चुनावों से आपको क्‍या...तो भूखो मरो!

उदय केसरी
चुनावी मौसम की घोषणा हो चुकी है...अभी पांच राज्‍यों में, फिर पूरे देश में चुनावी मौसम आयेगा. पर आप तो किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता, या नेता तो नहीं, इसलिए आपको इससे क्‍या...हां, आप अगामी महीने में अपनी यात्रा या मनबहलाव कार्यक्रमों की तैयारियों को सुनिश्चित कर लें और यदि ऐसी कोई व्‍यस्‍तता नहीं हो, तो फिर कोई परेशानी नहीं...बस चुनावी दंगल का टीवी दर्शन कीजिए...फिर मतदान के दिन तो चद्दर तान कर सोना है ही...अरे, वोट तो गांव-देहात के निरक्षर व भोले-भाले लोग देते हैं और वह भी अलग-अलग पार्टी के विभिन्‍न आश्‍वासनों जैसे दारू-चखने की फुल व्‍यवस्‍था, लोन दिलाने में मदद, किसी आपराधिक मामले से निकलवाने अ‍ादि हर संभव-असंभव काम करवाने के नाम पर. आप इंटरनेट व टीवी वाले लोगों के लिए मतदान व चुनाव कोई मायने थोड़े रखता है...आप जैसे पढ़े-लिखों का मतलब तो चुनाव बाद आने वाले परिणामों से होता है...जीतने वाला पुराना ही आदमी है कि नहीं...कहीं कोई नया जीत गया तो फिर से सेटिंग जमानी पड़ेगी, नहीं तो धंधे व नौकरी की आफत समझो...आजकल टाटा टी वाले एक बेवकूफी भरा टीवी विज्ञापन करवा रहे है...ग्‍लास में चाय लेकर घुमते फिर रहे है और लोगों से पूछते हैं-आप सो क्‍यों रहे हैं...क्‍या बेहूदा सवाल है...चलते-फिरते लोगों को सोया कह रहे हैं...अंधे हैं क्‍या टाटा टी वाले...और जब एक महिला अपनी आंखें फाड़कर दिखाती है, तो कहते हैं, मतदान के दिन क्‍या अपना वोट डालने के लिए जागते हैं?..अरे मेरे एक वोट डालने या न डालने से क्‍या देश की सूरत बदल जाएगी...आजकल विज्ञापन के कुछ भी तरीके अपना रहे हैं ये समान बेचने वाले....
चुनावी मौसम और मतदान के बारे में उपर्युक्‍त बातें क्‍या आपकी सहज धारणा को अभिव्‍यक्‍त नहीं करती? यदि नहीं, तो देश की राजनीति इतनी गंदी क्‍यों हो चुकी है? इसकी सफाई की जिम्‍मेदारी और अधिकार आखिर किसके पास है? आप कहेंगे यह केवल कहने भर में अच्‍छा लगता है...व्‍यवहारिकता कुछ और है...नेताओं को खुद गंदगी साफ करनी होगी...पर क्‍या यह वर्तमान व भविष्‍य में किसी भी दृष्टि से संभव लगता है? नहीं न...तो क्‍या हमें जागना चाहिए? चलिए आपको अपने देश का एक ताजा सूरतेहाल बताते हैं, फिर अपने जागने पर विचार कीजिएगा....
बेचारा भारत !
भूख और कुपोषण के लिहाज से भारत की स्थिति ‘चिंताजनक’ है. भारत में 20 करोड़ से अधिक लोग ऐसी हालत में जी रहे हैं कि उन्हें सुबह उठ कर पता नहीं होता कि दिन में खाना मिल पाएगा या नहीं. भारत अब भी कुपोषण को दूर करने में कामयाब नही हुआ है. अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के 2008 ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार इस मोर्चे पर भारत की हालत अफ्रीका महाद्वीप के सहारा क्षेत्र के करीब 25 देशों से भी बदतर है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स के साथ पहली बार इंडिया हंगर इंडेक्स भी जारी किया गया है. इससे पता चलता है कि भारत का कोई भी राज्य ‘कम भूख’ या ‘मध्यम दर्जे की भूख’ वाली स्थिति से जुड़ी श्रेणियों में नहीं है. यानी इनकी स्थिति इससे भी नीचे है.
सबसे भूखा मध्‍यप्रदेश
देश में भूख के मोर्चे पर मध्यप्रदेश की सबसे बुरी गत है. इससे थोड़ी अच्छी स्थिति झारखंड और बिहार की है. इंडिया हंगर इंडेक्स में पंजाब और केरल की स्थिति सबसे अच्छी रही. इस इंडेक्स में तीन अहम पैमानों पर देशों की स्थिति तय की गई। ये तीन मानक थे- बाल कुपोषण की स्थिति, बाल मृत्यु दर और पर्याप्त कैलोरी वाले भोजन से वंचित लोगों का अनुपात. भारतीय राज्यों को जब 2008 ग्लोबल हंगर इंडेक्स में विभिन्न देशों के मुकाबले तौला गया, तो मध्यप्रदेश की जगह इथियोपिया और चाड के बीच में रही. इस इंडेक्स में सबसे अच्छी स्थिति में रहे राज्य पंजाब का स्थान गैबॉन, होंडुरास और वियतनाम के बाद आया. दरअसल इस खराब स्थिति की वजह भारत में कुपोषण के शिकार बच्चों और पर्याप्त कैलोरी वाले भोजन से वंचित लोगों की बड़ी तादाद है. भारत में बाल मृत्यु दर अफ्रीका के उप सहारा क्षेत्र के अधिकतर देशों से अधिक है.
सावधान हो जायें
आप यदि अब भी देश के सफेदपोश कर्णधारों के चुनाव में जागरूक भूमिका निभाने पर गंभीरता और निष्‍पक्षता से विचार नहीं करते हैं, तो मेरे ख्‍याल से आपको इस देश में रहने का कोई हक नहीं है और दुश्‍मन घुसपैठियों की तरह रहते भी हैं, तो कुछ ही सालों में आपकी भी तबाही निश्चित है...तब आपको किसी से शिकायत करने का भी हक नहीं होगा और यदि भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था की आड़ में आपको यह हक मिलता भी है, तो सुनवाई सिफर होगी यह तय मान लीजिए...

1 comment:

  1. सर चुनाव आते ही मतदाताओ की बांझे खिल जाती है!और चुनाव बाद राजनेताओ की !कितने अच्छे होते है न ये चुनाव दोनों को खुशी दे जाते है!किसी को पन्द्रह दिन की तो किसी को पाँच साल की !

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