कुआं व खाई के बीच फंसी अभिव्यक्ति

उदय केसरी
कई दिनों से मन में एक द्वंद्व है कि इस आजाद लोकतांत्रिक देश में जब सत्ता और संपत्ति, तमाम आचार-विचार-संवाद और जनविरोध-प्रदर्शन-भूख हड़ताल या अनशन से व्यवहारिक तौर पर बड़ी हो चुकी है, तब फिर अभिव्यक्ति की आजादी क्या कभी सत्ता एवं संपत्ति वानों की आत्मा जगा पाएगी?....नहीं ना!....तो फिर क्या यही अभिव्यक्ति जनता को उद्वेलित नहीं करेगी?...हां!...तो क्या यह सत्ता और संपत्ति वानों को कभी मंजूर होगा? नही ंना!....ऐसे में क्या सच को सच्चाई के साथ अभिव्यक्त करने वालों के समक्ष इससे-एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई-वाली स्थिति पैदा नहीं होती? दरअसल,
इस द्वंद्व से हाल के दो-तीन वर्षों में पत्रकारों को शायद सबसे अधिक गुजरना पड़ा होगा, क्योंकि वे सत्ता से नहीं तो संपत्ति यानी किसी न किसी पूंजीपति से जरूर जुड़े होते हैं, जिसके संसाधनों के दम पर वे पत्रकारिता की राह पर चलते हैं और इसमें उनके खुद की संपत्ति का सपना भी जुड़ा होता है। बेशक, इस देश में पत्रकारिता अब भी न्यायपालिका के समकक्ष ही विश्वसनीय है और देश की जनता को लोकतंत्र के होने का सबसे ज्यादा अहसास भी शायद इसी से होता है। इसके बाद भी देश की विधायिका और कार्यपालिका सर्वशक्तिमान है। उसे अभिव्यक्ति को दमित और उपेक्षित करने का अघोषित अधिकार प्राप्त है। इतना कि वह कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर देशद्रोह का मुकदमा दायर उसे गिरफ्तार कर सकती है? पश्चिम  बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अंबिकेश महोपात्रा को गिरफ्तार किया जा सकता है और ऐसे ही कई कार्टूनिस्टों, पत्रकारों, लेखकों, चित्रकारों और यहां तक टिप्पणी या प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले पाठकों तक को कभी भी अपनी अभिव्यक्ति पर दंडित होना पड़ सकता है। इसके जाने-अनजाने कई उदाहरण देश भर में आज भी मौजूद हैं।
इस द्वंद्वात्मक माहौल का प्रभाव परजीवी पत्रकारों पर सबसे अधिक पड़ता है, जिससे कई बार मन में निराशा उत्पन्न होती है...तो कई बार विद्रोह। मुझे लगता है कि जब निराषा से व्यथित होकर कोई विद्रोह की अवस्था में आता है, तब वह सहिष्णुता की अनदेखी करने की गलती कर बैठता है। हालांकि ऐसी अभिव्यक्ति में यह गलती भी स्पष्ट तौर पर जाहिर रहती है। असीम त्रिवेदी के कार्टूनों में ऐसी ही गलती जरूर नजर आती है-कि उनके कार्टूनों के अभिप्राय पूर्णतः सत्य हैं, लेकिन उनका चित्रण असहिष्णु तरीके से किया गया है। लेकिन इस गलती का कोई भी गलत असर दर्शकों पर नहीं पड़ता है। या कहें इससे नफरत नहीं फैलती। मसलन, हिंसा गलत है, लेकिन भगत सिंह की हिंसा देशभक्ति की प्रेरणा देती है....न कि देश के प्रति नफरत की। फिर भी यदि अभिव्यक्ति को बेलगाम बताकर उन्हें लक्ष्मणरेखा की याद दिलाने के नाम पर कार्रवाई की जाती है, तो सवाल उठता है कि क्या लक्ष्मणरेखाएं केवल उन्हीं के लिए खींची गई हैं, जो सत्ता और संपत्ति से दूर हैं?...संविधान के तहत यदि देश चलता है और तमाम कानून लागू होते हैं तो क्या ये सब सत्तावानों को खिलाफ लागू नहीं होते? मसलन, एक तरफ, कर्नाटक के विधानसभा के अंदर दो सदस्य अश्लील फिल्म देखते हैं, देश की संसद में नोटों की गड्डियां लहराई जाती है, एक-दूसरे पर माइक और कुर्सियां फेंकी जाती हैं, हाथापाई होती है...यही नहीं, सत्तावान राजनीतिक दल के नेता सीएजी जैसी संवैधानिक संस्था की रिपोर्ट और उसके प्रमुख के खिलाफ घोर आपत्तिजनक सवाल उठाते हैं। तो दूसरी तरफ, राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे जैसे नेता आए दिन असंवैधानिक तरीके से क्षेत्रवादी भड़काऊ बयान देकर दंगे-फसाद फैलाते रहते हैं।.....ये सब क्या देशद्रोह और संविधान के अपमान की श्रेणी में नहीं आते हैं?
यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता के बीच से निकलकर अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल सरीखे लोग संसद में मौजूद विभिन्न आपराधिक मामलों में आरोपी मंत्रियों एवं सांसदों के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उनका दमन यह कहकर किया जाता है कि इससे संसद रूपी लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का अपमान होता है...लोकतंत्र कमजोर होता है।....तो क्या जब यही सवाल संसद के अंदर बैठने वाला विपक्ष उठाता है और संसद पूरा का पूरा सत्र हंगामें की भेंट चढ़ा देता है तो लोकतंत्र कमजोर नहीं होता? सवाल है कि आखिर वास्तव में देशद्रोह है क्या? एक तरफ, देश की एकता व अखंडता के खिलाफ आग उगलने वाले और प्रगति के खिलाफ घोटाला करने वाले सत्ता की कुर्सियों पर पहुंच जाते हैं, वहीं इनके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वालों को अंग्रेजों के जमाने के कानून 124ए के तहत देशद्रोही करार देकर दमित करने की कोशिश की जाती है। जिस कानून को बनाने वाले ब्रिटिश खुद अपने देश में इसे खत्म कर चुके हैं, लेकिन भारत में यह विवादित कानून आज भी मौजूद है। आजादी के बाद से संविधान और उसके कानूनों में अनेक संषोधन किए गए, लेकिन इस कानून में आजाद परिवेश के अनुरूप आजतक कोई सुधार नहीं किया गया। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के खिलाफ इसी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है, जिससे साफ है कि सत्ता और संपत्ति से लड़कर लोकतंत्र को बचाए रखने की कोशिश में लगातार दमन, शोषण और अत्याचार का सामना करना पड़ेगा।...इससे मुक्ति केवल जनता के समवेत और सतत प्रतिकार में ही निहित है।

1 comment:

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