किस तरहां से दूं,नववर्ष की शुभकामनाएं

उम्मीदें तो हम कर ही सकते हैं कि आने वाला साल सबके लिए सुकूनभरा और प्रगति के पहिये पर सवार हो, पर बीते साल ने एक के बाद एक जो जख़्म दिये हैं, उसे अगले एक साल में भूलना मुश्किल होगा...पर क्या यह भी हम पूरे विश्‍वास से कह सकते हैं। हम भारत के लोगों की सहनशीलता जख्म सहते-सहते काफी मजबूत हो चुकी है। इसलिए यह कहना भी अप्रासंगिक हो सकता है कि नये वर्ष का जश्‍न न मनाया जाए।...

खैर, सीधीबात के लिए सक्रिय एडिटोरियल प्लस डेस्क के सभी पत्रकार साथियों के तरफ से मैं पत्रकार मीतेन्द्र नागेश ‘ पत्थर नीलगढ़ी’ की इस कविता के साथ आप तमाम ब्लॉगर बंधुओं, बुद्धिजीवियों व संवेदनशील पाठकों को अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं:

किस तरहां से दूं
नववर्ष की शुभकामनाएं।

जब मैं दे रहा होऊंगा,
नववर्ष की शुभकामनाएं
तो,

मेरी आंखों में तुम्हें चमक नहीं,
दिखेंगे खून के आंसू।

मेरे चहरे पर उत्साह नहीं,
दिखेगा तैरता हुआ खौफ।

मेरे होंठ संकोच से
कांप रहे होंगे।
मेरी जुबां लड़खड़ा रही होगी।

गर गले मिलने का साहस भी जुटा पाया
तो,

शायद खुद को तुममें
छुपाने का प्रयास ही होगा
क्योंकि अभी-अभी

देखा है मैंने निदोर्षों का लहू
जमीं पर गिरता हुआ।

मैंने सुनी हैं चीखें,
मौत से जूझती हुई।

मैंने देखा हैं जिंदे जिस्मों को
गोश्‍त बनते हुए।

फिर भी एक परंपरा को निभाते हुए
बस इतना कहूंगा,

गर वाकई कल से
एक नया वक्त शुरू हो
तो, खुदा बस इतना कर दे

इस देश के युवाओं में जोश भर दे,
इस देश के नेताओं में होश भर दे।

जनता को जागरूक और,
देश तोड़ने वालों के मन में
एकता भर दे।
- पत्थर नीलगढ़ी

उस्तादों के उस्ताद मिर्ज़ा ग़ालिब

हम एकेश्‍वरवादी हैं। हमारा धर्म रूढ़ियों का त्याग है। सांप्रदायिकता का लुप्त हो जाना ही सत्य धर्म का प्रकट होना है।
उदय केसरी
आज से दो सौ ग्यारह साल पहले आगरा की धरती पर जन्म लिया था उस शख्स ने। उस जैसा आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ और आगे शायद ही हो। वह बचपन से ही कोई आमशख्स नहीं था। उसे तो जैसे खुदा ने बड़ी तबीयत से गढ़ा, इस जहां के लिए। उसके हृदय में दुनिया के तमाम कवि हृदयों की गहराइयों को समेटकर एक साथ डाल दिया। उसके मस्तिष्क में जीवनदर्शन की अंतिम ज्योति भी प्रज्जवलित कर दी। पर शायद खुदा उस शख्स को गढ़ने के दौरान कवि हृदय की असीम गहराई और मानव जीवन दर्शन के अनंत ज्ञानलोक में खो गये, तभी तो वे उस नायाब शख्स की तकदीर पर विशेष ध्यान नहीं दे सके। उस शख्स के जीवनकाल की भौतिक समृद्धि और पारिवारिक सुख से नजरें चूक गईं। फिर भी, जो दिया दिल खोलकर दिया, जैसा आज तक किसी को नहीं मिला। तभी, उस शख्स के अक्स को मिटा, छिपा पाने में वक्त की परतें सौकड़ों साल बाद भी नाकाम हैं। उस शख्स की जुबां से निकले शेर के एक-एक शब्द की गहराइयों में उतरना एक नए अनुभव से गुजरने जैसा है। जाहिर है हम बात कर रहे हैं, उसी अज़ीम शख्स की, जिसका पूरा नाम मिर्ज़ा असदउल्लाह खां और जिसे सारा ज़माना मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से जानता है।

चौड़ा-चकला हाड़, लंबा कद, सुडौल इकहरा जिस्म, भरे-भरे हाथ-पैर, सुर्ख चेहरा, खड़े नाक-नक्‍श, चौड़ी पेशानी, घनी लंबी पलकें, बड़ी-बड़ी बादामी आंखें और सुर्ख गोरे रंग वाले मिर्ज़ा ग़ालिब का व्यक्तित्व बेहद आकर्षक था। ऐबक तुर्क वंश के इस शख्स का मिजाज ईरानी, धार्मिक विश्‍वास अरबी, शिक्षा-दीक्षा फारसी, भाषा उर्दू और संस्कार हिन्दुस्तानी था। दस-ग्यारह साल की उम्र में मकतब (पाठशाला) में पढ़ाई के दौरान ही ग़ालिब की जुबां से एक से बढ़कर एक शेर निकलने लगे थे। शेर सुनकर लोग अक्सर उसकी अवस्था और शेर के ऊंचे दर्जे से भौचक्के रह जाते थे। इस शख्स ने पच्चीस पार करने से पूर्व ही उच्चकोटि के क़सीदे और ग़ज़लें कह डाली थीं। तीस-बत्तीस के होते-होते ग़ालिब ने अपनी शेरो-शायरी की जादूगरी से कलकत्ते से दिल्ली तक हलचल-सी मचा दी थी। उस ज़माने में दिल्ली में खासा शायराना माहौल हुआ करता था। दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह जफ़र खुद शायर थे। आए दिन शेरो-शायरी की महफिलें जमती थीं। इन महफिलों में ग़ालिब ने अपने कलाम पढ़कर न जाने कितने ही मुशायरे लूट लिये। इस शख्स के शेर तो खासमखास होते ही थे, अंदाज-ए-बयां भी अलहदा था। जिस पर सुनने वाले लुट-लुट जाते थे। उस्तादों के उस्ताद ग़ालिब कभी किसी उस्ताद शायर के शार्गिद नहीं बने, उन्हें तो जैसे कवित्वमय इस सुंदर दुनिया की रचना करने वाले सबसे बड़े उस्ताद ने ऊपर से ही सब कुछ सिखाकर धरती पर भेजा था। इतना कि वे शायरी जगत के समकालीन बड़े-बड़े उस्तादों के शेरों की नुक्ताचीनी भी कर दिया करते थे।

जैसा कि हर उस शख्स का मिजाज कुछ खास होता है, जो आम से हटकर और आसाधारण प्रतिभा का धनी होता है, ग़ालिब का मिजाज भी बेशक अलहदा था। दृढ़ स्वाभिमानी, जो निश्‍चय कर लिया, वह ब्रहमलकीर, जो कह दिया, उससे डिगना नामुमकिन। लेकिन उनकी भौतिक तकदीर सजाने में जैसे खुदा से चूक हो गई हो, उनका जीवन इस धरती पर भौतिक सुख के लिए सदा तरसता रहा। बावजूद इसके कभी उन्‍होंने अपने मिजाज या कहें दृढ़ स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। उस अजीम शख्स के जीवन में धन की तंगी तो रही ही, पारिवारिक सुख भी बहुत कम ही मिला। आगरा में 28 दिसंबर 1797 में उनके जन्म लेने के कुछेक साल बाद ही पिता और चाचाजी चल बसे। बचपन में ही वे अनाथ सरीखे हो गए। लालन-पालन ननिहाल (आगरा) में हुआ। जब उन्होंने होश संभाला आर्थिक तंगहाली को अपने साथ पाया और यह ताजिंदगी उनके साथ रही। लेकिन इससे उस शख्स ने कभी हार नहीं मानी। उनकी जीवनशैली कोई आम नहीं, रईसों की थी। कर्ज में डूबकर भी, अपने रईसी शौक से कभी उन्होंने तौबा नहीं की। करेला, इमली के फूल, चने की दाल, अंगूर, आम, कबाब, शराब, मधुरराग और सुंदर मुखड़े सदा उन्हें आकर्षित करते रहे। तभी तो ग़ालिब ने अपने एक शेर में कहा-

कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हां
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन

एक बार कर्ज के पहाड़ ने ग़ालिब को अपने घर में बंद रहने तक को मजबूर कर दिया, जब एक दीवानी मुकदमे में उनके खिलाफ पांच हजार रुपये की डिग्री हो गई। क्‍योंकि उस जमाने में कर्जदार व्यक्ति यदि प्रतिष्ठित होता, तो उसे घर के अंदर से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था। ऐसी दुर्दशा में भी मिर्जा साहब अपने शतरंज और चौसर खेलने के शौक को पूरा करते थे। दिल्ली के चांदनी चौक के कुछ लौहरी मित्र के बीच जुआं चला करता था, जो ग़ालिब के घर पर ही जुआं खेलने पहुंच जाते थे। बादशाह घराने के कई लोग, धनवान जौहरी से लेकर शराब विक्रेताओं तक और दिल्ली के पंडितों, विद्वानों से लेकर अंग्रेज अधिकारियों तक अनेक लोग उस शख्स की बेमिसाल शायरी के कद्रदान थे और जो इनके खास मित्र भी हुआ करते थे। बीस-पच्चीस साल की उम्र होने से पहले जवानी में ग़ालिब नृत्य, संगीत, शराब, सुंदरता व जुएं की रंगीन दुनिया से खासा मोहित रहे। मगर इसके बाद इन सब से बहुत हद तक उनका मोहभंग हो गया। यह वक्त जैसे मिर्जा ग़ालिब के जीवन का अहम मोड़ था। वह जीवन दर्शन की दिशा में चल पड़े। उनकी शायरी में सूफियों जैसे स्वतंत्र व धर्मनिरपेक्ष विचार व्यक्त होने लगे। इस दौर में उन्होंने एक शेर लिखा-

हम मुवाहिद हैं, हमारा केश है तर्के-रसुम
मिल्लतें जब मिट गई, अजज़ाए-ईमां हो गई।

मतलब यह कि, हम एकेश्‍वरवादी हैं। हमारा धर्म रूढ़ियों का त्याग है। सांप्रदायिकता का लुप्त हो जाना ही सत्य धर्म का प्रकट होना है।

ग़ालिब से पहले उर्दू शायरी में गुलो-बुलबुल, हुस्नो-इश्‍क आदि के रंग कुछ ज्यादा ही हुआ करते थे। यह ग़ालिब को पसंद न था। इसे वे ग़जल की तंग गली कहते थे, जिससे वे अपने शेरों के साथ गुजर नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने ऐसी शायरी करने वाले उस्तादों को अपने शेरों में खूब लताड़ा। इस कारण इन उस्तादों द्वारा उनका मजाक उड़ाया जाता था, जिसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की। दिलचस्‍प तो यह कि ग़ालिब के शेरों की आलोचना उनसे खिसियाये या घबराये उस्तादों ने जितनी नहीं की, उतनी उन्होंने स्वयं की। यह अजीब ही था कि ग़ालिब अपनी शायरी के कठोर आलोचक भी थे। तभी तो उन्होंने, जब दीवान-ए-ग़ालिब संकलन तैयार करना शुरु किया, तो बचपन से लेकर जिंदगी के अंतिम दौर तक लिखे असंख्य शेरों में से दो हज़ार शेरों को बड़ी बेदर्दी से निरस्त कर दिया। इस कारण ग़ालिब का यह महान संकलन छोटा तो है, लेकिन इसमें जो शेर हैं, वह उर्दू शायरी के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों से सिंचित ही नहीं, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक आनंद की असीम गहराइयों वाले हैं, जिसमें डूबना आज भी उतना आनंदप्रद है, जितना इसके रचयिता के जमाने में।

‘कश्‍मीरियों पर जुल्‍म का परिणाम मुंबई पर हमला’

उदय केसरी
उसे भारतीय पुलिस व फौज पर विश्‍वास नहीं. उसे खुद के भारतीय होने पर शर्म आती है. वह इंडियन मुजाहिदीन को भारतीय मीडिया व पुलिस का मनगढंत संगठन मानती है. बाटला हाउस एनकांउटर को वह फर्जी समझती है और इसमें शहीद हुए वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी एमसी शर्मा की मौत को साजिश मानती है. यही नहीं, वह मुंबई पर आतंकी हमले का जिम्‍मेदार खुद भारत को मानती है. वह मानती है कि मुंबई पर हमला कश्‍मीरियों पर भारतीय जुल्‍म व शोषण का परिणाम है. वह मुंबई आतंकी हमले को गुजरात दंगा, बाबरी ढांचा विध्‍वंस से भी जोड़कर देखती है.

जाहिर है कि यह दुषित और देशद्रोही राय रखने वाली महिला अरूंधती राय ही है. जिसका जन्‍म तो भारत में हुआ, पर विचार से वह भारतीय बिल्‍कुल नहीं है. वैसे सीधीबात पर मैंने एक पूर्व आलेख क्‍या आप अरूंधती राय को जानते हैं में इस महिला के भारत के प्रति असल चरित्र का उल्‍लेख किया था. लेकिन इस तथाकथित बौद्धिक महिला ने एक बार फिर भारत के खिलाफ विश्‍व समुदाय के बीच अपनी उलटी राय दी है, जिसमें उसने मुंबई हमले जैसे हृदयविदारक आतंकी वारदात के लिए खुद भारत को ही जिम्‍मेदार ठहराया है. यह बेहद निंदापूर्ण और विश्‍व में भारत की छवि को बिगाड़ने जैसी है. यह महिला एनआईआई है और न्‍यूयार्क में पिछले दिनों मुंबई पर आतंकी हमले को लेकर हुई एशियाई सोसाइटी की परिचर्चा में उसने इस वारदात को गुजरात दंगा, विवादित बाबरी ढांचा विध्‍वंस व कश्‍मीर विवाद का नतीजा करार दिया. हालांकि अरूंध‍ती के इस विचार पर परिचर्चा में शामिल प्रख्‍यात लेखक मीरा कामदार, सुकेतु मेहता समेत सलमान रश्‍दी ने कड़ी आलोचना की, लेकिन अरूंध‍ती के नापाक विचारों का भारत में भी व्‍यापक विरोध होना चाहिए, ताकि इस महिला को राष्‍ट्रीयता के प्रति नैतिकता का सबक सिखाया जा सके.

इससे पहले इस महिला ने सीएनएन-आईबीएन चैनल को दिये एक साक्षात्‍कार में बाटला हाउस एनकांउटर में शहीद हुए वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी एमसी शर्मा की शहादत पर भी सवाल खड़ा किया. उसने कहा कि यह एनकांउटर फर्जी था और इसमें एक साजिश के तहत श्री शर्मा को मारा गया. उसने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट के जज के नेतृत्‍व में इसकी निष्‍पक्ष जांच होनी चाहिए, क्‍योंकि उसे भारतीय पुलिस व फौज के चरित्र पर भरोसा नहीं है. वह यह कहती है कि इंडियन मुजाहीदीन नामक आतंकी संगठन भी पुलिस व मीडिया की मिली भगत से गढ़ा गया एक संगठन हो सकता है और इसके हार्ड कोर आतंकी के नाम पर मारे गए लोग बेगुनाह लोग हो सकते हैं.

इस प्रख्‍यात महिला ने एक साक्षात्‍कार में यह पूछे जाने पर कि मुंबई पर आतंकी हमले के लिए क्‍या पाकिस्‍तान जिम्‍मेदार है, कहा कि वह अभी ऐसा नहीं मानती. उलटे उसने इस हमले पर यह सीख दे डाली कि भारत इस हमले को आईने के सामने रखकर देखे.

नापाक सवाल : क्‍या सबूत है कि पाक के ही हमलावर थे?

उदय केसरी
छुट्टी के बाद लौटा हूं। पर मन में अब भी हैरानी है-आखिर कब भारत के सब्र का बांध टूटेगा? पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बेशर्म बयान और झूठी कार्रवाई तो सोची-समझी रणनीति के तहत है। कम से कम इस बेशर्मी में पाकिस्‍तानी फितरत के प्रति जरदारी की असीम आस्‍था तो झलकती है, लेकिन अपने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और परोक्ष पीएम सोनिया गांधी तो बस बयान से भारतीय स्‍वाभिमान की तुष्टि करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। ये झूठी कार्रवाई भी नहीं कर पाये हैं। अव्‍वल यह है कि लापरवाह सुरक्षा व्‍यवस्‍था के कारण मुंबई हमले में आतं‍कवादियों की गोली का निशाना बने जांबाज पुलिस अफसर हेमंत करकरे की शहादत पर सियासत होने लगी है। अल्‍पसंख्‍यक मामलों के केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले के ‘अतुले’ बयान पर लोकसभा में हंगामा बरपा है। विपक्ष अंतुले के इस्‍तीफे की मांग कर रहा है। लेकिन आश्‍चर्य यह कि राष्‍ट्रीय संप्रभुता पर आतंक के आघात के दाग को धोने की मांग पर लोकसभा में कोई हंगामा नहीं हो रहा। दूसरी तरफ जरदारी विश्‍व समुदाय के बीच पाकिस्‍तान को पाक-साफ साबित करने में लगा है। भले, इसके लिए उसे एक दिन में दस बार झूठे बयान ही क्‍यों न देने पड़े। मसलन, बीबीसी को दिये एक साक्षात्‍कार में जरदारी ने मुंबई पर आतंकी हमले पर उलटे भारत से ही पूछा-क्‍या सबूत है कि पाक के ही हमलावर थे। जबकि इससे पहले इसी जरदारी ने माना था कि मुंबई में कहर ढाने वाले पाकिस्तान में सरकार इतर संगठनों के हो सकते हैं।

खैर छोडि़ये, जब सात साल पहले भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद भवन पर आतंकी हमले के दोषी मोहम्मद अफजल को सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा सुनाई जाने के बाद भी अब तक सजा नहीं दी जा सकी है और वह तिहाड़ जेल में हमारे देश की रोटियां तोड़ रहा है, तो मुंबई हमले के दोषियों को सजा देने में देश के सत्‍तासीनों से तत्‍परता की उम्‍मीद कैसे की जा सकती है...और ऐसे हालात में भी हमारे देश के नये गृहमंत्री पी। चिदंबरम को अब भी जैसे अपनी पुरानी कुर्सी से मोह बाकी है, तभी तो वे प्रधानमंत्री के तरफ से पुराना होम लोन सस्ता करने के बयान दे रहे हैं...जब देश ही असुरक्षित हो तो होम लोन सत्‍ता करने से क्‍या होगा गृहमंत्री जी....लेकिन यह तो जनता का सवाल है, जिसका जवाब देने की जिम्‍मेदारी से आज के राजनेता मुक्‍त हैं. दरअसल, चिदंबरम जी को कुछ ही महीनों बाद के आम चुनाव की चिंता अधिक है, जिसके लिए सत्‍ता की अंतिम घड़ी में लोकलुभावन घोषणाएं करने की राजनीतिक परंपरा बहुत पुरानी है. पेट्रोल-डीजल के मूल्‍य में अधूरी कमी को भी इस नजर से देखा जा सकता है...और हो सकता है कि आम चुनाव की घड़ी और करीब आई तो पेट्रोल-डीजल के भाव और कम हो सकते हैं...तब तक तो जनता के दिल-दिमाग पर लगे ताजा आतंक के जख्‍म भी समय के मरहम से भर चुके होंगे...

बहरहाल, देश के राजनेताओं की महज सत्‍तालोलुप राजनीति और नैतिक‍हीनता के बीच आप तमाम सुधी पाठकों के सामने पाक राष्‍ट्रपति का यह नापाक सवाल- क्‍या सबूत है कि पाक के ही हमलावर थे? छोड़ रहा हूं। उम्‍मीद है आप सब भारत की तरफ से इस सवाल का माकूल जवाब देंगे।

बुज़दिलों को सौंप बैठे, क्‍या हम अपना वतन...

एडिटोरियल प्‍लस डेस्‍क
मुंबई पर सबसे बड़े आतंकी हमले के ठीक बाद राजनेता फिर सत्‍ता की राजनीति में डूब चुके हैं और देश पर लगे हमले के जख्‍मों को लगभग भुला दिया गया है...आखिर राजनीतिक सत्‍ता चीज ही ऐसी बन चुकी है कि उसके आगे राष्‍ट्रीय संवेदना और जनता के जख्‍म की क्‍या औकात...नजर डालिये इन राजनीतिक घटनाक्रमों पर-
पहला- विलास राव देशमुख के इस्‍तीफे के बाद से दो दिनों तक नये मुख्‍यमंत्री के नाम को लेकर दिल्‍ली से मुंबई तक राजनीति गरम रही। बड़ी मुश्किल से अशोक चाव्‍हाण के नाम पर कांग्रेस आलाकमान की सहमति मिली, तो इस पद की दौड़ में पसीना बहा रहे नारायण राणे फट पड़े. कांग्रेस आला कमान और सोनिया गांधी के खिलाफ राजनीतिक जंग का ऐलान कर दिया. नतीजतन, राणे को पार्टी से निलं‍बित कर दिया गया. इसके बाद भी राणे की तल्‍ख बयानबाजी जारी है...

दूसरा- आठ दिसंबर विधान सभा चुनाओं के परिणाम पर दिल्‍ली, राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश व छत्‍तीसगढ़ के कांग्रेस व भाजपा के नेताओं की गिद्ध दृष्टि, जीत की खुशी और हार के गम में डूबे राजनेता व उनके कार्यकर्ता। दूसरी तरफ, इन दोनों पार्टियों के आलाकमान इन राज्‍यों में अपनी सरकार बनाने के विचार-विमर्श में लीन...

बहरहाल, भारतीय राजनेताओं को मुंबई हमले से क्‍या लेना-देना...अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलिजा राइस ने तो पाक पर दबाव बना ही दिया है और पाक राष्‍ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कह ही दिया है कि प्रमाण मिलते ही पाक में आतंकियों के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई की जाएगी...बस ले लिया गया मुंबई हमले का बदला...अब इस राजनीतिक मौसम में राजनेताओं से इससे अधिक क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है...भले जनता चिल्‍लाती रहे...तो क्‍या...जनता वोट भी तो उन्‍हें ही देती है...

खैर, सीधीबात के उदय केसरी फिर एक हफ्ते की छुट्टी पर जा रहे हैं। आज एडिटोरियल प्‍लस डेस्‍क आपके सामने मीतेंद्र नागेश की एक कविता पेश कर रहा है...उम्‍मीद है, सीधीबात के सभी सुधी पाठकों को पसंद आयेगी...
खौफ भरते, शोर करते बम धमाके रात-दिन,
सुनते-सहते सन्‍न हुए सब, पर नेताओं के कान शुन (शून्‍य)।

पकड़ के जनता गिरेबां, पूछती है बात एक,
बुज़दिलों को सौंप बैठे, क्‍या हम अपना वतन।

लोक जागेगा अगर, तो ही जगेगा लोकतंत्र,
हर हाथ उठाले मशालें, बुद्धिजीवी, आमजन।
आतंकी बेखौफ हैं, अधिनायक शांत चित,
देश की यह दुर्दशा, होती नहीं अब सहन।

काश! देश की बागडोर किसी युवा के हाथ में होती...

राष्‍ट्रीयता के प्रति वाम दलों की भूमिका ऐसी है, मानों उनकी दृष्टि में आतंकियों का जेहाद भारतीय पूंजीवाद के खिलाफ एक वर्ग संघर्ष हो !
उदय केसरी
सीधीबात पर दिल्ली बम धमाके (13 सितंबर) के एक दिन पहले ही ‘...तो भारत क्यों नहीं पीओके में घुसकर मार सकता’ आलेख के जरिये यह आवाज बुलंद की गई कि आतंकी दहशतगर्दों से भारत और भारतवासियों की रक्षा करना है, तो अमेरिका की तरह भारत को भी तत्काल सख्त जवाबी कदम उठाना होगा।...इसके दूसरे ही दिन देश की राजधानी में आतंकियों ने सीरियल बम बलास्ट कर दिया, जिसमें 22 बेगुनाहों की मौत हुई और सौ से अधिक लोग जख्मी हो गए। इस घटना के 13 दिन बाद एक बार फिर दिल्ली के महरौली में विस्फोट हुआ।...यही नहीं फिर 30 अक्टूबर को आतंकी बम बलास्ट से असम दहल उठा। इसमें 13 धमाकें, 70 निर्दोषों की मौत और 470 से अधिक लोग घायल हो गए।...और अब फिर 26 नवंबर को मुंबई पर हमला।...क्या भारत के संयम की कोई हद है या नहीं?...और यदि है, तो भारत के खिलाफ आतंकियों ने सारी हदें पार नहीं कर ली हैं?...यदि हां, तो केंद्र सरकार अब तक सोच-विचार में ही क्यों डूबी हुई है?

मुंबई हमले के बाद से सीधीबात पर दो आलेखों में फिर से पीओके पर हमले की आवाज बुलंद की गई, जिसमें आपमें से कई ब्‍लॉगर पाठकों की आवाज भी शामिल है। यही नहीं, अब तो पूरा संवेदनशील भारत बदले की आग में जल रहा है। हर दिन आतंकी हमलों पर जनता नेताओं को कोस रही है। इसके बावजूद केंद्र सरकार सख्त फैसला लेने में देर कर रही है।...जबकि अब तो अमेरिका भी यह कह रहा है कि भारत को आतंक के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने का पूरा हक है।...ऐसे में, देश के बुजुर्ग नेताओं से बड़ी खीज उत्पन्न होती है...और दिल टीस से भर उठता है-कि काश! अपने देश की बागडोर भी किसी युवा के हाथ में होती...तो आतंकियों के हौसले इतने बुलंद न होते कि वे हमें बता-बता कर हमारी धरती पर तबाही मचाते...और हमारे देश के नेता कभी बयान देकर, कभी खेद जताकर, तो कभी इस्तीफा देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते।

यह स्थिति तब है, जब 26 नवंबर के आतंकी हमले ने मुंबई ही नहीं, पूरे देश की संवेदनशील व प्रभावित जनता को झकझोर कर रख दिया है। यहां संवेदनशील से मेरा अर्थ उनसे है जिनके लिए देश के प्रति वफादारी सर्वोच्‍च है, दूसरा शब्द प्रभावित यानी आतंक की आग में मारे गए बेगुनाहों के परिजन। इसके बाद देश में जो लोग बचते हैं, वे हैं नेता (अपवाद हो सकते हैं), अपराधी, भ्रष्ट नौकरशाह यानी बेईमान, जिनके लिए सत्ता, पार्टी व पैसा सर्वोच्च है।...इन्हें मुंबई हमले ने झकझोरा नहीं, बल्कि संवेदनशील व प्रभावित जनता के बीच रहना दूभर कर दिया है। तभी तो वे पागल कुत्तों की तरह कुछ भी भौंकने लगे हैं। हालांकि इसका तत्काल खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ रहा है। फिर भी वे इससे बाज नहीं आ रहे, क्योंकि उन्हें असल संवेदना का मतलब ही नहीं मालूम। न्यूज चैनलों पर ऐसे नेताओं को ‘बयान बहादुर’, ‘बेशर्म बयान’, तो ‘क्योंकि इन्हें शर्म नहीं आती’ आदि कई अलंकारों से विभूषित किया गया, पर इससे उनकी संवेदना व नैतिकता यदि जागती तो देश में कभी ऐसी नौबत ही न आती।

खैर, मैं वामपंथी व साम्यवादी दलों के राजनीतिक वर्ग की देश की राष्‍ट्रीयता के प्रति भूमिका पर कुछ सीधीबात करना चाहता हूं। यह वर्ग ऐसा है, जो मजदूरों, किसानों व गरीबों के हक और बुनियादी परिवर्तन के लिए क्रांति की बात करता है। कार्ल मार्क्‍स के समाजवाद या साम्यवाद का सपना देखने की वकालत करता है। इनकी बातों के पीछे दर्शनों की भरमार होती है। लेकिन आप कहेंगे कि राष्ट्रीयता, राष्ट्रधर्म, देशभक्ति, भारतमाता, तो ऐसी बातें इन्हें जज्बाती और बेतुकी लगती है। ये धर्म को नहीं मानते। पूंजीवाद को अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते हैं। पूजा-पाठ करने वाले इनकी नजर में मूर्ख व अंधविश्‍वासी हैं। यहीं नहीं, देश की आजादी की लड़ाई में इनका कोई सरोकार नहीं था, ये अपने वाद के तहत परिवर्तन का रट लगाते हुए स्‍वाधीनता संग्राम से तटस्थ रहे। देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले असंख्य शहीदों के प्रति इनके मन में बस औपचारिक सम्मान है।
यह आलेख पढ़ने वाले वामपंथी दलों के समर्थक जरूर यह कहेंगे कि मेरी बातें आरोप है, जिसका कोई सबूत नहीं। या फिर मुझे दक्षिणपंथी घोषित कर देंगे। मुझे इससे कोई मतलब नहीं...और उन्हें सबूत देने से कोई फायदा भी नहीं। जिनके वाद से पैदा हुआ नक्‍सलवाद अपने ही देश में या कहें घर में निहत्‍थों, मजलूमों, किसानों व गरीबों की हत्‍या कर सामानांतर सरकार चलाने का दंभ भरता है। ऐसे वादियों से भी देश के संवदेनशील लोगों को सतर्क रहना चाहिए। खैर, अभी तो आतंकी संकट से निपटने के लिए जरूरी राष्ट्रीयता में वाम दलों की भूमिका की बात कर रहे हैं, तो याद करें कि क्या पिछले अनेक बम धमाकों के बाद वाम दलों की कोई भी ऐसी प्रतिक्रिया आई, जो देश की सुरक्षा व्यवस्था की बेहतरी या निकंमेपन के विरोध में केंद्र सरकार पर दबाव बनाने वाली हो। या फिर, आतंक की समस्या से निपटने के लिए संघर्ष करने का जनता को भरोसा देती हो।...जहां तक मुझे याद है, नहीं। राष्‍ट्रीयता के मुद्दे से इतर थोड़ा नजर डालें, तो केंद्र सरकार पर पिछले दिनों करार के मुद्दे पर तो वाम दलों ने सरकार तक को हिला कर रख दिया। अब जब देश के खिलाफ आतंकियों ने सारी हदें पार कर दी है, तब देखिए, इन वाम दलों की भूमिका- मुंबई हमले में शहीद मेजर संदीप के घर से निकाले जाने पर केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने कहा- ‘शहीद का घर नहीं होता, तो कुत्ता भी नहीं जाता।’ जब इस बयान पर देश भर में बवाल मचा तो माकपा नेता प्रकाश कारत ने इस पर औपचारिक खेद व्यक्त कर दिया। सीपीआई नेता एबी वर्धन ने कहा- शब्द गलत हो सकते हैं, पर अच्युतानंदन ने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे तूल दिया जाए। इसके बाद भी जब इस बयान पर बवाल नहीं थमा, तो दो दिन बाद अपनी कुर्सी के मोह से बाध्‍य होकर अच्युतानंदन को भी अपने बयान पर खेद प्रकट करना पड़ा। अब देखिए जरा, इस वाकये के दौरान दिल्ली में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में जब आतंक के खिलाफ संघीय जांच एजेंसी बनाने का प्रस्ताव लाया गया, तो केवल वाम दलों को ही एतराज हुआ।

जब पूरा देश आतंक से सुरक्षा, आतंकियों से बदला लेने और देश की संप्रभुता पर लगे दाग को मिटाने की सोच रहा है, तब वाम दलों के पास आतंकियों के विरुद्ध भारत सरकार की कार्रवाई के खिलाफ भी सोचने का वक्त है। तब तो कोई आश्‍चर्य नहीं, वाम दलों की दृष्टि में आतंकियों का जेहाद भारतीय पूंजीवाद के खिलाफ एक वर्ग संघर्ष जैसा हो, जिसका पक्ष लेना उनका परम कर्तव्य है। (इस मुद्दे पर बाकी बातें मैं बाद में करूंगा, धन्यवाद।)

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