आतंक का अंतहीन दौर

हृदयनारायण दीक्षित
मनुष्य ही नहीं कीट-पतंगा भी आत्मरक्षार्थ युद्ध करते है। आत्मरक्षा जीवमान राष्ट्र का भी प्रथम कर्तव्य है, लेकिन भारतीय राष्ट्र-राज्य आक्रमण पर भी हथियार नहीं उठाता। राष्ट्र एक अंतहीन युद्ध की गिरफ्त में है। हुक्मरान इसे आतंकवाद कहते है। मुस्लिम संगठन इसे 'जेहाद' कहने पर आपत्ति जताते हैं। सभी सत्तारूढ़ ऐसे हमलों को 'कायराना' बताते है और अपनी कोरी बयानबाजी को पराक्रम समझते है। भारतीय शासक युद्ध लड़ने का साहस नहीं दिखाते। जयपुर रक्तरंजित हुआ, करीब 70 लोग मारे गए, 150 जख्मी हुए। इसी दिन रक्षामंत्री एके एंटनी ने घुसपैठ बढ़ने की पुष्टि की। उन्होंने मौसम विभाग की तर्ज पर आतंकी घटनाओं का अंदेशा जताया। सुप्रीम कोर्ट ने घुसपैठ को राष्ट्र पर आक्रमण बताया था। केंद्र मौन रहा। आखिर घुसपैठिए वोट बैंक बनते है। जयपुर पहला आक्रमण नहीं है। मनमोहन सिंह के राज में ही दिल्ली, वाराणसी, मुंबई, मालेगांव, हैदराबाद, अजमेर, फैजाबाद, वाराणसी, लखनऊ, लुधियाना में आतंकी हमले हुए। संप्रग राजग पर आरोप लगाता है, वारदात और मृतक संख्या पर बहस करता है, राजग संप्रग पर नरम रुख अपनाने का आरोप जड़ता है, पोटा खात्मे का तर्क भी देता है। दु:खद आश्चर्य है कि हजारों नागरिकों की हत्या के बावजूद राजनीति इसे 'राष्ट्र के विरुद्ध युद्ध' नहीं मानती।
इंटेलिजेंस ब्यूरो के संयुक्त निदेशक रहे केंद्र सरकार के निवर्तमान वरिष्ठ अधिकारी मलयकृष्ण धर के निष्कर्ष तथ्यपरक है-''भारत अंतरराष्ट्रीय जेहाद के निशाने पर है। यह भी समझ लेना चाहिए कि यह खिलाफत आंदोलन का दोहराया जाना नहीं है। यह जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर जैसे धर्मयुद्ध की घोषणा है।'' धर याद कराते हैं- ''याद करिए जब बाबर राणा सांगा की सेनाओं से घिर गया तो उसने सेना के जवानों से कहा शराब छोड़ो, सांगा से जेहाद करो। उसके बाद धार्मिक नेता शाहवली उल्लाह (1703-1762) ने अब्दाली को मराठों के खिलाफ जेहाद का न्यौता दिया कि अल हिंद में इस्लाम का गौरव लौटाया जा सके।'' धर कट्टरपंथी नहीं, वरिष्ठ आईपीएस है। वह आधुनिक जेहाद को इसी पुरानी विचारधारा का विस्तार मानते हुए लिखते है कि बाबर और वलीउल्लाह की वह कड़ी इन जेहादियों में बनी हुई है। देश को इससे निपटने के लिए जल्दी से तैयार हो जाना चाहिए। दरअसल सभ्यता और सांस्कृतिक विस्तार के दो ही मार्ग है। एक मार्ग युद्ध का है। अरब की विस्तारवादी जेहादी विचारधारा युद्धप्रिय है। प्रीति, प्यार, ममत्व और विचार प्रवाह का दूसरा मार्ग है। भारत प्राचीन काल से इसी मार्ग का प्रतिनिधि है। कबायली अरबी सभ्यता अपने जन्मकाल से ही आक्रामक है। दुनिया पर वर्चस्व उसका मकसद है। जेहादी आतंकवाद एक युद्धपिपासु मुकम्मल विचारधारा है। जमायत-ए-इस्लामी आतंकवादी संगठन नहीं माना जाता। इंदिरा गांधी ने 1975 में इस पर प्रतिबंध लगाया था। इसके संस्थापक मौलाना मौदूदी सिमी के 'ख्याले आजम' हैं। मौदूदी ने 'जेहाद फीस बिल्लाह' में समझाया-''इस्लाम सिर्फ एक मजहबी अकीदा (आस्था) नहीं है। यह संपूर्ण जीवन पद्धति है। यह पार्टी अपने जिंदगी मकसद के लिए जेहाद शुरू कर देती है कि वह गैर-इस्लामी निजाम की हुक्मरानी को मिटाने की कोशिश करे।''
सिमी का जेहादी ऐलान गौरतलब है-''वक्त की मांग है कि कुरान पाक की रोशनी में दुनिया को शैतानी पंजों से मुक्त कराने, दीनी (इस्लामी) व्यवस्था को सर्वोपरि लाने के लिए मुस्लिम युवक संघर्ष करें।'' आतंकी संगठन सैकड़ों है, नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। सभी जेहादी संगठनों के मकसद एक है। सब हमलावर है, युद्धरत हैं। केंद्र सरकार प्रत्येक वारदात में आतंकी संगठन का नाम पता लगाकर खुश हो जाती है। सुरक्षा बल जान की बाजी लगाकर उन्हे गिरफ्तार भी करते है, उन पर सामान्य कानूनों में मुकदमा चलता है, उनके विरुद्ध गवाह नहीं मिलते। कई साक्ष्य के अभाव में छूट भी जाते है। सुरक्षा बल निर्दोष मुसलमानों को सताने का घटिया आरोप झेलते है। जेहादी बेखौफ हमलावर होकर आते है, उन्हे मारे जाने पर जन्नत की गारंटी है। वे धर्मयोद्धा है, वे किसी को भी मार देते हैं-बच्चों को, महिलाओं को, वृद्धों को। वे मंदिर या आस्था केंद्रों को ही निशाना बनाते है, खून बहाते है। वे बहुधा पाकिस्तानी, बांग्लादेशी भी होते हैं, कभी-कभी इसी देश के भी, लेकिन हर वारदात में उनकी मदद 'देसी जेहादी'' ही करते है। देसी लोग उन्हे घर टिकाते है, मौका-ए-वारदात तक ले जाते है, भाग जाने का रास्ता दिखाते है। वे युद्ध करने ही आते हैं, बावजूद इसके वे संभ्रांत नागरिक की तरह न्याय व्यवस्था का लाभ लेते है और उनके देसी सहयोगी मौज में रहते है। छद्म सेकुलर राजनीति देसी संदिग्धों की खोजबीन, तफ्तीश, तहकीकात की हिम्मत नहीं जुटाती। वोट बैंक बाधा बनता है।
भारत उदार है, आर्थिक नीतियों का भूमंडलीकरण है, अमीरी, गरीबी और महंगाई वैश्विक है। अर्थव्यवस्था में उछाल है। जेहादी विचारधारा की मांगें जन्मकाल से ही वैश्विक हैं। भारत उनका स्वागतकर्ता है। महात्मा गांधी जैसे घोर राष्ट्रवादी ने भी खिलाफत जैसे घोर सांप्रदायिक आंदोलन को गले लगाया और खिलाफत के सत्याग्रही भी बने। मो. बिन कासिम (सातवीं सदी) के हमले से लेकर गजनी, गोरी, बाबर सहित अफजल के हमले तक भारत के ही लोग किसी न किसी रूप में विदेशी जेहादी हमलों के प्रत्यक्ष-प्रछन्न सहायक बने। संप्रति जेहादी आतंकवाद का भूमंडलीकरण है। भारत के सभी राज्यों में, सभी जिलों और सभी क्षेत्रों में जिहादी आतंकवादी विचारधारा है। अमेरिका में आतंकी की सुनवाई फौजी न्यायालय करते है, उन्हे वकील की सुविधा नहीं मिलती। अमेरिका ने आतंकवाद को युद्ध और हमला माना है। भारत की नीतियों में यह सामान्य अपराध है। यह युद्ध रणनीति या युद्ध कौशल कदापि नहीं है। हमला तो कतई नहीं। आतंकी बिगडै़ल अतिथि है। कानून उनका सम्मान करता है। कोर्ट सजा भी सुनाती है तो केंद्र 'अनुकंपा अर्जी' के लिए तैयार और तत्पर है। आतंकवाद की सभी घटनाओं का एक केंद्रीय विचार है। सरकारे खंडों में सोचती है। जयपुर कांड में हुजी पर शक किया जा रहा है। हुजी का गठन 1980 में जमायत-ए-इस्लाम और तबलीगी जमात ने रूस के विरुद्ध अफगान मुजाहिदीन की मदद के लिए किया था। अमेरिका इस लड़ाई का मददगार था। अलकायदा और आईएसआई ने उसे भारत और बांग्लादेश के लिए तैयार किया। आईएसआई ने ही लश्कर-ए-तोयबा बनवाया था। जैश-ए-मोहम्मद को मौलाना मसूद अजहर ने खड़ा किया।
भारत विश्व के सभी जेहादी आतंकियों का निशाना है। यह इस विचारधारा का युद्धस्थल है। यहां हिंदू बहुसंख्यक हैं, यहां मंदिर है। मंदिरों के आस-पास उन्हे जेहादी विचारधारा से इनकार करने वाले 'स्थाई शत्रु' मिल जाते है। पाकिस्तान, बांग्लादेश की खुफिया एजेंसियां उन्हे मदद करती है। भारत में घुसपैठ कराती है, लेकिन उन्हे दोष देने का कोई फायदा नहीं। केंद्र स्वयं ही घुसपैठियों का स्वागत करता है और आतंकियों को सहूलियत देता है। पोटा इसीलिए हटाया गया। इसीलिए आतंकवाद के 'स्थानीय सहयोगियों' पर सरकारी रुख में नरमी है। युद्ध और हमलों को भी नजरअंदाज करने के जज्बात कोई भारत सरकार से सीखे।..लेकिन राष्ट्र क्षुब्ध, आहत और बेहद गुस्से में भी है।
साभार : जागरण डॉट याहू डॉट कॉम

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