कुआं व खाई के बीच फंसी अभिव्यक्ति

उदय केसरी
कई दिनों से मन में एक द्वंद्व है कि इस आजाद लोकतांत्रिक देश में जब सत्ता और संपत्ति, तमाम आचार-विचार-संवाद और जनविरोध-प्रदर्शन-भूख हड़ताल या अनशन से व्यवहारिक तौर पर बड़ी हो चुकी है, तब फिर अभिव्यक्ति की आजादी क्या कभी सत्ता एवं संपत्ति वानों की आत्मा जगा पाएगी?....नहीं ना!....तो फिर क्या यही अभिव्यक्ति जनता को उद्वेलित नहीं करेगी?...हां!...तो क्या यह सत्ता और संपत्ति वानों को कभी मंजूर होगा? नही ंना!....ऐसे में क्या सच को सच्चाई के साथ अभिव्यक्त करने वालों के समक्ष इससे-एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई-वाली स्थिति पैदा नहीं होती? दरअसल,

‘चोरों’ की मदद से ‘डकैतों’ से बाबा की जंग

उदय केसरी
काफी दिनों की चुप्पी के बाद भाजपा ने टीम अन्ना के राजनीतिक पार्टी बनाने के फैसले पर अब अपनी बौखलाहट जाहिर की है। इससे यह साफ हो गया है कि भाजपा को भी भ्रष्टाचार के मुद्दे से नहीं, बल्कि महज सत्ता से मतलब है।

ये क्या हो रहा है देश में?

उदय केसरी 
ये क्या हो रहा है देश  में? नैतिकता और कर्तव्यों का गला घोंट का भ्रष्टाचार और लूट; सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा रूपी खंजर से जन आंदोलनों की हत्याएं; महंगाई की मार से कराहती जनता को मोबाइल देने की योजना-क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं? वह भी दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। शायद नहीं, बल्कि यह परोक्ष अराजकता है।

भटक वे नहीं, मीडिया गया है

उदय केसरी
मेरे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकार साथियों का टीम अन्ना के समर्थन को लेकर प्रायः मतभेद होता है। वे टीम अन्ना की हर छोटी-बड़ी गलतियों और उनपे लगने वाले आरोपों व उठने वाले सवालों को आधार बनाकर टीम अन्ना के प्रति मेरे सकारात्मक विचारों को खंडित करने की कोशिश करते हैं। मैं हर बार उनसे कहता हूं कि व्यक्ति या संगठन से कहीं बड़ा उसके विचार और मकसद होते हैं।

नीतीश की धर्मनिरपेक्षता व ममता की नाराजगी के मायने

उदय केसरी 
देश की राजनीति में देश कहीं पीछे छूटता जा रहा है। यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन जनता को बार-बार इसे याद कराना भी जरूरी है, क्योंकि जनता से जुड़े मुद्दे अब सियासत के गलियारों में सत्ता और अहम के मुद्दों के आगे दम तोड़ने लगे हैं। देश के नाम पर और जनता के वास्ते अनेक राजनीतिक दल मौजूद हैं, लेकिन गौर करें तो लगभग पार्टियां पाइवेट लिमिटेड कंपनी जैसी या ऐसी कंपनियों के लिए हो चुकी हैं।

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