तेल पर फिसलती देश की राजनीति

शांतनु गुहा रे

सरकार को ईंधन के दाम बढ़ाने ही बढ़ाने हैं मगर परेशानी ये है कि वो ये नहीं जानती कि ऐसा बिना वोटों को खोए कैसे किया जा सकता है...पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के सामने एक बड़ी दुविधा खड़ी है. ईंधन की कीमतें बढ़ाने के लिए उनके पास आर्थिक वजहें तो है पर राजनीतिक नहीं. उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. कई देशों ने इस स्थिति से निपटने के उपाय भी कर लिए हैं. मसलन इंडोनेशिया को अपने यहां ईंधन के मूल्य में 28 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी करनी पड़ी है जबकि श्रीलंका के लिए ये आंकड़ा 14 से 47 फीसदी तक है. उधर, बांग्लादेश तो कुछ पेट्रो पदार्थों की कीमतें 80 फीसदी तक बढ़ाने के लिए तैयार है. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां लगातार कीमतें बढ़ाए जाने की मांग कर रही हैं. ये स्वाभाविक भी है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ उनका नुकसान भी बढ़ रहा है. गौरतलब है कि आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस की बिक्री से रोजाना कुल 440 करोड़ रुपए का नुकसान होता है और अगर जल्द ही कोई इलाज नहीं किया गया तो इस वर्ष उनकी कमर टूट सकती है. तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर 16.34, प्रति लीटर डीजल पर 23.49, कुकिंग गैस के हर सिलिंडर पर 305.90 और प्रति लीटर केरोसीन पर 28.72 रुपयों का नुकसान होता है. दरअसल सरकार ईंधन पर जो सब्सिडी देती है उसकी मार इन तेल कंपनियों को झेलनी पड़ती है. मसलन तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर 16.34, प्रति लीटर डीजल पर 23.49, कुकिंग गैस के हर सिलिंडर पर 305.90 और प्रति लीटर केरोसीन पर 28.72 रुपयों का नुकसान होता है. सरकार इस नुकसान की भरपाई उन्हें ऑयल बांड्स जारी करके करती है. जिन्हें कंपनियां ज़रूरत पड़ने पर भुना सकती हैं. वर्तमान में कंपनियों के कुल नुकसान के 42.7 फीसदी की भरपाई इन बांड्स के जरिये ही की जा रही है जबकि उनका 33 फीसदी नुकसान, तेल मुहैया कराने वाली ओएनजीसी और गेल जैसी कंपनियां वहन करती हैं. देवड़ा मांग कर रहे हैं कि सरकार तेल कंपनियों को हो रहे कुल नुकसान के 42.7 फीसदी के बजाय 57.1 फीसदी के लिए बांड्स जारी करे. गौरतलब है कि पिछले साल इन कंपनियों को कुल 77,000 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ था और वित्तीय वर्ष 2008-09 में इस आंकड़े के 1,30,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.ऊपर से स्टील के दामों के बढ़ जाने की वजह से नए गैस कनेक्शन के लिए सिक्योरिटी डिपॉजिट में पहले ही 400 रुपये की बढ़ोतरी की जा चुकी है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सी रंगराजन के साथ हुई एक लंबी बैठक के बाद देवड़ा का कहना था, “अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के उछाल का ज्यादातर बोझ सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां उठा रही हैं. हमने कई विकल्पों पर चर्चा की मगर अभी कोई फैसला नहीं किया गया है.” उधर, पेट्रोलियम सचिव एम एस श्रीनिवासन तहलका से कहते हैं, “कीमतें बढ़ना तय है और फैसला जल्द ही लिया जाएगा.”दूसरी तरफ कांग्रेस की सहयोगी सीपीएम का मानना है कि सरकार को कच्चे तेल और पेट्रो उत्पादों पर उत्पाद और सीमा शुल्क को पुनर्व्यवस्थित करना चाहिए था. पार्टी महासचिव प्रकाश करात कहते हैं, “हम पिछले तीन साल से सरकार को प्रस्ताव दे रहे हैं. उन्हें कीमतें बढ़ाने की बजाय हमारे प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए.”मुंबई स्थित लेहमन ब्रदर्स में अर्थशास्त्री सोनल वर्मा कहती हैं, “राजनीतिक विरोध को देखते हुए साफ है कि तेल मंत्रालय जितने की मांग कर रहा है, बढ़ोतरी उससे कहीं कम की होगी. एक्सिस बैंक में कार्यरत अर्थशास्त्री सौगत भट्टाचार्य कहते हैं, “सरकार ईंधन की कीमतें तीन से पांच फीसदी तक बढ़ा सकती है. मगर ये काफी नहीं है.” जानकार कहते हैं कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी सत्ताधारी गठबंधन के चुनावी हितों पर बुरा असर डाल सकती है. मगर दीर्घकालिक हित में सरकार को इन दो विकल्पों में से एक को चुनना ही होगा--या तो वो खुद ईंधन की कीमतें बढ़ाए या फिर कीमतों का निर्धारण बाजार की ताकतों पर छोड़ दे. जानकार कहते हैं कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी सत्ताधारी गठबंधन के चुनावी हितों पर बुरा असर डाल सकती है. मगर दीर्घकालिक हित में सरकार को इन दो विकल्पों में से एक को चुनना ही होगा. चिंताएं कुछ और भी हैं. पेट्रोलियम और वित्त मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो सरकार शायद इसलिए भी बढ़ोतरी को टाल रही है क्योंकि मुद्रास्फीति की दर पहले ही करीब आठ फीसदी तक पहुंच चुकी है. अधिकारी ये भी कहते हैं कि वित्त मंत्री को आखिरकार और भी ऑयल बांड्स जारी करने और ईंधन पर कस्टम और एक्साइज ड्यूटी घटाने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा. पिछली बार ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी इसी साल फरवरी में हुई थी जब सरकार ने पेट्रोल की कीमत दो और डीजल की कीमत एक रुपये प्रति लीटर बढ़ा दी थी. फिलहाल भी सरकार के पास कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता. मॉर्गन स्टेनली के प्रबंध निदेशक चेतन अहाया कहते हैं, “हालात को देखते हुए कीमतें बढ़ाना ही एकमात्र सही विकल्प है. आम चुनाव में अब भी काफी वक्त है. उपभोक्ता के हितों की सुरक्षा अच्छी बात है मगर एक सीमा के बाद इससे देश के हित प्रभावित होने लगते हैं.” स्टेंडर्ड एंड पुअर के चीफ एशिया इकॉनामिस्ट सुबीर गोकर्ण भी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं, “कीमतों में वृद्धि चरणबद्ध तरीके से की जानी चाहिए. ये एक झटके में नहीं होनी चाहिए. क्योंकि इससे मुद्रास्फीति के दहाई तक पहुंचने का भी खतरा हो सकता है.”तेल विश्लेषकों के मुताबिक वर्तमान तेल संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संकट है. कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल से आगे जाते हुए 2015 तक 400 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. ऐसे में तेल कंपनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिए उनके घाटे की भरपाई करनी जरूरी होगी. तेल कंपनियों के अधिकारी कहते हैं कि अगर जल्द ही कोई निर्णय न लिया गया तो हो सकता है कि पेट्रोल पंपों पर तेल ही उपलब्ध न हो.पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने तहलका को बताया कि कुछ पेट्रोलियम उत्पादक देशों में द्विपक्षीय सौदों की संभावनाएं तलाश करने के लिए उच्चस्तरीय टीमें भेजे जाने पर भी विचार चल रहा है. उदाहरण के लिए साठ लाख बैरल प्रति दिन उत्पादन करने वाला वेनजुएला इसमें से दस लाख बैरल प्रति दिन भारत को भेजने पर सहमति दे चुका है.“इसी तरह कुछ दूसरे विकल्प भी तलाश किए जा सकते हैं.सरकार मुख्य तेल आयातक देशों जैसे अमेरिका, जापान, जर्मनी, चीन, फ्रांस और दक्षिण कोरिया के साथ एक खरीदार गठबंधन बनाने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है ताकि तेल उत्पादक देशों के साथ कीमतें घटाने के लिए मोलभाव किया जा सके”, एक अधिकारी बताते हैं.इसके अलावा तेल कंपनियों को राहत प्रदान करने के लिए कुछ दूसरी कवायदों के बारे में भी सोचा जा रहा है. इसमें आयकर और कॉरपोरेट कर पर अतिरिक्त अधिभार लगाने का प्रस्ताव भी शामिल है ताकि तेल सब्सिडी के कुछ हिस्से की भरपाई इससे आने वाली राशि से की जा सके. उदाहरण के लिए एक फीसदी का अधिभार लगाने से 3000 करोड़ रुपये के राजस्व की प्राप्ति हो सकती है. इसके साथ ही पेट्रोलियम मंत्रालय आयात कर को 7.5 फीसदी से घटाकर 2.5 फीसदी तक करने की भी सिफारिश कर रहा है.मगर सबसे पहले सरकार को कीमतों में बढ़ोतरी पर यथार्थवादी रवैया अपनाना होगा. साथ ही उसे तेल कंपनियों को वित्तीय संकट से उबारने के लिए करों में सुधार और बाकी चीज़ों के साथ उपभोक्ता को भी हालात की हकीकत से रूबरू करवाने की जरूरत है।
साभार : तहलका हिन्दी डॉट कॉम

1 comment:

  1. sarkaaron ka rawaiya hamesha gair jimedaraana raha hai.ye sachn ko chhipane ki koshish karti hain.yah sahi hai ki antarrastriy baazar men tel ki kimato men betahaasha briddhi hui hai.yah bhi sahi hai ki isse tel kanmaniyon ko nukshan ho raha hai.
    lekin sarkar samasya ke aane ke pahle kyon nahi chetati.
    hamara desh ganne ka pramukh utpadak hai uski khoi se ethnol banakar petrol men milane se petrol ki bachat ki jaa sakati hai .
    jisse petrol ki kimat ko sthir karne men madad mil sakti hai lekin sarkaar kuchh dabav men aisa nahi kar raha hai.
    isse kisaano ka bhi kuchh labh ho jata.
    doosare sar sarkaaren rajy ho yaa kendra inpar chautarfa tax vasulti hai .....kai jagah to inki kimat ka 1 chauthai hai.
    aur tax bhi ek nahi anek tarah ke inmen kami kar aur raste se rajsw ki vyavastha ki ja sakti hai yadi aam aadmi ki chinta ho.
    yah dhog hai kyonki petrolium padartho ki kimat ka seedha asar manhgaai par seedha asar padtaa hai.
    ek aur baat ki sarkaaren sharab gutkhe par tax nahi badha rahi hai.balki ab unko sahayata kar rahi hai.
    ab waqt aa gaya hai yah tay karne ka ki sarkaar ke liye kye jyada jaruri hai.sarkaaren apani apavyay ko bhi rok sakti hain par we aisa karen kyon?
    aur bhi tareeko par vichar kiya ja saktaa hai...jisase rajasw badhe aur kimat niyantrit ki jaa sake.

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