महंगाई की आंच

अशोक चक्रधर

उबली जन-मन भावना, महंगाई की आंच,
कीमत इतनी नुकीली, रस्ते पर ज्यों कांच।
रस्ते पर ज्यों कांच, बालकों को बहलाओ,
बटुआ लहूलुहान, न शॉपिंग करने जाओ।
चक्र सुदर्शन कहे— 'चाय है कैसी बबली?'
'गैस बचाने के चक्कर में आधी उबली।'

साभार: तहलका हिन्दी डॉट कॉम

तेल पर फिसलती देश की राजनीति

शांतनु गुहा रे

सरकार को ईंधन के दाम बढ़ाने ही बढ़ाने हैं मगर परेशानी ये है कि वो ये नहीं जानती कि ऐसा बिना वोटों को खोए कैसे किया जा सकता है...पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के सामने एक बड़ी दुविधा खड़ी है. ईंधन की कीमतें बढ़ाने के लिए उनके पास आर्थिक वजहें तो है पर राजनीतिक नहीं. उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. कई देशों ने इस स्थिति से निपटने के उपाय भी कर लिए हैं. मसलन इंडोनेशिया को अपने यहां ईंधन के मूल्य में 28 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी करनी पड़ी है जबकि श्रीलंका के लिए ये आंकड़ा 14 से 47 फीसदी तक है. उधर, बांग्लादेश तो कुछ पेट्रो पदार्थों की कीमतें 80 फीसदी तक बढ़ाने के लिए तैयार है. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां लगातार कीमतें बढ़ाए जाने की मांग कर रही हैं. ये स्वाभाविक भी है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ उनका नुकसान भी बढ़ रहा है. गौरतलब है कि आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस की बिक्री से रोजाना कुल 440 करोड़ रुपए का नुकसान होता है और अगर जल्द ही कोई इलाज नहीं किया गया तो इस वर्ष उनकी कमर टूट सकती है. तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर 16.34, प्रति लीटर डीजल पर 23.49, कुकिंग गैस के हर सिलिंडर पर 305.90 और प्रति लीटर केरोसीन पर 28.72 रुपयों का नुकसान होता है. दरअसल सरकार ईंधन पर जो सब्सिडी देती है उसकी मार इन तेल कंपनियों को झेलनी पड़ती है. मसलन तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर 16.34, प्रति लीटर डीजल पर 23.49, कुकिंग गैस के हर सिलिंडर पर 305.90 और प्रति लीटर केरोसीन पर 28.72 रुपयों का नुकसान होता है. सरकार इस नुकसान की भरपाई उन्हें ऑयल बांड्स जारी करके करती है. जिन्हें कंपनियां ज़रूरत पड़ने पर भुना सकती हैं. वर्तमान में कंपनियों के कुल नुकसान के 42.7 फीसदी की भरपाई इन बांड्स के जरिये ही की जा रही है जबकि उनका 33 फीसदी नुकसान, तेल मुहैया कराने वाली ओएनजीसी और गेल जैसी कंपनियां वहन करती हैं. देवड़ा मांग कर रहे हैं कि सरकार तेल कंपनियों को हो रहे कुल नुकसान के 42.7 फीसदी के बजाय 57.1 फीसदी के लिए बांड्स जारी करे. गौरतलब है कि पिछले साल इन कंपनियों को कुल 77,000 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ था और वित्तीय वर्ष 2008-09 में इस आंकड़े के 1,30,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.ऊपर से स्टील के दामों के बढ़ जाने की वजह से नए गैस कनेक्शन के लिए सिक्योरिटी डिपॉजिट में पहले ही 400 रुपये की बढ़ोतरी की जा चुकी है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सी रंगराजन के साथ हुई एक लंबी बैठक के बाद देवड़ा का कहना था, “अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के उछाल का ज्यादातर बोझ सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां उठा रही हैं. हमने कई विकल्पों पर चर्चा की मगर अभी कोई फैसला नहीं किया गया है.” उधर, पेट्रोलियम सचिव एम एस श्रीनिवासन तहलका से कहते हैं, “कीमतें बढ़ना तय है और फैसला जल्द ही लिया जाएगा.”दूसरी तरफ कांग्रेस की सहयोगी सीपीएम का मानना है कि सरकार को कच्चे तेल और पेट्रो उत्पादों पर उत्पाद और सीमा शुल्क को पुनर्व्यवस्थित करना चाहिए था. पार्टी महासचिव प्रकाश करात कहते हैं, “हम पिछले तीन साल से सरकार को प्रस्ताव दे रहे हैं. उन्हें कीमतें बढ़ाने की बजाय हमारे प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए.”मुंबई स्थित लेहमन ब्रदर्स में अर्थशास्त्री सोनल वर्मा कहती हैं, “राजनीतिक विरोध को देखते हुए साफ है कि तेल मंत्रालय जितने की मांग कर रहा है, बढ़ोतरी उससे कहीं कम की होगी. एक्सिस बैंक में कार्यरत अर्थशास्त्री सौगत भट्टाचार्य कहते हैं, “सरकार ईंधन की कीमतें तीन से पांच फीसदी तक बढ़ा सकती है. मगर ये काफी नहीं है.” जानकार कहते हैं कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी सत्ताधारी गठबंधन के चुनावी हितों पर बुरा असर डाल सकती है. मगर दीर्घकालिक हित में सरकार को इन दो विकल्पों में से एक को चुनना ही होगा--या तो वो खुद ईंधन की कीमतें बढ़ाए या फिर कीमतों का निर्धारण बाजार की ताकतों पर छोड़ दे. जानकार कहते हैं कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी सत्ताधारी गठबंधन के चुनावी हितों पर बुरा असर डाल सकती है. मगर दीर्घकालिक हित में सरकार को इन दो विकल्पों में से एक को चुनना ही होगा. चिंताएं कुछ और भी हैं. पेट्रोलियम और वित्त मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो सरकार शायद इसलिए भी बढ़ोतरी को टाल रही है क्योंकि मुद्रास्फीति की दर पहले ही करीब आठ फीसदी तक पहुंच चुकी है. अधिकारी ये भी कहते हैं कि वित्त मंत्री को आखिरकार और भी ऑयल बांड्स जारी करने और ईंधन पर कस्टम और एक्साइज ड्यूटी घटाने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा. पिछली बार ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी इसी साल फरवरी में हुई थी जब सरकार ने पेट्रोल की कीमत दो और डीजल की कीमत एक रुपये प्रति लीटर बढ़ा दी थी. फिलहाल भी सरकार के पास कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता. मॉर्गन स्टेनली के प्रबंध निदेशक चेतन अहाया कहते हैं, “हालात को देखते हुए कीमतें बढ़ाना ही एकमात्र सही विकल्प है. आम चुनाव में अब भी काफी वक्त है. उपभोक्ता के हितों की सुरक्षा अच्छी बात है मगर एक सीमा के बाद इससे देश के हित प्रभावित होने लगते हैं.” स्टेंडर्ड एंड पुअर के चीफ एशिया इकॉनामिस्ट सुबीर गोकर्ण भी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं, “कीमतों में वृद्धि चरणबद्ध तरीके से की जानी चाहिए. ये एक झटके में नहीं होनी चाहिए. क्योंकि इससे मुद्रास्फीति के दहाई तक पहुंचने का भी खतरा हो सकता है.”तेल विश्लेषकों के मुताबिक वर्तमान तेल संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संकट है. कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल से आगे जाते हुए 2015 तक 400 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. ऐसे में तेल कंपनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिए उनके घाटे की भरपाई करनी जरूरी होगी. तेल कंपनियों के अधिकारी कहते हैं कि अगर जल्द ही कोई निर्णय न लिया गया तो हो सकता है कि पेट्रोल पंपों पर तेल ही उपलब्ध न हो.पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने तहलका को बताया कि कुछ पेट्रोलियम उत्पादक देशों में द्विपक्षीय सौदों की संभावनाएं तलाश करने के लिए उच्चस्तरीय टीमें भेजे जाने पर भी विचार चल रहा है. उदाहरण के लिए साठ लाख बैरल प्रति दिन उत्पादन करने वाला वेनजुएला इसमें से दस लाख बैरल प्रति दिन भारत को भेजने पर सहमति दे चुका है.“इसी तरह कुछ दूसरे विकल्प भी तलाश किए जा सकते हैं.सरकार मुख्य तेल आयातक देशों जैसे अमेरिका, जापान, जर्मनी, चीन, फ्रांस और दक्षिण कोरिया के साथ एक खरीदार गठबंधन बनाने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है ताकि तेल उत्पादक देशों के साथ कीमतें घटाने के लिए मोलभाव किया जा सके”, एक अधिकारी बताते हैं.इसके अलावा तेल कंपनियों को राहत प्रदान करने के लिए कुछ दूसरी कवायदों के बारे में भी सोचा जा रहा है. इसमें आयकर और कॉरपोरेट कर पर अतिरिक्त अधिभार लगाने का प्रस्ताव भी शामिल है ताकि तेल सब्सिडी के कुछ हिस्से की भरपाई इससे आने वाली राशि से की जा सके. उदाहरण के लिए एक फीसदी का अधिभार लगाने से 3000 करोड़ रुपये के राजस्व की प्राप्ति हो सकती है. इसके साथ ही पेट्रोलियम मंत्रालय आयात कर को 7.5 फीसदी से घटाकर 2.5 फीसदी तक करने की भी सिफारिश कर रहा है.मगर सबसे पहले सरकार को कीमतों में बढ़ोतरी पर यथार्थवादी रवैया अपनाना होगा. साथ ही उसे तेल कंपनियों को वित्तीय संकट से उबारने के लिए करों में सुधार और बाकी चीज़ों के साथ उपभोक्ता को भी हालात की हकीकत से रूबरू करवाने की जरूरत है।
साभार : तहलका हिन्दी डॉट कॉम

रिंगटोन का बाज़ार और संस्कृति

प्रियदर्शन
बरसों पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘अजनबीपन’ - दिल्ली में अकेले रहते हुए रात को टेलीफोन बूथ से अपने घर फोन करने के अनुभव पर। मुझे याद है कि एसटीडी तारों के उलझे हुए दिनों में बड़ी मुश्किल से फोन मिला करते थे, लेकिन जब मिल जाया करते तो अचानक उनकी मशीनी ध्वनि बेहद मानवीय हो जाती। लगता था, जैसे बीप बीप की वह आवाज़ मुझे दिल्ली और रांची के बीच बिछे अनगिनत उलझे तारों के रास्ते 1200 मील दूर अपने घर के ड्राइंग रूम तक ले जाती है।
आज जब रिंगटोन और कॉलर ट्यून्स की एक रंगारंग दुनिया हमारे सामने है, तब भी मुझे रात ग्यारह बजे के आसपास बजती हुई वह बीप बीप याद आती है, क्योंकि इस ध्वनि से मेरी पहचान थी, वह मेरा धागा थी, जो मुझे दूसरों के साथ बांधती थी। आज वह ध्वनि मुझे नहीं मिलती, क्योंकि जब भी मैं किसी को फोन करता हूं, दूसरी तरफ कोई धुन, किसी फिल्मी गीत की कोई पंक्ति, या कोई बंदिश प्यार, इसरार, मनुहार या शृंगार बिखेरती हुई मेरी प्रतीक्षा की घड़ियों को मादक बना रही होती है।
दरअसल इन दिनों मोबाइल क्रांति ने ‘रिंगटोन’ और कॉलर ट्यून्स’ के जरिये जो नई सांगीतिक क्रांति की है, उसके कई पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है। आप किसी को फोन करें और आपको कोई अच्छी सी धुन या बंदिश सुनाई पड़े, इसमें कोई बुराई नहीं लगती। यही नहीं, जो लोग फोन पर अपनी पसंदीदा धुनें लगाकर रखते हैं, उनका एक तर्क यह भी हो सकता है कि इससे उनके व्यक्तित्व का भी कुछ पता चलता है।
लेकिन क्या संगीत का यह उपयोगितावाद क्या एक सीमा के बाद खुद संगीत के साथ अन्याय नहीं करने लगता... संगीत का काम सारी कला-विधाओं की तरह एक ऐसे आनंद की सृष्टि करना है, जिसके सहारे हमें अपने-आप को, अपनी दुनिया को कुछ ज्यादा समझने, कुछ ज्यादा खोजने में मदद मिलती है। लेकिन जब हम संगीत को ‘टाइम पास’ की तरह इस्तेमाल करते हैं तो उसको उसके मूल लक्ष्य से भटकाते हैं। किसी फोन कॉल पर किसी बड़े उस्ताद की पांच सेकंड से लेकर 15 या 30 सेकंड तक चलने वाली बंदिश जब तक आपकी पकड़ में आती है, ठीक उसी वक्त कोई आवाज इस बंदिश का गला घोंट देती है।
आप शिकायत नहीं कर सकते, क्योंकि आपने संगीत सुनने के लिए नहीं, बात करने के लिए किसी को फोन किया है। संगीत तो बस उस इंतज़ार के लिए बज रहा है, जो आपका फोन उठाए जाने तक आपको करना है। आप इस समय जम्हाई लें या बंदिश सुनें, किसी को फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता बंदिश को ज़रूर फर्क पडता है, क्योंकि पांच बार उसे पांच-दस या 20-30 सेकंड तक आप सुन चुके हैं और उसका जादू जा चुका है। छठी बार वह पूरी बंदिश सुनने भी आप बैठें तो उसका अनूठापन आपके लिए एक व्यतीत अनुभव है, क्योंकि आपको मालूम है कि इसे तो आपने अपने किसी दोस्त के मोबाइल पर सुन रखा है।
असल में हर फोन सिर्फ गपशप के लिए नहीं किया जाता, बल्कि सिर्फ गपशप जैसी कोई चीज नहीं होती - कोई न कोई सरोकार उस गपशप की प्रेरणा बनता है, कोई न कोई संवाद इसके बीच आता है, सुख या दुख के कुछ अंतराल होते हैं। जाहिर है, संगीत की कोई धुन या बंदिश इस संवाद में बाधा बनती है। आप किसी अफसोस या दुख की कोई खबर साझा करने बैठे हैं और आपको फोन पर कोई भैरवी या ठुमरी या चालू फिल्मी गाना सुनने को मिल रहा है तो आपको पता चले या नहीं, कहीं न कहीं, यह आपके दुख का उपहास भी है। यही बात सुखद खबरों के साथ कही जा सकती है।
संस्कृति एक बहुत बड़ी चीज है, उसे आप काटकर प्लेटों में परोस नहीं सकते, उसे टुकड़ा-टुकड़ा कर पैक नहीं कर सकते। लेकिन बाजा़र यही करने की कोशिश कर रहा है। वह मोत्सार्ट, बाख, रविशंकर, हरिप्रसाद चौरसिया और उस्ताद बिस्मिल्ला खां का जादू छीनकर उसे अपनी डिबिया में बंद कर रहा है और बेच रहा है। खरीदने वालों को भी संस्कृति का यह इत्र रास आ रहा है, क्योंकि इसके जरिये वह बता पा रहे हैं कि उनका नाता बड़ी और कलात्मक अभिव्यक्तियों से भी है।
दरअसल हर ध्वनि का अपना मतलब होता है, हर मुद्रा का अपना अर्थ। दरवाजे पर दस्तक देने की जगह कोई गाना गाने लगे तो इसे उसका कला प्रेम नहीं, उसकी सनक मानेंगे। ध्वनियों के सहारे हम हंसी को भी समझते हैं, रुलाई को भी। अगर हवा के बहने और पानी के गिरने की ध्वनियां किन्हीं दूसरे तरीकों से हम तक पहुंचने लगें तो समझिए कि कुदरत में कोई अनहोनी हुई है - या तो कोई भयावह तूफ़ान हमारे रास्ते में है या कोई विराट बाढ़ हमें लीलने को आ रही है। क्या मोबाइल क्रांति ने हमारी ध्वनि-संवेदना नहीं छीन ली है, वरना हम एक आ रहे तूफ़ान को पहचानने में इतने असमर्थ क्यों होते...? साभार : एन डी टी वी ख़बर डॉट कॉम

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