पेश है माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय की व्‍यवस्‍था की लापरवाही का एक उदाहरण

आवेदकों से मंगवाई गई डीडी को उसकी वैधता अवधि के बाद लौटाया गया
माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल के बारे आये दिन अखबारों में बहुत कुछ छपता रहता है। चूंकि यह पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय है इसलिए इसे खबरों में रहना ही चाहिए, लेकिन अपने अच्‍छे कामों के लिए, न कि केवल अव्‍यवस्‍था, लापरवाही और लाभ की राजनीति के लिए। इस विश्‍वविद्यालय से कभी एमजे करके निकलने के नाते इसके बारे में कुछ शब्‍द कहने के बाद असल मुद्दे पर आउंगा। महान राष्‍ट्रीय कवि व पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी के नाम पर 1990 से संचालित यह विश्‍वविद्यालय के पहले दशक में जब यहां संसाधनों का अभाव था तब यहां माखनलाल चतुर्वेदी के विचारों पर चलने की कोशिश करने वाले लोग हुआ करते थे और उनके सामूहिक कोशिशों ने इस विश्‍वविद्यालय का नाम पूरे देश भर रौशन किया था। इस पहले दशक में यहां से पढ़कर निकले विद्यार्थी भी कोई आम विद्यार्थी नहीं थे, वे पत्रकारिता संस्‍कार लेकर यहां आये और यहां से पत्रकारिता का समुचित ज्ञान प्राप्‍त गये। लेकिन इसके बाद दूसरे दशक में उत्‍तरोतर इस विश्‍वविद्यालय को शायद लालची लोगों की नजर लग गई, जिसका नतीजा आप सबके सामने है। अब यहां कैसे विद्यार्थी आ रहे है और उन्‍हें कैसी पत्रकारिता का ज्ञान दिया जा रहा है। यह बताने की जरूरत नहीं है। कह सकते हैं कि जब किसी संस्‍था की व्‍यवस्‍था में लालची और गैरजिम्‍मेदार लोगों की संख्‍या बढ़ती है तो उस व्‍यवस्‍था का नाम और इतिहास चाहें कुछ भी वहां के मूल्‍यों का ह्रास होने लगता है और उसके प्रति आग्रह तो घटती ही है।

अब मैं अपने असल मुद्दे पर आता हूं, इस विश्‍वविद्यालय ने पिछले साल अगस्‍त में अतिथि व्‍याख्‍याता/संकाय सदस्‍य की आवश्‍यकता हेतु अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कर आवेदन आमंत्रित किया था, जिसमें आवेदन के साथ विश्‍वविद्यालय के नाम से देय दो सौ रूपये की डीडी भी मांगी गई थी। अपने कुछ मित्रों के सुझाव पर मैंने भी इसके लिए आवेदन भेजा था। आवेदन की अंतिम तिथि निकलने के बाद मुझे इंतजार था कि साक्षात्‍कार के लिए कभी कोई बुलावा आयेगा, लेकिन नहीं आया। विश्‍वविद्यालय के कुछ संपर्क वालों से पूछा तो कुछ खास पता नहीं चला। उनका यहीं कहना था-यहां तो बस ऐसा ही है....बाद में मैंने भी इसे भूला दिया। लेकिन 12 मार्च को अचानक डाकिये के हाथ एक पंजीकृत लिफाफा मिला। उसमें डीडी वापिस भेजने के संबंध में एक पत्र के साथ दो सौ रूपये की डीडी है। पत्र (क्रमांक 650/प्रशासन/2011, दिनांक-21 फरवरी 2011) में लिखा है कि संदर्भित विज्ञापन (Advt. No. 04/Admn.2010, Dt. 05-08-2010) द्वारा अतिथि व्‍याख्‍याता/संकाय सदस्‍य की आवश्‍यकता हेतु आमंत्रित आवेदन पर किन्‍ही कारणवश अग्रिम कार्यवाही न होने के कारण आपका डीडी (DD No. 007960, Date- 09-08-2010) मूलत: वापिस भेजा जाता है। नीचे कुलसचिव डा. सुधीर कुमार त्रिवेदी का हस्‍ताक्षर है। इस लिफाफे को विश्‍वविद्यालय से 10 मार्च 2011 को भेजा गया, जैसा कि लिफाफे पर‍ चिपके भारतीय डाक विभाग की स्‍लीप में अंकित है।

अब इसमें विश्‍वविद्यालय की लापरवाही पर जरा गौर कीजिए, लौटाई जा रही डीडी कब की, 09-08-2010 की, बनी हुई है और उसे मूलत: वापस कब भेजा गया 10-03-2011, जो 12-03-2011 को मुझे प्राप्‍त हुआ। यानी विश्‍वविद्यालय ने डीडी को जारी तारीख से करीब सात महीने बाद वापसी के लिए डाक खाने भेजा, जबकि बैंक आफ इंडिया की इस डीडी पर सबसे उपर ही हिन्‍दी में लिखा हुआ छपा है-जारी किये जाने की तारीख से छह महीने तक वैध। यानी मुझे वापिस की गई डीडी अवैध डीडी हो चुकी है, तो इससे पैसे कैसे रिफंड होंगे? अब आप इसे क्‍या कहेंगे, मानवीय भूल या जानबूझकर की गई लापरवाही। अतिथि व्‍याख्‍याता/संकाय सदस्‍य पद के लिए विश्‍वविद्यालय को मेरे जैसे सैकड़ों आवेदन डीडी सहित मिले होंगे और यदि सभी डीडी को 10 मार्च 2011 को ही वापसी के लिए डाकखाने भेजा गया तो बहुत संभव है उन सभी डीडी की वैधता अवधि समाप्‍त हो चुकी होंगी।

ऐसे में, आवेदकों को वैधता अवधि के बाद लौटाई गई उनकी डीडी से पैसे रिफंड नहीं होने के जिम्‍मेदार विश्‍वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. सुधीर कुमार त्रिवेदी तो है ही और आवेदकों को हुए इस नुकसान की भरपाई विश्‍वविद्यालय को करनी चाहिए। यह घटना चाहे, छोटी धनराशि की ही क्‍यों न हो, यह विश्‍वविद्यालय की लचर और लापरवाह चुकी व्‍यवस्‍था की पोल जरूर खोलती है। इतने बड़े विश्‍वविद्यालय में किसी पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किये जाने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया को निरस्‍त कर दिया जाता है और पहले आवेदकों को इसकी सूचना तक भी नहीं दी जाती है और बाद में आवेदन के साथ मंगवाई गई शुल्‍क के रूप में डीडी को मनमाने ढंग से उसकी वैधता अवधि के बाद भेजा जाता है। इस अंधेरगर्दी के बारे में आप क्‍या कहेंगे?

क्‍या भरोसेमंद है देश की कानून व्‍यवस्‍था?

उदय केसरी  
हाल के दिनों पर नजर डालें तो देश में कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति में जबरदस्‍त फेरबदल हुआ है। नीतिश कुमार के बिहार पर से बदनामी के दाग धुलने लगे हैं, ले‍किन शायद ये धुले हुए दाग का पानी बहकर उत्‍तर प्रदेश जा रहा है, क्‍योंकि गौर से देखें तो उत्‍तर प्रदेश पर पुराने बिहार का रंग चढ़ने लगा है। थोड़ा और गौर फरमायें तो इस दागदार पानी का बहाव उत्‍तर प्रदेश से होते हुए दिल्‍ली तक जा पहुंचा है। दरअसल, गंदा पानी प्राय: वहीं जमा होता है, जहां गड्ढे अधिक होते हैं। यही नहीं, अब चूंकि दिल्‍ली में ही केंद्र सरकार का भी दरबार है तो राष्‍ट्रीय कानून व्‍यवस्‍था से भी इस पानी की गंध आने लगी है।

इस गंदे या दागदार पानी से हमारा तात्‍पर्य तो अब तक आप समझ ही गये होंगे- अपराध, घोटाला और गबन, अन्‍याय, अत्‍याचार। एक अनुमान है कि पिछले एक साल के दौरान देश में जितने घोटालों का खुलासा हुआ है, उतने पिछले साठ सालों में नहीं हुए। 1996 में पर्दाफाश हुए 900 करोड़ के चारा घोटाले के बाद भी इससे भी बड़े घोटालों के खुलासे होंगे यह तो शायद देश की आम जनता ने सोचा भी नहीं होगा। लेकिन भारत की जनता तो भोली-भाली है और वह तो घोटालेबाज नेताओं को तक तब तक दोषी नहीं मानती और वोट देते रहती, जबतक न्‍यायालय उसे सजा सुनाकर जेल नहीं भेज देता।

खैर, भारत देश और यहां की जनता यदि उदार है तो उसका फायदा चालाक नेता, अफसर, व्‍यवसायी और अपराधी तो उठायेंगे ही। सो, अब घोटालों के फर्दाफाश होने की खबरे भी मीडिया में वैसे ही हो गई है, जो रोज चोरी, डकैती, लूट और बलात्‍कार की खबरें आती रहती हैं। अव्‍वल तो यह कि घोटाले के आरोपी नेताओं और अफसरों को अब शर्म नहीं आती, बल्कि वे तो इसे घोटाला मानते ही नहीं हैं। वे मीडिया के सामने बेखौफ अपनी दलीलें देते नजर आते हैं। वैसे, सच कहें तो आम लोगों को भी इससे कोई मतलब नहीं रह गया कि किसके बंगले, गाड़ी और कारोबार में काली कमाई लगी है, उसे तो वे सब ‘महान’ और बड़े लोग लगते हैं जो धनवान हैं।

कानून व्‍यवस्‍था में फेरबदल का असर महाराष्‍ट्र पर देखा जा सकता है, वहां की पुलिस को काफी तेजतर्रार माना जाता रहा है, लेकिन शायद दिल्‍ली तक पहुंच चुका गंदा पानी अंदर ही अंदर मुंबई भी पहुंच गया है। यहां पहले अपराधियों का अगल ही वर्ल्‍ड; अंडर वर्ल्‍ड हुआ करता था। वह शायद अब ओपन वर्ल्‍ड में तब्दिल हो चुका है, क्‍योंकि यहां के मुख्‍यमंत्री से लेकर विधायक तक और विपक्ष दलों के नेताओं तक कौन कब किस घोटाला, गबन या अपराध में आरोपी बन सामने आ जाते है समझ में नहीं आता। मसलन, कानून व्‍यवस्‍था बनाये रखने में लापरवाही के लिए विलास राव देशमुख को मुंबई पर आतंकी हमले के बाद हटाया गया, फिर आदर्श सोसाइटी घोटाले में शामिल होने के आरोप में अशोक चौहान को हटाया गया और दिल्‍ली से पृथ्‍वीराज चौहान को सीएम की गद्दी संभालने के लिए भेजा गया। ले‍किन अभी एक साल भी नहीं पूरे हुए हैं कि उन पर सीवीसी नियु‍क्ति के मामले थॉमस के बारे में गलत जानकारी देने का आरोप लगा है और यह आरोप कोई और नहीं स्‍वयं प्रधानमंत्री ने लगाया है। यानी महाराष्‍ट्र में कुछ महीने बाद किसी और आदमी को मुख्‍यमंत्री बना दिया जाये तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। अब ऐसे फेरबदल और घोटालों के दौर में कानून व्‍यवस्‍था पर शासकों का कितना ध्‍यान रहता होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। और यह भी कि बाकी पावरफुल नेता, अधिकारी और अपराधी इस दौर का कैसे इस्‍तेमाल करते होंगे, यह भी समझ सकते हैं-जितना चाहो लूटो, भारत की कानून व्‍यवस्‍था कुछ नहीं कर पायेगी। सालों टैक्‍स जमा नहीं करने वाले और स्‍वीस बैंक में काला धन जमा करने वाले हसन अली विरूद्ध भारत की कानून व्‍यवस्‍था क्‍या कुछ कर पायी है। उसे तो गिरफ्तार करने में पुलिस डरती रही है। इस बात पर जब सुप्रीम से फटकार लगी तब जाकर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है।

देश में ऐसी कानून व्‍यवस्‍था के आलम में ऐसे किसते घोटाले चल रहे होंगे, जिनका आगे चलकर खुलासा होगा। इसे रोका नहीं जा सकता, क्‍योंकि किसी भी बड़े घोटाले की जांच में सालों लगते है और मामला दर्ज होने के उसकी सुनवाई में सालों लगते हैं। तबतक देश में और इतने बड़े घोटाले सामने आ जाते हैं कि पुराने घोटाले बहुत छोटे लगने लगते हैं। और कभी-कभी उन मामलों को बेनतीजा ही बंद कर दिये जाने की सिफारिश कर दी जाती है। जैसे बुफोर्स घोटाला।
खैर, यह विषय इतना विस्‍तृत है कि बातों और तथ्‍यों का कोई अंत नहीं है, फिर भी देश में अबतक फर्दाफाश हुए शीर्ष दस घोटालों की सूची के साथ अपनी बात समाप्‍त करता हूं-
1. 2जी स्‍पैक्‍ट्रम घोटाल : 1.76 लाख करोड़
2. राष्‍ट्रमंडल खेल 2010 : 70 हजार करोड़
3. तेलगी स्‍टाम्‍प घोटाला : 20 हजार करोड़
4. सत्‍यम कंप्‍यूटर घोटाल: 14 हजार करोड़
5. बोफोर्स घोटाल : 64 करोड़
6. चारा घोटाला : 900 करोड़
7. हवाला घोटाला : 72 करोड़
8. आईपीएल घोटाला : अज्ञात
9. हर्षद मेहता घोटाला : 2 हजार करोड़
10. केतन पारेख घोटाल : 120 करोड़

बुरा तो ‘भ्रष्टाचार’शब्द है, इसे करने वाला नहीं!

उदय केसरी  
 लाभ के लिए अनैतिक कार्य या कहें भ्रष्टाचार अब शायद जायज हो चुका है। समाज में भ्रष्टाचार करने को और भ्रष्टाचारियों को बुरा नहीं माना जाता, बशर्ते इस कृत्‍य को सीधे भ्रष्टाचार और करने वाले को भ्रष्टाचारी नहीं कहा जाए। जानते हैं, ऐसे लोगों में इतनी शर्म भी क्यों बाकी है, कि उन्हें भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारी कहने/कहलाने में बुरा लगता है? क्योंकि समाज में अब भी एक तपका है या कहें, गरीब, अशिक्षित, भोले-भाले लोग बचे हैं, जो ईमानदारी से परिश्रम करके अपने परिवार के लिए भरण-पोषण करते हैं। जो संस्कार और नैतिकता को अब भी सबसे उपर रखते हैं। बेशक, ईमान की खाने वाले लोगों में पढ़े-लिखे और नौकरीशुदा तथा राजनीतिक लोग भी हैं, लेकिन वे अल्पसंख्यक हैं, मगर उनकी इस बदले सामाजिक परिवेश में एक नहीं चलती। उन्हें अपने दफ्तर और अपनी पार्टी में एक कोना पकड़ कर नौकरी बचानी पड़ती है।

भारत के इस बदले सामाजिक परिवेश में भ्रष्टाचार का एक तरह से समाजिकरण हो चुका है। सरकारी नौकरी में नौजवान यह सोचकर भी जाने लगे हैं कि वहां उपरी कमाई की असीमित संभावनाएं हैं और साथ ही कामचोरी की पूरी गारंटी भी। इसी तरह, नेतागिरी में पावरफुल पद पाने की होड़ लगी है। एक बार मौका मिला कि फिर कैसे कोई गली का गुंडा मंत्री बन जाता है, यह आप कभी समझ नहीं पायेंगे। आप सोच रहे होंगे ये क्यों भ्रष्टाचार पर वही पुराना उपदेश दे रहा है, जिसे सुनते-सुनते लोगों के कान पक चुके हैं। इसमें क्या नई बात है? गांधी बाबा अब धरती पर नहीं रहे, वह तो नोटों में विराजमान हो चुके हैं, इसलिए लोगों की श्रद्धा अब नोट वाले गांधी बाबा में हो चुकी है।...पता नहीं गांधी बाबा की आत्मा ऐसे लोगों की श्रद्धा को कैसे स्वीकार करती होगी?

अब आप दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स-2010, मुंबई के आदर्श सोसाइटी अपार्टमेंट और 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस से जुड़े भ्रष्टाचारियों को क्या कहेंगे? ये तो पढ़े-लिखे, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले, तथाकथित सभ्रांत वर्ग के लोग हैं। इन लोगों के नाम तो न्यूज चैनल वालों ने आपको रटवा ही दिये ही होंगे। इसलिए आप उनके स्टैंडर्ड का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। लेकिन आश्‍चर्य यह है कि इन लोगों को न्यूज चैनल वालों से काफी गुस्सा है, जिन्होंने कोर्ट में अपराध साबित होने से पहले इनके नाम सार्वजनिक कर दिये। यह भी कि इन लोगों का दावा है कि घोटाले में वे शामिल ही नहीं हैं। मसलन, सुरेश कलमाडी, अशोक चव्हाण, ए. राजा, जिनके हाथों से राजनीतिक मजबूरियों के कारण सत्ता छीन ली गई है, लेकिन सजा के तौर पर नहीं ‘नैतिकता’ के आधार पर।

इस ‘नैतिकता’का मतलब क्या है? मेरे विचार में इसका मतलब होता है जनता की आंखों में धूल झोंकना। ताकि जब तक जनता अपनी आंखों को साफ कर फिर से देखने लायक बना ले, तब तक उसी नेता की वही ‘नैतिकता’किसी दूसरे पद पर बैठने के लिए ‘योग्यता’बन जाए। अब चाहें दूसरा पद पार्टी संगठन की ऊंची कुर्सी ही क्यों न हो। भ्रष्टाचार करने के लिए वहां तो खुली छूट होती है और फिर संसद या विधानसभा की कुर्सी तो है ही न....’नोट के लिए वोट’ का मौका तो अगले चुनाव तक कोई थोड़े छीन सकता है। इसी तरह, रसूखदार बड़े नौकरशाहों को भ्रष्टाचार का खुलासा या कोई गबन होने पर ‘कार्रवाई’ के नाम पर पहले तो ‘तबादला’कर दिया जाता है और यदि जनता उससे भी न मानी तो उसे ‘निलंबित’किया जाता है। सवाल फिर उठता है कि इस ‘तबादले’और ‘निलंबन’का मतलब क्या है? आप अपने दिमाग पर जोर डालकर याद करें कि हाल के वर्षों में आपने कभी ऐसी खबर पढ़ी है कि किसी आईएएस और आईपीएस या राज्य स्तरीय सिविल अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मामले में नौकरी से निकाल कर जेल में डाल दिया गया। यदि होगा तो अपवाद स्वरूप ही। मसलन, रूचिका हत्याकांड में देख लें, 17 साल से अधिक वक्त बीत जाने के बाद भी उस पुलिस अधिकारी राठौर को जेल में नहीं डाला जा सका। बावजूद इसके कि यह मामला एक बच्ची के साथ छेड़छाड़ और उसके परिणामस्वरूप उस बच्ची की मौत का है। यही नहीं, मीडिया में इस मामले को लगातार उठाया जाता रहा है। और भी कई आईएएस और आईपीएस अधिकारी हैं, जो अपने पद की शक्ति का दुरूपयोग करने, रिश्‍वत लेने, आमदमी से अधिक दौलत जमा करने के मामले में आरोपी हैं, पर समय गुजरता जाता है और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। बल्कि वे तो बाद में राजनीतिक दल में शामिल हो जाते हैं, जहां उनकी बड़ी पूछ होती है।

अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि शीर्ष नेता व अधिकारी स्तर पर भ्रष्टाचार का आलम यह है, तो नीचले स्तर पर यानी कार्यकर्ता और कर्मचारी स्तर पर भ्रष्टाचार का रूप कैसा होगा। छोटे-बड़े हर काम के लिए ‘रिश्‍वत’लेना उस काम के लिए ‘फीस’लेने जैसा मान्य हो चुका है। और इससे छोटा हो या बड़ा, कोई भी सरकारी विभाग अछूता नहीं है।

शायद आपमें से कई के मन में अंततः यह सवाल उठे कि आखिर चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला कैसे बढ़ गया है?...उनके लिए मेरा जवाब है- क्योंकि हम केवल ‘भ्रष्टाचार’ शब्द को बुरा मानते हैं, भ्रष्टाचार करने वालों को नहीं।...यदि मानते तो...हमारे समाज और देश का यह हाल नहीं होता।

नफरत की आग में जलता देश

उदय केसरी  
एक तरफ, कश्‍मीर घाटी में आग लगी है। अलगावादी दल हुर्रियत और सत्‍तासीन नेशनल कांफ्रेंस अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। घाटी के युवा भी पत्‍थरबाजी में रोज नये रिकार्ड बना रहे हैं। दशा ऐसी है कि केंद्र सरकार उहापोश की स्थिति में दिख रही है। दूसरी तरफ, अयोध्‍या में आग लगने की जबर्दस्‍त आशंका है। मंदिर-मस्जिद विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला आने की तारीख 24 सितंबर तय है। आग की आशंका ऐसी की उत्‍तर प्रदेश सरकार केंद्र से इतनी बड़ी संख्‍या में सुरक्षा बलों की मांग कर रही है कि उसे पूरा करने में केंद्र असमर्थ है, क्‍योंकि दिल्‍ली में हाल में कॉमनवेल्‍थ गेम शुरू होने वाला है। इन दो राष्‍ट्रीय महासमस्‍याओं के बीच देश में त्‍योहारों का मौसम शुरू हो गया है।

अब आम भारतीय को समझ लेना चाहिए कि भारत में अमन चाहिए तो न तो नेता, न ही पुलिस और न ही सैन्‍य बल कुछ सकते हैं। ये सब कहीं न कहीं कठपुतली हो चुके हैं और इनमें से किसी की डोर सत्‍ता के स्‍वार्थी तत्‍वों के हाथों में, तो किसी की डोर धन के लालची लोगों के हाथों में है। यही नहीं हम-आप को भी ऐसे स्‍वार्थी तत्‍व कभी धर्म, तो कभी जाति और कभी क्षेत्र के नाम पर अपने इशारों पर नचाते रहते हैं और हम इनको समझे बगैर अपने ही लोगों के खिलाफ पत्‍थर उठा लेते हैं।

हम-आप को ऐसी बातें बहुत देर में समझ में आती हैं, जबकि आंखों के सामने स्‍वार्थी तत्‍व अपने खेल-खेलते रहते हैं। मसलन, बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाला है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव अपराधी सहाबुद्दीन के दरवाजे पर दस्‍तक देता है गठजोड़ करने के लिए। 17 सालों बाद अयोध्‍या विवाद पर समाधान की दिशा में अदालत का फैसला आने की घड़ी आते ही भाजपा और उसके सहयोगी संगठन विवाद को विवाद बनाये रखने की तैयारी में आग उगलना शुरू कर चुके हैं। उधर बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी भी फैसला के पक्ष में नहीं आने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का मन बना चुकी है। यानी राम और अल्‍ला के नाम विवाद का कोई हल निकलना असंभव ही लगता है। हां, एक चीज तय है और वह है-एक बार फिर राम और अल्‍ला नाम की बदनामी। इनके नाम पर खून-खराबा, दहशतगर्दी, तोड़फोड़। ऐसे जख्‍म सह-सहकर धर्मस्‍थली अयोध्‍या का आजतक सही विकास नहीं हो सका है। कह सकते हैं अयोध्‍या की भी हालत कश्‍मीर घाटी की तरह ही है। जहां रहने वाले आम आदमी के दर्द को कोई समझना नहीं चाहता, बस सब अपनी राजनीति उनपर थोपकर उन्‍हें गुमराह करते रहते हैं।

कश्‍मीर घाटी में तैनात सैन्‍य बलों के विशेषाधिकार को वापस लेने की मांग वहां के युवा मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला ने की है। जिसपर केंद्र सरकार आम राय बनाने की कोशिश में कैबिनेट की बैठक कर कोई राय नहीं बन सकी है अब इसके लिए सर्वद‍लीय बैठक की जाएगी। लेकिन कश्‍मीर समस्‍या का क्‍या यही हल है? सैन्‍य बलों के विशेषाधिकार वापस ले लिये जाने के बाद क्‍या उमर अब्‍दुल्‍ला इस बात की गारंटी लेंगे कि घाटी में आतंकवादियों की सक्रियता नहीं बढ़ेगी।...नहीं बिल्‍कुल नहीं। इसी तरह, अयोध्‍या में राममंदिर बनाने के लिए केंद्र सरकार यदि कानून बना दे तो क्‍या अयोध्‍या समेत पूरे देश में कोई दंगा-फसाद नहीं होगा, इसकी गारंटी भाजपा या विश्‍व हिन्‍दू परिषद लेगी? नहीं, बिल्‍कुल नहीं। तो फिर आप और हम खुद ही विचार करके देखें कि ऐसी मांगों के पीछे कितनी बड़ी स्‍वार्थ की राजनीति छिपी है।

सावधान ! धर्म के नाम पर किसी बहकावे में न आएं

उदय केसरी  
अयोध्‍या का मुद्दा फिर से हवा में तैरने लगा है। इसे हवा देने के लिए स्‍वार्थी पार्टी और संगठन तैयार हैं। इन पार्टियों और संगठनों को न राम की मर्यादा से मतलब है और न अल्‍ला की शांतिप्रियता से बस इन्‍हें सत्‍ता की कुर्सी से मतलब है, जो आपके वोटों से उन्‍हें प्राप्‍त होती है। इसलिए वे आपको आपके वोट के लिए एक बार फिर से राम या इस्‍लाम के नाम पर गुमराह करने की रणनीति बनाने में लगे हैं। ऐसे में आपको सर्तक और जागरूक रहने की बेहद जरूरत है। आपको यह ध्‍यान रखने की जरूरत है कि ईश्‍वर एक है और उसका कण-कण वास में है, धर्म, जाति और पंथ सब इंसानों के बनाये रास्‍ते हैं ईश्‍वर तक पहुंचने के लिए और समाज के सुप्रबंधन के लिए। आस्‍था नितांत निजी मामला है इसपर अपने दिल व दिमाम के सिवाय किसी अन्‍य पर विश्‍वास नहीं करना चाहिए। इसलिए रामजन्‍मभूमि मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद विवाद पर अपनी कोई राय बनाने से पहले इन तथ्‍यों को जान लें।-
विवाद के बारे में
• 1528 में विवादित राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाया गया था। कुछ हिन्दुओं का कहना था कि यहां भगवान राम का जन्म हुआ था।
• हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस जमीन को लेकर पहली बार 1853 में विवाद हुआ।
• 1859 में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा।
• 1949 में अन्दर के हिस्से में भगवान राम की मूर्ति रखी गई। तनाव को बढ़ता देख सरकार ने इसके गेट में ताला लगा दिया।
• सन् 1986 में जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दिया। मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की।
• सन् 1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल से सटी जमीन पर राम मंदिर की मुहिम शुरू की।
• 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई।
परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं।
इस जांच के लिए इस घटना के दस दिन बाद 16 दिसम्बर 1992 को लिब्रहान आयोग गठित किया गया।
• लिब्रहान आयोग को 16 मार्च 1993 को यानि तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन आयोग ने रिपोर्ट देने में 17 साल लगाए।
• पिछले 17 सालों में इस रिपोर्ट पर लगभग 8 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
• आयोग से जुड़े एक सीनियर वकील अनुपम गुप्ता के अनुसार 700 पन्नों के इस रिपोर्ट में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व भाजपा नेता कल्याण सिंह के नाम का उल्लेख 400 पन्नों में है, जबकि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की चर्चा 200 पन्नों पर की गई है।
रामजन्‍मभूमि अयोध्‍या के बारे में
• रामजन्मभूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएं तट पर बसा है। प्राचीन काल में इसे कौशल देश कहा जाता था।
• अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम और जैन धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित पांच र्तीथकरों का जन्म हुआ था।
• हिन्दुओं के मंदिरों के अलावा अयोध्या जैन मंदिरों के लिए भी खासा लोकप्रिय है। जैन धर्म के अनेक अनुयायी नियमित रूप से अयोध्या आते रहते हैं।
• अयोध्या में जहां जिस र्तीथकर का जन्म हुआ था, वहीं उस र्तीथकर का मंदिर बना हुआ है। इन मंदिरों को फैजाबाद के नवाब के खजांची केसरी सिंह ने बनवाया था।
• भारतवर्ष में कई राज्य थे जो अक्सर आपस में लड़ते रहते थे जिसका लाभ उठाकर बाबर ने भारत पर आक्रमण किया था और अपने विजयोल्लास के उपलक्ष्य में बाबरी मस्जिद बनवाया था।
• बाबरी मस्जिद मन्दिर तोड़कर बनी अथवा बिना तोड़े बनी, कोई ठोस प्रमाण नहीं है। कुछ विज्ञानी बाबरी मस्जिद के नीचे स्तूप का रहना बताते हैं जो बौद्ध धर्म का प्रतीक है।
• बौद्ध धर्मी अपना दावा नहीं ठोक पाये मगर हिन्दू धर्मी अपना दावा ठोक दिया कि बाबरी मस्जिद में ही राम ने जन्म लिया था।
• विवाद का आधार रामायण अथवा रामचरितमानस हुआ क्योंकि वाल्मीकि एवं तुलसीदास ने कथा के माध्यम से यह बतला दिया कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म अयोध्या में हुआ था मगर इन कवियों ने एक निश्चय स्थान नहीं बता पाये थे मगर यही अनुमान स्वरूप राम की जन्मस्थली बाबरी मस्जिद के बीच निकल आयी।
हिन्‍दू धर्म के बारे में
• हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए, तो उन्होने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया।
• आर्यों की वैदिक सभ्‍यता से इस आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म लगभग १७०० ईसा पूर्व हुआ।
• हिन्‍दू धर्म के मूल तत्‍व हैं-ईश्वर एक नाम अनेक, ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है, ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें, हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर, हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है, बल्कि अनेकों पैगंबर हैं, धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं, परोपकार पुण्य है दूसरों के कष्ट देना पाप है, जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है, स्त्री आदरणीय है, सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है, हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में, पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता, हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी, आत्मा अजर-अमर है, सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र, हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं, हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है, हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है।
• माना जाता है कि राम का जन्म प्राचीन भारत में हुआ था। उनके जन्म के समय का अनुमान सही से नही लगाया जा सका है, परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि राम ( भगवान विष्णु जी के अवतार माने जाते है )का जन्म तकरीबन आज से ९,००० वर्ष (७३२३ ईसा पूर्व) हुआ था।
इस्‍लाम धर्म के बारे में
• इस्लाम शब्द अरबी भाषा का शब्द है जिसका मूल शब्द सल्लमा है जिस की दो परिभाषाएं हैं (१) शान्ति (२) आत्मसमर्पण।
• इस्लाम एकेश्वरवाद को मानता है। इसके अनुयायियों का प्रमुख विश्वास है कि ईश्वर केवल एक है और पूरी सृष्टि में केवल वह ही महिमा (इबादत) के योग्य है।
• इस्लाम का उदय सातवीं सदी में अरब प्रायद्वीप में हुआ।
विवाद में शामिल राजनीतिक पार्टियां और संगठन
कुछ व्यक्ति, पार्टी व संगठन भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं और कुछ इसे धर्म निरपेक्ष राष्ट्र रखना चाहते हैं, पर कोई भी सत्‍ता की कुर्सी और निजी हितों से समझौता करके देशहित में और मानवता के हित में इस विवाद का हल नहीं निकालना चाहते, बस आग लगाकर अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं।
• कांग्रेस
• बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी
• विश्‍व हिन्‍दू परिषद
• राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ
• भारतीय जनता पार्टी
• बजरंग दल
विवाद सुलझाने की कोशिश
• 1859 में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा।
• 1990 में देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी और विश्‍व हिन्‍दू परिषद को आमने सामने बिठाकर भैरो सिंह शेखावत और शरद पवार निगरानी में बातचीत से हल निकालने की प्रक्रिया शुरू की। कई दौर की बातचीत के बाद यह तय हुआ कि दोनों पक्ष अपने-अपने कागज और सबूत पेश करें। इसके बाद बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी ने तो अपने दस्‍तावेज पेश किये लेकिन विश्‍व हिन्‍दू परिषद ने दस्‍तावेज नहीं पेश किये। इस तरह यह बातचीत विफल रहा।
• अब यह मामला कोर्ट में है, जिसका फैसला इसी माह आने वाला है।
विवाद का दुष्‍प्ररिणाम
• बाबरी मस्जिद तोड़े दिये जाने के बाद यह विवाद काफी संवेदनशील हो गया। इसके कारण देश के कई शहरों और क्षेत्रों में हिन्दू-मुस्लिम दंगे होने लगे। इसी लपेट में ईसाई धर्म एवं हिन्दू धर्म में कटुता बढ़ी। कई चर्चों को नष्ट कर डाला गया यह झगड़ा बढ़ते-बढ़ते आतंक में बदल गया है।
• 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई।
परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं।
ध्‍यान रहे
उपर्युक्‍त सभी तथ्‍यों को जानने के बाद आप विचार करें कि क्‍या हमारा धर्म, हमारी आस्‍था, हमारा ईश्‍वर महज एक मंदिर या मस्जिद का मोहताज है? क्‍या हमारे ईश्‍वर अपने मंदिर या मस्जिद के लिए हजारों लोगों की मौत को सही करार देंगे? नहीं न, तो इसके नाम पर लोगों को भड़काने वाले और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले राजनीतिक दल या संगठनों या कमेटी के लोगों को मुंहतोड़ जवाब देकर अपने असल धर्म का पूरी निष्‍ठा से निर्वाह करें।