बुज़दिलों को सौंप बैठे, क्‍या हम अपना वतन...

एडिटोरियल प्‍लस डेस्‍क
मुंबई पर सबसे बड़े आतंकी हमले के ठीक बाद राजनेता फिर सत्‍ता की राजनीति में डूब चुके हैं और देश पर लगे हमले के जख्‍मों को लगभग भुला दिया गया है...आखिर राजनीतिक सत्‍ता चीज ही ऐसी बन चुकी है कि उसके आगे राष्‍ट्रीय संवेदना और जनता के जख्‍म की क्‍या औकात...नजर डालिये इन राजनीतिक घटनाक्रमों पर-
पहला- विलास राव देशमुख के इस्‍तीफे के बाद से दो दिनों तक नये मुख्‍यमंत्री के नाम को लेकर दिल्‍ली से मुंबई तक राजनीति गरम रही। बड़ी मुश्किल से अशोक चाव्‍हाण के नाम पर कांग्रेस आलाकमान की सहमति मिली, तो इस पद की दौड़ में पसीना बहा रहे नारायण राणे फट पड़े. कांग्रेस आला कमान और सोनिया गांधी के खिलाफ राजनीतिक जंग का ऐलान कर दिया. नतीजतन, राणे को पार्टी से निलं‍बित कर दिया गया. इसके बाद भी राणे की तल्‍ख बयानबाजी जारी है...

दूसरा- आठ दिसंबर विधान सभा चुनाओं के परिणाम पर दिल्‍ली, राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश व छत्‍तीसगढ़ के कांग्रेस व भाजपा के नेताओं की गिद्ध दृष्टि, जीत की खुशी और हार के गम में डूबे राजनेता व उनके कार्यकर्ता। दूसरी तरफ, इन दोनों पार्टियों के आलाकमान इन राज्‍यों में अपनी सरकार बनाने के विचार-विमर्श में लीन...

बहरहाल, भारतीय राजनेताओं को मुंबई हमले से क्‍या लेना-देना...अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलिजा राइस ने तो पाक पर दबाव बना ही दिया है और पाक राष्‍ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कह ही दिया है कि प्रमाण मिलते ही पाक में आतंकियों के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई की जाएगी...बस ले लिया गया मुंबई हमले का बदला...अब इस राजनीतिक मौसम में राजनेताओं से इससे अधिक क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है...भले जनता चिल्‍लाती रहे...तो क्‍या...जनता वोट भी तो उन्‍हें ही देती है...

खैर, सीधीबात के उदय केसरी फिर एक हफ्ते की छुट्टी पर जा रहे हैं। आज एडिटोरियल प्‍लस डेस्‍क आपके सामने मीतेंद्र नागेश की एक कविता पेश कर रहा है...उम्‍मीद है, सीधीबात के सभी सुधी पाठकों को पसंद आयेगी...
खौफ भरते, शोर करते बम धमाके रात-दिन,
सुनते-सहते सन्‍न हुए सब, पर नेताओं के कान शुन (शून्‍य)।

पकड़ के जनता गिरेबां, पूछती है बात एक,
बुज़दिलों को सौंप बैठे, क्‍या हम अपना वतन।

लोक जागेगा अगर, तो ही जगेगा लोकतंत्र,
हर हाथ उठाले मशालें, बुद्धिजीवी, आमजन।
आतंकी बेखौफ हैं, अधिनायक शांत चित,
देश की यह दुर्दशा, होती नहीं अब सहन।

5 comments:

  1. लोक जागेगा अगर, तो ही जगेगा लोकतंत्र,
    हर हाथ उठाले मशालें, बुद्धिजीवी, आमजन।
    आतंकी बेखौफ हैं, अधिनायक शांत चित,
    देश की यह दुर्दशा, होती नहीं अब सहन।
    vicharaniy post or badhiya rachana prastut karne ke liye dhanyawad.

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  2. बुजदिलो को हमने ही चुना है और
    सौप दिया है उन्हें अपना वतन

    इसके लिए क्या हम स्वयं जिम्मेदार नही है . जागरुक नही है .

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  3. सर इनके लिए तो मेरे पास शब्द कम पड़ जाते है.कितना कुछ कहे इनके लिए कम है.इसे इनकी राजनीति कहे या तासीर कि किसी भी मामले पर राजनीती करना शुरू कर देते है,भावनाओं को कोई तवज्जो नही देते

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  4. वो देख ले हमारी सब्र की इम्तहान कहाँ तक है,वो सितम करले उनकी दम जहाँ तक है.
    सर हम केवल लिख ही सकते है क्या,हमें कुछ करना होगा इन नेताओं का ,इन आतंकवादिओं का जो हमारे ही घर में छिप कर बैठे है

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  5. uday ji,shahid bhagat singh ne kaha tha ki gunge bahro ko sunane ke liye dhamake jaruri hai.hamare neta to itne dhmako ke baad bhi nahi jaage hai

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