जज, ज्यूरी और जल्लाद भी

अनिल वर्गीज़
एक के बाद एक उत्तर प्रदेश की कई बार असोसिएशनों ने आतंकवाद के आरोपियों की पैरवी करने न करने का फैसला कर रखा है। नतीजा पुलिस स्वच्छंद होकर आरोपियों को मुजरिम साबित करने के लिए कुछ भी कर रही है और आरोपी अपनी बात तक रखने की स्थिति में नहीं हैं। क्या मुस्लिम युवा किसी अघोषित, अनाधिकारिक आपातकाल के शिकार हैं? इलाहाबद में कुछ हफ्तों पहले एक असामान्य बैठक हुई जिसे लगभग सभी ने अनदेखा कर दिया। मीडिया की चकाचौंध से दूर हजारों मुसलमान वो सवाल करने के लिए इकट्ठा हुए थे जो मुस्लिम समुदाय के अंदर दिनों-दिन गहरी पैठ बनाता जा रहा है। क्या आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उनकी दशा गेंहू के घुन जैसी हो गई है? आयोजन में जमा लोगों ने विशेषकर उत्तर प्रदेश की बात की जहां स्थानीय वकीलों ने आतंकवाद के आरोपी मुसलमानों की पैरवी करने से ही इनकार कर दिया। न्याय को नकारने के ये असाधारण मामले हैं। किसी वकील द्वारा पैरवी न किए जाने की वजह से पुलिस को मनमानी करने की आज़ादी मिल जाती है और ऐसा ही हो रहा है। आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पुलिस उल्टे-सीधे, वैध-अवैध सभी हथकंडे अपना रही है।
इलाहाबाद की मीटिंग राज्य द्वारा प्रायोजित इस आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए बुलाई गई थी। मीटिंग में लगे बैनरों पर लिखा था-- "एटीएस-एसटीएफ विभाग - आतंकवाद का दूसरा नाम"। एटीएस और एसटीएफ उत्तर प्रदेश में बढ़ रही जेहादी घटनाओं से निपटने के लिए बनाए गए दो विशेष पुलिस बल हैं। एक वक्ता ने श्रोताओं को चेताया, "ये सोचकर खुद को दिलासा मत दीजिए कि एसटीएफ ने आपको नहीं पकड़ा, बहुत जल्द आप की बारी भी आ सकती है।"
कोर्ट में उसके ऊपर हमला हुआ और वकीलों ने उसका केस लड़ने से इनकार कर दिया। जब डेढ़ साल तक मामले में कोई प्रगति नहीं हुई तो उसने अपना केस दूसरी जगह ट्रांसफर करने के लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
वलीउल्लाह, आफताब आलम अंसारी, मोहम्मद खालिद मुजाहिद, मोहम्मद तारिक क़ासमी, सहजादुर रहमान, मोहम्मद अख्तर। इन सभी के परिवार वालों ने ने पुलिस पर अवैध तौरतरीके अपनाने के आरोप लगाए हैं। लेकिन किसी को भी किसी तरह की भी क़ानूनी सहायता नहीं मिल सकी क्योंकि एक के बाद एक तमाम बार एसोसिएशन्स ने इन आरोपियों का बहिष्कार करने के प्रस्ताव पारित कर रखे है। फैजाबाद बार एसोसिएशन ने 2005 में राम जन्मभूमि पर आतंकी हमले के बाद इसकी शुरुआत की थी। इसके बाद वाराणसी बार एसोसिएशन ने 2006 में संकटमोचन और कैंट स्टेशन पर हुए विस्फोट के आरोपी वलीउल्लाह के मामले में यही रुख अपनाया। लखनऊ और बाराबंकी बार एसोसिएशनों ने भी 22 नवंबर 2007 में लखनऊ, बाराबंकी और वाराणसी के कचहरी परिसर में हुए सिलिसलेवार धमाकों के बाद आरोपियों को क़ानूनी सहायता नहीं दिए जाने के फरमान पास कर दिए। विस्फोट के एक दिन पहले लखनऊ कचहरी के वकीलों ने एसटीएफ द्वारा पकड़े गए राहुल गांधी की हत्या की साजिश के तीन आरोपियों के साथ मारपीट भी की थी।
इलाहाबाद से 40 किलोमीटर दूर फूलपुर में 25 मार्च 2006 को वलीउल्लाह स्थानीय पुलिस थाने में पूछताछ के लिए हाजिर हुआ था। कुछ चश्मदीदों के हवाले से वलीउल्लाह के पड़ोसी इम्तियाज़ बताते हैं कि अगले दिन उससे इफ्को के परिसर में पूछताछ के लिए आने को कहा गया। इफ्को जाते वक्त रास्ते में बोलेरो में सवार तीन लोगों ने उसे रोक लिया। उसे एक गाड़ी में डालकर वे वहां से फुर्र हो गए। वलीउल्लाह को लोग मुफ्तीसाब के नाम से पुकारते हैं। ये एक मदरसा संचालित करते हैं और फूलपुर मस्जिद के इमाम भी हैं। उनके गायब होने के बाद फूलपुर जैसे थम सा गया, यहां तक कि ट्रेनों का भी यहां से निकलना मुश्किल हो गया।
एसटीएफ की एफआईआर के मुताबिक वलीउल्लाह को विस्फोटकों के साथ पांच अप्रैल को लखनऊ से गिरफ्तार किया गया था, चश्मदीदों की बताई तारीख से ठीक दस दिन बाद। वलीउल्लाह के भाई वसीउल्लाह एसटीएफ के उस आरोप को सिरे से नकारते हैं जिसमें कहा गया है कि वलीउल्लाह के पास एक पासपोर्ट था और उसके बैंक खाते में पचास लाख रूपए थे। वाराणसी में वलीउल्लाह की सुनवाई अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि पुलिस के सामने किया गया उसका इकरारनामा टीवी पर प्रसारित कर दिया गया। कोर्ट में उसके ऊपर हमला हुआ और वकीलों ने उसका केस लड़ने से इनकार कर दिया। जब डेढ़ साल तक मामले में कोई प्रगति नहीं हुई तो उसने अपना केस दूसरी जगह ट्रांसफर करने के लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसका केस गाज़ियाबाद ट्रांसफर कर दिया गया। यहां दो सालों से कैद में रह रहे वलीउल्लाह को जैसे-तैसे एक वकील मिल पाया। जिस समय उन्हें गिरफ्तार किया गया था उनकी पत्नी गर्भवती थी और दो छोटे बच्चे भी थे। बहिष्कार की अगुवाई करने वाले वाराणसी के वकील अनुपम वर्मा से पूछने पर उनका जवाब कुछ यूं था-- "ये ही वो लोग हैं जो देश के साथ धोखा कर रहे हैं। उनका मामला पुलिस की जांच का विषय है और पुलिस के कहने को ही सही माना जाना चाहिए।"
एक तरह से वकील खुद ही यहां जज की भूमिका में आ गए हैं। कचहरी परिसरों में एक के बाद एक धमाकों से न्यायिक समुदाय एकजुट हो गया और इस केस के पांच आरोपियों को अछूत घोषित कर दिया गया। लखनऊ के एक वकील मोहम्मद शोएब इस प्रतिबंध को दरकिनार करके उनके बचाव में आगे आए। शोएब, आफताब आलम अंसारी की पैरवी कर रहे हैं जिनके ऊपर एसटीएफ ने हूजी आतंकवादी होने का आरोप लगाया है। "आफताब की मां और मुझे जेल में उससे मिलने भी नहीं दिया गया। जब मैंने कोर्ट में शिकायत दाखिल की तो जज ने इस पर कार्रवाई करने की बजाय जेल अथॉरिटी से रिपोर्ट मांगी," शोएब कहते हैं। लेकिन उनकी कोशिश रंग लायी और कुछ ही दिनों बाद जब शोएब ने पुलिसिया कहानी की धज्जियां उड़ा दी तब आफताब को रिहा किया गया। क़ानून के इस अकेले सिपाही की इस सफलता के बाद जल्द ही मामले के सह आरोपी मोहम्मद खालिद मुजाहिद और मोहम्मद तारिक क़ासमी के परिवारों ने भी उनसे संपर्क किया।
आतंकवाद के संदिग्ध आरोपियों के खिलाफ पूर्वाग्रह रखने वालों का दायरा बहुत व्यापक है। इसमें निचले स्तर तक के कर्मी शामिल हैं। यहां तक कि केस से जुड़े कागजातों का निवेदन भी अनसुना कर दिया गया।
"खालिद को एसटीएफ ने जौनपुर ज़िले के मड़ियाहूं से गिरफ्तार किया था, जहां वो सब्जी खरीद रहा था। इस बात के सैकड़ो गवाह हैं जिन्होंने इसकी पुष्टि करने वाले एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर भी किए हैं.," खालिद की पत्नी शबनम बानों कहती हैं। ये घटना 16 दिसंबर 2007 की है—दोनों का निकाह इससे केवल दो महीने पहले ही हुआ था। तारिक की कहानी भी ऐसी ही है। "उसे आज़मगढ़ ज़िले के सरायमीर कस्बे से गिरफ्तार किया गया था। वो अपने घर मोहम्मदपुर जा रहा था। जब आस-पास के लोगों ने पूछा तो एसटीएफ के लोगों ने कहा कि इन्हें मोहम्मदपुर ले जा रहे हैं। लेकिन वहां ले जाने की बजाय उसे लखनऊ जेल में डाल दिया गया," नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के नेता अरशद खान कहते हैं। इसके बाद 22 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने एक प्रेस कांफ्रेंस मे घोषणा की कि उन्होंने हूजी के दो आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है जिनके ऊपर कचहरी सीरियल धमाकों में शामिल होने की आशंका है। ये दोनों संदिग्ध तारिक और खालिद थे। इनके बारे में डीजीपी ने दावा किया कि धमाके वाले दिन ही एसटीएफ ने इन्हें बाराबंकी में धर दबोचा था।
शोएब के मुताबिक उन्हें केस लड़ने के साथ-साथ लोगों के छुआछूत भरे व्यवहार से भी लड़ना पड़ रहा है क्योंकि आतंकवाद के संदिग्ध आरोपियों के खिलाफ पूर्वाग्रह रखने वालों का दायरा बहुत व्यापक है। इसमें निचले स्तर तक के कर्मी शामिल हैं। यहां तक कि केस से जुड़े कागजातों का निवेदन भी अनसुना कर दिया गया। इस अभियान में सिर्फ वकील ही नहीं बल्कि जेल अधिकारी भी शामिल हैं। फैजाबाद के जेल सुपरिटेंडेंट ने तो अपने खिलाफ उस कारण बताओ नोटिस का भी जवाब नहीं दिया जो उन्हें आरोपियों को अदालत में पेश न करने के लिए जारी किया गया था। लिहाजा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को एक अजीबोगरीब कदम उठीना पड़ा। शोएब कहते हैं, "उन्होंने खुद जेल परिसर में जाकर मुझे और मेरे मुवक्किलों को आरोपपत्र पढ़कर सुनाया।" जेल प्रशासन ने अभी तक तारिक और खालिद को कोर्ट में पेश नहीं किया है।
जब शोएब बाराबंकी में जमानत अर्जी दाखिल करने के लिए गए तो वहां पर स्थानीय बार एसोसिएशन के सचिव प्रदीप सिंह ने उन्हें चेतावनी दी कि अगर उन्होंने मामलों से हाथ नहीं खींचा तो उनपर हमला भी हो सकता है। दबाव में झुकते हुए उन्होंने मामले से अपना हाथ खींच लिया और वापस लखनऊ पहुंच कर अपने मुवक्किलों के कागजातों से अपना नाम हटा दिया। खालिद औऱ तारिक के परेशान परिवार वालों ने उनसे इस फैसले पर फिर से विचार करने का निवेदन किया है। इस बात को जानते हुए कि किसी दूसरे वकील का मिलना असंभव है शोएब तहलका को बताते हैं, "तमाम संभावनाओं के बाद, ये विकल्प मैं ही होऊंगा।"
कोई आरोपी आरोप साबित हुए बिना दोषी नहीं होता, लेकिन क़ानून का ये मूलभूत सिद्धांत उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में लागू नहीं होता। वकीलों द्वारा बहिष्कार आरोपियों के परिवार वालों के लिए जीवन-मरण के सवाल जैसा होता है। मगर करने वालों पर इसका कैसा भी असर दिखाई नहीं देता। फैजाबाद बार एसोसिएशन के सचिव सभाजीत पांडेय ने बहिष्कार का प्रस्ताव पारित करते समय कहा था, "ये प्रस्ताव वकीलों की अपनी व्यक्तिगत आवाज़ है। ये देश क प्रति उनके प्यार से प्रेरित है। भविष्य में भी ऐसा होना जारी रहेगा।" ये बहिष्कार पिछले तीन सालों से जारी है और अब जाकर शोएब ने लखनऊ, फैजाबाद और बाराबंकी बार एसोसिएशन के बहिष्कार संबंधी प्रस्ताव के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। इसकी सुनवाई 22 मई को होनी है- इस तारीख पर ही आरोपियों के परिवार वालों की उम्मीदें टिकी हुई हैं।उधर शोएब के असहाय मुवक्किलों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अब वो सज्जादुर्रहमान और मोहम्मद अख्तर की पैरवी भी कर रहे हैं। ये दोनों भी कचहरी में हुए धमाकों के आरोपी हैं। इसके अलावा वे शोएब कौशर फारुखी के वकील भी हैं जिसे संदिग्ध परिस्थितियों में प्रतापगढ़ के कुंडा से गिरफ्तार किया गया था। इनके ऊपर रामपुर में सीआरपीएफ कैंप पर हमले का आरोप है। "मेरे तीन दशकों के करियर में मेरा सामना इस तरह की परिस्थितियों से कभी नहीं हुआ। यहां तक कि आपातकाल के दौरान भी नहीं, जब मैं करीब साल भर तक भूमिगत और फिर दो महीनें तक जेल में रहा था। उस दौर में भी मुझे क़ानूनी सहायता उपलब्ध हो सकती थी," शोएब कहते हैं। उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में ऐसा लगता है मुस्लिम युवाओं के लिए कोई अनाधिकारिक अघोषित आपातकाल लागू है।
साभार : तहलका हिन्दी डॉट कॉम

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