मारेगी महंगाई...


पंकज पचौरी
अब यह साफ दिखने लगा है कि अगले आम चुनाव और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में बड़ा मुद्दा महंगाई की मार का होने वाला है। यूपीए सरकार, बड़े अर्थशास्त्री माने जाने वाले मनमोहन सिंह की अगुवाई में चल रही है। उनके साथ योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया जुड़े हुए हैं, जो खुद अर्थशास्त्री हैं। वकालत छोड़कर वित्त मंत्रालय संभालने वाले पी चिदंबरम पांच बजट पेश कर चुके हैं, लेकिन इतने ज्यादा हुनरमंद रहनुमाओं के देश में महंगाई लगातार बढ़ रही है, जिससे निपटने के उपाय किसी के पास दिखाए नहीं देते।
सरकार एक के बाद एक बैठक कर रही है और इन बैठकों में कुछ मंत्री दबे स्वर में कह रहे हैं कि चिदंबरम साहब अगला चुनाव हरवाएंगे। मुद्रास्फीति एनडीए के जमाने में ज्यादा हुआ करती थी। 'शाइनिंग इंडिया' का नारा देकर एनडीए ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया और चुनाव में नुकसान उठाया, लेकिन यूपीए ने आम आदमी के अपने नारे को भजन की तरह इतना गाया है कि आंकड़ों के हिसाब से कम महंगाई भी उसे भारी पड़ सकती है। सबसे अहम बात यह है कि मुद्रास्फीति चाहे औसतन पांच फीसदी के आसपास रही हो, लेकिन खाने-पीने की चीजों की कीमतें हमेशा आठ से 10 फीसदी के हिसाब से बढ़ती रही हैं। पिछले बजट के बाद तो इसमें 12 फीसदी तक वृद्धि देखी गई।
अब हिन्दुस्तान में 67 फीसदी जनता ऐसी है, जो अपने कुल खर्च का 61 फीसदी सिर्फ खाने-पीने के सामान पर खर्च करती है। यही आबादी वोट देने वालों की है, जिस पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है। पिछले चार सालों में आटे का भाव 40 फीसदी ऊपर चढ़ा है, चीनी 20 फीसदी, दालें 50 फीसदी तक महंगी हुई हैं और खाने के तेल के दाम एक तिहाई बढ़ गए हैं। अगर सेवाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो परिवहन और शिक्षा पर लोगों को लगातार ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ, शहरी मध्यम वर्ग को सरकार की नीतियों का लगातार फायदा हो रहा है। मोबाइल फोन, एसी, फ्रिज, टीवी, डीवीडी प्लेयर, बाइक, कार, हवाई यात्रा और कंप्यूटर सस्ते हो रहे हैं। निजीकरण की नीतियों ने पूंजी बाजार में स्पर्धा शुरू कर दी है और अब हिन्दुस्तान में जापान से ज्यादा अरबपति बन गए हैं।
मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में 1,000 से ज्यादा कंपनियों का बाजार भाव 100 करोड़ रुपये से ज्यादा है और दुनिया की हर बड़ी कंपनी हिन्दुस्तान में ऑफिस खोल रही है। इससे असमानता बढ़ रही है। 20 लाख लोगों को रोजगार देने वाले आईटी उद्योग में प्रति व्यक्ति सालाना आय एक करोड़ रुपये से ज्यादा है, जबकि कृषि क्षेत्र में लगे 67 फीसदी लोगों की सालाना आमदनी पांच हजार रुपये से भी कम बैठती है। यह अर्थशास्त्र के साथ-साथ राजनीति की भी नाकामी है। यूपीए सरकार किसानों के कर्ज माफ करके चुनाव से पहले मरहम-पट्टी करना चाहती है, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा महंगाई का मारा हुआ है। जिस दिन उसके हाथ में वोट की लाठी आई, वह अपना हिसाब बराबर कर लेगा।

साभार : एन डी टी वी ख़बर डॉट कॉम

1 comment:

  1. आपके विचारो से सहमत हूँ बहुत बढ़िया

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