अण्णा से कुछ सीखें नक्सलवादी

-उदय केसरी
महात्मा गांधी ने आजादी के दशकों पहले जिस अमोघ हथियार की अभेद्यता को पहचाना लिया था, वह आज भी उतना ही अभेद्य है। वह हथियार है अहिंसक विरोध- अनशन और सविनय अवज्ञा। गांधी जी ने जब इस हथियार का इस्तेमाल बर्बर अंग्रेजों के खिलाफ करने का निर्णय लिया, तब उन्हें आजादी के दीवाने भारतीय नौजवानों का विरोध भी सहना पड़ा था। इसी कारण गांधी जी को 1920 का असहयोग आंदोलन बीच में वापस लेना पड़ा था। गरम दल यानी हिंसा को हथियार बनाने वाले भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु आदि ने चौरी-चौरा कांड को अंजाम देकर असहयोग आंदोलन के अनुशासन का उल्लंघन कर दिया था। लेकिन अंतत: उन आजादी के दीवानों को अहिंसा की अभेद्यता का अहसास हो गया था, तभी गिरफ्तार होने के बाद जेल में भगत सिंह के नेतृत्व में नौजवानों ने अंग्रेजों के खाने का बहिष्कार यानी अनशन कर दिया था। इस अनशन ने अंग्रेजों की चुलें हिला दी थीं।


गांधी जी का वह अमोघ अस्त्र आज भी अभेद्य है, जिसे साबित किया है अण्णा हजारे ने। जिस लोकपाल बिल की मांग लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उठाई थी और जिसे 42 सालों तक उपेक्षित किया गया, उसी बिल की मांग को लेकर अण्णा के अनशन ने केंद्र की मनमोहन सरकार को महज चार दिनों में झुकने पर मजबूर कर दिया। इसे अनशन जैसे हथियार का चमत्कार ही कहें कि अण्णा के समर्थन में पूरा देश उमड़ पड़ा। लेकिन इतने सबूतों के बाद भी भारत में आज भी एक ऐसा वर्ग है, जिसे न कभी महात्मा गांधी पर विश्वास हुआ और न ही उनके अमोघ अस्त्र अहिंसा पर। उन्होंने हमेशा उनके विचारों को अपना मार्ग बनाया, जिनके विचार भारतीय परिवेश से उपजे ही नहीं थे। कार्ल मार्क्स, लेनिन, माओत्से तुंग के विचारों को आखिर भारत में कैसे लागू किया जा सकता है, जो अपने देशों में ही मिटने की कगार पर हैं। इस वर्ग ने अहिंसा को हमेशा बुजदीली समझा और हिंसा और ताकत के बल पर परिवर्तन लाने की कोशिश की। क्या आज तक उन्हें इसमें कोई बड़ी सफलता हाथ लगी। लाल झंडे को सलाम करने वाले इस वर्ग से ही निकले हैं नक्सली, जिन्हें भारत की जनतांत्रिक व्यवस्था पर तनिक भी भरोसा नहीं है। नक्सलबाड़ी से पैदा हुए नक्सलवाद को आज दशकों हो गए हैं, क्या उन्हें कोई भी कामयाबी मिली? उलटे उनकी हिंसा की भेंट सबसे अधिक गरीब और मजलूमों को ही चढ़ना पड़ा है। नक्सलियों की हिंसक वारदातों से देश के कई राज्य लहूलुहान हैं, लेकिन क्या वे अपने घोषित मंसूबों पर सरकार को झुका पाए? यह तो बड़ी बात है, क्या वे जनता के बीच अपना विश्वास तक जगा पाए? कितना भी तर्क-वितर्क करके देख लें, इन सवालों का जवाब सदा नहीं ही होगा। क्रांति चंद सिरफिरों के बलवे से नहीं आती, जनता का भरोसा जीतकर उन्हें अपने साथ लाना होता है। और यह भरोसा न धन से और ना ही ताकत से खरीदा जा सकता है। इसे जीतने की खुद में योग्यता हासिल करनी होती है, जिसके बाद कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती, लोग स्वयं ही जुड़ते चले जाते हैं। जैसे अण्णा हजारे के पीछे पूरा देश उमड़ पड़ा।


नक्सलियों को यदि महात्मा गांधी जी के विचारों से इतना परहेज है, तो ट्यूनिशिया, म्रिस, सीरिया और लीबिया से ही सबक लें, जो गांधी जी को शायद कम ही जानते होंगे, पर भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ उनके विरोध का तरीका अहिंसा पर आधारित रहा है। अहिंसा का अस्त्र वहां की जनता को सालों से जड़ जमा रखे भ्रष्टतंत्र से छुटकारा दिलाने में कामयाब है। लेकिन आए दिन निर्दोषों के खून बहाने वाले नक्सलियों और उन्हें वैचारिक समर्थन देने वाले वामपंथियों को क्या कभी यह समझाया जा सकता है? कहते हैं कि जगाया उन्हें जा सकता है जो नींद में हों, उन्हें नहीं जो नींद में होने का नाटक करते हैं। गरीबों, दलितों और शोषितों के हक के वास्ते पुलिसवालों और उनके जंगली कानून को नहीं मानने वालों की बलि चढ़ाने वाले नक्सली अपने गलत मार्ग पर इतने आगे तक निकल आए हैं कि उनका वापस लौटना संभव नहीं दिखता, उसपर से अरुंधती राय जैसे कुछ मानवतावादियों का बौद्धिक आतंकवाद इसे कभी खत्म नहीं होने देगा। नक्सवाद इस देश और समाज के प्रर्वतक नहीं, अमन-चैन के दुश्मन हैं, जिससे छुटकारा पाना भी उतना ही जरूरी है, जितना भ्रष्टाचारियों से।


भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे की लड़ाई ने साफ तौर पर यह साबित कर दिया है कि जनताशक्ति के आगे सभी को नतमस्तक होना ही पड़ेगा। फिर चाहे सत्तासीन कितना ही ताकतवर क्यों न हो। छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों में जड़ जमाए रखने वाला नक्सलवाद भी नासूर हो चुका है। यह अब आंदोलन नहीं, अपराध हो चुका है। यह उतना ही घातक है, जितका आतंकवाद। आतंकवाद यदि देशद्रोह के समान है, तो निर्दोषों के खून बहाने वाले नक्सली इससे अलग कैसे हुए?

पेश है माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय की व्‍यवस्‍था की लापरवाही का एक उदाहरण

आवेदकों से मंगवाई गई डीडी को उसकी वैधता अवधि के बाद लौटाया गया
माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल के बारे आये दिन अखबारों में बहुत कुछ छपता रहता है। चूंकि यह पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय है इसलिए इसे खबरों में रहना ही चाहिए, लेकिन अपने अच्‍छे कामों के लिए, न कि केवल अव्‍यवस्‍था, लापरवाही और लाभ की राजनीति के लिए। इस विश्‍वविद्यालय से कभी एमजे करके निकलने के नाते इसके बारे में कुछ शब्‍द कहने के बाद असल मुद्दे पर आउंगा। महान राष्‍ट्रीय कवि व पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी के नाम पर 1990 से संचालित यह विश्‍वविद्यालय के पहले दशक में जब यहां संसाधनों का अभाव था तब यहां माखनलाल चतुर्वेदी के विचारों पर चलने की कोशिश करने वाले लोग हुआ करते थे और उनके सामूहिक कोशिशों ने इस विश्‍वविद्यालय का नाम पूरे देश भर रौशन किया था। इस पहले दशक में यहां से पढ़कर निकले विद्यार्थी भी कोई आम विद्यार्थी नहीं थे, वे पत्रकारिता संस्‍कार लेकर यहां आये और यहां से पत्रकारिता का समुचित ज्ञान प्राप्‍त गये। लेकिन इसके बाद दूसरे दशक में उत्‍तरोतर इस विश्‍वविद्यालय को शायद लालची लोगों की नजर लग गई, जिसका नतीजा आप सबके सामने है। अब यहां कैसे विद्यार्थी आ रहे है और उन्‍हें कैसी पत्रकारिता का ज्ञान दिया जा रहा है। यह बताने की जरूरत नहीं है। कह सकते हैं कि जब किसी संस्‍था की व्‍यवस्‍था में लालची और गैरजिम्‍मेदार लोगों की संख्‍या बढ़ती है तो उस व्‍यवस्‍था का नाम और इतिहास चाहें कुछ भी वहां के मूल्‍यों का ह्रास होने लगता है और उसके प्रति आग्रह तो घटती ही है।

अब मैं अपने असल मुद्दे पर आता हूं, इस विश्‍वविद्यालय ने पिछले साल अगस्‍त में अतिथि व्‍याख्‍याता/संकाय सदस्‍य की आवश्‍यकता हेतु अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कर आवेदन आमंत्रित किया था, जिसमें आवेदन के साथ विश्‍वविद्यालय के नाम से देय दो सौ रूपये की डीडी भी मांगी गई थी। अपने कुछ मित्रों के सुझाव पर मैंने भी इसके लिए आवेदन भेजा था। आवेदन की अंतिम तिथि निकलने के बाद मुझे इंतजार था कि साक्षात्‍कार के लिए कभी कोई बुलावा आयेगा, लेकिन नहीं आया। विश्‍वविद्यालय के कुछ संपर्क वालों से पूछा तो कुछ खास पता नहीं चला। उनका यहीं कहना था-यहां तो बस ऐसा ही है....बाद में मैंने भी इसे भूला दिया। लेकिन 12 मार्च को अचानक डाकिये के हाथ एक पंजीकृत लिफाफा मिला। उसमें डीडी वापिस भेजने के संबंध में एक पत्र के साथ दो सौ रूपये की डीडी है। पत्र (क्रमांक 650/प्रशासन/2011, दिनांक-21 फरवरी 2011) में लिखा है कि संदर्भित विज्ञापन (Advt. No. 04/Admn.2010, Dt. 05-08-2010) द्वारा अतिथि व्‍याख्‍याता/संकाय सदस्‍य की आवश्‍यकता हेतु आमंत्रित आवेदन पर किन्‍ही कारणवश अग्रिम कार्यवाही न होने के कारण आपका डीडी (DD No. 007960, Date- 09-08-2010) मूलत: वापिस भेजा जाता है। नीचे कुलसचिव डा. सुधीर कुमार त्रिवेदी का हस्‍ताक्षर है। इस लिफाफे को विश्‍वविद्यालय से 10 मार्च 2011 को भेजा गया, जैसा कि लिफाफे पर‍ चिपके भारतीय डाक विभाग की स्‍लीप में अंकित है।

अब इसमें विश्‍वविद्यालय की लापरवाही पर जरा गौर कीजिए, लौटाई जा रही डीडी कब की, 09-08-2010 की, बनी हुई है और उसे मूलत: वापस कब भेजा गया 10-03-2011, जो 12-03-2011 को मुझे प्राप्‍त हुआ। यानी विश्‍वविद्यालय ने डीडी को जारी तारीख से करीब सात महीने बाद वापसी के लिए डाक खाने भेजा, जबकि बैंक आफ इंडिया की इस डीडी पर सबसे उपर ही हिन्‍दी में लिखा हुआ छपा है-जारी किये जाने की तारीख से छह महीने तक वैध। यानी मुझे वापिस की गई डीडी अवैध डीडी हो चुकी है, तो इससे पैसे कैसे रिफंड होंगे? अब आप इसे क्‍या कहेंगे, मानवीय भूल या जानबूझकर की गई लापरवाही। अतिथि व्‍याख्‍याता/संकाय सदस्‍य पद के लिए विश्‍वविद्यालय को मेरे जैसे सैकड़ों आवेदन डीडी सहित मिले होंगे और यदि सभी डीडी को 10 मार्च 2011 को ही वापसी के लिए डाकखाने भेजा गया तो बहुत संभव है उन सभी डीडी की वैधता अवधि समाप्‍त हो चुकी होंगी।

ऐसे में, आवेदकों को वैधता अवधि के बाद लौटाई गई उनकी डीडी से पैसे रिफंड नहीं होने के जिम्‍मेदार विश्‍वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. सुधीर कुमार त्रिवेदी तो है ही और आवेदकों को हुए इस नुकसान की भरपाई विश्‍वविद्यालय को करनी चाहिए। यह घटना चाहे, छोटी धनराशि की ही क्‍यों न हो, यह विश्‍वविद्यालय की लचर और लापरवाह चुकी व्‍यवस्‍था की पोल जरूर खोलती है। इतने बड़े विश्‍वविद्यालय में किसी पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किये जाने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया को निरस्‍त कर दिया जाता है और पहले आवेदकों को इसकी सूचना तक भी नहीं दी जाती है और बाद में आवेदन के साथ मंगवाई गई शुल्‍क के रूप में डीडी को मनमाने ढंग से उसकी वैधता अवधि के बाद भेजा जाता है। इस अंधेरगर्दी के बारे में आप क्‍या कहेंगे?

क्‍या भरोसेमंद है देश की कानून व्‍यवस्‍था?

उदय केसरी  
हाल के दिनों पर नजर डालें तो देश में कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति में जबरदस्‍त फेरबदल हुआ है। नीतिश कुमार के बिहार पर से बदनामी के दाग धुलने लगे हैं, ले‍किन शायद ये धुले हुए दाग का पानी बहकर उत्‍तर प्रदेश जा रहा है, क्‍योंकि गौर से देखें तो उत्‍तर प्रदेश पर पुराने बिहार का रंग चढ़ने लगा है। थोड़ा और गौर फरमायें तो इस दागदार पानी का बहाव उत्‍तर प्रदेश से होते हुए दिल्‍ली तक जा पहुंचा है। दरअसल, गंदा पानी प्राय: वहीं जमा होता है, जहां गड्ढे अधिक होते हैं। यही नहीं, अब चूंकि दिल्‍ली में ही केंद्र सरकार का भी दरबार है तो राष्‍ट्रीय कानून व्‍यवस्‍था से भी इस पानी की गंध आने लगी है।

इस गंदे या दागदार पानी से हमारा तात्‍पर्य तो अब तक आप समझ ही गये होंगे- अपराध, घोटाला और गबन, अन्‍याय, अत्‍याचार। एक अनुमान है कि पिछले एक साल के दौरान देश में जितने घोटालों का खुलासा हुआ है, उतने पिछले साठ सालों में नहीं हुए। 1996 में पर्दाफाश हुए 900 करोड़ के चारा घोटाले के बाद भी इससे भी बड़े घोटालों के खुलासे होंगे यह तो शायद देश की आम जनता ने सोचा भी नहीं होगा। लेकिन भारत की जनता तो भोली-भाली है और वह तो घोटालेबाज नेताओं को तक तब तक दोषी नहीं मानती और वोट देते रहती, जबतक न्‍यायालय उसे सजा सुनाकर जेल नहीं भेज देता।

खैर, भारत देश और यहां की जनता यदि उदार है तो उसका फायदा चालाक नेता, अफसर, व्‍यवसायी और अपराधी तो उठायेंगे ही। सो, अब घोटालों के फर्दाफाश होने की खबरे भी मीडिया में वैसे ही हो गई है, जो रोज चोरी, डकैती, लूट और बलात्‍कार की खबरें आती रहती हैं। अव्‍वल तो यह कि घोटाले के आरोपी नेताओं और अफसरों को अब शर्म नहीं आती, बल्कि वे तो इसे घोटाला मानते ही नहीं हैं। वे मीडिया के सामने बेखौफ अपनी दलीलें देते नजर आते हैं। वैसे, सच कहें तो आम लोगों को भी इससे कोई मतलब नहीं रह गया कि किसके बंगले, गाड़ी और कारोबार में काली कमाई लगी है, उसे तो वे सब ‘महान’ और बड़े लोग लगते हैं जो धनवान हैं।

कानून व्‍यवस्‍था में फेरबदल का असर महाराष्‍ट्र पर देखा जा सकता है, वहां की पुलिस को काफी तेजतर्रार माना जाता रहा है, लेकिन शायद दिल्‍ली तक पहुंच चुका गंदा पानी अंदर ही अंदर मुंबई भी पहुंच गया है। यहां पहले अपराधियों का अगल ही वर्ल्‍ड; अंडर वर्ल्‍ड हुआ करता था। वह शायद अब ओपन वर्ल्‍ड में तब्दिल हो चुका है, क्‍योंकि यहां के मुख्‍यमंत्री से लेकर विधायक तक और विपक्ष दलों के नेताओं तक कौन कब किस घोटाला, गबन या अपराध में आरोपी बन सामने आ जाते है समझ में नहीं आता। मसलन, कानून व्‍यवस्‍था बनाये रखने में लापरवाही के लिए विलास राव देशमुख को मुंबई पर आतंकी हमले के बाद हटाया गया, फिर आदर्श सोसाइटी घोटाले में शामिल होने के आरोप में अशोक चौहान को हटाया गया और दिल्‍ली से पृथ्‍वीराज चौहान को सीएम की गद्दी संभालने के लिए भेजा गया। ले‍किन अभी एक साल भी नहीं पूरे हुए हैं कि उन पर सीवीसी नियु‍क्ति के मामले थॉमस के बारे में गलत जानकारी देने का आरोप लगा है और यह आरोप कोई और नहीं स्‍वयं प्रधानमंत्री ने लगाया है। यानी महाराष्‍ट्र में कुछ महीने बाद किसी और आदमी को मुख्‍यमंत्री बना दिया जाये तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। अब ऐसे फेरबदल और घोटालों के दौर में कानून व्‍यवस्‍था पर शासकों का कितना ध्‍यान रहता होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। और यह भी कि बाकी पावरफुल नेता, अधिकारी और अपराधी इस दौर का कैसे इस्‍तेमाल करते होंगे, यह भी समझ सकते हैं-जितना चाहो लूटो, भारत की कानून व्‍यवस्‍था कुछ नहीं कर पायेगी। सालों टैक्‍स जमा नहीं करने वाले और स्‍वीस बैंक में काला धन जमा करने वाले हसन अली विरूद्ध भारत की कानून व्‍यवस्‍था क्‍या कुछ कर पायी है। उसे तो गिरफ्तार करने में पुलिस डरती रही है। इस बात पर जब सुप्रीम से फटकार लगी तब जाकर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है।

देश में ऐसी कानून व्‍यवस्‍था के आलम में ऐसे किसते घोटाले चल रहे होंगे, जिनका आगे चलकर खुलासा होगा। इसे रोका नहीं जा सकता, क्‍योंकि किसी भी बड़े घोटाले की जांच में सालों लगते है और मामला दर्ज होने के उसकी सुनवाई में सालों लगते हैं। तबतक देश में और इतने बड़े घोटाले सामने आ जाते हैं कि पुराने घोटाले बहुत छोटे लगने लगते हैं। और कभी-कभी उन मामलों को बेनतीजा ही बंद कर दिये जाने की सिफारिश कर दी जाती है। जैसे बुफोर्स घोटाला।
खैर, यह विषय इतना विस्‍तृत है कि बातों और तथ्‍यों का कोई अंत नहीं है, फिर भी देश में अबतक फर्दाफाश हुए शीर्ष दस घोटालों की सूची के साथ अपनी बात समाप्‍त करता हूं-
1. 2जी स्‍पैक्‍ट्रम घोटाल : 1.76 लाख करोड़
2. राष्‍ट्रमंडल खेल 2010 : 70 हजार करोड़
3. तेलगी स्‍टाम्‍प घोटाला : 20 हजार करोड़
4. सत्‍यम कंप्‍यूटर घोटाल: 14 हजार करोड़
5. बोफोर्स घोटाल : 64 करोड़
6. चारा घोटाला : 900 करोड़
7. हवाला घोटाला : 72 करोड़
8. आईपीएल घोटाला : अज्ञात
9. हर्षद मेहता घोटाला : 2 हजार करोड़
10. केतन पारेख घोटाल : 120 करोड़

बुरा तो ‘भ्रष्टाचार’शब्द है, इसे करने वाला नहीं!

उदय केसरी  
 लाभ के लिए अनैतिक कार्य या कहें भ्रष्टाचार अब शायद जायज हो चुका है। समाज में भ्रष्टाचार करने को और भ्रष्टाचारियों को बुरा नहीं माना जाता, बशर्ते इस कृत्‍य को सीधे भ्रष्टाचार और करने वाले को भ्रष्टाचारी नहीं कहा जाए। जानते हैं, ऐसे लोगों में इतनी शर्म भी क्यों बाकी है, कि उन्हें भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारी कहने/कहलाने में बुरा लगता है? क्योंकि समाज में अब भी एक तपका है या कहें, गरीब, अशिक्षित, भोले-भाले लोग बचे हैं, जो ईमानदारी से परिश्रम करके अपने परिवार के लिए भरण-पोषण करते हैं। जो संस्कार और नैतिकता को अब भी सबसे उपर रखते हैं। बेशक, ईमान की खाने वाले लोगों में पढ़े-लिखे और नौकरीशुदा तथा राजनीतिक लोग भी हैं, लेकिन वे अल्पसंख्यक हैं, मगर उनकी इस बदले सामाजिक परिवेश में एक नहीं चलती। उन्हें अपने दफ्तर और अपनी पार्टी में एक कोना पकड़ कर नौकरी बचानी पड़ती है।

भारत के इस बदले सामाजिक परिवेश में भ्रष्टाचार का एक तरह से समाजिकरण हो चुका है। सरकारी नौकरी में नौजवान यह सोचकर भी जाने लगे हैं कि वहां उपरी कमाई की असीमित संभावनाएं हैं और साथ ही कामचोरी की पूरी गारंटी भी। इसी तरह, नेतागिरी में पावरफुल पद पाने की होड़ लगी है। एक बार मौका मिला कि फिर कैसे कोई गली का गुंडा मंत्री बन जाता है, यह आप कभी समझ नहीं पायेंगे। आप सोच रहे होंगे ये क्यों भ्रष्टाचार पर वही पुराना उपदेश दे रहा है, जिसे सुनते-सुनते लोगों के कान पक चुके हैं। इसमें क्या नई बात है? गांधी बाबा अब धरती पर नहीं रहे, वह तो नोटों में विराजमान हो चुके हैं, इसलिए लोगों की श्रद्धा अब नोट वाले गांधी बाबा में हो चुकी है।...पता नहीं गांधी बाबा की आत्मा ऐसे लोगों की श्रद्धा को कैसे स्वीकार करती होगी?

अब आप दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स-2010, मुंबई के आदर्श सोसाइटी अपार्टमेंट और 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस से जुड़े भ्रष्टाचारियों को क्या कहेंगे? ये तो पढ़े-लिखे, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले, तथाकथित सभ्रांत वर्ग के लोग हैं। इन लोगों के नाम तो न्यूज चैनल वालों ने आपको रटवा ही दिये ही होंगे। इसलिए आप उनके स्टैंडर्ड का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। लेकिन आश्‍चर्य यह है कि इन लोगों को न्यूज चैनल वालों से काफी गुस्सा है, जिन्होंने कोर्ट में अपराध साबित होने से पहले इनके नाम सार्वजनिक कर दिये। यह भी कि इन लोगों का दावा है कि घोटाले में वे शामिल ही नहीं हैं। मसलन, सुरेश कलमाडी, अशोक चव्हाण, ए. राजा, जिनके हाथों से राजनीतिक मजबूरियों के कारण सत्ता छीन ली गई है, लेकिन सजा के तौर पर नहीं ‘नैतिकता’ के आधार पर।

इस ‘नैतिकता’का मतलब क्या है? मेरे विचार में इसका मतलब होता है जनता की आंखों में धूल झोंकना। ताकि जब तक जनता अपनी आंखों को साफ कर फिर से देखने लायक बना ले, तब तक उसी नेता की वही ‘नैतिकता’किसी दूसरे पद पर बैठने के लिए ‘योग्यता’बन जाए। अब चाहें दूसरा पद पार्टी संगठन की ऊंची कुर्सी ही क्यों न हो। भ्रष्टाचार करने के लिए वहां तो खुली छूट होती है और फिर संसद या विधानसभा की कुर्सी तो है ही न....’नोट के लिए वोट’ का मौका तो अगले चुनाव तक कोई थोड़े छीन सकता है। इसी तरह, रसूखदार बड़े नौकरशाहों को भ्रष्टाचार का खुलासा या कोई गबन होने पर ‘कार्रवाई’ के नाम पर पहले तो ‘तबादला’कर दिया जाता है और यदि जनता उससे भी न मानी तो उसे ‘निलंबित’किया जाता है। सवाल फिर उठता है कि इस ‘तबादले’और ‘निलंबन’का मतलब क्या है? आप अपने दिमाग पर जोर डालकर याद करें कि हाल के वर्षों में आपने कभी ऐसी खबर पढ़ी है कि किसी आईएएस और आईपीएस या राज्य स्तरीय सिविल अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मामले में नौकरी से निकाल कर जेल में डाल दिया गया। यदि होगा तो अपवाद स्वरूप ही। मसलन, रूचिका हत्याकांड में देख लें, 17 साल से अधिक वक्त बीत जाने के बाद भी उस पुलिस अधिकारी राठौर को जेल में नहीं डाला जा सका। बावजूद इसके कि यह मामला एक बच्ची के साथ छेड़छाड़ और उसके परिणामस्वरूप उस बच्ची की मौत का है। यही नहीं, मीडिया में इस मामले को लगातार उठाया जाता रहा है। और भी कई आईएएस और आईपीएस अधिकारी हैं, जो अपने पद की शक्ति का दुरूपयोग करने, रिश्‍वत लेने, आमदमी से अधिक दौलत जमा करने के मामले में आरोपी हैं, पर समय गुजरता जाता है और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। बल्कि वे तो बाद में राजनीतिक दल में शामिल हो जाते हैं, जहां उनकी बड़ी पूछ होती है।

अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि शीर्ष नेता व अधिकारी स्तर पर भ्रष्टाचार का आलम यह है, तो नीचले स्तर पर यानी कार्यकर्ता और कर्मचारी स्तर पर भ्रष्टाचार का रूप कैसा होगा। छोटे-बड़े हर काम के लिए ‘रिश्‍वत’लेना उस काम के लिए ‘फीस’लेने जैसा मान्य हो चुका है। और इससे छोटा हो या बड़ा, कोई भी सरकारी विभाग अछूता नहीं है।

शायद आपमें से कई के मन में अंततः यह सवाल उठे कि आखिर चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला कैसे बढ़ गया है?...उनके लिए मेरा जवाब है- क्योंकि हम केवल ‘भ्रष्टाचार’ शब्द को बुरा मानते हैं, भ्रष्टाचार करने वालों को नहीं।...यदि मानते तो...हमारे समाज और देश का यह हाल नहीं होता।

नफरत की आग में जलता देश

उदय केसरी  
एक तरफ, कश्‍मीर घाटी में आग लगी है। अलगावादी दल हुर्रियत और सत्‍तासीन नेशनल कांफ्रेंस अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। घाटी के युवा भी पत्‍थरबाजी में रोज नये रिकार्ड बना रहे हैं। दशा ऐसी है कि केंद्र सरकार उहापोश की स्थिति में दिख रही है। दूसरी तरफ, अयोध्‍या में आग लगने की जबर्दस्‍त आशंका है। मंदिर-मस्जिद विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला आने की तारीख 24 सितंबर तय है। आग की आशंका ऐसी की उत्‍तर प्रदेश सरकार केंद्र से इतनी बड़ी संख्‍या में सुरक्षा बलों की मांग कर रही है कि उसे पूरा करने में केंद्र असमर्थ है, क्‍योंकि दिल्‍ली में हाल में कॉमनवेल्‍थ गेम शुरू होने वाला है। इन दो राष्‍ट्रीय महासमस्‍याओं के बीच देश में त्‍योहारों का मौसम शुरू हो गया है।

अब आम भारतीय को समझ लेना चाहिए कि भारत में अमन चाहिए तो न तो नेता, न ही पुलिस और न ही सैन्‍य बल कुछ सकते हैं। ये सब कहीं न कहीं कठपुतली हो चुके हैं और इनमें से किसी की डोर सत्‍ता के स्‍वार्थी तत्‍वों के हाथों में, तो किसी की डोर धन के लालची लोगों के हाथों में है। यही नहीं हम-आप को भी ऐसे स्‍वार्थी तत्‍व कभी धर्म, तो कभी जाति और कभी क्षेत्र के नाम पर अपने इशारों पर नचाते रहते हैं और हम इनको समझे बगैर अपने ही लोगों के खिलाफ पत्‍थर उठा लेते हैं।

हम-आप को ऐसी बातें बहुत देर में समझ में आती हैं, जबकि आंखों के सामने स्‍वार्थी तत्‍व अपने खेल-खेलते रहते हैं। मसलन, बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाला है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव अपराधी सहाबुद्दीन के दरवाजे पर दस्‍तक देता है गठजोड़ करने के लिए। 17 सालों बाद अयोध्‍या विवाद पर समाधान की दिशा में अदालत का फैसला आने की घड़ी आते ही भाजपा और उसके सहयोगी संगठन विवाद को विवाद बनाये रखने की तैयारी में आग उगलना शुरू कर चुके हैं। उधर बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी भी फैसला के पक्ष में नहीं आने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का मन बना चुकी है। यानी राम और अल्‍ला के नाम विवाद का कोई हल निकलना असंभव ही लगता है। हां, एक चीज तय है और वह है-एक बार फिर राम और अल्‍ला नाम की बदनामी। इनके नाम पर खून-खराबा, दहशतगर्दी, तोड़फोड़। ऐसे जख्‍म सह-सहकर धर्मस्‍थली अयोध्‍या का आजतक सही विकास नहीं हो सका है। कह सकते हैं अयोध्‍या की भी हालत कश्‍मीर घाटी की तरह ही है। जहां रहने वाले आम आदमी के दर्द को कोई समझना नहीं चाहता, बस सब अपनी राजनीति उनपर थोपकर उन्‍हें गुमराह करते रहते हैं।

कश्‍मीर घाटी में तैनात सैन्‍य बलों के विशेषाधिकार को वापस लेने की मांग वहां के युवा मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला ने की है। जिसपर केंद्र सरकार आम राय बनाने की कोशिश में कैबिनेट की बैठक कर कोई राय नहीं बन सकी है अब इसके लिए सर्वद‍लीय बैठक की जाएगी। लेकिन कश्‍मीर समस्‍या का क्‍या यही हल है? सैन्‍य बलों के विशेषाधिकार वापस ले लिये जाने के बाद क्‍या उमर अब्‍दुल्‍ला इस बात की गारंटी लेंगे कि घाटी में आतंकवादियों की सक्रियता नहीं बढ़ेगी।...नहीं बिल्‍कुल नहीं। इसी तरह, अयोध्‍या में राममंदिर बनाने के लिए केंद्र सरकार यदि कानून बना दे तो क्‍या अयोध्‍या समेत पूरे देश में कोई दंगा-फसाद नहीं होगा, इसकी गारंटी भाजपा या विश्‍व हिन्‍दू परिषद लेगी? नहीं, बिल्‍कुल नहीं। तो फिर आप और हम खुद ही विचार करके देखें कि ऐसी मांगों के पीछे कितनी बड़ी स्‍वार्थ की राजनीति छिपी है।