भटक वे नहीं, मीडिया गया है

उदय केसरी
मेरे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकार साथियों का टीम अन्ना के समर्थन को लेकर प्रायः मतभेद होता है। वे टीम अन्ना की हर छोटी-बड़ी गलतियों और उनपे लगने वाले आरोपों व उठने वाले सवालों को आधार बनाकर टीम अन्ना के प्रति मेरे सकारात्मक विचारों को खंडित करने की कोशिश करते हैं। मैं हर बार उनसे कहता हूं कि व्यक्ति या संगठन से कहीं बड़ा उसके विचार और मकसद होते हैं।
यदि तुम्हें टीम अन्ना के विचार और मकसद सही लगते हैं, तो फिर व्यक्तिगत टीका-टिप्पणियों के आधार पर क्यों एक नेक और राष्ट्रव्यापी मकसद की अनदेखी करते हो। ऐसे तो कोई भी दूध का धुला नहीं है। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है, दरअसल टीम अन्ना का छिपा मकसद कुछ और है। मैंने जब-जब उनसे टीम अन्ना के छिपे मकसद के बारे में पूछा तो वे उन्हीं बातों को दोहराते रहे, जो एक दिन पहले दिग्विजय सिंह सरीखे नेता व अन्य तथाकथित बुद्धिजीवी कहते, लिखते रहे। कभी यह कि वह संघ परिवार का एजेंट है, तो कभी वह भाजपा का। कभी वह दलित व पिछड़े समुदायों का विरोधी है...आदि....आदि। हर बार उन्हें मैंने एक ही जवाब सवाल के रूप दिया- इससे क्या फर्क पड़ता है-जनलोकपाल कानून क्या उनकी बपौती होगी? इस बार भी ऐसे ही कुछ पत्रकार मित्र मेरे सामने बड़े ही विजयी मुद्रा में कहने लगे-देखा जंतर-मंतर पर टीम अन्ना का अनशन फ्लाॅप हो गया, भीड़ गायब हो गई। हम कहते थे टीम अन्ना के लोग भटक गए हैं। इसबार मेरा जवाब कुछ अलग था-भटक वे नहीं, मीडिया गया है। उसकी नजर इसबार सरकार की धोखेबाजी, चालबाजी और षड्यंत्र पर नहीं; अपनी जान की बाजी लगाकर अनशन कर रहे अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और गोपाल राय की बिगड़ती तबीयत पर नहीं, बल्कि जंतर-मंतर पर जुटने वाली भीड़ की संख्या पर टिकी है, जो कल तक टीम अन्ना के अनषन को अधिक-से-अधिक दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने में लगे रहते थे। इस भटकाव के पीछे का सच आखिर क्या है? ऐसी गिनती तो मीडिया ने मुंबई में अन्ना के अनषन के वक्त भी नहीं की थी।

जाहिर है भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को कुचलने वाली ताकतें अब हर प्रकार के हथकंडे अपनाकर किसी भी तरह से जनता की आवाज को दबाना चाहती हैं। इसलिए अब भय और भ्रम को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। हाल ही में केंद्र सरकार के मंत्रियों का एक ग्रुप प्रेस ब्रीफिंग के लिए बनाया गया है। यह ग्रुप समय-समय पर देष के जाने-माने अखबार व न्यूज चैनलों के संपादकों को बुलाकर प्रेस ब्रीफिंग के नाम पर एडवाजरी देता है-कि कौन से मुद्दे को नहीं उछाले या दिखाएं या किस हद तक दिखाएं। ऐसे मुद्दों में अन्ना का मुद्दा भी प्रमुख है, जिसे ज्यादा कवरेज नहीं देने की एडवायजरी मिलते ही कई चैनलों ने उसका पालन करना प्रारंभ कर दिया। अब सरकारी एडवायजरी को सामान्य अर्थ में सरकारी धमकी या भय न कहें तो और क्या कहें। वैसे मीडिया जब से काॅरपोरेट जगत की राह पकड़ा, तब से पत्रकारिता के मायने किस तरह से बदले हैं, यह अब किसी से छुपा नहीं रहा है। ऐसे में, देषहित कितना पीछे चला गया है, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि जब पूरा देश  भ्रष्टाचार और महंगाई से त्राहिमाम है तो देश की राजधानी में चार दिनों से जारी भ्रष्टाचार विरोधी आमरण अनशन की खबरों से ऊपर एनडी तिवारी के पिता साबित होने की खबर सुर्खियों में चलती है। असम के दंगे में दो लाख लोग बेघर हो जाते हैं, जिसकी सुध मीडिया को पहले 7 दिनों बाद होता है, फिर भी यह खबर ज्यादा देर या दिन तक सुर्खियों में नहीं रहती। साफ है, इन दोनों खबरों से सत्तासीन कांग्रेस का संबंध है।

बहरहाल, ऐसे हालातों के बीच चलते इस देश की जनता को किसी भ्रम में पड़ने की बजाय खुद के विवेक और समझदारी पर ज्यादा भरोसा करने की जरूरत है, क्योंकि अनीति और भ्रष्टाचार की सबसे गहरी मार आखिरकार जनता को ही झेलनी पड़ती है।

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