चुनावी जुगाली के संक्रमण से बचें

उदय केसरी  
 देश को झकझोर देने वाले अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद अब देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में चुनावों का मौसम अपने चरम की ओर बढ़ रहा है| इस मौसम में राजनीतिक दलों के तमाम संकीर्ण समीकरणों के बावजूद जनता में एक मुद्दा काफी प्रभावी है| वह मुद्दा है भ्रष्टाचार, जिसके विरोध में अर्से बाद पुरजोर हवा चलने की उम्मीद है| यह देश के परिप्रेक्ष्य में ही नहीं, इन पांचों राज्यों के मद्देनजर भी लाजमी है| चाहे उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की मायावती सरकार हो या पंजाब में शिरोमणि अकाली दल व भाजपा गठबंधन की प्रकाश सिंह बादल की सरकार और उत्तराखंड में भाजपा की पहले पोखरियाल निशंक और फिलहाल भुवन चंद्र खंडूरी की सरकार हो या फिर गोवा व मणिपुर में कांग्रेस की दिगंबर कामत व इबोबी सिंह की सरकारें, इन पांचों राज्यों की सरकारों में किसी नाते यदि सबसे अधिक समानता है, तो वह है भ्रष्टाचार| कहने की जरूरत नहीं कि इन सभी राज्यों की जनता यदि गरीब, पिछड़ी और विकास से दूर है, तो उसकी सबसे बड़ी वजह इन सरकारों के संचालकों के बीच लहलहाती भ्रष्टाचार की पौध है| लेकिन हैरतअंगेज बात यह है कि इन राज्यों की ऐसी दुर्गति करने के बाद भी सभी प्रमुख दलों के सियासतदानों ने हमेशा की तरह इस बार भी चुनावी बिसात पर जाति, धर्म, समुदाय, आरक्षण और लालच के वही पुराने दांव चले हैं| जबकि सबसे अहम भ्रष्टाचार के मुद्दे को वे महज फैशन के चोले के तौर पर ओढ़कर चुनावी जुगाली कर रहे हैं, जिसमें पड़कर जनता हमेशा से ठगी जाती रही है|   फिर भी, इस बार भ्रष्टाचार विरोधी पुरजोर हवा चलने की उम्मीद इसलिए की जा सकती है, क्योंकि इन चुनावों के दो-तीन महीनों के मौसम से ठीक पहले हमने अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के आठ महीने भी देखे हैं, जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरा देश जाग उठा था| उम्मीद है कि चुनाव पूर्व के आठ महीनों में, जनता में इतनी प्रतिरोधी क्षमता जरूर पैदा हो गई होगी कि वे अपनी आंखों से नेताओं की चुनावी जुगाली के संक्रमण का मुकाबला कर सकें और अपने मत एवं विचार का सही इस्तेमाल करें| हालांकि यह भी कड़वा सच है कि इस आधुनिक युग में कई लोग तात्कालिक लाभ या लालच में पड़कर अपने विचारों से समझौता भी कर बैठते हैं| ऐसे लोगों के बीच उन तमाम लोगों को उसी तरह जाकर जागरूकता फैलाने की जरूरत है, जैसे टीम अन्ना के लोग कर रहे हैं| जाहिर है, बदलाव और विकास केवल उम्मीदों से नहीं हो सकता, सियासतदानों के लालच, आश्‍वासन और नकली मुद्दों को भी धीरज से समझना होगा|  यह सब समझने के बाद यक्ष प्रश्‍न यह भी है कि आखिर किस पार्टी और उम्मीदवार को सही माना जाए? जबकि इन पांचों राज्यों की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां, वह चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, सपा हो या बसपा या फिर अकाली दल, सभी की सरकारों में भ्रष्टाचार घटने के बजाय बेतहाशा बढ़ा है| यही नहीं, अपराध, गरीबी, भुखमरी और सामाजिक असमानता में जबर्दस्त इजाफा हुआ है| उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य में ६९.९ फीसदी आबादी गरीबी में जी रही है, तो पंजाब जैसे कृषि समृद्ध राज्य में अब भी २६.२ फीसदी, उत्तराखंड में ७७ फीसदी, गोवा में २१.७ और मणिपुर समेत पूर्वोत्तर में ५७.६ फीसदी जनता गरीबी में जीने को मजबूर है| वहीं इन राज्यों में हजारों करोड़ रुपयों के घोटाले सामने आए हैं| उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाला, पंजाब में जीपीएफ और गेहूं घोटाला, उत्तराखंड में पावर प्रोजेक्ट घोटाला, गोवा और मणिपुर में खनन घोटाले इस बात के प्रमाण हैं कि चाहे कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पाटियां हों या फिर बसपा, सपा या अकाली दल जैसी क्षेत्रीय स्तर की पार्टियां, जनता के निवाले छीनकर काली कमाई करने में कोई पीछे नहीं है| ऐसे में, यदि आप यह सोचते हैं कि वोट देने से क्या बदलेगा तो यह शत-प्रतिशत गलत है| सही और व्यावहारिक राय यह है कि सभी दलों के उम्मीदवारों में से उसको वोट दें, जो तुलनात्मक दृष्टि से आपकी नजर में सबसे कम भ्रष्ट या खराब हो| इससे भले ही चुनाव बाद शीघ्रता से बदलाव नहीं आएगा, लेकिन भ्रष्टाचार को राजनीतिक शिष्टाचार बना कर रखने वाले नेताओं को करारा झटका जरूर लगेगा| इससे और कुछ नहीं तो बदलाव की शुरुआत अवश्य होगी और फिर अभी २०१४ का आम चुनाव भी तो आने वाला है| हमने यदि बिना किसी लालच में पड़े आने वाले चुनावों में समझदारी से वोट डाला, तो ऐसे नेताओं और उम्मीदवारों के पास, राजनीति से बाहर जाने के सिवाय कोई रास्ता या समीकरण या दांव नहीं बचेगा

अन्ना के मायने समझे सरकार

उदय केसरी  
 हाल के दशकों में हुए बेतहाशा भ्रष्टाचार से देश तो खोखला हुआ ही, सबसे अधिक जनता बेहाल हुई है| इसी बेहाली के मौके पर भ्रष्टाचार विरोधी सख्त जनलोकपाल कानून की अवधारणा के साथ ७४ वर्षीय अन्ना हजारे देश के सामने आए और देखते ही देखते पूरे देश की जनता की उम्मीद बन गए| अन्ना व्यक्तिगत तौर पर एक ईमानदार समाजसेवक रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार का विरोध करके सार्वजनिक तौर पर वे जननायक या बहुसंख्य जनता के पर्याय जैसे हो चुके हैं| अगस्त २०११ के अनशन के बाद से अन्ना महज रालेगण सिद्धि गांव के नहीं, बल्कि देशभर के गांवों व शहरों में नायक हो चुके हैं और वर्तमान में अन्ना का वास्तविक मायने यही है| लेकिन कांग्रेस नीत केंद्र की यूपीए सरकार को अगस्त से अब तक चार महीने गुजर जाने के बाद भी अन्ना का यह मायने समझ में नहीं आया है| उलटे इन चार महीनों के दौरान कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों ने पानी पी-पीकर अन्ना व टीम अन्ना को कोसा, उन्हें तोड़ने-फोड़ने और बदनाम करने की कोशिश की है, जिसे पूरे देश ने देखा है और उसके मायने भी लगाए हैं| इसलिए दिसंबर से जनता ने, अन्ना के रूप में फिर से सरकार को अपनी ताकत और अन्ना के मायने समझाने की कोशिश पुन: शुरू कर दी है| लेकिन, जब सिर पर सत्ता की मद सवार हो तो मतिभ्रम की आशंका सबसे अधिक होती है| शायद सरकार को मतिभ्रम हो चुका है और उसे अन्ना में देश की जनता नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीतिक पार्टियां, भाजपा व आरएसएस दिख रही है| उसे तो यह भी परवाह नहीं कि देश के अन्ना को नाराज करके २०१४ में वह किस मुंह से उसी अन्ना से वोट मांगने जाएगी?  वैसे, केंद्र सरकार ने अगस्त में अन्ना से किए उस वादे को खुद ही लगभग झूठ साबित कर दिया है, जिसमें संसद के शीतकालीन सत्र में सख्त लोकपाल बिल पारित कराने का वादा किया गया था| इस पर कभी स्टैंडिंग कमेटी की राय का ड्रामा, तो कभी ग्रुप सी व डी के कर्मचारियों और सीबीआई को परे रखने के विचार ने अंतत: लोकपाल को टीन के डब्बे वाली अवधारणा में परिणत कर दिया है| यानी इन चार महीनों के इंतजार के बाद भी अब तक अन्ना यानी देश की जनता को सरकार से सिर्फ धोखा ही मिला है| ऐसे में अन्ना के आंदोलन को तेज करने के सिवाय देश की जनता के पास, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का अन्य कोई विकल्प नहीं बचता| लेकिन इस बार की लड़ाई केंद्र सरकार को पहले से बहुत अधिक भारी पड़ेगी, यह तय है, क्योंकि कांग्रेस को शायद जयप्रकाश आंदोलन के अनुभव अब याद नहीं रहे हैं, वरना वह फिर वैसी ही भूल दोहराने की दिशा में नहीं बढ़ती| हालांकि दूसरी तरफ, देश की विपक्षी पार्टियों को शायद अन्ना के मायने की समझ आ गई है, तभी तो कल तक अन्ना को चुनाव लड़ के आने की सलाह देने वाले सांसद, ११ दिसंबर २०११ को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना के मंच पर सख्त लोकपाल की मांग को बुलंद करने की बातें करते नजर आए| हालांकि इसके ठीक बाद ही इस मुद्दे पर सरकार ने जब सर्वदलीय बैठक बुलाई तो उसमें कुछ विपक्षी पार्टियों की बातों में अंतर आ गया| यह अंतर साफ करता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का सहयोग उनकी राजनीति के नफे-नुकसान के आधार ही पर प्राप्त होगा, क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है, जिसके दाग से कौन सा दल अछूता है और कौन कब तक अछूता रहेगा, कहना मुश्किल है| मसलन, हाल ही में कर्नाटक में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा को भ्रष्टाचार के मामले में इस्तीफा देना पड़ा है| यही भाजपा केंद्र में प्रमुख विपक्षी दल है, जो कांग्रेस के खिलाफ अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को अपना समर्थन दे रही है| साफ है, अन्ना या जनता को भ्रष्टाचार की लड़ाई खुद अपने दम पर लड़नी होगी और इस बार अगस्त से कहीं अधिक बड़ा आंदोलन करके सरकार को अन्ना के मायने समझाना होगा| पिछली बार की लड़ाई में सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और पी. चिदंबरम पासे फेंकते नजर आ रहे थे, लेकिन इस बार ये दोनों शायद ही नजर आएं| वजह साफ है कि कांग्रेस की आलाकमान सोनिया गांधी की गैर-मौजूदगी में सिब्बल के दांव-पेंच को लगभग विफल माना गया और जहां तक चिदंबरम की बात है तो वे अभी खुद ही एक तरफ, महाभ्रष्टाचार २जी के घेरे में घिरते नजर आ रहे, तो दूसरी तरफ, अपने एक पुराने मुवक्किल को बचाने से संबंधित हितों के टकराव के एक नए मामले में भी उनका गला फंसता नजर आ रहा है| हां, इस बार कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी अवश्य पूरे फॉर्म में नजर आ रहे हैं और अन्ना के खिलाफ वह खुलकर बोलने भी लगे हैं, जो अन्ना के अगस्त के अनशन के दौरान काफी संयम बरते हुए थे| वैसे, यह करके वे खुद की छवि को ही क्षति पहुंचा रहे हैं, क्योंकि कांगे्रस की यूपीए सरकार के विरोध के बावजूद भी राहुल गांधी से जनता को सहयोग की उम्मीद रही है| लेकिन हाल के दिनों में उनके अन्ना विरोधी बयानों ने इस उम्मीद पर पानी फेरा है और शायद इसीलिए खुद अन्ना ने भी उन्हें संभलने का इशारा करते हुए अपने एक बयान में कहा कि कई लोगों का मानना है कि राहुल गांधी शीघ्र ही प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन यदि वह लोकपाल पर अपने वर्तमान विचारों को नहीं बदलते हैं तो यह देश के लिए खतरनाक होगा| जाहिर है राहुल गांधी समेत केंद्र सरकार को अन्ना के मायने समझना होगा     

बाहर कुछ, अंदर कुछ

उदय केसरी  
भारत की वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की घर के बाहर की नीति और भीतर की नीति में सहिष्णुता के स्तर पर गजब का विरोधाभास है| एक तरफ, हमारे देश पर आतंकी हमले कर हमारी संप्रभुता को बार-बार चुनौती देने वाले आतंकियों के पोषक पाकिस्तान के साथ यूपीए सरकार तमाम दर्द और दगे भूलकर दोस्ती, भाईचारे का हाथ बढ़ा रही है, तो दूसरी तरफ, देश के भीतर देशहित में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों, अनशन व आंदोलन करने वालों को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से तत्काल दमन करने की कोशिश की जा रही है| यदि भारत की मौलिक विदेश नीति में सहिष्णुता की बात करें, तो यह इसके सात निर्धारक तत्वों में से एक है और इसी सहिष्णुुता के कारण भारत ने आज तक कभी किसी देश पर अधिकार नहीं किया और न ही किसी देश की भूमि को हड़पने की कोशिश की| अब भले ही, पाकिस्तान ने कश्मीर की आधी भूमि पर जबरन कब्जा ही क्यों नहीं जमा रखा हो| खैर, फिलहाल, विषय यह नहीं है| लेकिन, सवाल यह है कि मौलिक गृह नीति में क्या सहिष्णुता का कोई स्थान है?
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में कभी भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ अहिंसक तरीके से देश को जगाने की कोशिश करने वाले स्वामी रामदेव के हजारों समर्थकों पर आधी रात में लाठी चार्ज कर उन्हें दिल्ली से बाहर कर दिया जाता है, तो कभी ७४ साल के अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को लामबंद करने से रोकने के लिए तमाम तरह के नैतिक-अनैतिक हथकंडे अपनाएं जाते हैं| बावजूद इसके जनशक्ति की तेज से चमकते अन्ना को दबाने में विफल हो जाने पर उनके खिलाफ राजनीतिक चालों-कुचालों का सहारा लिया जाता है| और तो और अब टीम अन्ना में फूट डालने की भी साजिश होने लगी है| लेकिन, क्या इस तरह के हथकंडे अपनाने वाले और ऐसी साजिशों में शामिल नेताओं को यह अंदाजा नहीं कि देश जाग चुका है और शीतकालीन सत्र संपन्न होने का इंतजार कर रहा है| जनलोकपाल बिल की तर्ज पर सख्त लोकपाल बिल संसद से पारित करने का वादा यदि पूरा नहीं किया गया, तो शायद अन्ना के नेतृत्व में जनता की जवाबी नीति सरकार के लिए प्राणघातक हो सकती है|
रकार या सोनिया गांधी को क्या यह अंदाजा नहीं कि रालेगांव सिद्धि से आने वाले एक सामान्य नागरिक अन्ना हजारे को देश का नेता किसने बनाया? जनता ने| वह भी बिना किसी राजनीतिक पार्टी के, बिना चुनाव लड़े और बिना किसी राजनीतिक परिवार में जन्म लिए| हालांकि यह बात कुछ राजनीतिक विरादरी खासकर कांग्रेस के नेताओं और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को पसंद नहीं आई है, लेकिन, जो लोग राजनीतिक पार्टियों से चुनाव लड़कर या राजनीतिक परिवार में जन्म लेकर देश के नेता बने हैं, वे अब तक अन्ना की तरह जनता की आवाज क्यों नहीं बन पाए? उन्हें क्या भाषण देना नहीं आता? शायद नहीं| तभी शायद, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के फूलपुर में कांग्रेस की रैली को संबोधित करते हुए कुछ ऐसा कह गए, जिसकी कम से कम उनसे कभी उम्मीद नहीं थी| ऐसे शब्दों का इस्तेमाल महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना या शिव सेना के नेता करते रहे हैं| ऐसे शब्द प्राय: सहिष्णुता के अभाव में निकल जाते हैं| यूपीए सरकार और कांग्रेस की सहिष्णुता में विरोधाभास विदेश और देश के विरोधी नेताओं को लेकर ही नहीं है| यह विरोधाभास तो खुद कांग्रेस के भीतर स्पष्ट हो चुका है, पिछले माह की शुरुआत में जब पेट्रोल के दाम में एक बार फिर से १.८० रुपए का इजाफा किया गया और इसके विरोध में विपक्षी पार्टियां ही नहीं, यूपीए की सहयोगी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन वापसी तक की धमकी दे दी| तब खुद कांग्रेस पार्टी ने भी इस मूल्यवृद्धि पर सरकार की दलील पर अपनी असहमति जता दी थी| संभवत: इसी वजह से डेढ़ साल बाद पहली बार पेट्रोल के दाम में २.४१ रुपए कटौती की गई| जहिर है, सहिष्णुता के स्तर पर कांग्रेस की यूपीए सरकार ‘बाहर कुछ और अंदर कुछ’ की विरोधाभासी नीति पर चलकर देश का उत्थान करे-न करे, पर यह तय है कि खुद का पतन अवश्य कर लेगी, क्योंकि जनता अब जाग चुकी है|
दरअसल, यूपीए सरकार की नीति बाहर कुछ और अंदर कुछ और है, जिसे प्राय: आम भाषा में राजनीति कहते हैं, लेकिन ऐसी राजनीति से कुछ समय के लिए सत्ता जरूर पाई जा सकती है, देश का उत्थान नहीं किया जा सकता| अब कुछ दिनों पहले की ही बात लीजिए, देश के बाहर, मालद्वीप में सार्क सम्मेलन के दौरान हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी कोे ‘शांति पुरुष’ करार दे दिया| क्या दशकों से पाक पोषित आतंकवाद से आए दिन दो-चार होती देश जनता कभी पाक के प्रधानमंत्री को ऐसी उपाधि देती, शायद नहीं, तो फिर इस बयान को क्या भारतीय सहिष्णुता कहेंगे? शायद नहीं| लेकिन देश के भीतर इससे ठीक विपरीत, कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी, जिनकी व्यावहारिक तौर पर यूपीए सरकार में पीएम के बराबर की भूमिका मानी जाती है, जो पहली बार गांधीवादी व अहिंसा की राह पर चलने वाले समाजसेवी अन्ना हजारे पर कुछ बोली तो वह भी उनके खिलाफ, कि केवल भाषणबाजी से भ्रष्टाचार खत्म नहीं किया जा सकता| यूपीए
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अब जंग के वक्त देश मौन क्यों?

उदय केसरी  
१६ अगस्त के बाद देश को यदि जागा हुआ माना जाए, तो अब जंग के वक्त देश मौन क्यों है? शायद, यही सवाल उस ७४ साल के युवा की उपाधि पा चुके अन्ना हजारे के मन में उठा होगा, जिसका कोई जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने अनिश्‍चितकाल के लिए मौन धारण कर लिया| हालांकि खुद अन्ना ने मौन की वजह आत्मशांति और अपनी नासाज सेहत की जरूरत को बताया और १२ बार पहले भी ऐसा कर चुकने की बात कही| लेकिन क्या यह उन करोड़ों युवा भारतवासियों को झकझोरने वाली घटना नहीं लगी? जिनकी जुबान यह कहते नहीं थक रही थी- मैं अन्ना हूं्| देश की गलियां, जिनके नाम से गूंजने लगी थीं और सड़कों पर जन सैलाब उमड़ पड़ा था, उस शख्स को आखिर अपनी ही अभिव्यक्ति पर क्यों विराम लगाना पड़ा?
इस पर मेरा जवाब शायद कुछ लोगों को जज्बाती लगे, लेकिन साफ है कि अन्ना की अगस्त क्रांति से देश के सबसे अधिक युवा समेत करोड़ों लोगों की आंखें जरूर खुलीं, लेकिन वे खुद के भीतर जंग में चौतरफा हमलों के बीच अपने जज्बे को बरकरार रखने का अटूट साहस नहीं जगा पाए| जबकि हमारी इस कमजोरी से इस देश पर राज करने वाले चतुर-चालाक नेता बहुत पहले से वाकिफ रहे हैं| हमारे अंदर क्षण भर में पैदा होने वाले देशप्रेम के जज्बे से इस देश के नेता केवल तब ही डरते हैं, जब वक्त उनके चुनाव का होता है, जो एक लंबे अंतराल के बाद आता है और तब वे जनता के एकदम वफादार सेवक का चोला और व्यवहार धारण कर लेते हैं-हमारे क्षणिक जज्बे को धोखा देने और सत्ता में आने के बाद अपनी आंखें तरेरने के लिए|
अन्ना की अगस्त क्रांति में हम-आप ने यदि कुछ वक्त के लिए ही अन्ना होने के जज्बे से भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई हो, तो हमारे अंदर के उस अन्ना का दमन केंद्र की सत्ता में बैठी कांग्रेस के चालबाज सिपाही कैसे कर रहे हैं, यह क्या किसी से छुपा हुआ है? नहीं, तो फिर हम मौन क्यों हैं? क्या इस देश में अभिव्यक्ति इतनी खतरनाक हो गई है कि देश के एक जाने-माने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को उनके चैंबर में घुसकर एक सिरफिरा युवा बुरी तरह से पीट देता है और गर्व से खुद को छद्म सेना का सिपाही बताता है| यही नहीं, इसके खिलाफ जब टीम अन्ना के कुछ समर्थक आवाज उठाते हैं तो उन्हें भी उतनी ही बेरहमी से पीटा जाता है| कश्मीर मसले पर प्रशांत भूषण ने अपनी जो निजी राय व्यक्त की, उनसे पहले क्या ऐसी राय दिल्ली में ही प्रसिद्ध लेखिका अरूंधती राय ने नहीं व्यक्त की थी? की थी और यही बात उन्होंने कश्मीर में भी कही थी, तब उनके बयान के खिलाफ किसी छद्म सेना के सिपाही का खून इसी तरह से क्यों नहीं खौला?
जाहिर है, यहां मकसद देश की ‘कथित’ अखंडता के खिलाफ बयान देने का नहीं है, बल्कि हमारे अंदर जागे अन्ना को दमन करने का है| यहां मैं अखंडता शब्द से पहले लिखे ‘कथित’ शब्द का मतलब स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यह वह अखंडता है, जिसकी बात करने वाले खुद, इस धर्मनिरपेक्ष भारत भूमि में, सांप्रदायिक विचारों के खंडों में बंटे हुए हैं| जहां तक कश्मीर को देश से अलग होने की छूट देने का सवाल है तो प्रशांत भूषण की राय से मैं सहमत नहीं हूं, लेकिन मैं आरएसएस, विश्‍व हिन्दू परिषद, शिव सेना, बजरंग दल व कथित राम सेना, भगत सिंह क्रांति सेना समेत सांप्रदायिक मुस्लिम संगठनों, चरमपंथी सिमी, बब्बर खालसा, कट्टर ईसाई मिशनरी आदि के सांप्रदायिक विचारों से भी सहमत नहीं हूं, और मैं क्या इस देश की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था इससे सहमत नहीं है| तो क्या उनके खिलाफ तब तक कोई हिंसक कार्रवाई की जाती है, जब तक कि उनके कारनामों से देश में सुरक्षा-व्यवस्था का कोई भयंकर संकट पैदा नहीं हो जाता? नहीं ना, क्योंकि देश की इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था से हमें अहिंसक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी मिला हुआ है|
लेकिन इस अधिकार पर ही नहीं, २००५ में बने सूचना के अधिकार (आरटीआई) पर भी कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के नेताओं का नजरिया बदलने लगा है| कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के जरिये टीम अन्ना पर हो रहे लगातार हमलों के बीच सूचना आयुक्तों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा यह बयान दिया जाता है कि आरटीआई कानून के दायरे पर पुनर्विचार करने की जरूरत है| क्या इससे जाहिर नहीं होता कि टीम अन्ना और भ्रष्टाचार के खिलाफ हिसार समेत देशभर में जगे अनेक अन्नाओं से खार खाई कांग्रेस की सरकार बदले की कार्रवाई कर रही है? ऐसे में, यही सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में क्या वाकई सख्त लोकपाल बिल लाने और उसे पारित करवाने का वादा पूरा करेगी? विश्‍वास करना मुश्किल है| केंद्र सरकार तो अब लोकपाल कानून के लिए टीम अन्ना द्वारा की गई ऐतिहासिक पहल को भी जैसे मिटाने की फिराक में है और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के उस प्रस्ताव पर विचार होने लगा है कि लोकपाल को एक संवैधानिक संस्था बनाया जाए, जिसे बनाने की प्रक्रिया, कानून बनाने से कहीं अधिक मुश्किल है| यानी सरकार की मंशा कुछ और ही है, मगर हैरत यह है कि...टीम अन्ना पर चौतरफा हमलों के खिलाफ और अपने मौलिक अधिकारों के रक्षार्थ जंग के इस वक्त में देश मौन क्यों है?
मासिक पत्रिका 'फ्लाइंग स्क्वाड' के नवम्बर अंक में प्रकाशित|

दिल्ली आखिर खुद पर क्यों गर्व करे ?

उदय केसरी  
जिस दिल्ली ने देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जनक्रांति का ऐतिहासिक आगाज देखा, उसी दिल्ली को महज ९ दिन बाद एक आतंकी बम विस्फोट में जनहानि और कई घरों में मातम देखना पड़ा, तो ऐसी दिल्ली को इस देश की राजधानी होने पर कितना गर्व होता होगा? यह सवाल भले ही तथाकथित एलीट क्लास के कुछ विचारकों और बुद्धिजीवियों को जज्बाती लगे, लेकिन क्या बिना किसी जज्बात के किसी देश का कभी भला हुआ है? दिल्ली के हाईकोर्ट परिसर में ७ सितंबर को, जो विस्फोट हुआ, उसे आतंकियों के दुस्साहस की कौन सी सीमा कहेंगे? इसी जगह पर महज चार महीने पहले ही उन्हीं आतंकियों ने इस बम विस्फोट की रिहर्सल की थी| कितनी लाचार हो गई है देश की व्यवस्था? कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कहना पड़ता है-यह हमारी व्यवस्था की चूक है| ऐसी चूक का एहसास होने के बाद भी क्या किसी राष्ट्र का नेता चुप बैठ सकता है?...यह क्या हमारे नेतृत्वकर्ता की क्षमता पर एक बार फिर से प्रश्‍नचिन्ह खड़ा नहीं करता?
कायरता, जज्बात के अभाव और स्वार्थ की पराकाष्ठा से पैदा होती है| लेकिन इस जज्बात से देश के एक प्रसिद्ध न्यूज चैनल के एक स्टार एंकर महोदय इत्तेफाक नहीं रखते| वह ७/९ के बम विस्फोट की रात ही अपने चैनल पर एक परिचर्चा में खम ठोंककर कहते हैं- भले ही बाकी चैनलवाले इसे देश पर हमला कह रहे हों, पर मैं ऐसा नहीं कह सकता|
...क्या ऐसे पत्रकारों से देश का भला होने की उम्मीद की जा सकती है? यही नहीं, केंद्र में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शकील अहमद के जज्बात तो जैसे पार्टी की कुर्सी में सदा के लिए दफन हो चुके हैं| एक न्यूज चैनल पर वह मनिन्दरजीत सिंह बिट्टा के जज्बात के खिलाफ ऐसी संकीर्णता के साथ फटे कि उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है...माहौल इतना खराब हो गया कि उस चैनल को यह परिचर्चा बीच में ही बंद करनी पड़ी| जनता को सीख देने वाले ऐसे पत्रकार और प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे नेताओं के विचारों को क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? इसका जवाब मैं आप पर छोड़ता हूं| लेकिन यह कहे बिना नहीं रह सकता कि राजधानी दिल्ली के हाईकोर्ट परिसर में हाई अलर्ट के बाद भी आतंकियों ने बम विस्फोट करके हमारे देश की संप्रभुता को एक बार फिर चुनौती दी है| यदि आतंकियों के इस दुस्साहस का माकूल जवाब नहीं दिया गया, तो और किसी को तकलीफ भले न हो, पर अतीत के पन्नों में दर्ज देश के अनगिनत वीरों की आत्मा को जरूर दुख होगा|
भारत के लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका संभवत: पूरी दुनिया में अलहदा है| चाहे देश पर कैसी भी आफत आ जाए, वह सत्तापक्ष यानी सरकार के खिलाफ तमाम तरह के दोषारोपण वाले बयान दे दे, बस इतने से ही उसकी देश के प्रति सभी जिम्मेदारियां पूरी हो जाती है| या फिर आफत यदि राजनीतिक हो तो सरकार को गिराने के लिए कोई भी कर्म-कुकर्म करने से न चूके, यही उसका परम धर्म होता है| मसलन, भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ऐसे वक्त में एक बार फिर देश में रथयात्रा करने वाले हैं, जब पूरा देश भ्रष्टाचार, महंगाई और आतंकवाद से जूझ रहा है| उन्होंने यह ऐलान, नोट के बदले वोट कांड में अमर सिंह के साथ भाजपा के भी दो पूर्व सांसदों को जेल भेजने के विरोध में किया है और वे रथयात्रा के माध्यम से देशवासियों को यूपीए सरकार की असलियत बताएंगे|
किसी पार्टी या सरकार के प्रति देश की जनता की समझ क्या अब भी नेताओं के भाषणों की मुहताज है?...नहीं| वह जमाना बीती बात हो गई, जब धर्म के नाम राजनीतिक स्वार्थ के रथ पर सवार होकर देश की भोली-भाली जनता को बरगलाया जा सकता था| हाल ही में अन्ना के अनशन के पक्ष में बिना किसी कैम्पेन और भाषण के जिस तरह लोग स्वत: ही सड़कों और गलियों में तिरंगा लेकर निकल पड़े थे, उससे देश के नेताओं ने क्या कोई सबक नहीं लिया? प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करने में अब तक विफल रहे लालकृष्ण आडवाणी अपनी उम्र की इस ढलान पर फिर से वही पुरानी चाल क्यों चल रहे हैं? क्या इससे देश में आतंकवादी हमलों को रोकने में मदद मिलेगी़? या केंद्र की सरकार की असलीयत जानकर जनता समय से पहले ही केंद्र की सरकार को सत्ता की कुर्सी से बेदखल कर देगी? राइट टू रिकॉल का हक तो अभी जनता को मिला ही नहीं है, तो फिर इस रथयात्रा से देश की समस्या का हल कैसे निकलेगा? बरसों से सोई जनता जब भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त लोकपाल कानून की मांग पर जागी, तभी तो भाजपा भी जागी| तो फिर जनता को अब क्या बताना शेष रह गया है?
जाहिर है, सत्तारूढ़ केंद्र सरकार के कांग्रेसी नेता व मंत्री सत्ता की मद में चूर देश के लोकतंत्र को ‘जोकतंत्र’ बनाने पर तुल गए हैं, जिसमें विपक्षी पार्टियों की भूमिका भी कुछ कम नहीं है|...और दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की ऐसी दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह, इसके प्रति यहां के शासकों और प्रशासकों में जज्बात का नहीं होना है|
मासिक पत्रिका 'फ्लाइंग स्क्वाड' के अक्टूबर अंक में प्रकाशित|