सत्ता की राजनीति में सब जायज है!

उदय केसरी
बीमारी से संघर्ष कर लौटे मितभाषी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने लोकसभा चुनाव की चुनौती है। यह चुनौती केंद्र की राजनीति करने वाले राजनीतिकों के लिए सबसे बड़ी होती है। इसमें जीत के लिए वे साम-दाम-दंड-भेद यानी तमाम हथकंडे अपनाते हैं। चाहे उन्हें इसके लिए अपने मौलिक स्वभाव से ही समझौता क्यों न करना पड़े। अपने परंपरागत रिश्तों को ही क्यों न भूलना पडे़। नैतिकता या स्वाभिमान की तिलांजलि क्यों न देनी पड़े। कहते हैं-सत्ता की राजनीति में सब जायज है। तो फिर क्यों न मितभाषी मनमोहन सिंह भी अपने प्रतिद्वंद्वी को जवाब उसी के जुबान में दें।...सो जब प्रमुख विपक्षी पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी ने पीएम की कुर्सी के लिए मनमोहन सिंह को अयोग्य करार दिया, तो मनमोहन ने भी इसके जवाब में कह दिया, आडवाणी की उपलब्धि बाबरी मस्जिद विध्वंस और कंधार विमान अपहरण मामले में ससम्मान आतंकियों को लौटाया जाना है।

तभी, मितभाषी मनमोहन सिंह की यह प्रतिक्रिया मीडिया वालों को उनके स्वभाव के उलट लगी। लेकिन आखिर कब तक कोई अपने स्वभाव के बंधन में पड़कर प्रतिद्वंद्वी की सुनता रहेगा। सत्ता की राजनीति जब भाजपा निष्कासित व भारतीय जनशक्ति पार्टी प्रमुख उमा भारती को उस आडवाणी का भक्त बना सकती है, जिसके लिए उमा ने महज चार महीने पहले ही मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान एक साक्षात्कार में कसम खाई थी कि वह किसी भी कीमत पर आडवाणी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देगी, तो फिर यहां कुछ भी होना असंभव नहीं है। ऐसी ही एक खबर की एक लाइन यहां फिट बैठती है कि-बात से पलटने का यदि कोई नोबल पुरस्कार होता, तो यह पुरस्कार हर बार भारतीय नेताओं को ही मिलता।

सत्ता की राजनीति यदि ऐसी है, तो धर्मनिरपेक्ष परिवार और पशु प्रेम का अलख जगाने वाली मां के एक नौजवान बेटे वरूण गांधी के मुख से जहरीला भाषण दिया जाना भी आष्चर्य की बात नहीं है। यह तो आज के राजनीतिक धंधे की कथित मांग है। ऐसी मांगों के आगे सांप्रदायिक सद्भाव, भाई-चारा, सामाजिकता जैसे मूल्यों की क्या विसात-बकौल वरूण- ‘कोई एक गाल पर चाटा मारे, तो दूसरा गाल भी आगे बड़ा देना चाहिए’ (महात्मा गांधी का आदर्श) इससे बकवास बात मैंने आज तक नहीं सुनी। यदि कोई आपको चाटा मारे, तो उसका हाथ काट देना चाहिए, ताकि वह फिर कभी किसी के साथ ऐसा नहीं कर सके।’ यह आदर्श राजनीतिक बाजार की मांगों से कुप्रेरित वरूण गांधी का है। जिसका बखान हाल में उन्होंने पीलीभीत में किया। अब चाहे इसकी वजह से उनकी उम्मीदवारी खतरे में पड़ती दिख रही हो, पर ऐसी कुप्रेरणा जहां से मिली, वे उनके कांधे पर जय श्री राम की बंदूक धरकर तो चला ही रहे हैं। राजनीतिक भगवा के एक बड़े महात्मा बाल ठाकरे तो संपादकीय लिखकर वरूण के इस कुकृत्य को कुशलता करार दे रहे हैं।

ऐसे राजनीतिक वातावरण में चतुर चाणक्य लालू प्रसाद यादव के फरमान की कौन परवाह करे, चाहे वह अपने जीजा ही क्यों न हो। सो उनके साले साहब साधु यादव ने चुनाव की टिकट के लिए बगावत कर दी, जिसे राजनीति का ककहरा जीजाजी ने सिखाया। और अव्वल तो यह कि रिश्ते और पार्टी से बगावत करने वाले साधु यादव को तत्काल कांग्रेस ने टिकट दे दी। मानों, ऐसे ही लोग वर्तमान राजनीति में काम के होते हैं।

बहरहाल, ऐसे राजनीतिक हालात में भी मुंबई में कांग्रेस की उम्मीदवार प्रिया दत्त और लखनऊ से सपा उम्मीदवार संजय दत्त के बीच भाई-बहन का रिश्ता सत्ता की राजनीति की बलि नहीं चढ़ा है। प्रिया दत्त ने पिछले दिन एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जरूरी हुआ तो वह अपने भाई के लिए चुवाव प्रचार भी करेगी और वह कहेंगी, तो भाई संजय भी उनके लिए प्रचार करेंगे। भाई-बहन का रिश्ता राजनीति से बहुत बड़ा है।...यह अच्छी बात है। दुआ करें कि देश के बाकी राजनीतिकों को भी अपने अंदर परंपरागत रिष्ता, सम्मान, स्वाभिमान, नैतिकता, सांप्रदायिक सद्भाव व राष्ट्रीयता को सत्ता की राजनीति से बड़ा बनाने की सीख मिले।

9 comments:

  1. aapka aalekh padha achha laga.

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  2. आपके लेख से तस्वीर का एक ही पक्ष उजागर हुआ | दूसरा पक्ष उससे से अधिक खतरनाक है | कांग्रेस की छद्म धर्म निरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टीकरण, अन्य दलों द्वारा जातीय भावना उभारना भारतीय राजनीति के लिए कम घातक नहीं है | भाजपा को हिन्दू भावनाएं उभारने का जो थोड़ा बहुत लाभ मिल जाता है, उसके पीछे मुख्य कारण
    माकपा सहित अन्य दलों की छद्म धर्म निरपेक्षता है.

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  3. मनमोहनसिंह जी के बदलते हुए मौलिक स्वभाव को मैंने भी महसूस किया है बहुत बढिया लेख----

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  4. बिलकुल ठीक कहा सर आपने लेख में भारतीय राजनीती की असली तस्वीर नजर आती है .

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  5. सुरेन्द्रApril 1, 2009 at 11:46:00 PM GMT+7

    bhut sahee likha ahi, kaamnaaon ka koi ant nahee hai, ek poori hoti hai to kai jaag jaati hain

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  6. very nice
    uday ji

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  7. बहुत सही लिखा है आपने ! पर अफसोश की बात यहाँ यह है की वरुण गाँधी के भाषण का विरोध करने वाले जितने बुद्धिजीवी है उतने ही उससे सहमत भी है ! फिर चाहे वे अपने राजनैतिक फायदे के लिए हो या तथाकहित "धर्म की रक्षा कौन करेगा " के लिए हो

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