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आस्ट्रेलिया बनाम मुंबई और बाहरी छात्रों पर हमला

उदय केसरी
आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर नस्ली हमले से शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे नाराज हैं। उन्होंने इसके बदले में आईपीएल से आस्ट्रेलियाई टीम को बाहर करने और भारत में निवेश कर रही आस्ट्रेलियाई कंपनियों को चेताने की मांग की है। ठाकरे साहब का यह बयान कुछ हजम नहीं होता। जब मुंबई में किसी बिहारी छात्र को बाहरी होने के कारण बुरी तरह से पीटा जाता है। तब ठाकरे साहब इसके प्रायोजक अपने भतीजे राज ठाकरे के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाते हैं? क्या यह नस्ली हमला नहीं है? आस्ट्रेलिया में किसी भारतीय छात्र पर हमले से जो दर्द उस छात्र व उसके भारत में रहने वाले परिजनों को हो रहा है, क्या बिहार के छात्र व उसके परिजनों को नहीं होता?
होता है? मगर मुंबई में बाहरी छात्रों पर हमले के वक्त पार्टी का राजनीतिक स्वार्थ मानवीय संवेदना से ज्यादा अहम हो जाता है। वैसे, अभी तक इस मामले पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे की प्रतिक्रिया नहीं आई है। वह तो अपने चाचा जी के बयान में दो-चार और धमकी जोड़कर भारत में आस्ट्रेलियाई नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग कर सकते हैं। लेकिन सवाल है कि भाषावाद व क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली शिव सेना व मनसे को आस्ट्रेलिया के उपद्रवियों और अपने कार्यकर्ताओं में वैचारिक दृष्टि से क्या अंतर दिखता है?

पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले की खबर पढ़कर मुझे तो बार-बार मुंबई में रेलवे की परीक्षा देने गए एक बिहारी छात्र के साथ बेरहमी से की गई मारपीट की घटना याद आती है। मन में यही सवाल उठता है कि आस्ट्रेलिया के उपद्रवी लोग मुंबई के मनसे कार्यकर्ताओं जैसी हरकत क्यों कर रहे हैं? कहीं राज ठाकरे राजनीति की पाठशाला लेने आस्ट्रेलिया तो नहीं चले गए! या फिर आस्ट्रेलिया के उपद्रवियों को हाल में मुंबई में बिहारी छात्रों के साथ मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा की गई मारपीट इतनी पसंद आ गई कि उसी राह पर चल पड़े।
अपने मुख पत्र सामना में बाल ठाकरे ने आईपीएल के मालिकों विजय माल्या, प्रीति जिंटा व शाहरूख खान को राष्ट्रवाद की नसीहत देते हुए कहा है कि उन्हें राष्ट्रवाद की खातिर आईपीएल से आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को निकाल देना चाहिए।...क्या यह दोहरी बात नहीं लगती? अपने देश में भेद-भाव हो तो कोई बात नहीं, गैर देश में तो बुरी बात।

दरअसल, मैं यह सब बातें कर आस्ट्रेलिया के उपद्रवियों को सही ठहराने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। यह तो सर्वथा गलत और संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है। जिन भारतीय छात्रों पर हमले हो रहे हैं, उनसे आस्ट्रेलियाई स्कूल, कालेजों व विष्वविद्यालयों को भारी आय भी होती है। और फिर यदि वहां की सरकार को भारतीय छात्रों के आने से कोई दिक्कत नही है ंतो वहां के उपद्रवियों को पहले अपनी सरकार से लड़ना चाहिए। वैसे, आस्ट्रेलियाई उपद्रवियों को यह समझ लेना चाहिए कि अपने घर-परिवार से दूर भारतीय छात्रों पर हमले करना कोई बहादुरी नहीं, कायरता है। यह बात वहां की सरकार को भी समझनी चाहिए कि ऐसी घटनाओं से दुनिया भर से पढ़ाई करने के लिए आस्ट्रेलिया आने वाले छात्रों व परिजनों के बीच उनके देश की छवि धूमिल हो रही है, जो इस मंदी के दौर में नुकसान की एक बड़ी वजह बन सकती है।
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सीधीबात पर प्रकाशित होने के दूसरे दिन यानी 10 जून 09 को हिन्दी दैनिक अमर उजाला, दिल्ली में साभार प्रकाशित यह लेख। इसकी कॉपी हमें भेजा ब्लॉगर साथी श्री रामकृष्ण डोंगरे ने ...धन्यवाद!