दिल्ली आखिर खुद पर क्यों गर्व करे ?

उदय केसरी  
जिस दिल्ली ने देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जनक्रांति का ऐतिहासिक आगाज देखा, उसी दिल्ली को महज ९ दिन बाद एक आतंकी बम विस्फोट में जनहानि और कई घरों में मातम देखना पड़ा, तो ऐसी दिल्ली को इस देश की राजधानी होने पर कितना गर्व होता होगा? यह सवाल भले ही तथाकथित एलीट क्लास के कुछ विचारकों और बुद्धिजीवियों को जज्बाती लगे, लेकिन क्या बिना किसी जज्बात के किसी देश का कभी भला हुआ है? दिल्ली के हाईकोर्ट परिसर में ७ सितंबर को, जो विस्फोट हुआ, उसे आतंकियों के दुस्साहस की कौन सी सीमा कहेंगे? इसी जगह पर महज चार महीने पहले ही उन्हीं आतंकियों ने इस बम विस्फोट की रिहर्सल की थी| कितनी लाचार हो गई है देश की व्यवस्था? कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कहना पड़ता है-यह हमारी व्यवस्था की चूक है| ऐसी चूक का एहसास होने के बाद भी क्या किसी राष्ट्र का नेता चुप बैठ सकता है?...यह क्या हमारे नेतृत्वकर्ता की क्षमता पर एक बार फिर से प्रश्‍नचिन्ह खड़ा नहीं करता?
कायरता, जज्बात के अभाव और स्वार्थ की पराकाष्ठा से पैदा होती है| लेकिन इस जज्बात से देश के एक प्रसिद्ध न्यूज चैनल के एक स्टार एंकर महोदय इत्तेफाक नहीं रखते| वह ७/९ के बम विस्फोट की रात ही अपने चैनल पर एक परिचर्चा में खम ठोंककर कहते हैं- भले ही बाकी चैनलवाले इसे देश पर हमला कह रहे हों, पर मैं ऐसा नहीं कह सकता|
...क्या ऐसे पत्रकारों से देश का भला होने की उम्मीद की जा सकती है? यही नहीं, केंद्र में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शकील अहमद के जज्बात तो जैसे पार्टी की कुर्सी में सदा के लिए दफन हो चुके हैं| एक न्यूज चैनल पर वह मनिन्दरजीत सिंह बिट्टा के जज्बात के खिलाफ ऐसी संकीर्णता के साथ फटे कि उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है...माहौल इतना खराब हो गया कि उस चैनल को यह परिचर्चा बीच में ही बंद करनी पड़ी| जनता को सीख देने वाले ऐसे पत्रकार और प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे नेताओं के विचारों को क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? इसका जवाब मैं आप पर छोड़ता हूं| लेकिन यह कहे बिना नहीं रह सकता कि राजधानी दिल्ली के हाईकोर्ट परिसर में हाई अलर्ट के बाद भी आतंकियों ने बम विस्फोट करके हमारे देश की संप्रभुता को एक बार फिर चुनौती दी है| यदि आतंकियों के इस दुस्साहस का माकूल जवाब नहीं दिया गया, तो और किसी को तकलीफ भले न हो, पर अतीत के पन्नों में दर्ज देश के अनगिनत वीरों की आत्मा को जरूर दुख होगा|
भारत के लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका संभवत: पूरी दुनिया में अलहदा है| चाहे देश पर कैसी भी आफत आ जाए, वह सत्तापक्ष यानी सरकार के खिलाफ तमाम तरह के दोषारोपण वाले बयान दे दे, बस इतने से ही उसकी देश के प्रति सभी जिम्मेदारियां पूरी हो जाती है| या फिर आफत यदि राजनीतिक हो तो सरकार को गिराने के लिए कोई भी कर्म-कुकर्म करने से न चूके, यही उसका परम धर्म होता है| मसलन, भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ऐसे वक्त में एक बार फिर देश में रथयात्रा करने वाले हैं, जब पूरा देश भ्रष्टाचार, महंगाई और आतंकवाद से जूझ रहा है| उन्होंने यह ऐलान, नोट के बदले वोट कांड में अमर सिंह के साथ भाजपा के भी दो पूर्व सांसदों को जेल भेजने के विरोध में किया है और वे रथयात्रा के माध्यम से देशवासियों को यूपीए सरकार की असलियत बताएंगे|
किसी पार्टी या सरकार के प्रति देश की जनता की समझ क्या अब भी नेताओं के भाषणों की मुहताज है?...नहीं| वह जमाना बीती बात हो गई, जब धर्म के नाम राजनीतिक स्वार्थ के रथ पर सवार होकर देश की भोली-भाली जनता को बरगलाया जा सकता था| हाल ही में अन्ना के अनशन के पक्ष में बिना किसी कैम्पेन और भाषण के जिस तरह लोग स्वत: ही सड़कों और गलियों में तिरंगा लेकर निकल पड़े थे, उससे देश के नेताओं ने क्या कोई सबक नहीं लिया? प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करने में अब तक विफल रहे लालकृष्ण आडवाणी अपनी उम्र की इस ढलान पर फिर से वही पुरानी चाल क्यों चल रहे हैं? क्या इससे देश में आतंकवादी हमलों को रोकने में मदद मिलेगी़? या केंद्र की सरकार की असलीयत जानकर जनता समय से पहले ही केंद्र की सरकार को सत्ता की कुर्सी से बेदखल कर देगी? राइट टू रिकॉल का हक तो अभी जनता को मिला ही नहीं है, तो फिर इस रथयात्रा से देश की समस्या का हल कैसे निकलेगा? बरसों से सोई जनता जब भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त लोकपाल कानून की मांग पर जागी, तभी तो भाजपा भी जागी| तो फिर जनता को अब क्या बताना शेष रह गया है?
जाहिर है, सत्तारूढ़ केंद्र सरकार के कांग्रेसी नेता व मंत्री सत्ता की मद में चूर देश के लोकतंत्र को जोकतंत्रबनाने पर तुल गए हैं, जिसमें विपक्षी पार्टियों की भूमिका भी कुछ कम नहीं है|...और दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की ऐसी दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह, इसके प्रति यहां के शासकों और प्रशासकों में जज्बात का नहीं होना है|
मासिक पत्रिका 'फ्लाइंग स्क्वाड' के अक्टूबर अंक में प्रकाशित|

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