पत्रकारिता बनाम पवित्रता

एक पत्रकार के छोटे से पत्रकारिता जीवन की दास्ताँ
वाकई में संसार बदल चुका है. वह जमाना बीती बात हो गयी, जब यह संसार सत्कर्म की धुरी पर चलता था. अब भी धुरी तो वही है, पर संसार की चाल बिगड़ गयी है. सत्कर्म कमजोर और अपकर्म ताक़तवर हो चुका है. ऐसे में सामाजिक और मीडिया के मूल्यों के वजूद की बात करना ही अपने-आप में हास्यास्पद प्रतीत होता है. फिर भी मैं इस मुद्दे पर कुछ कहने की हिमाकत कर रहा हूँ. जो कुछ भी कहूँगा वह मेरे अनुभव और मन की टीस का शब्दों में रूपांतरण कह लें, तो ज्यादा सही होगा.पहली बार एक अंग्रेजी अखबार के लेटर टू एडिटर कॉलम के लिए पत्र लिखा. वह पत्र जब मेरे नाम के साथ प्रकाशित हुआ, तो मैं जितना खुश हुआ, वैसी खुशी शायद उसके बाद कभी महसूस नहीं पाया. पत्रकारिता जब तक पवित्रता का पर्याय लगी, तब तक इसके आगोश में सब कुछ भूलकर समाता गया. मुफ्फसिल संवाददाता से प्रशिक्षु पत्रकार और फ़िर उपसंपादक तक का सफर. इस दौरान कई ऐसे शख्स मिले, जिनसे पत्रकारिता की पवित्रता बरक़रार होने का आभास मिलता रहा. दूसरी तरफ़, ऐसे मस्त भी मिले, जिनसे पत्रकारिता के बदलते स्वरुप, नाम व अर्थ का भान भी होता रहा. पर इस बदलाव को तब गंभीरता से नहीं लिया. पत्रकारिता या पवित्रता को दामन से लगाये रखा और इसमें जितना डूबता गया, जिज्ञासा उतनी ही बढती गई. यह भी सच है कि जिज्ञासा के पीछे बचकाने में लिया गया एक संकल्प ज्यादा हावी था-संकल्प कि 'बहुत बड़ा पत्रकार होकर इस देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरेंगे।'
एक नामी विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया-पत्रकारिता की गहराई मापने की चाह में. पर पहली ही कक्षा में मिली चेतावनी भरी सलाह-'यदि पत्रकारिता करके समाज बदलने की बात सोचते हैं, तो बेहतर होगा यह पाठ्यक्रम अभी ही छोड़ दें, नहीं तो आपका कैरियर तबाह हो सकता है. यदि एक प्रोफेशनल पत्रकार बनने के लिए मन लगाकर पढ़ना चाहते हैं तभी यहाँ बने रहें.' पहले यह सब अजीब लगा, पर धीरे-धीरे ख़ुद को अध्ययन में रमाने लगा. कक्षाओं में अतिथि प्राध्यापक भी आते थे. उनमें कुछ पुराने ज़माने के, तो कुछ नए ज़माने के वरिष्ठ पत्रकार. कोई पत्रकारिता की पवित्रता और इसकी तपस्या से सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर, तो कोई इसके ठीक विपरीत सोच और सीख देने वाले. लेकिन मेरे बचकाने संकल्प पर नए-पुराने प्राध्यापकों की शिक्षा का विचार के स्तर पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा. विचारों में सेंध लगना वैसे भी कोई आसन नहीं होता. मगर परिस्थितियां बदलती हैं, तो विचारों को कुपोषित होना पड़ता है. यह तब महसूस हुआ, जब जेब खाली होने लगी. घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर एक अनजान शहर में खाली जेब गुजारा करना उतना ही मुश्किल है, जितना किसी वीराने में अकेले भटकना. पहला समझौता किया अपने आप से. छोटी सी नौकरी कर ली. नए शहर में ज्यों-ज्यों दिन बीते समझौतों का सिलसिला चलता रहा. विश्वविद्यालय की पहली कक्षा की चेतावनी सही प्रतीत होने लगी. एक के बाद दूसरी, फ़िर तीसरी नौकरी का सफर तय करने लगा. पत्रकारिता की पवित्रता अब नोट के हरे पत्तों में आंकने की मनोदशा बनने लगी, क्योकि इन पत्तों की जितनी मोटी गद्दी पर जो बैठे थे, उसे उतनी ही अधिक पूछ और पॉवर प्राप्त थे. अखबार अब लोकतंत्र के बाकी आधार स्तंभों के नक्शे कदम पर चलने लगे हैं. अब यह सिर्फ़ काले व रंगीन अक्षरों का कारोबार बनके रह गया है. यही नहीं अक्षरों के रंग-ढंग भी काफी बदल गए हैं. अव्वल तो यह कि अब अपढ़-अशिक्षित भी अखबार पलटने लगे हैं. फोटो जर्नलिज्म में बिंदास परिवर्तन आया है.
खैर, अख़बार की दुनिया से निकलकर मीडिया यानी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की दुनिया में भी जाने का मौका मिला. माया नगरी मुम्बई की मायावी दुनिया में कदम रखा, तो यहाँ हर रोज एक नए अनुभव हुए. ख़ुद को अनुकूल बनाते-बनाते एक माह लगे. लेकिन जिस मीडिया होउस में नौकरी करने गया था, उसके अनुकूल छः-सात महीने बाद भी नहीं बन सके. मुम्बई में दलाली का रोजगार सर्वाधिक लोकप्रिय है. यहाँ इसे किसी भी तरह से बुरा या अपमानजनक नहीं माना जाता, बल्कि नौकरी, व्यवसाय में बेहतर कमाई कर लेने वाले भी दलाली खाने के किसी मौके को हाथ से नहीं जाने देते. तभी तो शायद यहाँ के दलाल स्ट्रीट में देश की अर्थव्यवस्था की आत्मा बसती है. मुम्बई में दलाली कमाने की एक नहीं, अनगिनत गलियां हैं. आप अपनी शर्म व हया के चोले को उतार फेंकने को तैयार हैं, तो यह कमाई करने की दृष्टि से आदर्श नगर है. जिस मीडिया होउस में मुझे काम मिला था. उसे पत्रकारिता के 'प' से कम सट्टेबाजी के 'स' से अधिक मतलब था. सटोरियों को उनके नफा-नुकसान से सचेत करने वाली खबरें बेचने का कारोबार. यहाँ के जर्नलिज्म को सिर्फ़ सटोरियों से सरोकार था. बाकी सरोकारों से किसी को कोई मतलब नहीं, जैसे देश की सत्तर फीसदी आबादी सटोरिये हो और शेष आबादी धनी बिजनेस मैन. खैर, छोडिये कब तक इस माहौल में ख़ुद के साथ समझौते करता, ख़ुद को मरता रहता. वेतन/पैसे तो ठीक-ठाक थे, तो क्या सब कुछ यही तो नहीं होता. मायानगरी से तौबा कर ली और वापस लौट आया अपने पुराने ठिकाने. वही पुराना शहर, जहाँ पत्रकारिता के कई रंग-ढंग सीखे थे. इन तमाम अनुभवों का जोड़-घटाव करने के पश्चात् अब पत्रकारिता तो कर रहा हूँ, लेकिन किसी पूंजीपति/सेठ के अखबार में उनकी मुनाफ़ाखोर शर्तों पर नहीं, बल्कि ख़ुद के मीडिया होउस में, जो हालांकि पत्रकारिता को नए ढंग से परिभाषित करता है, लेकिन अपनी पवित्रता से समझौता नहीं करता.....अब देखते हैं पत्रकारिता की पवित्रता के साथ इस बदले संसार में कितनी दूरी तक चल पाते हैं...

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