अब सरोकार में भी कारोबार की संभावनाएं

उदय केसरी  
 हिन्दुस्तान का नवधनाड्य वर्ग, जिसकी एक अलग पहचान है। वह अपने बिजनस और मालदार नौकरी से पागलपन ही हद तक प्रेम करता है। गरीबी की कल्पना करके भी वह सिहर उठता है। इस वर्ग की मां उदारीकरण को कह सकते हंै। 1990 के बाद तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लागू की गई यह नीति अब दो दशक से अधिक पुरानी हो चुकी है, इसलिए इससे पैदा हुए नवधनाड्य वर्ग भी अब जवान हो चुका है। कॉरपोरेट जगत इसी वर्ग की बसाई दुनिया है, जिससे अब हर कोई वाकिफ हो चुका है। इन दो दशकों में नवधनाड्य वर्ग के कॉरपोरेट जगत ने इतने रुपए और शोहरत कमाए हैं कि हिन्दुस्तान का हर एक नौजवान इस दुनिया का निवासी, प्रवासी होने के सपने देखता है। उनमें से कई के सपने साकार भी हो रहे हैं। देश में कॉरपोरेट कंपनियों की संख्या आबादी की दर से बढ़ रही है। बिजनस के तमाम संभावनाओं को खोद-खोद कर निकाले जा रहे हैं। इससे भी कुछ नहीं मिले तो छोटे-छोटे परंपरागत कुटीर व्यापारों को विज्ञापन और रैपर की चमक दिखाकर हथिया लिया जा रहा है। समाज की कोई भी ऐसी जरूरत की चीज इस वर्ग की नजर से नहीं बची है-फिर से चाहे अगबत्ती हो या आचार-पापड़, आटे की पिसाई हो या तेल की पेराई।
आप सोच रहे होंगे इस मुद्दे की चर्चा मैं यहां फिलहाल किस संदर्भ में कर रहा हूं, तो बता दूं कि इस नवधनाड्य वर्ग के पास फिलहाल बिजनस करने के लिए पूंजी की भरमार है, लेकिन वे बिजनस किस चीज का करें, उन्हें शायद इसकी कमी हो रही है। इसलिए वे अब उन विचारों को भी अपने बिजनस आइडिया बनाने के लिए तैयार हो रहे हैं, जिसे पूंजीपति वर्ग ने कभी फायदे का सौदा नहीं समझा और सदा ऐसे विचारों और इसके समर्थकों की उपेक्षा की। विचार-बुनियादी विकास के, सामाजिक सरोकारों के। ‘सत्यमेव जयते’ टीवी शो के व्यापार को इसके ताजा उदाहरण के तौर पर समझा जा सकता है। इस शो की लागत और कारोबार पर थोड़ा गौर करें तो नवधनाड्य वर्ग के जवां हो चुके व्यापारिक कौशल का अंदाजा आप आसानी से लगा पाएंगे। इस शो के सबसे बड़े एक्स फैक्टर आमिर खान इसके हर एपिसोड के लिए 3 करोड़ रुपए फीस ले रहे हैं, जबकि एक एपिसोड की पूरी लागत 4 करोड़ रुपए है। इसमें यदि आमिर की फीस अलग कर दें तो महज एक करोड़ रुपए में पूरा कॉन्सेप्ट, रिसर्च, फिल्मांकन आदि तमाम उपक्रम किए जा रहे हैं। साफ है कि बुनियादी विषयों को बेचने की वस्तु तो बनाया गया, लेकिन अब भी इन विचारों के संवाहकों की कीमत उपेक्षात्मक ही है। अब जरा इस शो की कमाई पर नजर डाल लें तो यह संदर्भ दिन की तरह साफ हो जाएगा। भारत की सबसे बड़ी मोबाइल टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल लिमिटेड इस शो की मुख्य प्रयोजक है, जिसने इसमें 18 करोड़ रुपए लगाए हैं। वहीं वॉटर प्यूरीफायर कंपनी एक्वागार्ड ने इसमें16 करोड़ रुपए लगाए हैं।  इसके अलावा शो के सह प्रायोजकों में एक्सिस बैंक लिमिटेड, कोका कोला इंडिया, स्कोडा आटो इंडिया, बर्जर पेंट्स इंडिया लिमिटेड, डिक्सी टेक्स्टाइल प्राइवेट लिमिटेड और जॉनसन एंड जॉनसन लिमिटेड हैं। इन 6 कंपनियों ने भी 6-7 करोड़ रुपए (सभी का मिलाकर लगभग 40 करोड़ रुपए) शो में लगाए हैं। यही नहीं, इस शो के एड स्लॉट अबतक के सबसे अधिक भाव में बेचे जा रहे हैं। प्रत्येक 10 सेकेंड के एड स्लॉट के लिए पूरे दस लाख रुपए लिए जा रहे हैं। इस तरह देखा जाए तो यह शो कई गुना फायदे में चल रहा है। अब जरा इस सच को भी जान लें कि इस शो में दर्शकों द्वारा सबसे अधिक क्या पसंद किया जा रहा है-आमिर खान को या सामाजिक सरोकार के मुद्दों को। गूगल इंडिया के अनुसार, देश में इंटरनेट का उपयोग करने के आदी लोग इस शो के लिए अधिक से अधिक तथ्यों की तलाश कर रहे हैं। गूगल के जरिये ज्वलंत मुद्दों के बारे में तथ्यों की तलाश करने वालों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि 'सत्यमेव जयते' की लोकप्रियता 'आमिर खान' से कहीं अधिक है।
जाहिर है बिजनस करना है, पूंजी भी है तो हर उस चीज पर ग्लैमर का तड़का मार कर फायदे कमाए जा सकते हैं, जिसे पूर्वाग्राह से ग्रस्त धनाड््यों ने पहले कभी तरजीह नहीं दी। लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही आपको बता दिया कि नवधनाड्यों की फौज ने हिन्दुस्तान में बाजार की जमकर खोज की है और इसे उन्होंने वैश्विक स्तर पर ख्यात कर दिया है। इसके उन्हें फायदे भी मिले तो गंभीर प्रतिस्पर्द्धा के रूप में नुकसान और परेशानियां भी। लेकिन इससे देश की गरीबी, उसकी बुनियादी समस्याओं पर कोई फर्क नहीं पड़ा, बल्कि वे पहले से ज्यादा बढ़ते चले गए, जिससे नवधनाड्यों से नीचे के तमाम वर्ग पहले की तरह ही त्रस्त हैं। ऐसे में, पिछले दिनों एक खबर दिल को तसल्ली देने वाली प्रतीत हुई। बॉलीवुड के मेगास्टार अमिताभ बच्चन ने कर्ज से दबे विदर्भ के 114 किसानों के कर्ज चुकाने के लिए उन्हें 30 लाख  रुपए दान दिए हैं। यह दान उन किसानों को खुदकुशी के फंदे से उतारने और जीवनदान देने जैसा है। लेकिन अमिताभ ने ऐसा किस उपलक्ष्य या संदर्भ में किया, इसकी उन्होंने मीडिया समेत किसी को भी जानकारी नहीं दी। वैसे, अमिताभ ने शायद बहुत अर्से बाद ऐसी कोई पहल की है, जिसमें विशुद्ध सामाजिक सरोकार प्रदर्शित होता है। फिर भी अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है क्योंकि आमिर खान पर भी यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि उन्होंने पूर्व में सामाजिक मुद्दों और अभियानों में जिस तरह हिस्सा लिया, उसी का फायदा उन्हें ‘सत्यमेव जयते’ कार्यक्रम की एंकरिंग में मिल रहा है। लोग उन्हें उम्मीद की नजरों से देख रहे हैं।   

हिलेरी पर ममता की प्रकृति का साया

उदय केसरी  
 यह कैसा संयोग है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिलने आई अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पर ममता की प्रकृति का साया पड़ गया। जैसे ममता बनर्जी आए दिन विभिन्न मुद्दों पर केंद्र सरकार पर धौंस जमाती रहती हैं, कुछ वैसे ही हिलेरी क्लिंटन ने भारत में ही भारत को से दो टूक कह दिया है कि ईरान से दूर रहो। वैसे अमेरिका यह दबाव भारत के अलावा चीन, यूरोपीय देशों और जापान पर भी बना रहा है कि ईरान से तेल आयात में कटौती करें। लेकिन भारत के बारे में हिलेरी के सुर ममता बनर्जी की तरह ही धौंस भरा प्रतीत हुआ, जब हिलेरी ने कहा ईरान के कुल तेल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 12 फीसदी है। सऊदी अरब के बाद ईरान भारत को तेल का निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। यानी भारत जल्दी कटौती की  ओर कदम बढ़ाए। यह भी कह दिया गया कि इराक और सऊदी अरब जैसे पेट्रोलियम उत्पादक देश भारत जैसे देशों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। इस एकतरफा फरमान के पीछे अमेरिका का तर्क है कि इससे ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएगा। ज्ञात रहे कि अमेरिका इस बाबत  इससे पहले मार्च में  भी भारत और 11 अन्य देशों को नोटिस थमाकर धमकी दे चुका है कि ईरान से तेल आयात में कटौती नहीं करने पर उनपर वित्तीय प्रतिबंधों को कड़ा कर दिया जाएगा। उसी तरह जैसे ममता बनर्जी पेट्रोल के दाम बढ़ाए जाने पर केंद्र सरकार को धमकी दी थी। भलें ही संदर्भ अलग-अलग हों, पर कोलकाता में हिलेरी और ममता बनर्जी की शैली में, जो एक समानता दिखी, वह भारत सरकार पर अपनी मांग को लेकर धौंस जमाने जैसा ही कह सकते हैं।
खैर, ऐसे संयोग के बीच सवाल यह है कि आखिर भारत क्यों अमेरिकी धौंस में आकर ईरान से अपने पुराने रिश्ते  तोड़ दे और तेल के आयात में कटौती करे? जबकि भारत में पहले से ही तेल की  आपूर्ति और उसके आए दिन बढ़ते दाम को लेकर बवाल मचा रहता है। ऐसे में क्या  एक पुराने आपूर्तिकर्ता देश से आयात कम करके दूसरे देशों से तेल खरीदने में नई व्यवस्था बनाने आदि का अतिरिक्त भार नहीं बढ़ेगा ? फिर सऊदी अरब को तेल निर्यात करने में कहीं कोई उपलब्धता की समस्या खड़ी हो गई तो? खासकर तब जब उसे ईरान से तेल लेने वाले 11 देशों  को भी तेल निर्यात करना पड़ेगा। उससे भारत में पैदा होने वाले तेल के महासंकट से निपटने के लिए हमारी मदद कौन करेगा? यह तो निश्चित  को छोड़कर अनिश्चित की ओर बढ़ने जैसा खतरनाक कदम हो सकता है। 
दरअसल, अमेरिका ये दबाव की राजनीति ईरान पर अपनी दादागिरी को इराक के माफिक स्थापित करने के लिए कर रहा है। अमेरिका  ईरान से तेल आयात में काटौती का फरमान जारी कर ईरान के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से ध्रुवीकरण को बढ़ावा देकर अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश में है। वैसे ही जैसे जैविक हथियार के नाम पर इराक के खिलाफ पहले विश्व  समुदाय को भड़काया गया और फिर उसपर हमला बोल दिया गया। अमेरिका को हमेशा से तेल संपन्न इन देशों  को अपने नियंत्रण में रखने की ख्वाहिश रही है। इराक के बाद अब बारी ईरान की है और बहाना परमाणु बम निर्माण का है। अमेरिका के इस अघोषित मंशा  को ईरान और इजराइल के बीच लगातार तनातनी से भी बल मिलता है। इसमें वह इजराइल की ममद भी इसी कारण बढ़-चढ़कर करता रहा है। वैसे ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने के मुद्दे में अमेरिका को परमाणु अप्रसार संधि टूटने से ज्यादा खुद की मंशा पर पानी फिरने का डर है। यदि ईरान ऐसा करने में सफल हो गया तो उसपर इराक की तरह नियंत्रण पाना अमेरिका के लिए बड़ी दूर की कौड़ी हो सकती है। इस डर का अंदाजा पिछले दिनों की उस घटना से लग चुका है, जब ईरान ने परमाणु बम बनाने की अपनी कुशलता का खुला प्रदर्शन किया था और जिसे देख अमेरिका मानो बौखला उठा था। अमेरिका तभी से खाड़ी और पश्चिम एशिया के सभी देशों को ईरान से नाता तोड़ने का सुझाव देने लगा है। इस तरह वह ध्रवीकरण को हवा दे रहा है।
यही नहीं ईरान के खिलाफ देशों को बांटने के लिए अमेरिका अब कुचक्र भी रचने लगा है। हाल ही में दिल्ली में हुए स्टीकर बम धमाके पर खुफिया विभाग की बैंकॉक यूनिट की जो रिपोर्ट सामने आई। उसके मुताबिक दिल्ली, बैंकॉक और जार्जिया के ब्लास्ट एक समान थे। तीनों धमाकों में लो-इंटेंसिटी बम का प्रयोग किया गया। तीनों धमाकों की साजिश इजराइल या अमेरिका में ही रची गई और तीनों जगहों पर लोकल लोगों ने ही इसे अंजाम दिलाया। वहीं तीनों ब्लास्ट का मकसद किसी को मारने का नहीं था। जाहिर है, इस विस्फोट का मकसद तबाही फैलाना नहीं, बल्कि भारत और कुछ देशों के बीच मनमुटाव पैदा कर संबंधित देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना था। यहीं नहीं, इन धमाकों के बाद तमाम एजेंसियों ने अभी छानबीन की शुरुआत ही की थी और वे हमले के बारे में कुछ कह पातीं, इससे पहले ही इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतानयाहू ने हमलों के लिए ईरान और हिजबुल्लाह पर आरोप लगा दिया। हालांकि भारत ने इस मामले में ईरान को क्लीनचीट देकर यह साफ कर दिया कि अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच जारी कूटनीतिक चालबाजियों के बीच भारत का रुख तटस्थ है और ईरान से भारत के रिश्ते पूर्ववत बने रहेंगे। वहीं हिजबुल्लाह ने भी स्पष्ट कर दिया कि इन धमाकों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी तरफ, इसके लिए इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद की भूमिका पर सवाल खड़ा होने लगा, क्योंकि वह पहले से ही इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ इस तरह के हथियार इस्तेमाल करता रहा है। फिलीस्तिन और दूसरे अरब देशों में इसके उदाहरण भी मिले हैं।
ऐसे में ईरान को लेकर अमेरिका के असल मकसद को समझना मुश्किल नहीं है, लेकिन इस माहौल में भारत को बेहद सतर्कता से अपनी तटस्थता को बरकरार रखने की चुनौती होगी और इस चुनौती को पार पाना तभी संभव है, जब अमेरिका पर भरोसा और निर्भरता दोनों ही नापतौल कर किया जाए।

असल पत्रकारिता को आमिर का सलाम

उदय केसरी  
 आमिर खान ने अपने पहले टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ के पहले एपिसोड से सरोकारों से जुड़े दर्शकों को खासा आकर्षित किया है और सोशल नेटवर्किंग साइटों पर जमकर इस शो की तरीफ भी हो रही है। इस शो के प्रसारण की टाइमिंग और सादे-सच्चे फार्मेट को लेकर महज टीआरपी का चश्मा लगाने वाले कार्यक्रम निर्माता-निर्देशक अवश्य आशंकाएं व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन आमिर ने इन सबके बावजूद जिस हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ इस शो का निर्माण किया है, उससे साफ है कि उन्होंने बड़े पर्दे की तरह, छोटे पर्दे पर भी एक अनोखा मिसाल कायम करने की ठान ली है। यही नहीं उन्होंने सरोकार के असल पथ भटकते कई न्यूज चैनलों और अखबारों को भी आईना दिखाने की कोशिश की है, जो इसे टीआरपीलेस सब्जेक्ट मानते हैं।
आमिर जैसे फिल्मों के किसी देसी अवार्ड फंक्शन में जाना पसंद नहीं करते हैं और अपने कैरियर के लिए ऐसे अवार्ड को नहीं, बल्कि मेहनत व ईमानदारी से किए गए काम को महत्वपूर्ण मानते हैं। वैसे ही शायद वे टीवी जगत में भी टीआरपी को महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं, बल्कि दर्शकों के दिलों को छूकर अपने संदेश पहुंचाने में वे किस हद तक सफल होते हैं, इसे वह महत्वपूर्ण मानते हैं। इस शो के आने से पहले एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपना यह विचार जाहिर भी कर दिया था। इसलिए महज क्षणिक मनोरंजन की उम्मीद रखने और सरोकारों को बोरिंग समझने वाले दर्शक इस शो के निर्माता यानी आमिर खान के टारगेट आडियंस नहीं हैं। 
आमिर को अपने अलहदे काम करने की शैली के चलते पहले उन्हें काफी समय तक तमाम तरह की आलोचनाएं सहनी पड़ी, लेकिन उन्होंने कभी इसपर ध्यान नहीं दिया और अपने काम में लगातार संजीदा और शोधपरक बने रहे। उनके काम की इसी शैली के कारण उन्हें मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहा जाने लगा और उन्होंने हर साल अपनी फिल्मों के जरिए खुद को साबित किया, इस हद तक साबित किया कि अब उनके आलोचकों के पास कोई तर्क ही नहीं बचे। वे ऐसे अभिनेता बन गए जिसके महज होने से फिल्मों के सफल होने की गारंटी दी जाने लगी।
लेकिन ‘सत्यमेव जयते’ कार्यक्रम के आने के बाद जिस आमिर खान ने टीवी पर आवतार लिया है, वह अभिनेता से कहीं अधिक असल पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के धर्म का बाखूबी पालन करते हुए सरोकारों से दूर होते इस देश के कई मनोरंजन चैनलों, न्यूज चैनलों और अखबारों को आईना दिखाते से प्रतीत होते हैं। आमिर ने पहले एपिसोड में महिलाओं पर अत्याचार और भ्रूण हत्या के जिस स्याह सच को शोधपरक तरीके से सामने लाया है, वह नया नहीं है, उसे कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर उजागर किया जाता रहा है, लेकिन मीडिया में ऐसे मुद्दे को कभी विशेष तवज्जो नहीं दिया गया, क्योंकि टीआरपी गुरुओं को यह समाजसेवा ज्यादा नजर आती है, इसलिए उन्हें यह फायदे का सब्जेक्ट नहीं लगता।
ऐसे माहौल में आमिर खान प्रोडक्शन द्वारा टीवी के लिए ऐसे शो बनाना और उसे प्राइम टाइम पर नहीं, बल्कि एक औड टाइमलाइन पर रविवार सुबह 11 बजे पेश करना अपने आप में चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन गौर करने की बात है कि इनडेप्थ रिसर्च के बाद ही किसी काम को हाथ में लेने वाले आमिर खान ने  क्या इन टीआरपी गुरुओं की आशंकाओं पर विचार नहीं किया होगा। जरूर किया होगा, लेकिन जैसे कभी दूरदर्शन पर आने वाला आधे-एक घंटे के समाचार कार्यक्रम को दर्शकों के लिए पर्याप्त माना जाता था और 24 घंटे समाचार प्रसारित करने की कोई कल्पना भी नहीं कर पाते थे, तब 24 घंटे न्यूज चैनल शुरू करने वालों को लेकर भी ऐसी ही आशंकाएं व्यक्त की गई थीं। ऐसे आशंकाओं से क्रांतिकारी विचारों और पहल करने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता, बशर्ते उसके पीछे का इरादा नेक और सरोकारों से जुड़ा हो।
जहिर है, आमिर खान ने ‘सत्यमेव जयते’ के माध्यम से एक क्रांतिकारी पहल ही नहीं की है, बल्कि भारतीय पत्रकारिता और संचार के वास्तविक मूल्यों को एक बड़े कैनवास पर फिर से सबसे उपर लाकर उकेरने की कोशिश की है, जिसे कारपोरेट जगत की मीडिया ने कहीं स्वार्थ के परदों की ओट में छुपा दिया था।       

उमा के बयान पर गौर करे मीडिया

उदय केसरी  
 जिस मीडिया ने पहले निर्मल बाबा के लाइव समागम कार्यक्रम को बतौर विज्ञापन प्रसारित कर उन्हें देशभर के लोगों से सीधे जोड़ने का काम किया, उसी की आंख बाद में उनकी कमाई पर लग गई। लेकिन, मजे बात यह है कि निर्मल बाबा से न्यूज चैनलों को बतौर विज्ञापन होने वाली कमाई अब भी जारी है। कुछ चैनलों पर पहले की तरह ही अब भी समागम के लाइव कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा है। पिछले दिनों झारखंड के एक अखबार प्रभात खबर ने निर्मल बाबा के असली नाम और पहचान की खोज क्या की, कुछ न्यूज चैनल वालों ने अपने चिरपरिचित अंदाज में इसे सनसनीखेज बनाकर पेश  करना शुरू कर दिया। निर्मल बाबा के खिलाफ तमाम तरह के तथ्यों को खोज निकालने की होड़ सी लग गई। इसपर विराम तब लगा जब खुद निर्मल बाबा ने एक न्यूज चैनल पर अपनी सारी कहानी बयां कर दी। उन्होंने बताया कि वह कोई चमत्कार नहीं करते हैं, बस जो उन्हें लोगों के बारे में समागम के दौरान महसूस होता है, उसका हल बताने की  कोशिश  करते हैं। इससे उन्हें जो धन मिलता है, उसके लिए वे नियमतः टैक्स चुकाते हैं और किसी से गुप्त तरीके से धन नहीं लेते।
निर्मल बाबा के इस इंटरव्यू के बाद उनसे संबंधित खबरों की सनसनी जैसे जाती रही और एक-दो दिनों में ही न्यूज चैनलों का ध्यान निर्मल बाबा से हटने लगा। हाल तक यह बाबा खबरों से लगभग विलुप्त हो गए थे। इसीबीच, भाजपा की फायरब्रांड कहे जाने वाली नेत्री उमा भारती ने निर्मल बाबा के मुद्दे  पर बयान देकर एक बार फिर उन्हें खबरों के केंद्र में ला दिया, लेकिन उमा भारती ने जो कुछ कहा है, उसपर  मीडिया को गौर करने और समाज को जागरूक करने की जरूरत है। उमा भारती ने कहा, ‘मैं निर्मल बाबा के पक्ष या विपक्ष में नहीं हूं। मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि जब बात समागम, सभाओं की हो तो केवल निर्मल बाबा का नाम ही सामने क्यों आ रहा है। भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों  में भी इसी तरह की धार्मिक सभाएं आयोजित की जाती हैं।’ भारती ने यह भी कहा कि निर्मल बाबा को रोकना है तो ईसाई धर्म गुरू पौल  दिनाकरण को भी रोका जाना चाहिए। उमा के इस बयान में दक्षिणपंथी राजनीति की बू से इंकार नहीं किया जा सकता और यह भी कि ईसाई धर्मगुरू ही नहीं, कई हिन्दू धर्म गुरू और योग गुरू भी अच्छी-खासी फीस लेकर अपनी सभाओं में लोगों को आने देते हैं-मसलन, आशाराम बापू, श्रीश्री रविशंकर, स्वामी रामदेव आदि। यहीं नहीं, अनेक ऐसी धार्मिक संस्थाएं भी लोगों को योग, ध्यान और मोक्ष की शिक्षा देने के नाम पर चल रही हैं, जिसमें भी विविध प्रकार से भक्तों से शुल्क वसूले जाते हैं। साथ ही इसकी आड़ में पत्र-पत्रिकाएं, किताब, आयुर्वेदिक दवाएं, माला, मूर्ति, फोटो, कैलेंडर आदि भी बेचे जाते हैं। लेकिन सवाल है कि इनकी कमाई पर मीडिया या अन्य किसी संस्था की नजर क्यों नहीं गई, जैसे निर्मल बाबा की कमाई पर गई? क्या केवल इसलिए कि इन संस्थाओं के बाबा भुट्टे, पानीपूरी, रसगुल्ले, खीर जैसे अजीबोगरीब उपायों के जरिए लोगों की समस्याओं का निदान नहीं बताते, बल्कि अपने भक्तों को उनके प्रवचनों को सुनने-पढ़ते और सत्संग करते रहने या उनके बताए योग विधि का पालन करते रहने के लिए कहते हैं। यहां एक बात याद दिला दूं कि दो साल पहले सत्संगी सभाएं लगाने वाले कई नामचीन बाबाओं की गतिविधियों को लेकर कोबरा पोस्ट ने एक स्टिंग ऑपरेशन  कर खुलासा किया था कि ऐसे कुछ बाबा भक्तों से दान लेने की आड़ में काले धन को सफेद करने का काम भी करते हैं। इस ऑपरेशन  में जिन बाबाओं को काले धन को सफेद करने के प्रसंगों में डील करते हुए गुप्त कैमरों में कैद किया गया था, उनमें कुछ की सभाएं आज भी लगती हैं और भक्तों की भीड़ में भी कोई कमी नहीं आई है।
    साफ है कि ऐसे धार्मिक सत्संग, समागम, योग शिविर चाहे किसी भी धर्म के गुरू लगाते हो, चलाते हो, उसमें जुटने वाले लोग कहीं न कहीं अपनी समस्याओं से निजात पाने के लिए इन गुरुओं पर अपनी आस्था जताते हैं और इसकी कीमत भी चुकाते हैं। अब यदि इनमें ठगी, धोखा, प्रपंच की पड़ताल की जाए शायद ही कोई धर्मगुरू ऐसे मिलेंगे जो इसके कठघरे में न आए। असल  सवाल यह है कि आस्था और विश्वास  के इस कारोबार के फलने-फूलने की वजह क्या है? इसकी बुनियादी वजह है इस 21वीं सदी में देश  में बरकरार पिछड़ापन, बेकारी, बेरोजगारी, विपन्नता, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा  और जागरूकता का अभाव है। इन समस्याओं से निजात दिला पाने में देश  की सरकारें जबतक विफल रहेंगी, विभिन्न तरह के बाबाओं, धर्मगुरुओं, स्वामियों के समागम में लोग ऐसे ही अपनी गाढ़ी कमाई फीस में चुका कर अपनी समस्याओं का हल खोजते रहेंगे।  

धमाकों के पीछे का सच नापाक

उदय केसरी  
 परमाणु मुद्दे को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का माहौल गहराने लगा है। वहीं इन दोनों के बीच इजराइल एक मासूम उत्प्रेरक की भूमिका निभाता प्रतीत हो रहा है। जाहिर है ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने की अपनी कुशलता का खुला प्रदर्शन करना अमेरिका को चुनौती जैसा लगा हो, तभी वह खाड़ी और पश्चिम एशिया के सभी देशों को ईरान से नाता तोड़ने का सुझाव देकर ध्रवीकरण को हवा दे रहा है। वैसे, ये हालात खुद नहीं बन रहे, बल्कि बनाए जा रहे हैं। खुफिया विभाग की बैंकॉक यूनिट की जो रिपोर्ट सामने आई है। उसके मुताबिक दिल्ली, बैंकॉक और जार्जिया के ब्लास्ट एक समान हैं। तीनों धमाकों में लो-इंटेंसिटी बम का प्रयोग किया गया। तीनों धमाकों की साजिश इजराइल या अमेरिका में ही रची गई और तीनों जगहों पर लोकल लोगों ने ही इसे अंजाम दिलाया। तीनों ब्लास्ट का मकसद किसी को मारने का नहीं था। जाहिर है, इस विस्फोट का मकसद तबाही फैलाना नहीं, बल्कि भारत और कुछ देशों के बीच मनमुटाव पैदा कर संबंधित देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना था। यहीं नहीं, इन धमाकों के बाद तमाम एजेंसियों ने अभी छानबीन की शुरुआत ही की थी और वे हमले के बारे में कुछ कह पातीं, इससे पहले ही इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतानयाहू ने हमलों के लिए ईरान और हिजबुल्लाह पर आरोप लगा दिया। हालांकि भारत ने इस मामले में ईरान को क्लीनचीट देकर यह साफ कर दिया है अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच जारी कूटनीतिक चालबाजियों के बीच भारत का रुख तटस्थ है और ईरान से भारत के रिश्ते पूर्ववत बने रहेंगे। वहीं हिजबुल्लाह ने भी स्पष्ट कर दिया कि इन धमाकों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी तरफ, इसके लिए इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद की भूमिका पर सवाल खड़ा होने लगा, क्योंकि वह पहले से ही इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ इस तरह के हथियार इस्तेमाल करता रहा है। फिलिस्तीन और दूसरे अरब देशों में इसके उदाहरण भी मिले हैं। सवाल है क्या वाकई ईरान के दावों में दम है कि खुद इजरायल ने ही ये धमाके अपनी सीक्रेट सर्विस मोसाद के जरिए करवाया है? यदि ऐसा है तो आने वाला समय एक बार फिर खाड़ी युद्ध का गवाह बन सकता है। करीब नौ साल पहले 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद इराकी आवाम की तबाही और अमेरिकी दादागिरी, दोनों से पूरी दुनिया वाकिफ है। ऐसे में, ईरान के साथ अमेरिका का तनाव गहराना गंभीर है। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि चूंकि हाल ही में अमेरिका और ईरान में चुनाव होने वाले हैं, वहीं पूर्व के इराक व अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले से अमेरिकी सरकार को अपने ही देश में समर्थन से अधिक विरोध ङोलने पड़े हैं और उसपर से अभी आर्थिक मंदी बोझ भी है। ऐसे में, में ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका कम से कम फिलहाल के कुछ महीनों में नहीं दिखती है। हालांकि युद्ध के मामले में ऐसे विश्लेषण तब धरे के धरे रहे जाते हैं, जब हितों का टकराव और आपसी महत्वाकांक्षा चरम पर पहुंच जाती है, मसलन, 2001 का अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमला बहुत प्रत्याशित नहीं था। बहरहाल, इन तनावों के बीच भारत की तटस्थता एक बेहतर नीति है।