महंगाई के लिए विपक्ष भी जिम्‍मेदार

उदय केसरी  
बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि हम उस भारत के वासी है जहां की संस्‍कृति व परंपरा तो गौरवशाली है, पर राजनीति बड़ा दुखदाई है। महंगाई की मार से आम जनता त्राहिमाम है, पर देश की सरकार आंखें बंद कर रखी है। प्रधानमंत्री अर्थशास्‍त्री माने जाते हैं, पर वे इस नियमित महंगाई का अर्थ नहीं समझ पा रहे हैं। कृषि एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री शरद पवार तो आंखें खोलना ही नहीं चाहते हैं। ज्‍यादा जगाने पर वह कह देते हैं-‘मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है’ तो कभी कहते हैं-‘मैं कोई ज्‍योतिषी नहीं हूं कि महंगाई कब थमेगी, यह बता दूं’ यानी इनके होने, न होने का कोई मतलब नहीं रह गया है। तो कौन हैं जनता के त्राहिमाम को सुनने व देखने वाला। क्‍या विपक्षी पार्टियां? काश, इस अंधी सरकार में विपक्ष की आंखों पर स्‍वार्थ और राजनीतिक लाभ का चश्‍मा नहीं लगा होता। तो महंगाई पर भाजपा का भारत बंद और महंगाई के विरोध में करोड़ों हस्‍ताक्षर वाले पत्रों को लेकर राष्‍ट्रपति की शरण में जाना शायद सार्थक होता।
इस महंगाई से गरीब व श्रमजीवी ही नहीं औसत अमीर भी परेशान हैं। गृह‍स्‍थी का बजट चिंताजनक स्‍तर तक बिगड़ चुका है। ऐसे में, परेशान जनता की आवाज उठाने और उन्‍हें महंगाई से राहत दिलाने के लिए हरसंभव कोशिश करने की जरूरत है, न कि केवल रा‍जनीति करने की। यदि महंगाई के खिलाफ भाजपा समेत अन्‍य बड़े विपक्षी पार्टियों का विरोध असल है तो वे इसके विरोध और इससे राहत देने की शुरूआत अपने घर, अपने प्रदेशों, जहां उनकी सरकारें हैं, वहां से क्‍यों नहीं करतीं। य‍दि केंद्र सरकार अंधी हो गई है तो क्‍या केवल केंद्र से जुबानी जंग करने से जनता को राहत मिल जाएगी। कम से कम जिन चीजों पर राज्‍य सरकारों का नियंत्रण है, उसमें तो महंगाई रोक सकती है। लेकिन ऐसी कोशिश विपक्षी दलों की सरकारों ने अपने राज्‍यों में नहीं की है। बल्कि वह तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने के बाद भी उस पर वैट दरों को भी बढ़ा रहे हैं। राज्‍यों में सड़ते अनाजों की परवाह नहीं है। राज्‍य से कृषि विकास पर घोटाले की ही बस खबरें आती हैं, विकास की नहीं। कालाबाजारियों, जमाखोरों को पार्टी कार्यकर्ता बना दिया गया है।...तो क्‍या महंगाई के इन कारकों की सफाई पहले अपने घर में ही नहीं करनी चाहिए? केवल जुबानी-बदजुबानी राजनीति या विरोध-प्रदर्शन करने से क्‍या कभी महंगाई जाएगी?
लेकिन इस सवाल पर हमारे देश की विपक्षी पार्टियां कभी सोचती ही नहीं, क्‍योंकि इसपर सोचना, वे अपने पैर पर खुद कुल्‍हाड़ी मारने के बराबर समझती हैं। अरे, भई जनता तो जनता होती है, वही केंद्र सरकार के लिए वोट देती है और वही राज्‍य सरकार के लिए भी।...और कौन सदा राज्‍य पर शासन करते रहना चाहता है, सभी दल तो केंद्र की सत्‍ता पर कब्‍जा जमाना चाहते हैं, ऐसे में यदि राज्‍य की जनता को राहत दे दिये तो उन्‍हें केंद्र के खिलाफ वोट डालने के लिए कैसे तैयार कर पायेंगे।...इसलिए केंद्र सरकार के नाम पर महंगाई और बढ़ा दो और जुबानी जंग भी ताकि जनता महंगाई की मार से मरने लगे। तभी तो केंद्र सरकार को गिराने का मौका मिलेगा।...ऐसी सोच के साथ अपने देश की विपक्षी पार्टियां राजनीति करने लगी हैं। यानी जनता की फिक्र न सरकार को है और न ही सरकार की नीतियों का हर दिन विरोध करने वाले विपक्ष को। सबको बस सत्‍ता की कुर्सी की चिंता है। पिछले दिनों एक खबर आई कि शिवसैनिकों ने पुणे में महंगाई का विरोध करने के दौरान एक दूध के टैंकर में भरे हजारों लीटर दूध पानी की तरह रोड पर बहा दिये। क्‍या ऐसे विरोध से महंगाई कम होगी या फिर और बढ़ेगी...यानी जनता की आवाज बनने का ढोंग करने वाली विपक्षी पार्टियों को जनता की परेशानी बढ़ाने में ही अपना राजनीतिक फायदा अधिक दिखता है।
तो फिर, देश की जनता महंगाई के जिम्‍मेदार केंद्र की सरकार और भ्रष्‍ट विपक्षी पार्टियों के बीच खुद को कैसे बचा पायेगी? यह सवाल अहम है। इस पर भारत की हमें निजी स्‍वार्थों से उपर उठकर सोचने की जरूरत है। जरूरत है महंगाई और महंगाई के पोषक सत्‍ता पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के भ्रष्‍ट राजनीतिकों, अफसरों व दलालों को गैर राजनीतिक जनांदोलन के जरिये मार भगाने की।

कैसे हो गए हैं हम और हमारा देश

उदय केसरी  
 कैसा होता जा रहा है अपना देश और कैसे हो गए हैं अपने देश के लोग। भारत रूपी समाज में कोई ऐसा समूह नहीं बचा जहां भ्रष्टाचार ने अपने पैर नहीं जमा रखे हों। किसी भी वर्ग पर आंख मूंद कर विश्‍वास करना दूभर हो गया है। पहले तो राजनीति बदनाम हुई, फिर पुलिस प्रशासन। पर अब कार्यपालिका, न्यायपालिका, खेल-क्रिकेट, हॉकी, गैर सरकारी/राजनीतिक संगठन, यहां तक धार्मिक संगठन भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं रहे हैं।...तो क्या भ्रष्टाचार का वर्चस्व चारों तरफ इसी तरह बढ़ता रहेगा ? और क्या एक दिन भ्रष्टाचार का, आचार पर पूरी तरह से अधिपत्य हो जाएगा? तब क्या भ्रष्ट होना योग्यता होगी और ईमानदार होना अयोग्यता? यानी एक पुराने गाने की वह पंक्ति- एक दिन ऐसा कलयुग आयेगा, हंस चुगेगा दाना-तिनका, कौआ मोती खायेगा-सार्थक हो जाएगी। हम सब भ्रष्टाचार के दलदल में धंसते चले जाएंगे और सब एक-दूसरे को ठगने-लूटने की फिराक में रहेंगे। धर्म के स्थान में अधर्म होगा और साधु-संतो के स्थान पर पाखंडी। किसी को दूसरे के लिए सोचने की जरूरत नहीं होगी। स्वार्थ सबसे बड़ी नैतिकता होगी। घर के बूढ़े-बुजुर्ग जब काम करने में असर्थ हो जाएंगे तो उन्हें मरने के लिए किसी विराने में छोड़ दिया जाएगा। रिश्‍ते बस नाम और स्वार्थ के लिए होंगे। अंधी वासना के आगे किसी तरह के रिश्‍ते कोई मायने नहीं रखेंगे। लोगों को पूरी आज़ादी होगी-किसी भी तरह के कुकर्म और भ्रष्टाचार करने की।....कितना अच्छा होगा न!, हम तो ऐसा ही चाहते हैं न!

क्या आप ऐसा नहीं चाहते। तो क्या आप केवल खुद ही भ्रष्ट बने रहना चाहते हैं और यह कि शेष लोग आपको ईमानदार समझते रहें। ताकि आपको अन्य लोगों से कोई खतरा नहीं हो। भले ही अन्य लोगों के हक मारने में आप उस्ताद हों।....चुप क्यों हो गए। बंधुवर कहने और आचारण में लाने में बहुत फर्क होता है। आप दूसरे से जिस आचरण की अपेक्षा रखते हैं, वहीं आचरण आप खुद करने से क्यों कतराते हैं। इसलिए कि इसमें भौतिक फायदा कम और मेहनत ज्यादा है। सादगी ज्यादा और ऐयाशी कम है। अब आपको लगेगा कि यह लेखक हमें उपदेश देने की कोशिश कर रहा है। यह खुद कितना ईमानदार है, जो सबसे ऐसे सवाल कर रहा है? यदि आपके मन में यह सवाल उठा तो बुरा न मानें-बल्कि खुद को किसी न किसी स्तर के भ्रष्टचार का समर्थक मान लें। यदि आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तो निश्चित तौर पर समझ लें कि आपके अंदर भ्रष्टाचार का प्रवेश हो चुका है, जिसके दुष्प्रभाव से इस समाज कोई अन्य नहीं बचा सकता।

यानी, इसी तरह से हम भ्रष्टाचार के गुलाम होते जाएंगे और एक दिन हमारे समाज पर भ्रष्टाचार का राज होगा, और जो सबसे ज्यादा भ्रष्टाचारी होंगे वही इस समाज पर राज करेंगे।....वर्तमान में भ्रष्टाचार के प्रति भारत रूपी समाज के शासक, प्रशासक और जनता की जैसी प्रतिक्रिया है, उसे देखकर तो भ्रष्ट भारतीय समाज की कल्पना करना मुश्किल नहीं लगता।....

....तो क्या वाकई में हम ऐसा ही चाहते हैं ? प्रतिदिन के अखबार, न्यूज चैनलों के बुलेटिन भ्रष्टाचार की खबरों से जो भरे रहते हैं, उन्हें देखकर क्या आपको मजा आता है? अफसोस नहीं होता? यदि होता है तो क्यों नहीं इसका प्रतिकार करते हैं। कहेंगे आप अकेले क्या कर सकते हैं। आप खुद को तो भ्रष्टाचार से मुक्त कर सकते हैं। कोई अनैतिकता, बेईमानी, कर्तव्यविमुखता छोटी नहीं होती है, उसी को छोड़कर आप भ्रष्टाचार का प्रतिकार कर सकते हैं। सच का दामन थाम कर हो सकता है, कुछ दिनों आपको थोड़ी दिक्कत हो, पर प्रतिकार इतना आसान नहीं होता, उसके लिए दिक्कत सहना ही पड़ेगा। ऐसा करना एक आंदोलन करने जैसा ही है। यदि ऐसा ज्यादातर लोग करने लगे तो कल्पना कीजिए क्या अपने समाज में भ्रष्टाचार का वर्चस्व कभी जम पायेगा....नहीं न। तो फिर आप किस दिशा में जाना चाहते हैं भ्रष्टाचार की ओर या आचार की ओर। समाज के ऐसे किसी नेता, कार्यकर्ता, प्रशासक, कर्मचारी, व्यापारी, एजेंट से कोई ऐसा काम नहीं करवाये, जिसके लिए वह भ्रष्ट तरीके अपनाता हो। घूस लेने व देने वालों का प्रतिकार करें। आपकी नजर में खराब नेताओं को किसी भी शर्त या लालच या डर में वोट नहीं दें।

क्या हम ऐसा कर सकते हैं? यह सवाल भी काफी महत्वपूर्ण है। पिछले साठ सालों की बेफिक्र जीवन ने हमारे दिल-दिमाग पर कई तरह की बुराइयों के परत जमा दिये हैं और वे हमारे लिए आम बात हो चुकी हैं। ऐसे में उन बुराइयों का प्रतिकार करना आसान नहीं है। ऐसे में, इसके दंश झेल रहे लोगों पर नजर डालें। लंबी लाइन में ईमानदारी से घंटों खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करने वाले उन साधारण आदमी को देखें, जिनकी बारी का हक मारकर आप अपनी पहुंच और पहचान के बल पर लाइन तोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। आप कहेंगे, यह सब नहीं करने से तो समय पर आपका कोई काम ही नहीं होगा, फिर तो आप समाज में पीछे रह जाएंगे।...तो क्या लाइन में खड़े लोग को आगे नहीं बढ़ना है?...यदि हां, तो थोड़ा कम आराम कीजिए।

आप अपने घर-परिवार के लिए इतनी मेहनत करते है, तो क्या उस समय में से दस-पांच मिनट दूसरे के लिए भी नहीं दे सकते। ऐसा करके देखिएगा, बदलाव आपके सामने दिखेगा और उससे जितनी खुशी और आनंद आपको मिलेंगे, उतना कार पर लांग ड्राइव लेने, यारों के साथ बियर की बोतले गटकने से भी नहीं होगा।

भाई साहब...यदि इंसानियत और मानवता का आनंद और भी आसानी से प्राप्त करना हो तो मेरा एक सुझाव चाहें तो मान सकते हैं-यह सुझाव मैं निजी अनुभव के आधार पर दे रहा हूं-मानना न मानना आपकी इच्छा पर निर्भर है, क्योंकि इंसानियत और मानवता का आनंद उठाने के रास्ते अनेक हैं, पर सबके मूल में एक ही परमात्मा है। क्योंकि सबका मालिक एक ही है। और मैं इस परम वाक्य के वक्ता और परमात्मा के प्रवक्ता, करूणा के अवतार बाबा साईनाथ की शरण में जाने और उनका अनुसरण करने की आपसे आग्रह करता हूं। भारत रूपी समाज को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए मुझे लगता है कि बाबा की भक्तिमार्ग को अपनाना सबसे सरल रास्ता है।

आखिर कब मैच्‍योर होगा झारखंड?

उदय केसरी  
झारखंड की हालत देखकर बेहद दुख होता है। मानो, झारखंड किसी के द्वारा शापित हो कि वह कभी मैच्‍योर (समझदार) नहीं हो सकेगा। सदा यूं ही बचकानी राजनीति का शिकार होता रहेगा। यह भी कि चालाक और भ्रष्‍ट लोग सदा उसका दोहन करते रहेंगे। उसके दुश्‍मनों में अपने भी होंगे और पराये भी। यहां किसी राजनीतिक दल या गठबंधन की सरकार ज्‍यादा दिनों तक नहीं चल पायेगी। राज्‍य में सदा राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना रहेगा। यानी, इस भूखंड का कभी विकास नहीं हो सकेगा, बल्कि इसके अपने और परोये बस इसकी बोटियां नोंच-नोंच कर खाते रहेंगे। यहां निवास करने वाली आदिवासी व गैरआदिवासी जनता की आंखें विकास की आस में पथरा जाएंगी, पर उनकी आस शायद कभी पूरी हो पाए।

क्‍या आपको ऐसा महसूस नहीं होता? बिहार से अलग कर जब 2000 में झारखंड को पृथक राज्‍य का दर्जा मिला, उसी समय मध्‍यप्रदेश से अलग कर छत्‍तीसगढ़ और उत्‍तर प्रदेश से अलगकर उत्‍तराखंड को भी पृथक राज्‍य का दर्जा मिला। क्‍या अपने समान उम्र के छत्‍तीसगढ़ और उत्‍तराखंड की तुलना में झारखंड का विकास हो सका है?...नहीं न। तो फिर, वह कौन सी वजह है जो झारखंड के पोषण में बाधा बन खड़ी है? क्‍यों उसे मैच्‍योर नहीं होने दिया जा रहा है। साल की भी गिनती की जाए तो नौ-दस साल कम नहीं होते हैं, इतने समय में तो बच्‍चा चलने, उछलने व दौड़ने लगता और कम से कम इतना मैच्‍योर जरूर हो जाता है कि अपने-पराये को आसानी से पहचान ले। पर, क्‍यों झारखंड रूपी अबोध बालक का सामान्‍य विकास भी नहीं हो सका? आखिर इस अबोध बालके के जन्‍म पर माता-पिता होने का श्रेय लेने वाले पार्टी व नेता या पालन-पोषण करने की जिम्‍मेदारी लेने वाले लोगों के अपने बच्‍चे भी क्‍या ऐसे ही कुपोषण के शिकार हैं?

शायद इन सवालों को जनता की तरफ से झारखंड में निकलने वाले अखबारों और प्रसारित होने वाले न्‍यूज चैनलों को तब तक पूछना चाहिए, जबतक कि झारखंड के कुपोषण के लिए जिम्‍मेदार नेता और अधिकारी जनता के बीच नग्‍न खड़े होकर क्षमा की भीख मांगते नहीं दिखने लगे। मगर, क्‍या कभी ऐसा हो सकता है?...लोकतंत्र के सिद्धांतों में कहते हैं कि लोकतांत्रिक ‘विकास’ प्रक्रिया में विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका की तरह ही प्रेस यानी मीडिया की भी चौथे स्‍तम्‍भ के रूप में महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। अब यदि इस सिद्धांत को उलट दें तो क्‍या होगा...लोकतांत्रिक ‘विनाश’ प्रक्रिया में विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका की तरह ही प्रेस यानी मीडिया की भी चौथे स्‍तम्‍भ के रूप में महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। तात्‍पर्य यह कि झारखंड की मीडिया को इन मूलभूत प्रश्‍नों का बोध शुरू से है, पर जब नवनिर्मित राज्‍य के तीन स्‍तम्‍भ माल बटोरने में लगे हैं, तो वे क्‍यों उनसे बैर लेकर अपने अखबार और चैनल के व्‍यवसाय पर ग्रहण लगाए?

ऐसे में, झारखंड क्‍यों नहीं इम-मैच्‍योर राज्‍य होगा? फिर क्‍यों नहीं यहां मधु कोड़ा जैसे एक निर्दलीय विधायक जोड़-तोड़ की राजनीति कर मुख्‍यमंत्री बने? क्‍यों नहीं, वह एक-डेढ़ साल के भीतर 3000 करोड़ से ज्‍यादा रूपये का घोटाला करके डकार भी न ले? फिर क्‍यों नहीं इसके बाद भी उसकी पत्‍नी चुनाव जीते? फिर क्‍यों नहीं, झारखंड की स्‍थापना का श्रेय लेने में सबसे अव्‍वल और सांसद रिश्‍वतकांड के आरोपी दिशोम गुरू शिबू सोरेन जबदस्‍ती मुख्‍यमंत्री की कुर्सी हथिया ले और इसकी न्‍यूनतम योग्‍यता वाली परीक्षा यानी उपचुनाव भी हार जाए? और भी बहुत कुछ बुरा हो सकता है इस राज्‍य में जो यहां के लिए शायद आम बात होगी।

अब जब, इस राज्‍य को प्राप्‍त प्राकृतिक या नैसर्गिक संपदा पर नजर डालेंगे तो भी आपको आश्‍चर्य होगा। अपनी उम्र के छत्‍तीसगढ़ और उत्‍तराखंड के मुकाबले ऊपरवाले ने झारखंड को दिल खोल कर प्राकृतिक संपदाओं से संपन्‍न बनाया। यहां की धरती में खासकर खनिजों के मामले में क्‍या नहीं है- लौह अयस्‍क, कोयला, तांबा अयस्‍क, अबरक, बॉक्‍साइट, फायर क्‍ले, ग्रेफाइट, सिलिमनाइट, चूना पत्‍थर, यूरेनियम आदि। लेकिन नीचे वाले झारखंड के विधायकों ने सिवाय इसके दोहन के और कुछ भी नहीं किया। यह भी नहीं सोंचा कि यह माटी अपनी मां भी है।...आखिर इतने नीच लोगों के नेतृत्‍व में झारखंड की जनता कैसे जीती होगी...इसका अंदाजा स्‍वत: लगाया जा सकता है।

नक्‍सलवाद हो या आईपीएलवाद, दोनों ही खतरनाक

उदय केसरी  
इन दिनों देश में दो सबसे बड़े मुद्दे सुर्खियों में है। एक नक्‍सलवाद और दूसरा आईपीएलवाद । एक में, गरीबी और शोषण के कांधे पर बंदूक धरकर सरकार के विरूद्ध युद्ध किया जा रहा है। तो दूसरे में, क्रिकेट के प्रोत्‍साहन के नाम पर हजारों करोड़ का कारोबार किया जा रहा है। दोनों मुद्दे गंभीर रूप धारण कर चुके हैं- एक में, 76 सीआरपीएफ के जवानों पर हमला कर उन्‍हें मौत की नींद सुला दिया गया, तो दूसरे में, केंद्र के विदेश राज्‍य मंत्री शशि थरूर को अपना मंत्री पद छोड़ना पड़ा। इन दोनों मुद्दों पर मीडिया में पिछले दो-तीन हफ्तों से बहस जारी है। पर, इन दोनों बहसों में मत काफी बंटे हुए हैं। नक्‍सलवाद के मुद्दे पर जहां वामपंथी विचारधारा वाले लोग उसे गरीबी और शोषण के खिलाफ हक की लड़ाई बता रहे हैं, तो इस पंथ से इतर लोग इसे देशद्रोह करार दे रहे हैं। इसी तरह, आईपीएलवाद के मुद्दे पर जहां आईपीएल से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जुड़े़ कॉरपोरेट जगत, बॉलीवुड, क्रिकेट और क्रिकेटमैनिया से ग्रसित लोग इसे मोदी का वरदान कह रह रहे हैं और मोदी के विरोध करने वालों को थरूर का पक्षधर बताकर विरोध को बदले की कार्रवाई कह रहे हैं, तो वहीं इससे इतर लोग आईपीएल को क्रिकेट के नाम पर अय्याशी और टैक्‍सचोरी का काला कारोबार बता रहे हैं।

खैर, यह सब आप भी जानते होंगे। इन दोनों मुद्दों पर जो मुझे कहना उस पर आता हूं। पहले नक्‍सलवाद पर- इसके समर्थकों से मैं पूछना चाहूंगा कि भारत में सबसे बड़ी आबादी किन लोगों की है अमीरों या गरीबों की। गरीबों की न। और आपके मुताबिक नक्‍सली गरीबों के हक की लड़ाई लड़ते हैं, तो वे गरीबों का समर्थन प्राप्‍त कर केंद्र या राज्‍यों में खुद अपनी सरकार क्‍यों नहीं बना लेते? फिर जैसा परिवर्तन चाहे करके दिखा दें। क्‍या यह प्रयास जंगलों में गुमनाम जिंदगी बिताने और कायरों की तरह निहत्‍थे व लाचार ग्रामीणों पर भय की सरकार चलाने से ज्‍यादा मुश्किल है। नक्‍सली यदि कार्ल मार्क्‍स, माओत्‍से तुंग, लेनिन की विचारधारा पर चलने की बात करते हैं, तो यह उनका सबसे बड़ा झूठ है। क्‍योंकि इन ऐतिहासिक विचारकों ने परिवर्तन के लिए अपने समाज के निहत्‍थो, मजलूमों का खून बहाकर परिवर्तन की बात कभी नहीं की। और फिर मैं तो कहता हूं कि यदि इनके विचारों से परिवर्तन के ऐसे भाव निकलते भी हों, तो भी इनके विचारों की भारतीय समाज में कोई प्रासंगिकता नहीं है। क्‍योंकि इन तीनों विचारकों के विचार भारतीय समाज व सरकार की व्‍यवस्‍था को ध्‍यान में रखकर नहीं बने, न ही इन्‍होंने कभी विविधता के बावजूद एकता में बंधे भारतीय समाज को समझा। तो फिर इनके विचारों के आधार अपने देश में परिवर्तन की बात सरासर जबरदस्‍ती नहीं तो क्‍या है?

चलिए, नक्‍सलवाद के मुद्दे पर मेरे मन में और भी कई बातें हैं कहने को, पर आलेख की लंबाई और आपके पेसेंस को ध्‍यान में रखते हुए मैं अब दूसरे बड़े मुद्दे पर आता हूं। आईपीएलवाद- सबसे पहला सवाल है देश को आईपीएल की जरूरत है? अब तो राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट मैच साल भर होते रहते हैं, जिससे बीसीसीआई पहले ही मालामाल हो चुका है, तो फिर ऐसे क्रिकेट का क्‍या फायदा जिससे खिलाड़यों का न रिकार्ड बनता हो और न देश को जीत की ट्रॉफी मिलती है। यही नहीं, इससे तो असली क्रिकेट के लिए देश के खिलाडि़यों के पास स्‍टैमिना भी नहीं बचती। तो फिर आईपीएलवाद आखिर किसके लिए....यह सब है महज करोड़पति से अ‍रबपति और खरबपति बनने का अचूक धंधा। जिसमें नेता-अभिनेता-व्‍यापारी-खिलाड़ी-जुआरी-कालाबाजारी सबों का अंतर्गठजोड़ होता है और यह धंधा महज ढाई-तीन सालों में बढ़कर बीस हजार करोड़ का हो चुका है।

खैर आईपीएलवाद के बारे में यह सब तो आप भी जानते होंगे मैं इस पर कुछ बुनियादी सवाल करना चाहूंगा। यह कि एक तरफ सरकार हमसे रोज टीवी, रेडियो व अखबारों में प्रचार देकर यह निवेदन करती रहती है कि बिजली बचायें, इसके अनावश्‍यक और बेजा इस्‍तेमाल से बचें। तभी पूरे भारत में उजाला रह पायेगा। इस प्रचार को यदि आईपीएलवाद के संदर्भ में लें, तो क्‍या वे रात में हजारों-लाखों वाट बिजली खर्च कर देश को अंधकार की ओर नहीं ले जा रहा है? आखिर यह कैसा वाद या कहें धंधा है, जिसने महज ढाई-तीन साल में ललित मोदी को धनकुबेर बना दिया, जो इससे पहले शरद पवार के ‘यशमैन’ थे। एक और सवाल, जो शर्मनाक है, कि इस मुद्दे पर न्‍यूज चैनलों के मत भी क्‍यों बंटे हुए हैं? क्‍या इसलिए कि आईपीएल में रूपर्ट मड्रोक के बेटे का भी पैसा लगा है? या इसलिए कि आईपीएल मीडिया मैंनेजरों ने विज्ञापनों के एहसानों तले उन्‍हें दबा रखा है? यदि ऐसा नहीं तो कल जब ललित मोदी के बॉ‍डीगार्डों ने मुंबई एयरपोर्ट पर मीडिया वालों को खदेड़कर भगाया और गालीगलौज की, तो इस खबर को सभी न्‍यूज चैनलों ने प्रमुखता से क्‍यों नहीं दिखाया। क्‍या केवल जी न्‍यूज और इंडिया टीवी को ही मीडिया के अपमान पर विरोध करने की और मोदी का सच बाहर लाने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है। शेष न्‍यूज चैनलों ने क्‍या आईपीएल की चूडिया पहन रखी है?

भारत के अमन-चैन के दो दुश्‍मन

उदय केसरी 
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और आजाद भारत में यह क्‍या हो रहा है? तानाशाह और फासिस्‍ट शिवसेना भारतीय सिनेमा के सुप्रसिद्ध कलाकर शाहरूख खान की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अपहरण करना चाहती है। सहिष्‍णुता की भारतीय संस्‍कृति को शर्मशार कर शाहरूख के उस बयान के लिए उनसे माफी मांगने की मांग की जा रही है, जो भारतीय सहिष्‍णुता को ही प्रदर्शित करता है। पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसी मां तुल्‍य भूमि है, जिसकी गोद में दुनिया के सभी धर्म, जाति, संप्रदाय, मान्‍यता व‍ विचार के लोगों को हमेशा इतना प्‍यार व दुलार मिला कि वे सब भारतीय रंग में रंगते चले गए। यह भारत की प्रकृति है, जिसे कभी बदला नहीं जा सकता। यदि बदलना संभव होता, तो यह देश बहुत पहले ही असंख्‍य टुकड़ों में बांट जाता। शिवसेना और महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना से भी ताकतवर अलगावादियों ने कई बार ऐसी नाकाम कोशिशें की हैं, पर भारत के मौलिक स्‍वभाव और प्रकृति के आगे उन्‍हें अपना मुंह काला कर दुबकना या भागना पड़ा है।

जैसे बाघ की खाल पहन लेने से कोई बाघ नहीं हो जाता, उसी तरह गेरूआ वस्‍त्र धारण कर लेने से कोई हिन्‍दू धर्म का मसीहा नहीं बन जाता है। और फिर मसीहा बनने का जज्‍बा है तो कोई गरीबों का मसीहा बनके दिखाए। भारत में हिन्‍दू धर्म को न कभी मसीहा की जरूरत पड़ी और न आगे कभी पड़ेगी। क्‍योंकि यह एक मात्र ऐसा धर्म है, जो महज धर्म नहीं, भारतीयों की स्‍वाभाविक प्रकृति है, जिसमें असीम विनम्रता और सहिष्‍णुता है। यह मानव को कट्टर व निरंकुश नहीं, महान और महात्‍मा बनाता है। जिस शिव के नाम पर बाल ठाकरे ने अपनी सेना का नाम रखा है, क्‍या उस शिव की प्रकृति भी उन्‍हें नहीं मालूम? शिव तो इतने बड़े देव थे, जो मानव और दानवों में भी भेद नहीं करते थे। जो भी उन्‍हें त्‍याग और तपस्‍या से प्रसन्‍न करता, वह उन्‍हें मुंहमांगा वरदान दे देते थे। ऐसे महासहिष्‍णु शिव के नाम पर खुद को हिन्‍दू धर्म और मराठी मानुष का मसीहा बताने वाले बाल ठाकरे के शिव क्‍या इस प्रकृति के नहीं हैं?

जाहिर है कि बाल ठाकरे अपने कर्मों से न भारतीय प्रतीत होते हैं और न ही हिन्‍दू। तो फिर वह कौन हैं?... वह भारत के अमन-चैन के दुश्‍मन हैं। जिन्‍हें किसी भी तरह से बस सत्‍ता की ताकत चाहिए। वह सत्‍ता के पुजारी हैं और भय फैलाना उनका धर्म है। पिछले विधानसभा चुनाव में धूल चाटने के बाद से ठाकरे काफी अवसाद में हैं। इसलिए वह कभी शाहरूख खान को गद्दार कहते हैं, तो कभी राहुल गांधी को रोम पुत्र। क्‍या वह बता सकते हैं कि वे खुद क्‍या हैं?

दरअसल, इस सत्‍ता के पुजारी को तो सबसे बड़ी चोट उन्‍हीं के गिरोह से बगावत करने वाले सगे भतीजे राज ठाकरे ने दी, विधानसभा चुनाव में 13 सीट जीत कर। जिसने शिवसेना के विरूद्ध महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना खड़ी कर ली, मगर उसने केवल नाम भर बदला, चरित्र शिवसेना वाला ही रखा। या कहें उससे भी कहीं अधिक अलगाववादी। जिसके लिए शायद महाराष्‍ट्र एक अलग राष्‍ट्र है, जहां भारत के किसी भी प्रांत के, खासकर यूपी और बिहार के लोगों के आने या बसने पर रोक है। साथ ही मराठी वहां की राष्‍ट्र भाषा है और अन्‍य कोई भी भाषा बर्दास्‍त नहीं। ऐसे में हो सकता है कि आप सोचें कि क्‍या राज ठाकरे का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है? तो ऐसा नहीं है, राज ठाकरे का मानसिक संतुलन ठीक है, वह तो यह सब केवल सत्‍ता की भूख शांत करने के लिए कर रहे हैं। मगर वह यह जरूर भूल गए हैं कि जिस दिन जनता का दिमाग फिरा, तो वे कहीं के नहीं रहेंगे। मराठी मानुष ही उन्‍हें बता देंगे कि महाराष्‍ट्र यदि यूपी-बिहार वालों का नहीं है, तो उनका भी नहीं है। यह सर्वविदित है कि राज या बाल ठाकरे का खानदान खुद महाराष्‍ट्र में बाहर (मध्‍यप्रदेश) से आकर बसा है।

यदि आप हमारे विचारों से इत्‍तेफाक रखते हैं तो आप सभी सुधी पाठकों से अनुरोध है कि अपने स्‍तर पर विचार व्‍यक्‍त कर बाल ठाकरे और राज ठाकरे का पुरजोर विरोध करें। चूंकि इन दोनों अलगाववादियों ने देश में, खासकर महाराष्‍ट्र में अमन-चैन को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और उनकी ये नापाक कोशिशें हदें पार करने लगी हैं। वैसे ही, जैसे सरहद पार कर आने वाले आतंकी।