संकट में आम आदमी

देवर्षि शर्मा
कभी प्याज की कीमतों को लेकर दिल्ली में भाजपा सरकार गिर गई थी। आज कांग्रेस के राज में सभी आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। बढ़ती महंगाई से आम आदमी घोर संकट में फंस गया है। सरकार न जाने किस उधेड़बुन में है कि उसे आम आदमी पर पड़ रही महंगाई की भीषण मार दिखाई नहीं पड़ रही। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह सरकार तीन प्रमुख अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व में चलाई जा रही है, जिसे समर्थन दे रहे हैं गरीबों की बढ़-चढ़कर बात करने वाले वाम दल। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अर्थवेत्ताओं में प्रमुख है और उनके सहयोगी है वित्तमंत्री पी. चिदंबरम तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया। यदि ये विद्वान अर्थशास्त्री पिछले चार वर्षो में केवल कमर तोड़ महंगाई ही दे पाए हैं तो उनकी विद्वता पर संदेह होना लाजिमी है। कुछ दिनों पूर्व ही वित्त मंत्री का कथन था कि देश सुदृढ़ आर्थिक धरातल पर खड़ा है। ऐसी आर्थिक सुदृढ़ता का आश्वासन किसके लिए? क्या यह आश्वासन केवल बड़े घरानों के लिए है? आम आदमी कहां जाए? किसान, मजदूर, साधारण वेतनभोगी तथा गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लगभग 30 करोड़ बेरोजगार जिंदा कैसे रहें? भीषण महंगाई ने प्रमुख खाद्य पदाथरें-आटा, दाल, चावल तथा सब्जियों पर सबसे अधिक सितम ढाया है। साथ ही पेट्रोल-डीजल, स्टील की बढ़ती कीमतें आम आदमी की मुसीबतें बढ़ा रही हैं। महंगी बिजली, ऊपर से भीषण कटौती लोगों का जीना दूभर कर रही है। शिक्षा और चिकित्सा के व्यवसायीकरण ने उन्हें आम लोगों की पहुंच से बाहर कर दिया है।
आज जो समस्याएं आम आदमी के सामने मुंह बाए खड़ी हैं उनकी तरफ देखने से इनकार किया जा रहा है। इसे दृष्टि दोष कहें या समझ का फेर, वित्त मंत्री एवं प्रधानमंत्री, दोनों ही धरातल की वास्तविकता की पूरी अनदेखी करते हुए अर्थव्यवस्था का इंडियन संस्करण परोसने में व्यस्त है। उन्हे वैश्वीकरण के साथ-साथ अर्थशास्त्र के भारतीय संस्करण की अनदेखी से बचना होगा। करोड़ों भारतीयों के लिए जहां पेट भरना समस्या बनता जा रहा हो वहां बहुराष्ट्रीय माल कल्चर देश को अराजकता की आग के हवाले कर सकता है। अमेरिका जैसी महंगाई भारत झेल नहीं पाएगा। कृषि एवं किसानों की अनदेखी तथा गलत नीतियों ने हरित क्रांति को लील लिया है। पिछले पांच साल में डेढ़ लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं और देशवासियों का पेट भरने के लिए सरकार को विदेश से गेहूं आयात करना पड़ रहा है। इससे बड़ी विडंबना कोई और नहीं कि गरीबों के लिए न केवल पेट भरना दूभर होता जा रहा है, बल्कि उन्हें सिर छुपाने के लिए छत भी नहीं मिल पा रही है। जहां पूंजीपतियों, अधिकांश राजनेताओं और नौकरशाहों के पास कई-कई मकान और फार्म हाउस हैं वहीं देश के करोड़ों लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं। अब तो बैंकों द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कारण होम लोन लेना और चुकाना भी मुश्किल हो गया है। नीति-नियंताओं के लचर और अप्रभावी शासन की कीमत आम जनता को चुकानी पड़ रही है। महंगाई अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों के अतिरिक्त व्यापारिक जमाखोरी से भी बढ़ती है। प्रकारांतर में यह अनैतिकता का ही परिणाम है। सरकार ने थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर गणना करके महंगाई वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत घोषित की है, जबकि हकीकत में महंगाई दर की गणना थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर न करके खुदरा मूल्यों के आधार पर करनी चाहिए। आम लोगों का वास्ता तो खुदरा व्यापारियों से ही होता है। अगर इस आधार पर महंगाई का निर्धारण करें तो यह 17 से 20 प्रतिशत बैठती है। प्रधानमंत्री का कथन कि खाद्यान्न के बढ़ते मूल्य मुद्रास्फीति की दर को काबू करने में कठिनाई पैदा करेगे तथा मैक्रो अर्थव्यवस्था की स्थिरता विचलित हो सकती है, आगामी संकट को और स्पष्ट करने वाला है। समय रहते केंद्र तथा प्रदेश सरकारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत तथा चुस्त-दुरुस्त करना होगा। आयात तथा अन्य साधनों से जमाखोरी और कालाबाजारी रोककर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि गरीब भुखमरी का शिकार होने से बच सकें। राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों जमाखारों के खिलाफ डाले गए छापे से जिस तरह हजारों टन खाद्यान्न बरामद हुआ वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जमाखोरों और कालाबाजारियों के मन में कानून का कोई भय नहीं रह गया है। जब राजधानी में जमाखोरी की यह स्थिति है तब यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के दूसरे भागों में स्थिति कितनी गंभीर होगी। अभी भी समय है, यदि केंद्र और राज्य सरकारें जमाखोरों के खिलाफ सघन अभियान चलाएं तो खाद्यान्न का जो संकट नजर आ रहा है वह एक हद तक दूर हो सकता है।
साभार : जागरण डॉट याहू डॉट कॉम

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