अच्छे दाम पर भद्दी चाय का प्लैटफार्म

उदय केसरी
भारत में ही नहीं, चाय दुनियाभर में लोकप्रिय पेय है। अपने देश  में चाय तो जैसे ज्यादातर लोगों की शक्ति, स्फूर्ति का राज हो। इसे पीए बिना जैसे कोई काम न हो। तभी सुदूर गांव से लेकर मैट्रो शहर तक कोने-कोने में भले ही आपको और कुछ मिले न मिले पर चाय की छोटी-बड़ी दुकान मिल ही जाएगी।
चाय की ऐसी चाह के बीच पूरे देश  में चाय का एक सेंटर ऐसा भी है, जहां मसालेदार, कड़क, गर्मागरम, स्पेषल आदि अंलकारों से युक्त चाय की लंबी पुकार आपको चाय पीने के लिए ललायित तो करती है, लेकिन जब आप पुकार लगाने वाली की चाय पीते हैं तो आपका मन चिल्ला उठता है-कितनी भद्दी चाय है। जी हां, रेल से यात्रा के दौरान हममें से ज्यादातर लोगों ने ऐसी भद्दी चाय का सीप लिया होगा और वह भी आपके पड़ोस की चाय से अधिक कीमत देकर।  
दरअसल, यहां चाय तो एक बानगी मात्र है। रेल से यात्रा करने वाले ज्यादातर आम लोग को प्रायः हम इस बात की शिकायत करते सुनते हैं कि-रेलवे प्लैटफार्म पर खाने-पीने की चीजों के दाम दुगुने होते हैं, लेकिन उनकी गुणत्ता आधा या उससे भी कम। यह किसी एक प्लैटफार्म की नहीं, बल्कि देषभर के अधिकत्तर प्लैटफार्म की कहानी है। आपको भी शायद ऐसा अनुभव हुआ होगा-जब एक से दो रुपए अधिक कीमत वाली चाय की पहली सीप पी होगी। तब मन में चायवाले पर जबर्दस्त खीज पैदा हुई  होगी । सोचिए, ऐसा अनुभव प्लैटफार्म के बाहर या अपने गांव-शहर की चाय की दुकान पर क्यों नहीं होता, जबकि वहां आपको चाय की कीमत भी कुछ कम देनी पड़ती है? इस सवाल पर शायद सोचने और आवाज उठाने का जहमत कोई नहीं उठाता, क्योंकि सब सफर के भागम-भाग में इस खीज को यह मानकर भूल जाते हैं कि जाने दो, उन्हें कौन प्लैटफार्म पर रोज-रोज चाय पीनी है।
लेकिन क्या यह आम रेलयात्री के साथ धोखा या ठगी नहीं? ऐसा कौन सा कानून प्लैटफार्म पर उन चीजों को अधिक दाम में बेचने का अधिकार देता है, जो स्टेशन से बाहर कम दामों पर बिकती हैं। मसलन, स्टेशन के भीतर या चलती ट्रेन में, कौफी, कोल्ड ड्रिंक, पानी की बोतलें, पूड़ी-सब्जी, समोसे, आलूबड़े, चिप्स आदि तमाम चीजों के दामों में धांधली को आपने भी महसूस किया होगा। इसके बावजूद हम-आप उन चीजों को खरीदने के लिए मजबूर होते हैं, लेकिन इसके खिलाफ कुछ करने की कभी सोच नहीं पाते। क्यों? इसलिए कि प्लैटफार्म पर खुलेआम ठगी का यह दस्तूर बरसों से चला आ रहा है और सफर करने वालों को अब इसकी आदत सी पड़ चुकी है। किसी को प्लैटफार्म की चीजें ज्यादा खराब और महंगी लगती हैं तो वे घर से ही खाने-पीने के सारे इंतजाम लेकर ट्रेन पर चढ़ते हैं या फिर कोई सफर पूरा होने तक मन मारकर या पानी पी-पीकर बैठा रहता है।
सवाल है कि क्या खाने-पीने की चीजों के दाम और गुणवत्ता पर रेलवे शासन-प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है? हां है, लेकिन वह मसालेदार चाय की पुकार लगाने वालों की तरह ही झूठी और महज दिखावटी। इसे हम-आप भी देखते हैं-प्लैटफार्म पर ऐसी दुकानों और ठेलों में एक बिक्री होने वाली वस्तुओं का बोर्ड लगा होता है, जिसमें उसके दाम लिखे रहते हैं, लेकिन गुणवत्ता का क्या है? चाय का मतलब भद्दी, काली, बहुत देर की बनी हुई, अत्यंत कम दूध या पावडर दूध की बनी हुई चाय तो नहीं होती। इसी तरह अन्य वस्तुओं की गुणवत्ता भी उसके नाम और दाम से कम ही मेल खाती हैं। तो फिर रेलवे प्रशासन के अधिकारियों को क्या इसकी जानकारी नहीं? बिल्कुल है, लेकिन देश के  ज्यादातर प्लैटफार्म पर जिस तरह से कूड़े-कचरे बढ़े हैं, वैसे ही करप्शन भी बढ़ा है। यही करप्शन भद्दी चाय की तरह यहां की भद्दी व्यवस्था का जिम्मेदार है।
अंततः एक वाकये से मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा, पिछले साल मैं शिर्डी से लौट रहा था। मनमाड़ स्टेशन के प्लैटफार्म पर एक चाय-स्नैक्स की दुकान से चिप्स खरीदा। चिप्स के पैकेट पर 15 रुपए मूल्य दर्ज था, लेकिन दुकानदार ने उसके 20 रुपए मुझसे लिए। मैंने जब उससे पांच रुपए अधिक लेने के खिलाफ बहस करने लगा, तो वह बड़ी विनम्रता से मुझे समझाया। देखिए, भाई साहब हम जानते हैं कि हम आपसे अधिक ले रहे हैं, लेकिन हमारी मजबूरी भी तो आप समझिए। क्या मजबूरी? उसने कहा कि यह जो मेरी दुकान है, उसे यहां लगाने की जो मुझे परमिशन मिली है, वह ऐसे थोड़े न मिली है। इसके लिए हर महीने हमें भी तय किराया से दो गुणा अधिक किराया चुकाना पड़ता है। क्यों? अब इसका जवाब तो आप जैसे पढे़-लिखे लोग खुद ही समझ सकते हैं। इसके बाद मैंने उस दुकानदार से कोई बहस नहीं की, बस यही सोचता हुआ चला गया कि-ऐसे में प्लैटफार्म पर अपनी रोजगार चलाने वाले लोग आखिर क्या करेंगे-जनता को तो अच्छे दाम पर भद्दी चाय ही पिलाएंगे न!
16 जून 2012 :  एल एन स्टार, भोपाल में प्रकाशित 

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