राजनीतिक दल-दल मे कराह रही है राष्ट्रीयता

  • Meetendra Nagesh

राजनीति का मतलब यदि राष्ट्र सेवा समझते है तो यह लगभग बीती बात हो चुकी है। अब तो यह सत्ता और शक्ति हथियाने का हथकंडा बन चुकी है। केन्द्र मे आजादी के बाद से ज्यादातर कान्ग्रेसिओं का शासन रहा और हर बार गरीब जनता को महंगाई के नए बोझ उठाने पड़े। विपक्ष जब मजबूत हुआ तो प्राय: इसी मुद्दे पर कांग्रेस की सरकार गिरीं। कभी जनता पार्टी, तो कभी जनता दल तो कभी भाजपा, वह भी गठबंधन का अवसरवादी फार्मूला अपनाकर सरकार बनती रहीं। लेकिन महंगाई कम नही हुई बल्कि बढती ही गई। पिछली बार इसी फार्मूला को अपनाकर कांग्रेस भी पुन: सत्ता हासिल कर ली। नतीजा आपके सामने है। अगले साल आम चुनाव होने है पर कांगेस को इसका भी डर नही। आम जरूरत की चीजो के दाम आसमान छू रहे है। गरीबों को फ़िर महंगाई की चक्की तले पिसा जा रहा है। जबकि दूसरी तरफ़ मोबाइल फ़ोन के दाम गिर रहे है। कॉल रेट लगभग मुफ्त होती जा रही है। आख़िर क्यों आपको खाने मे मोबाइल सेट परोस दिया जाए तो आपकी भूख मिट जायेगी। नहीं न, सचाई यह है कि सरकार की चिंता के दायरे मे गरीब जनता नही और न ही उनकी जरूरतें है, बल्कि धनी और पूंजीपति वर्ग है, जो सरकार की राजनितिक दल को चुनाव लड़ने के लिए अनाप- सनाप रुपये पहुंचाते है। और इसके बदले मे उन्हें मिलाती है गरीब के पसीने की कमaai lootane की chhoot।

क्या आपको नही लगता राजनीति से ईमानदारी का totoly break-up हो चुका है। और इस क्षेत्र मे dhurt, pakhandio की jamavat कुछ jyada ही tagdi हो चुकी है।

तो फ़िर क्यो chup बैठे है - sidhi बात मे अपनी बात कहते क्यो नही? आख़िर कब तक राजनितिक दलदल की sadandh मे साँस लेने को मजबूर होते रहेंगे।

2 comments:

  1. acha likha meetendra ji ne humabhari hai rajnete ki itane achai sunkar chlo kisi na to sach bola

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  2. rajniti me imndari ki baat sochna hi bemani lagti hai neta ya rajnitik partyon ko satta se matlab hai na ki janata ki samasyaon se sarokar hai.aab janata ko hi nirnay lena hoga ki rajnetaon ko kab aur kaise dhakka lagaya jaye jisase rajniti ko brashtachar se dur rakha jaye.azadi ke diwane barat ki is tasvir ko dekhate honga to asun baha rahe honge ki bematlab me hi hum logon ne apni kurbani di thi.

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