ये क्या हो रहा है देश में?

उदय केसरी 
ये क्या हो रहा है देश  में? नैतिकता और कर्तव्यों का गला घोंट का भ्रष्टाचार और लूट; सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा रूपी खंजर से जन आंदोलनों की हत्याएं; महंगाई की मार से कराहती जनता को मोबाइल देने की योजना-क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं? वह भी दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। शायद नहीं, बल्कि यह परोक्ष अराजकता है।
इसे ’धोखाराज’ भी कहना गलत नहीं होगा।
जब लोकतंत्र में ‘लोक’ की महत्ता ही लुप्त हो जाए तो शेष बचे ‘तंत्र’ को निरंकुश होने से कौन रोकेगा? क्या सत्ता से बाहर की राजनीतिक पार्टियां? कतई नहीं! क्योंकि इनकी सारी राजनीति बस इसी लोकविहीन तंत्र का उत्तराधिकारी बनने तक सीमित है। अन्यथा, देश को ऐसी अराजक दिशा में लेने जाने वाली सत्तासीनों के खिलाफ ये यूं चुप नहीं रहते हैं। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की यूं हत्या नहीं हो जाती।
आजादी के 65 साल बाद इस व्यस्त और आधुनिक दुनिया में यदि किसी आंदोलनकारी के पीछे लाखों की संख्या में आम जन बिना किसी स्वार्थ के इकट्ठा होते हैं; देशभर में अनशनों का दौर चलता है; देश की राजधानी में अनशन पर बैठे लोग मरणासन स्थिति में पहुंच जाते हैं- इन सबके बाद भी सरकार उनसे बात तक करना जरूरी नहीं समझती; क्या ऐसी सरकार को जिंदा कहा जा सकता है? स्पष्ट है नहीं; यह मुर्दा सरकार केवल चुने हुए लोगों से बात करती है। खासकर तब जब उसकी सरकार बचानी या बनानी होती है। इसके लिए वह खरीद-फरोख्त के दांव भी आजमाने से नहीं चूकती। वहीं गैर निर्वाचित या कहें आम जनता के नायकों या कहें जननायकों को वह अछूत और दुश्मन  की दृष्टि से देखती है।
लोकतंत्र में धरना, प्रदर्शन, अनशन व आंदोलनों को प्राणवायु के रूप में देखा जाता है। इसके बगैर लोकतंत्र को मृत कह सकते हैं। दबाव समूह की अवधारणा इनसे ही पूर्ण होती है, लेकिन जिस लोकतंत्र में प्राणवायु के ही प्राण निकलने लगे तो उसे कौन सा तंत्र कहेंगे? केंद्र की यूपीए सरकार को नेतृत्व करने वाली कांग्रेस की दलील रही है कि ऐसे धरना, प्रदर्शन, अनशन व आंदोलनों में जनता नहीं सरकार विरोधी शक्तियां होती हैं, जो निजी स्वार्थ के लिए यह सब करती हैं। यदि वास्तव में जनता नेताओं को चोर, भ्रष्ट समझती तो उन्हें ही बार-बार चुनकर संसद क्यों भेजती है? दरअसल, जैसा समाज होता है, वैसे ही नेता चुनकर आते हैं। यदि भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना है तो पहले समाज को बदलना होगा। आंदोलन करने वालों को यदि यह बात समझ में नहीं आती तो वे खुद चुनकर आएं और सरकार बनाएं। इस दलील से स्पष्ट है कि वर्तमान भारतीय लोकतंत्र में मर्ज का इलाज करने के लिए मरीज को खुद डाॅक्टर बनना होगा।
जयप्रकाश नारायण से लेकर अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, बाबा रामदेव समेत अन्य कई जननेताओं के आंदोलनों को यदि सरकारी दमन, उपेक्षा, तिरस्कार का सामना पड़ा है, तो कहीं न कहीं यह भारतीय लोकतंत्र की विपफलता का परिचायक है, जो दो सौ साल की मेहनत से आजाद कराए गए भारत को फिर से गुलामी की दिशा में ले जा सकता है। यह प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। जनता को जाति, धर्म, वर्ग और क्षेत्रों में बांटकर उनकी सोच को राष्ट्रवाद से संकीर्णतावाद और स्वार्थवाद की ओर ले जाना आज राजनीति हो चुकी है। नगरीय निकायों और राज्यों में यह राजनीति तो काफी हद तक अपनी जड़ जमा चुकी है; मसलन, वोट के बदले यूपी में लैपटाॅप, तो तमिलनाडु में टीवी आदि बांटने का प्रचलन। यही राजनीति अब राष्ट्रीय स्तर पर भी होने लगी है, जो हाल तक तो पर्दे के पीछे थी, लेकिन अब लगता है सामने भी आने वाली है, मसलन, 2014 के लोक सभा चुनाव के मद्देनजर गरीबों को केंद्र सरकार मुफ्त मोबाइल फोन बांटने की योजना बना रही है।........क्या ऐसे हालत में आपका मन विचलित होकर यह सवाल नहीं करता...ये क्या हो रहा है देश में?

1 comment:

  1. wah uday babu......khoob likha.....kam se kam sone wale to jag jayenge...jo mar gaye unhe dafna denge

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