एक उम्मीद हमें भी

मीडिया को चौथी दुनिया और इसके क्रिया-कलाप को पूर्णतः प्रोफेशनल करार देते हुए श्री नीलेश द्विवेदी ने इस दुनिया के पत्रकारों के कुछ नाजायज उम्मीदों का व्यंग्य रूपांतरण किया है। वर्तमान में मीडियाकर्मियों के लिए यह लेख वाकई में आईना दिखाने वाला है।
'एक उम्मीद' कितना अच्छा ध्येय वाक्य है। सुनकर और सोचकर बांछें खिल जाती हैं और मन में मिश्री सी घुलने लगती है कि उम्मीद अब पूरी हुई कि तब। लेकिन इंसानी उम्मीदें हैं कि पूरी ही नहीं होतीं न पहली दुनिया (विकसित देश) में न दूसरी दुनिया (विकासशील देश) में। तीसरी दुनिया (अविकसित देश) में तो इसके पूरा होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। शायद इसीलिए जाने-माने शायर कैफी आज़मी ने लिखा था, 'इन्सां की ख्वाहिशों की कोई इंतेहा नहीं, दो गज जमीं भी चाहिए दो गज कफ़न के बाद।' लेकिन कैफी आज़मी ने जब लिखा था तब चौथी दुनिया (पत्रकारिता) का स्वरूप कुछ अलग था। इस दुनिया का हर बाशिंदा किसी न किसी मिशन में लगा रहता था। सो, उस समय इस दुनिया के लोगों की उम्मीदें भी अधूरी रह जाती थीं लेकिन अब तो चौथी दुनिया का पूरा मामला ही पूरी तरह 'प्रोफेशन' पर आ टिका है। लिहाजा, यहां हर शख्स अपनी दबी-कुचली उम्मीदों (इसे कुण्ठा पढ़ें) को पूरा करने में लगा है। सो, भैया अब हमारी (मेरी) भी उम्मीद या कहिए कि उम्मीदें इन दिनों ठाठें मार रही हैं। आखिर हम (मैं) भी इसी दुनिया के बाशिंदे हैं तो फिर हम पीछे क्यों रहें भला?

उम्मीद है, हम भी कि किसी दिन किसी अखबार या चैनल में खोजी पत्रकार के तौर पर स्थापित हो जाएं और कुछ विश्वसनीय-अविश्वसनीय से स्टिंग ऑपरेशन करके दाम कमा लें। जहां दाम न मिले वहां नाम मिलना तो तय है ही। किसी मीडिया संस्थान में भारी-भरकम से राजनीतिक सम्पादक टाइप के कुछ हो जाएं और जब भी चुनाव आएं तो अगले पांच साल के लिए अपने और अपने बीवी-बच्चों के खाने-खर्चे का इन्तजाम कर लें। आजकल वैसे भी राजनीतिक दलों और ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने इस सत्य को तहे-दिल से स्वीकार कर लिया है कि चुनाव के दौरान राजनीतिक खबरों को छापने-रोकने के एवज में पैसों का आदान-प्रदान तो होना ही है।

लिहाजा, दोनों ही पक्ष म्यूचुअल अन्दार्स्तान्डिंग के तहत लेने-देने के लिए एकदम तैयार हैं। तो हम इस बहती गंगा में हाथ क्यों न धोएं? फिर जब अपनी अण्टी में पैसे पर्याप्त हो जाएं तो किसी राजनीतिक दल से सैटिंग कर राज्यसभा में दाखिला ले लें। कम से कम जिन्दगी भर की पेंशन तो बंध जाएगी। इस जगह पहुंचकर सम्मान-वम्मान तो हाथ का मैल है, आते-जाते ही रहेंगे इसलिए हमें इनकी ज्यादा फिक्र भी नहीं और फिर इनमें रकम भी कुछ ज्यादा नहीं मिलती, लाख-दो लाख बस! कहीं कहीं तो 25-50 हजार में ही टरका देते हैं इसलिए इसकी ज्यादा चिन्ता करना, हमारे हिसाब से, मुनासिब नहीं।
हमें तो उम्मीद है कि किसी चैनल का सर्वेसर्वा बन जाएं, फिर चाहे वह कोई क्षेत्रीय या स्थानीय चैनल ही क्यों न हो। अब कोई पूछेगा कि इससे क्या फायदा? तो भैया इसके तो फायदे ही फायदे हैं। चैनल का कैमरा और डण्डा (माइक) तो ऐसी चुम्बक है जिसे देखते ही मुफ्त की दारू और लडक़ी का इन्तजाम यूं खिचा आता है मानो गुड़ से मक्खी! तो छककर भोगेंगे, ससुरी दोनों को। पैसे के इन्तजाम की तो चिन्ता ही मत करिए भैया! अपने चैनल में काम करने वाले लडक़े-लड़कियों से कह देंगे कि जाओ-कमाओ-खाओ और हमें भी खिलाओ। ज्यादा हुआ तो अपने चैनल की कुछ सन्दर सी लड़कियों को छोटे-छोटे कपडों में (कभी मौका लगा तो बिना कपड़ों के भी) मॉडलिंग रैम्प पर 'बिल्ली चाल' चलवा देंगे। जुगाड़ लग गई तो 'नैकेड न्यूज' टाइप का कोई कार्यक्रम शुरू करवा देंगे। पैसे अपने-आप बरस पड़ेंगे और देखने वालों को नयनसुख मिलेगा सो अलग।
उम्मीद है कि चैनल के न बन पाएं तो किसी बड़े अखबार के ही सम्पादक-वम्पादक टाइप का कुछ बन जाएं। अपने संस्थान के कर्मचारियों- चाहे वे महिला हों या पुरुष- पर जमकर अपनी अकड़ दिखाएं और मनमानी करें। जब चाहे उन्हें हाथ पकडक़र धक्के-देकर बाहर निकाल दें, बिल्कुल किसी सिरफिरे अफसर की तरह। जो हमारे खिलाफ आवाज उठाए उसकी तो अपने रसूख का फायदा उठाकर मट्टी-पलीत ही कर डालें ताकि दोबारा कभी और कोई भी हमारे खिलाफ सिर या आवाज न उठा सके। पैसे का बन्दोबस्त तो हम यहां भी कर लेंगे गुरू! अब पूछो कैसे? बहुत आसान है। जो हमारी मुखालफत करेंगे उनके साथ सुहानुभूति जताते हुए कुछ दीगर संस्थानों के लोग भी उनके साथ हो लेंगे और हमारे विरुद्ध टीका-टिप्पणी करेंगे। बस यहीं धर लेंगे इन लोगों को, लगा देंगे मानहानि का मुकदमा और मांग लेंगे 10-15 लाख रुपए। अब ये तो हम ही जानते हैं न कि हमारा मान-वान तो कुछ रहा नहीं फिर हानि कैसी, दूसरा थोड़े ही न जानता है?

हमें भैया, न्यायाधीश की भूमिका निभाने की भी उम्मीद है। लेकिन यह भी तभी हो सकता है, जब हम किसी ऊंचे पद पर पहुंच जाएं। फिर हम अपने हिसाब से खबरों को खबर सरीखा न दिखाकर फैसलों सरीखा दिखाया करेंगे। जिसे मर्जी आए उसे जहरीला कह देंगे और जिसको इच्छा हुई उसे साम्प्रदायिक करार देंगे। जिसका चाहेंगे उसका अच्छा ही अच्छा पक्ष दिखाएंगे और जिसका चाहेंगे सिर्फ बुरा ही बुरा। सबको बढ़-चढक़र बताएंगे कि जो हमने दिखाया-सुनाया या लिखा उसे पढऩे-देखने वाला प्रभावित हो रहा है और इससे एक ओपिनियन तैयार हो रही है। हालांकि ऐसा होता-वोता कुछ नहीं है, यह भी हमारे जैसे लोगों के अलावा ज्यादा कोई जाानता नहीं, तो चिन्ता कैसी?

पर पूरी सच्चाई और ईमान से कहूं तो हमारे अन्दर एक ज़मीर जैसी कोई चीज़ है चीख-चीखकर भगवान से मना रही है कि हमारी ये उम्मीदें कभी पूरी न हों। और हम भी ठण्डे दिमाग से सोचते हुए अपने ज़मीर की आवाज़ के साथ आवाज़ मिलाकर खुदा से कह रहे हैं....आमीन, आमीन, आमीन! शुम्मामीन

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लेखक का पत्रकारिता में एक लंबा अनुभव है। उन्होंने लोकमत समाचार, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों में अपनी सेवा दी है और फिलहाल, राजस्थान पत्रिका, जयपुर में स्पेशल सेल में सीनियर सब एडिटर हैं।

सत्ता की राजनीति में सब जायज है!

उदय केसरी
बीमारी से संघर्ष कर लौटे मितभाषी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने लोकसभा चुनाव की चुनौती है। यह चुनौती केंद्र की राजनीति करने वाले राजनीतिकों के लिए सबसे बड़ी होती है। इसमें जीत के लिए वे साम-दाम-दंड-भेद यानी तमाम हथकंडे अपनाते हैं। चाहे उन्हें इसके लिए अपने मौलिक स्वभाव से ही समझौता क्यों न करना पड़े। अपने परंपरागत रिश्तों को ही क्यों न भूलना पडे़। नैतिकता या स्वाभिमान की तिलांजलि क्यों न देनी पड़े। कहते हैं-सत्ता की राजनीति में सब जायज है। तो फिर क्यों न मितभाषी मनमोहन सिंह भी अपने प्रतिद्वंद्वी को जवाब उसी के जुबान में दें।...सो जब प्रमुख विपक्षी पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी ने पीएम की कुर्सी के लिए मनमोहन सिंह को अयोग्य करार दिया, तो मनमोहन ने भी इसके जवाब में कह दिया, आडवाणी की उपलब्धि बाबरी मस्जिद विध्वंस और कंधार विमान अपहरण मामले में ससम्मान आतंकियों को लौटाया जाना है।

तभी, मितभाषी मनमोहन सिंह की यह प्रतिक्रिया मीडिया वालों को उनके स्वभाव के उलट लगी। लेकिन आखिर कब तक कोई अपने स्वभाव के बंधन में पड़कर प्रतिद्वंद्वी की सुनता रहेगा। सत्ता की राजनीति जब भाजपा निष्कासित व भारतीय जनशक्ति पार्टी प्रमुख उमा भारती को उस आडवाणी का भक्त बना सकती है, जिसके लिए उमा ने महज चार महीने पहले ही मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान एक साक्षात्कार में कसम खाई थी कि वह किसी भी कीमत पर आडवाणी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देगी, तो फिर यहां कुछ भी होना असंभव नहीं है। ऐसी ही एक खबर की एक लाइन यहां फिट बैठती है कि-बात से पलटने का यदि कोई नोबल पुरस्कार होता, तो यह पुरस्कार हर बार भारतीय नेताओं को ही मिलता।

सत्ता की राजनीति यदि ऐसी है, तो धर्मनिरपेक्ष परिवार और पशु प्रेम का अलख जगाने वाली मां के एक नौजवान बेटे वरूण गांधी के मुख से जहरीला भाषण दिया जाना भी आष्चर्य की बात नहीं है। यह तो आज के राजनीतिक धंधे की कथित मांग है। ऐसी मांगों के आगे सांप्रदायिक सद्भाव, भाई-चारा, सामाजिकता जैसे मूल्यों की क्या विसात-बकौल वरूण- ‘कोई एक गाल पर चाटा मारे, तो दूसरा गाल भी आगे बड़ा देना चाहिए’ (महात्मा गांधी का आदर्श) इससे बकवास बात मैंने आज तक नहीं सुनी। यदि कोई आपको चाटा मारे, तो उसका हाथ काट देना चाहिए, ताकि वह फिर कभी किसी के साथ ऐसा नहीं कर सके।’ यह आदर्श राजनीतिक बाजार की मांगों से कुप्रेरित वरूण गांधी का है। जिसका बखान हाल में उन्होंने पीलीभीत में किया। अब चाहे इसकी वजह से उनकी उम्मीदवारी खतरे में पड़ती दिख रही हो, पर ऐसी कुप्रेरणा जहां से मिली, वे उनके कांधे पर जय श्री राम की बंदूक धरकर तो चला ही रहे हैं। राजनीतिक भगवा के एक बड़े महात्मा बाल ठाकरे तो संपादकीय लिखकर वरूण के इस कुकृत्य को कुशलता करार दे रहे हैं।

ऐसे राजनीतिक वातावरण में चतुर चाणक्य लालू प्रसाद यादव के फरमान की कौन परवाह करे, चाहे वह अपने जीजा ही क्यों न हो। सो उनके साले साहब साधु यादव ने चुनाव की टिकट के लिए बगावत कर दी, जिसे राजनीति का ककहरा जीजाजी ने सिखाया। और अव्वल तो यह कि रिश्ते और पार्टी से बगावत करने वाले साधु यादव को तत्काल कांग्रेस ने टिकट दे दी। मानों, ऐसे ही लोग वर्तमान राजनीति में काम के होते हैं।

बहरहाल, ऐसे राजनीतिक हालात में भी मुंबई में कांग्रेस की उम्मीदवार प्रिया दत्त और लखनऊ से सपा उम्मीदवार संजय दत्त के बीच भाई-बहन का रिश्ता सत्ता की राजनीति की बलि नहीं चढ़ा है। प्रिया दत्त ने पिछले दिन एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जरूरी हुआ तो वह अपने भाई के लिए चुवाव प्रचार भी करेगी और वह कहेंगी, तो भाई संजय भी उनके लिए प्रचार करेंगे। भाई-बहन का रिश्ता राजनीति से बहुत बड़ा है।...यह अच्छी बात है। दुआ करें कि देश के बाकी राजनीतिकों को भी अपने अंदर परंपरागत रिष्ता, सम्मान, स्वाभिमान, नैतिकता, सांप्रदायिक सद्भाव व राष्ट्रीयता को सत्ता की राजनीति से बड़ा बनाने की सीख मिले।

...जाने कब कौन पिचकारी, बंदूकों सी तन जाए

उदय केसरी
सीधीबात के सुधी पाठकों व ब्‍लॉगर बंधुओं को होली की हार्दिक शुभकामनाएं!!!

होली पर कुछ खास कहने को नहीं है। देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व की तिथियों की घोषणा हो चुकी है, तो देश के बाहर पाकिस्तान के नाबालिग लोकतंत्र की हत्या होने वाली है। तालिबान का भय और बेकाबू लश्‍कर आतंकियों का रोना रोककर पाकिस्तान अमेरिका, हिन्दुस्तान समेत पूरी दुनिया को गुमराह करने में लगा है, ताकि मुंबई पर हमले के दोषियों पर कार्रवाई के लिए उस पर दबाव नहीं बनाया जाए। इस देश के चालाक शासकों को पाकिस्तान के अमन-चैन से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बस, उनकी भय की सत्ता कायम रहे, यही चाहते हैं वे। श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला भी महज एक ड्रामा है। उस आतंकवाद से खुद की बेबसी दुनिया को दिखाने के लिए, जिसे खुद पाकिस्तान ने ही पाला-पोसा है।

खैर, छोड़िए आतंकवाद और पाकिस्तान के दोहरे चरित्र की कहानी अभी चलती रहेगी। इस सवाल का जवाब फिलहाल उर्दू की एक चलताऊ शेर ही हो सकता है- इब्तदा-ए-इश्क़ है रोता है क्‍या, आगे आगे देखिए होता है क्‍या।

इस बरस की होली हिन्दुस्तान के सैकड़ों घरों में फीकी रहेगी। वजह, आप सबों को मालूम है-आतंकवाद, जिसने देश के कई शहरों में बम विस्फोटों के रूप में कहर बरपाये हैं। इसके शिकार सैकड़ों भारतीयों के परिवारों में तो कम से कम होली का रंग फीका रहेगा।....हमें भी उनके प्रति कम से कम सहानुभूति बनाए रखना चाहिए और कुछ करने की इच्छा हो, तो आगामी लोकसभा चुनाव में ऐसी सरकार बनाने की मुहिम में शामिल होना चाहिए, जो देश व देशवासियों की सुरक्षा करने में दमदार भूमिका अदा करने के लायक हो। मैं तो पहले से ही युवा नेतृत्व की आवाज उठाता रहा हूं। कम से कम देश के युवाओं को तो इस पर विचार करना ही चाहिए कि आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा की समस्या से लड़ने के लिए युवा जोश व सोच की देश को जरूरत है। यह तभी होगा जब देश के युवा जागेंगे।

इस होली पर मेरे दोस्त पत्थर नीलगढ़ी की यह पंक्तियां यहां मौजूं हैं-

आतंक के इस माहौल में,
इस बार की होली फीकी है।
अबीर की छुअन कटीली है,
रंगों की गंध भी तीखी है।

जंगल में टेशू की सूरत,
खून में भींगी लगती है।
जलती होली की हर लकड़ी,
इंसानों सी लगती है।

इन हालातों में फिर होली,
कैसे रंग जमायेगी।
जाने कब कौन पिचकारी,
बंदूकों सी तन जायेगी।
-पत्थर नीलगढ़ी

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