‘चोरों’ की मदद से ‘डकैतों’ से बाबा की जंग

उदय केसरी
काफी दिनों की चुप्पी के बाद भाजपा ने टीम अन्ना के राजनीतिक पार्टी बनाने के फैसले पर अब अपनी बौखलाहट जाहिर की है। इससे यह साफ हो गया है कि भाजपा को भी भ्रष्टाचार के मुद्दे से नहीं, बल्कि महज सत्ता से मतलब है।
तभी जब तक उसे टीम अन्ना का आंदोलन कांग्रेस विरोधी लगा, उसे समर्थन दिया और अब पार्टी मुखपत्र कमल संदेश के संपादकीय में टीम अन्ना पर निशाना साधते हुए  टीम अन्ना को अवसरवादी और दलदल में धंसा बताया गया है। दरअसल,पार्टी के अंदर भय है कि देशभर में कांग्रेस विरोधी लहर का फायदा कहीं टीम अन्ना की पार्टी ने उठा ले और भाजपा यूंही देखती रह जाए।
यही वजह है कि अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन गडकरी खुले तौर पर रामदेव के आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं और उसे कांग्रेस विरोधी लहर पैदा करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश में लगे हैं। इसके साथ ही जदयू नेता शरद यादव और अकाली दल के नेता ने रामलीला मैदान में रामदेव के मंच पर पहुंचकर जहां अपनी रणनीति-2014 जाहिर कर दी है, वहीं खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने बाहर से ही रामदेव के पक्ष में बयान देकर अपने दामन पर लगे दागों को छुपाने की कोशिश की है, ताकि आगामी चुनावों में जनता कांग्रेस की श्रेणी में उनकी गिनती न करें।

जाहिर है कि भ्रष्टाचार पीड़ित देश की चिंता यदि सत्तारुढ़ कांग्रेननीत यूपीए को नहीं है तो भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को भी नहीं है। दोनों बड़े गठबंधनों को बस दिल्ली की गद्दी पाने की चिंता है। ये पार्टियां सरकार विरोधी आंदोलनों को बस अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं। पहले ये अन्ना हजारे के आंदोलन को इस्तेमाल करना चाहे, लेकिन विफल रहे, तो अब बाबा रामदेव के काले धन के खिलाफ आंदोलन को चारा डाल रहे हैं। वैसे, बाबा के आंदोलन पर सदा से भाजपा प्रायोजित होने का आरोप लगता रहा है, जो पहले चरण के रामलीला मैदान के अनशन से किसी को स्पष्ट नहीं हुआ था, लेकिन इसबार बहुत हद तक स्पष्ट दिखने लगा है। जंतर-मंतर पर टीम अन्ना के भ्रष्टचार विरोधी अनशन से समान दूरी बनाने वाले और लगातार विरोधी बयान देने वाले नेताओं को आखिर अचानक बाबा रामदेव का आंदोलन बेहतर क्यों लगने लगा? क्या इसलिए क्योंकि इस बार टीम अन्ना ने भाजपा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार को भी निशाना बनाया। पिछले दिन एक खबरिया चैनल की एक बहस में जब यही सवाल बाबा रामदेव के समर्थक वक्ता से पूछा गया तो जवाब था-कि बाबा की रणनीति फिलहाल छोटे अशुभ को साथ लेकर बड़े अशुभ का खात्मा करने की है। एक साथ भ्रष्टाचार का सफाया नहीं किया जा सकता है। इस जवाब पे चैनल के एंकर ने तत्काल चुटकी ली-तो क्या बाबा भी यूपी के पीडब्ल्यूडी मंत्री शिवपाल सिंह यादव के मंत्र पर चल रहे हैं? यानी ‘चोरी करो, मगर डकैती नहीं’ की तर्ज पर कहें तो ‘चोरों को छोड़ो, डकैतों को पकड़ो’।

 दरअसल, इस बार बाबा रामदेव के आंदोलन की शुरुआत ही विवाद से हुई। मंच पर लगे महापुरुषों के बड़े पोस्टर में शहीद चंद्रशेखर आजाद और शहीदेआजम भगत सिंह के बीच बड़े आकार में रामदेव के निकटम सहयोगी आचार्य बालकृष्ण की तस्वीर लगी हुई थी, जबकि ये आचार्य महोदय फर्जी पासपोर्ट के मामले में जेल में बंद हैं। फिर बाबा के स्वर पहले तीन दिनों तक सरकार या कांग्रेस के खिलाफ काफी नरम थे, इसके बाद तीखे और एकपक्षीय होते चले गए। दो दिनों तक बाबा रामदेव महज अपने आंदोलन की रणनीति का सस्पेंस बनाते रहे, जो पांचवें दिन मानों खुद ब खुद टूट गया है। संसद की ओर कूच, गिरफ्तारी, फिर सरकार से अनशन तोड़ने के लिए भोजन-पानी की मांग आदि के बाद छठें दिन उन्होंने खुद अनशन तोड़ लिया। पहले बाबा ने आह्वान किया कि वे अनशन स्थगित कर रहे हैं आंदोलन जारी रहेगा, पर अनशन तोड़ते ही आंदोलन जारी रखने की बात भूलकर बाबा हरिद्धार के लिए रवाना हो गए।

 पहले ‘काला धन लाओ देश बचाओ’ फिर ‘कांग्रेस हटाओ देश बचाओ’ के नारों ने बाबा रामदेव की असल मंशा पर कहीं न कहीं सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। हिसार चुनाव के दौरान कांग्रेस का एकपक्षीय विरोध करके इसका दंश टीम अन्ना पहले ही भुगत चुका है, अब बाबा रामदेव द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को हराने की मुहिम चलाना भ्रष्टाचार और कालेधन के मुद्दों को अनिश्चितकाल के लिए तिलांजलि देने जैसा ही होगा। बहरहाल, कांग्रेस को उसकी करणी की सजा जनता आगामी लोकसभा चुनाव में तो निश्चित तौर पर देगी, लेकिन सवाल है कि 8-9 साल बाद भी जो भाजपा या एनडीए अब तक भारतीय जनमानस में कांग्रेस का बेहतर विकल्प बनने की योग्यता नहीं बना पाई, वह क्या बाबा रामदेव के कांग्रेस विरोधी मुहिम के भरोसे सत्ता हासिल कर पाएगी? वह भी तब जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ समूचे भारत में अलख जगाने वाली टीम अन्ना की राजनीतिक पार्टी भी मैदान होगी।        

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