लेकिन जीत पर अब भी भरोसा नहीं

उदय केसरी  
 बेशक, 12-13 (288 घंटे) के अनवरत अनशन के दौरान किशन बाबू हजारे उर्फ अन्ना पूरे देश की जनता के दिलों में राष्ट्रनायक की तरह धड़कने लगे। लोगों के अंतस में कहीं सोई हुई देशभक्ति के जज्बे को जगाने में अन्ना आश्‍चर्यजनक तरीके से सफल भी रहे| यही नहीं, सख्त लोकपाल बिल के लिए अपनी तीन अहम शर्तों को मनवाने और उन्हें संसद से पारित करवाने में भी कामयाब हो गए| लेकिन अन्ना का अनशन टूटने के बाद क्या केंद्र की सरकार और संसद के तमाम सदस्य अन्ना के लोकपाल बिल को कानूनी रूप देने और उसे पूरे देश में पूरी सख्ती से लागू करवाने में भी तत्परता दिखाएंगे? भरोसा करना मुश्किल है, क्योंकि भरोसा सद्भावना से लिये गए फैसलों पर किया जा सकता है, मजबूरी या विकल्पहीनता की स्थिति में लिये गए फैसलों पर नहीं| १६ अगस्त से शुरू हुआ अन्ना का अनशन भी ५ अप्रैल को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना के चार दिनों के अनशन के बाद सरकार से मिले जोकपाल के रूप में धोखा का ही परिणाम था| और फिर इसबार की आर या पार के संघर्ष से पूर्व अन् ना या सिविल सोसाइटी के प्रमुख सदस्यों को जिस कदर बदनाम करने की कोशिश की गई, उसे भी भूलना नहीं चाहिए| इससे २ महीने पहले ही रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के अनशन को जिस तरह से आधी रात में कुचला गया, वैसा अंग्रेजो के जमाने में हुआ करता था| फिर १६ की सुबह क्या हुआ-अन्ना को बिना किसी अरोप या अपराध के उनके निवास स्थान से गिरफ्तार कर उन्हें उस जेल में डाल दिया गया, जहां जघन्य अपराधियों को रखा जाता है| इस घटना की खबर सुनकर अन्ना समर्थकों की भारी भीड़ जब तिहाड़ जेल के बाहर जमा हो जाती है तो फिर अन्ना को रिहाई देकर उन्हें जबरन दिल्ली के बाहर भेजने की तैयारी कर ली जाती है| वह तो ऐनवक्त पर यदि अन्ना को सरकार की इस चालबाजी का आभास या पता नहीं चलता, तब शायद इस क्रांति की तस्वीर इतनी चौंकाने वाली नहीं होती| अन्ना के इस अगस्त क्रांति के दौरान केंद्र की मनमोहन सरकार की भूमिका तो अंग्रेजों जैसी ही रही, जो हर वक्त आंदोलन को विफल करने या उसे दबाने की नापाक कोशिश करती दिखी, लेकिन साथ ही देश के विपक्षी पार्टियों की नीयत भी अन्ना के अनशन और मांग के प्रति साफ नहीं दिखी| प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा की भूमिका तो सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूट पाए वाली थी| उसके भी सुर सरकार की तरह ही दिनोंदिन आंदोलन में बढ़ती स्वस्फूर्त जनभागीदारी के साथ बदली| यानी उन्होंने मजबूरी और अवसरवादी राजनीति की मांग को ध्यान में रखकर ही अन्ना के पक्ष में सुर बदले|
ऐसे में, कैसे भरोसा किया जा सकता है कि इस जीत के बाद यह सरकार और विपक्षी पार्टियां भ्रष्टाचार पर सख्ती से अंकुश लगाने वाले लोकपाल कानून को बनवाने और लागू करवाने में ईमानदारी और तत्परता दिखाएगी?
जाहिर है कि भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए महज एक कानून बनवाने के लिए जब पूरे देश की जनता को ऐतिहासिक आंदोलन करना पड़ा और तब जाकर सरकार झुकी, तो फिर उस कानून को सख्ती से लागू करवाने के लिए भी जनता को आंदोलन जारी रखना होगा| शायद इसका आभास इस आंदोलन के नेता अन्ना हजारे को भी है, तभी उन्होंने संसद में प्रस्ताव पारित होने के बाद जनता से कहा-यह आधी जीत है| यानी जितना संघर्ष अबतक हो चुका है, उतना या उससे अधिक संघर्ष और करना होगा| तब कहीं पूरी जीत हासिल होगी| वजह साफ है कि भ्रष्टाचार के दलदल में देश के नौकरशाह ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के अनगिनत नेता -कार्यकर्ता भी धंसे हुए हैं| फर्क बस इतना कि दलदल में कोई गले तक, तो कोई कंधे तक, कोई कमर तक तो कोई घुटने तक धंसे हुए हैं| बाकी ऐेसे नेता भी अनगिनत हैं जिनकी काली कमाई कमाई का खुलासा होना अभी बाकी है| अब ऐसे भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों के चंगुल में दशकों से लुटते देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं नेताओं और नौकशाहों को सौंपी जाएगी तो उसके सफल क्रियान्वयन पर कैसे भरोसा किया जा सकता है?अन्ना के अनशन की आंधी से केवल केंद्र सरकार ही नहीं, विपक्षी पार्टियों के नेता भी घबराए हुए थे| चूंकि हमाम में तो सभी निवस्त्र ही हैं| इसका अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस संसद की मर्यादा को एक नहीं कई बार धो डालने वाले सांसदों को अन्ना के अनशन से संसद की गरिमा संकट में नजर आने लगी थी| नोट लेकर या फिर मलाईदार कुर्सी की चाह में अपने वोट का सौदा करने वाले सांसदों को अन्ना के अनशन में ब्लैकमेलिंग नजर आ रही थी|
यही नहीं कुछ तथाकथित बुद्घिजीवियों ने भी अन्ना के अनशन पर सवाल उठाए और अनशन को भटका हुआ गांधीवाद करार दिया| ऐसा कहने वालों में वे ज्यादा थे, जिन्होंने सबसे अधिक महात्मा गांधी की आलोचना की| ऐसे माहौल में यदि अन्ना को बिना अन्न के संघर्ष करने की जहां से ऊर्जा मिली उसका एकमात्र स्रोत देश की जनता में स्वत: उमड़े निष्कपट और अटूट प्रेम था| लोकनायक जयप्रकाश के आंदोलन के बाद देश के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी क्रांति हुई, जिसके बारे में सुविधाभोगी विचारकों और नीतिकारों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था|
अन्ना आंदोलन में देश के युवाओं जैसी भागीदारी निभाई है, उसका राष्ट्रीय नेतृत्व करने का सपना देखने वाले कांग्रेस के सबसे खास युवा नेता राहुल गांधी को पहले ७४ साल के युवा अन्ना हजारे से कुछ सीखना चाहिए| स्व. राजीव गांधी के पुत्र होने के नाते देश के लोगों को उनसे कुछ उम्मीद जरूर जगी थी, लेकिन अन्ना के आंदोलन में उनके भी चाल और चरित्र को जगजाहिर हो गया| अन्ना के अनशन पर पहले तो राहुल पूरी तरह से चुप्प रहेे और अनशन के ग्यारहवें दिन जब बोले तो अन्ना के लोकपाल बिल को भ्रष्टाचार रोकने में नाकाबिल कह दिया और चुनाव आयोग की तरह लोकपाल को एक संवैधानिक संस्था बनाने का एक नया विचार थोपने की कोशिश की| तो क्या राहुल गांधी को यह विचार तब नहीं आया जब सरकारी लोकपाल का प्रस्ताव तैयार किया गया? साफ है देश को चलाने वाले ऐसे नेताओं पर भरोसा करके भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुए आंदोलन को खत्म कर देना खुद के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा|
मासिक पत्रिका 'फ्लाइंग स्क्वाड' के सितम्बर अंक में प्रकाशित|

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