बाहर कुछ, अंदर कुछ

उदय केसरी  
भारत की वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की घर के बाहर की नीति और भीतर की नीति में सहिष्णुता के स्तर पर गजब का विरोधाभास है| एक तरफ, हमारे देश पर आतंकी हमले कर हमारी संप्रभुता को बार-बार चुनौती देने वाले आतंकियों के पोषक पाकिस्तान के साथ यूपीए सरकार तमाम दर्द और दगे भूलकर दोस्ती, भाईचारे का हाथ बढ़ा रही है, तो दूसरी तरफ, देश के भीतर देशहित में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों, अनशन व आंदोलन करने वालों को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से तत्काल दमन करने की कोशिश की जा रही है| यदि भारत की मौलिक विदेश नीति में सहिष्णुता की बात करें, तो यह इसके सात निर्धारक तत्वों में से एक है और इसी सहिष्णुुता के कारण भारत ने आज तक कभी किसी देश पर अधिकार नहीं किया और न ही किसी देश की भूमि को हड़पने की कोशिश की| अब भले ही, पाकिस्तान ने कश्मीर की आधी भूमि पर जबरन कब्जा ही क्यों नहीं जमा रखा हो| खैर, फिलहाल, विषय यह नहीं है| लेकिन, सवाल यह है कि मौलिक गृह नीति में क्या सहिष्णुता का कोई स्थान है?
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में कभी भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ अहिंसक तरीके से देश को जगाने की कोशिश करने वाले स्वामी रामदेव के हजारों समर्थकों पर आधी रात में लाठी चार्ज कर उन्हें दिल्ली से बाहर कर दिया जाता है, तो कभी ७४ साल के अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को लामबंद करने से रोकने के लिए तमाम तरह के नैतिक-अनैतिक हथकंडे अपनाएं जाते हैं| बावजूद इसके जनशक्ति की तेज से चमकते अन्ना को दबाने में विफल हो जाने पर उनके खिलाफ राजनीतिक चालों-कुचालों का सहारा लिया जाता है| और तो और अब टीम अन्ना में फूट डालने की भी साजिश होने लगी है| लेकिन, क्या इस तरह के हथकंडे अपनाने वाले और ऐसी साजिशों में शामिल नेताओं को यह अंदाजा नहीं कि देश जाग चुका है और शीतकालीन सत्र संपन्न होने का इंतजार कर रहा है| जनलोकपाल बिल की तर्ज पर सख्त लोकपाल बिल संसद से पारित करने का वादा यदि पूरा नहीं किया गया, तो शायद अन्ना के नेतृत्व में जनता की जवाबी नीति सरकार के लिए प्राणघातक हो सकती है|
रकार या सोनिया गांधी को क्या यह अंदाजा नहीं कि रालेगांव सिद्धि से आने वाले एक सामान्य नागरिक अन्ना हजारे को देश का नेता किसने बनाया? जनता ने| वह भी बिना किसी राजनीतिक पार्टी के, बिना चुनाव लड़े और बिना किसी राजनीतिक परिवार में जन्म लिए| हालांकि यह बात कुछ राजनीतिक विरादरी खासकर कांग्रेस के नेताओं और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को पसंद नहीं आई है, लेकिन, जो लोग राजनीतिक पार्टियों से चुनाव लड़कर या राजनीतिक परिवार में जन्म लेकर देश के नेता बने हैं, वे अब तक अन्ना की तरह जनता की आवाज क्यों नहीं बन पाए? उन्हें क्या भाषण देना नहीं आता? शायद नहीं| तभी शायद, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के फूलपुर में कांग्रेस की रैली को संबोधित करते हुए कुछ ऐसा कह गए, जिसकी कम से कम उनसे कभी उम्मीद नहीं थी| ऐसे शब्दों का इस्तेमाल महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना या शिव सेना के नेता करते रहे हैं| ऐसे शब्द प्राय: सहिष्णुता के अभाव में निकल जाते हैं| यूपीए सरकार और कांग्रेस की सहिष्णुता में विरोधाभास विदेश और देश के विरोधी नेताओं को लेकर ही नहीं है| यह विरोधाभास तो खुद कांग्रेस के भीतर स्पष्ट हो चुका है, पिछले माह की शुरुआत में जब पेट्रोल के दाम में एक बार फिर से १.८० रुपए का इजाफा किया गया और इसके विरोध में विपक्षी पार्टियां ही नहीं, यूपीए की सहयोगी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन वापसी तक की धमकी दे दी| तब खुद कांग्रेस पार्टी ने भी इस मूल्यवृद्धि पर सरकार की दलील पर अपनी असहमति जता दी थी| संभवत: इसी वजह से डेढ़ साल बाद पहली बार पेट्रोल के दाम में २.४१ रुपए कटौती की गई| जहिर है, सहिष्णुता के स्तर पर कांग्रेस की यूपीए सरकार ‘बाहर कुछ और अंदर कुछ’ की विरोधाभासी नीति पर चलकर देश का उत्थान करे-न करे, पर यह तय है कि खुद का पतन अवश्य कर लेगी, क्योंकि जनता अब जाग चुकी है|
दरअसल, यूपीए सरकार की नीति बाहर कुछ और अंदर कुछ और है, जिसे प्राय: आम भाषा में राजनीति कहते हैं, लेकिन ऐसी राजनीति से कुछ समय के लिए सत्ता जरूर पाई जा सकती है, देश का उत्थान नहीं किया जा सकता| अब कुछ दिनों पहले की ही बात लीजिए, देश के बाहर, मालद्वीप में सार्क सम्मेलन के दौरान हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी कोे ‘शांति पुरुष’ करार दे दिया| क्या दशकों से पाक पोषित आतंकवाद से आए दिन दो-चार होती देश जनता कभी पाक के प्रधानमंत्री को ऐसी उपाधि देती, शायद नहीं, तो फिर इस बयान को क्या भारतीय सहिष्णुता कहेंगे? शायद नहीं| लेकिन देश के भीतर इससे ठीक विपरीत, कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी, जिनकी व्यावहारिक तौर पर यूपीए सरकार में पीएम के बराबर की भूमिका मानी जाती है, जो पहली बार गांधीवादी व अहिंसा की राह पर चलने वाले समाजसेवी अन्ना हजारे पर कुछ बोली तो वह भी उनके खिलाफ, कि केवल भाषणबाजी से भ्रष्टाचार खत्म नहीं किया जा सकता| यूपीए

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