बम विस्फोट अब आम बात...आम खबर

उदय केसरी
भारत में अब बम विस्फोट कोई सनसनीखेज बात नहीं रही...और न यह मीडिया के लिए बड़ी खबर रही। अब हर एक-दो दिन में विस्फोट होने लगे, तो उसे कोई न्यूज चैनल या अखबार वाला कब तक अपनी प्रमुख खबर बनाते रहेंगे।...आखिर जब खबरों को देखने व पढ़ने वाले देशवासियों के लिए विस्फोट की घटना सनसनीखेज नहीं रही, तो मीडिया वाले क्योंकर अपनी टीआरपी घटाना चाहेंगे,सो एक अक्टूबर को त्रिपुरा की राजधानी अगरतला जब पांच श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोटों से दहल उठा, तो इसकी धमक केवल अगरतला के लोगों ने ही पूरी संवेदना से महसूस की। बाकी देशवासी दशहरा मनाने, ईद का चांद देखने, गरबा-डांडिया नृत्य, तो द्रोणा फिल्म के प्रीमियर शो की खबर जानने में व्यस्त थे और न्‍यूज चैनल वाले भी इन्‍हीं की खबर परोसने में लगे हुए थे।

देश में दो दिनों के अंतराल में चार बम विस्फोट हुए, शनिवार (27 सितंबर) को दिल्ली के महरौली में, सोमवार (29 सितंबर) को गुजरात के साबरकांठा और महाराष्ट्र के मालेगांव में, वहीं बुधवार (1 अक्टूबर) को त्रिपुरा की राजधानी अगतला में। जबकि पंजाब व उत्तरप्रदेश के अलग-अगल स्थानों से कई जिंदा तो कुछ अधूरे बम भी बरामद किये गए। अपना देश बमों से इतना बम-बम हो चुका है कि दीपावली में फूटने वाले बमों का रोमांच शायद इस बार लोगों में कम रहे। क्योंकि लोग पहले से ही असल बमों के इतने धमाके सुन लिये हैं कि नकली बमों की आवाज अब क्या उन्हें रोमांचित कर पायेगी।

पर, उनके घरों में दीपावली के नकली बम भी दहशत बढ़ाने और जख्म ताजा करने में सफल रहेंगे, जिन घरों के बच्चे, जवान, बूढ़े़ व महिला दहशतगर्दों के बम धमाकों में मारे गए या घायल हुए। उनके घरों में इस बार खुशहाली का दीपक नहीं जलेगा, बल्कि आतंकी दहशत का अंधेरा कायम होगा। खैर, बाकी देशवासियों को इससे क्या, जो बच गए वो तो भाग्‍यशाली हैं, इसलिए उनकी दीपावली तो दीपकों की रोशनी और पटाखों की आवाजों के बीच हंसते-गाते या जुओं में दाव लगाते बीतेगी।

13 मई को जयपुर में हुए नौ धमाकों में 68 लोगों की मौत व अनेक घायल हुए। 25 जुलाई को बेंगलुरू में सात धमाकों में दो की मौत, कई घायल हुए। फिर 26 जुलाई को अहमदाबाद में 22 बम धमाकों में 58 से अधिक लोग मरे, सौ से अधिक जख्मी हुए। इसके बाद दिल्ली में 13 सितंबर को पांच धमाकों 24 लोगों की जानें गईं, जबकि 100 घायल हो गए।

इन धमाकों के शिकार घरों में इस दशहरा व दीपावली पर खैर, चाहे जैसा भी माहौल रहे...पर ऐसा नहीं लगता कि पूरे देश का ही माहौल खराब हो गया है। ऐसा नहीं, लगता कि हमें खुद व खुद के परिवार से अधिक किसी के प्राणों से कोई खास मोह नहीं रहा है... देश व समाज के प्रति मोह और उसके दुश्‍मनों के विरुद्ध हुंकार की तो बात ही करना बेमानी हो गई है।...

4 comments:

  1. sanvedna marne na paye. koshish aise hi jari rakhiye.

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  2. samay ko koi nahi rok sakta. rajeev gandhi chale gaye desh chal raha hai

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  3. sir bhale hi yah media ke liye naya na ho lekin jo log apnoa ko is bisfot main gawate hai unke liye yah aajivan tees bani rahegi

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  4. कोई असामान्य घटना ख़बर होती है.बम बिस्फोट तो रोज ही कहीं न कहीं हो रहे है उनका असर चाहे कम हो या ज्यादा.इन कारणों से लोगों को अब उनकी आदत सी होती जा रही है.
    अब कोई बिस्फोट लोगो का ध्यान खींच नही पाता, लगता है दुःख भी अपनी सार्वभौमिकता खो रहा है,अब यह व्यैक्तिक होता जा रहा है.

    दुःख का उसपर ही असर होता है जो ख़ुद या उसका कोई अपना घटना से प्रभावित होता है,उन्हें ही ऐसी ख़बर की जरूरत होती है.

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