायत रही है कि किसी को दूसरे की निजी जिंदगी में झांकने का अधिकार नहीं होना चाहिए। असल में उनके राजनीतिक विरोधियों को जब भी मौका मिला, उनकी गांव वाली दूसरी पत्नी का मुद्दा उठा दिया। विधायक केडी सिंह यादव की दूसरी शादी पर बवाल हुआ। एक कांग्रेसी सांसद ने पत्नी के रहते नाबालिग लड़की से शादी की। कांग्रेस के एक विधायक की पत्नी दूसरी महिला कांग्रेसी विधायक से नाजायज संबंधों के हवाले सड़क पर भिड़ गई। दो कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों का महिला प्रेम जगजाहिर रहा है। कर्पूरी ठाकुर भी ऐसी बदनामी से तभी मुक्त हुए, जब कोर्ट ने हस्तक्षेप किया। दुष्कर्म के दौरान एक लड़की ने राजद विधायक योगेंद्र सरदार का लिंग काट लिया। ख्यात राजनीतिज्ञ धनिक लाल मंडल ने भी दूसरी पत्‍‌नी [कुसुम चौधरी] से तलाक को ले बुढ़ौती में बदनामियां झेलीं।
राजनीतिक पार्टियों की रैलियों में अपसंस्कृति की पराकाष्ठा, कमोवेश इसी कुंठा का पर्याय है। लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की मौजूदगी में मुख्यमंत्री आवास में कई बार लौंडा व हिजड़ा नाच हुआ। यह आम राय है कि इसका सीधा असर महिलाओं या लड़कियों के खिलाफ बढ़ते अपराध के रूप में परिलक्षित होता है।
ऐसे में नौकरशाहों का कहना ही क्या? तीस के करीब आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के संबंध दूसरी महिलाओं से रहे है। चाहे आईपीएस अमिताभ दास का मसला हो या प्रसिद्ध गायक उदित नारायण का- घरेलू विवाद सुलझाने में राज्य महिला आयोग परेशान है।
नेता-नौकरशाहों के बहके मिजाज से पनपे सेक्स स्कैंडलों की भी कमी नहीं है। बाबी हत्याकांड, शिल्पी-गौतम कांड, चंपा विश्वास बलात्कार कांड, पापरी बोस अपहरण कांड, सुभाष-सुशान हत्याकांड, दीपा मुर्मू कांड .., लंबी फेहरिस्त है। लेकिन शायद ही किसी मामले में असरदार कार्रवाई हुई।
उल्लेखनीय है कि कोढ़ा विधायक सुनीता देवी पर उनके ही बाडीगार्ड बाल योगेश्वर शर्मा उर्फ लाली ने यौन शोषण का आरोप लगाया था। जिसके बाद सुनीता देवी ने प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे दिया। वहीं, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के निर्देश पर गठित एक दो सदस्यीय टीम ने सोमवार को सुनीता देवी से पूछताछ की। सुनीता देवी ने इस पूरे प्रकरण से पल्ला झाड़ते हुए अपने को निर्दोष बताया है। उसका कहना है कि वह और लाली के बीच भाई-बहन का रिश्ता है। लाली ने इसी रिश्ते को बेजा इस्तेमाल किया और अब वह उसे ब्लैकमेल कर रहा है। उधर, लाली को इस प्रकरण को मीडिया के समक्ष उजागर करने की सजा निलंबन के रूप में मिली है। इसके साथ ही लाली के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही भी चलाने का निर्देश दिया गया है। साभार : जागरण डॉट याहू डॉट कॉम

संकट में आम आदमी

देवर्षि शर्मा
कभी प्याज की कीमतों को लेकर दिल्ली में भाजपा सरकार गिर गई थी। आज कांग्रेस के राज में सभी आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। बढ़ती महंगाई से आम आदमी घोर संकट में फंस गया है। सरकार न जाने किस उधेड़बुन में है कि उसे आम आदमी पर पड़ रही महंगाई की भीषण मार दिखाई नहीं पड़ रही। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह सरकार तीन प्रमुख अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व में चलाई जा रही है, जिसे समर्थन दे रहे हैं गरीबों की बढ़-चढ़कर बात करने वाले वाम दल। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अर्थवेत्ताओं में प्रमुख है और उनके सहयोगी है वित्तमंत्री पी. चिदंबरम तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया। यदि ये विद्वान अर्थशास्त्री पिछले चार वर्षो में केवल कमर तोड़ महंगाई ही दे पाए हैं तो उनकी विद्वता पर संदेह होना लाजिमी है। कुछ दिनों पूर्व ही वित्त मंत्री का कथन था कि देश सुदृढ़ आर्थिक धरातल पर खड़ा है। ऐसी आर्थिक सुदृढ़ता का आश्वासन किसके लिए? क्या यह आश्वासन केवल बड़े घरानों के लिए है? आम आदमी कहां जाए? किसान, मजदूर, साधारण वेतनभोगी तथा गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लगभग 30 करोड़ बेरोजगार जिंदा कैसे रहें? भीषण महंगाई ने प्रमुख खाद्य पदाथरें-आटा, दाल, चावल तथा सब्जियों पर सबसे अधिक सितम ढाया है। साथ ही पेट्रोल-डीजल, स्टील की बढ़ती कीमतें आम आदमी की मुसीबतें बढ़ा रही हैं। महंगी बिजली, ऊपर से भीषण कटौती लोगों का जीना दूभर कर रही है। शिक्षा और चिकित्सा के व्यवसायीकरण ने उन्हें आम लोगों की पहुंच से बाहर कर दिया है।
आज जो समस्याएं आम आदमी के सामने मुंह बाए खड़ी हैं उनकी तरफ देखने से इनकार किया जा रहा है। इसे दृष्टि दोष कहें या समझ का फेर, वित्त मंत्री एवं प्रधानमंत्री, दोनों ही धरातल की वास्तविकता की पूरी अनदेखी करते हुए अर्थव्यवस्था का इंडियन संस्करण परोसने में व्यस्त है। उन्हे वैश्वीकरण के साथ-साथ अर्थशास्त्र के भारतीय संस्करण की अनदेखी से बचना होगा। करोड़ों भारतीयों के लिए जहां पेट भरना समस्या बनता जा रहा हो वहां बहुराष्ट्रीय माल कल्चर देश को अराजकता की आग के हवाले कर सकता है। अमेरिका जैसी महंगाई भारत झेल नहीं पाएगा। कृषि एवं किसानों की अनदेखी तथा गलत नीतियों ने हरित क्रांति को लील लिया है। पिछले पांच साल में डेढ़ लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं और देशवासियों का पेट भरने के लिए सरकार को विदेश से गेहूं आयात करना पड़ रहा है। इससे बड़ी विडंबना कोई और नहीं कि गरीबों के लिए न केवल पेट भरना दूभर होता जा रहा है, बल्कि उन्हें सिर छुपाने के लिए छत भी नहीं मिल पा रही है। जहां पूंजीपतियों, अधिकांश राजनेताओं और नौकरशाहों के पास कई-कई मकान और फार्म हाउस हैं वहीं देश के करोड़ों लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं। अब तो बैंकों द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कारण होम लोन लेना और चुकाना भी मुश्किल हो गया है। नीति-नियंताओं के लचर और अप्रभावी शासन की कीमत आम जनता को चुकानी पड़ रही है। महंगाई अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों के अतिरिक्त व्यापारिक जमाखोरी से भी बढ़ती है। प्रकारांतर में यह अनैतिकता का ही परिणाम है। सरकार ने थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर गणना करके महंगाई वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत घोषित की है, जबकि हकीकत में महंगाई दर की गणना थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर न करके खुदरा मूल्यों के आधार पर करनी चाहिए। आम लोगों का वास्ता तो खुदरा व्यापारियों से ही होता है। अगर इस आधार पर महंगाई का निर्धारण करें तो यह 17 से 20 प्रतिशत बैठती है। प्रधानमंत्री का कथन कि खाद्यान्न के बढ़ते मूल्य मुद्रास्फीति की दर को काबू करने में कठिनाई पैदा करेगे तथा मैक्रो अर्थव्यवस्था की स्थिरता विचलित हो सकती है, आगामी संकट को और स्पष्ट करने वाला है। समय रहते केंद्र तथा प्रदेश सरकारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत तथा चुस्त-दुरुस्त करना होगा। आयात तथा अन्य साधनों से जमाखोरी और कालाबाजारी रोककर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि गरीब भुखमरी का शिकार होने से बच सकें। राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों जमाखारों के खिलाफ डाले गए छापे से जिस तरह हजारों टन खाद्यान्न बरामद हुआ वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जमाखोरों और कालाबाजारियों के मन में कानून का कोई भय नहीं रह गया है। जब राजधानी में जमाखोरी की यह स्थिति है तब यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के दूसरे भागों में स्थिति कितनी गंभीर होगी। अभी भी समय है, यदि केंद्र और राज्य सरकारें जमाखोरों के खिलाफ सघन अभियान चलाएं तो खाद्यान्न का जो संकट नजर आ रहा है वह एक हद तक दूर हो सकता है।
साभार : जागरण डॉट याहू डॉट कॉम

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