भारत के अमन-चैन के दो दुश्‍मन

उदय केसरी 
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और आजाद भारत में यह क्‍या हो रहा है? तानाशाह और फासिस्‍ट शिवसेना भारतीय सिनेमा के सुप्रसिद्ध कलाकर शाहरूख खान की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अपहरण करना चाहती है। सहिष्‍णुता की भारतीय संस्‍कृति को शर्मशार कर शाहरूख के उस बयान के लिए उनसे माफी मांगने की मांग की जा रही है, जो भारतीय सहिष्‍णुता को ही प्रदर्शित करता है। पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसी मां तुल्‍य भूमि है, जिसकी गोद में दुनिया के सभी धर्म, जाति, संप्रदाय, मान्‍यता व‍ विचार के लोगों को हमेशा इतना प्‍यार व दुलार मिला कि वे सब भारतीय रंग में रंगते चले गए। यह भारत की प्रकृति है, जिसे कभी बदला नहीं जा सकता। यदि बदलना संभव होता, तो यह देश बहुत पहले ही असंख्‍य टुकड़ों में बांट जाता। शिवसेना और महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना से भी ताकतवर अलगावादियों ने कई बार ऐसी नाकाम कोशिशें की हैं, पर भारत के मौलिक स्‍वभाव और प्रकृति के आगे उन्‍हें अपना मुंह काला कर दुबकना या भागना पड़ा है।

जैसे बाघ की खाल पहन लेने से कोई बाघ नहीं हो जाता, उसी तरह गेरूआ वस्‍त्र धारण कर लेने से कोई हिन्‍दू धर्म का मसीहा नहीं बन जाता है। और फिर मसीहा बनने का जज्‍बा है तो कोई गरीबों का मसीहा बनके दिखाए। भारत में हिन्‍दू धर्म को न कभी मसीहा की जरूरत पड़ी और न आगे कभी पड़ेगी। क्‍योंकि यह एक मात्र ऐसा धर्म है, जो महज धर्म नहीं, भारतीयों की स्‍वाभाविक प्रकृति है, जिसमें असीम विनम्रता और सहिष्‍णुता है। यह मानव को कट्टर व निरंकुश नहीं, महान और महात्‍मा बनाता है। जिस शिव के नाम पर बाल ठाकरे ने अपनी सेना का नाम रखा है, क्‍या उस शिव की प्रकृति भी उन्‍हें नहीं मालूम? शिव तो इतने बड़े देव थे, जो मानव और दानवों में भी भेद नहीं करते थे। जो भी उन्‍हें त्‍याग और तपस्‍या से प्रसन्‍न करता, वह उन्‍हें मुंहमांगा वरदान दे देते थे। ऐसे महासहिष्‍णु शिव के नाम पर खुद को हिन्‍दू धर्म और मराठी मानुष का मसीहा बताने वाले बाल ठाकरे के शिव क्‍या इस प्रकृति के नहीं हैं?

जाहिर है कि बाल ठाकरे अपने कर्मों से न भारतीय प्रतीत होते हैं और न ही हिन्‍दू। तो फिर वह कौन हैं?... वह भारत के अमन-चैन के दुश्‍मन हैं। जिन्‍हें किसी भी तरह से बस सत्‍ता की ताकत चाहिए। वह सत्‍ता के पुजारी हैं और भय फैलाना उनका धर्म है। पिछले विधानसभा चुनाव में धूल चाटने के बाद से ठाकरे काफी अवसाद में हैं। इसलिए वह कभी शाहरूख खान को गद्दार कहते हैं, तो कभी राहुल गांधी को रोम पुत्र। क्‍या वह बता सकते हैं कि वे खुद क्‍या हैं?

दरअसल, इस सत्‍ता के पुजारी को तो सबसे बड़ी चोट उन्‍हीं के गिरोह से बगावत करने वाले सगे भतीजे राज ठाकरे ने दी, विधानसभा चुनाव में 13 सीट जीत कर। जिसने शिवसेना के विरूद्ध महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना खड़ी कर ली, मगर उसने केवल नाम भर बदला, चरित्र शिवसेना वाला ही रखा। या कहें उससे भी कहीं अधिक अलगाववादी। जिसके लिए शायद महाराष्‍ट्र एक अलग राष्‍ट्र है, जहां भारत के किसी भी प्रांत के, खासकर यूपी और बिहार के लोगों के आने या बसने पर रोक है। साथ ही मराठी वहां की राष्‍ट्र भाषा है और अन्‍य कोई भी भाषा बर्दास्‍त नहीं। ऐसे में हो सकता है कि आप सोचें कि क्‍या राज ठाकरे का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है? तो ऐसा नहीं है, राज ठाकरे का मानसिक संतुलन ठीक है, वह तो यह सब केवल सत्‍ता की भूख शांत करने के लिए कर रहे हैं। मगर वह यह जरूर भूल गए हैं कि जिस दिन जनता का दिमाग फिरा, तो वे कहीं के नहीं रहेंगे। मराठी मानुष ही उन्‍हें बता देंगे कि महाराष्‍ट्र यदि यूपी-बिहार वालों का नहीं है, तो उनका भी नहीं है। यह सर्वविदित है कि राज या बाल ठाकरे का खानदान खुद महाराष्‍ट्र में बाहर (मध्‍यप्रदेश) से आकर बसा है।

यदि आप हमारे विचारों से इत्‍तेफाक रखते हैं तो आप सभी सुधी पाठकों से अनुरोध है कि अपने स्‍तर पर विचार व्‍यक्‍त कर बाल ठाकरे और राज ठाकरे का पुरजोर विरोध करें। चूंकि इन दोनों अलगाववादियों ने देश में, खासकर महाराष्‍ट्र में अमन-चैन को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और उनकी ये नापाक कोशिशें हदें पार करने लगी हैं। वैसे ही, जैसे सरहद पार कर आने वाले आतंकी।

गणतंत्र दिवस से पहले मना ‘राज’तंत्र दिवस

उदय केसरी  
गणतंत्र दिवस पर जहां देश की राजनीतिक राजधानी दिल्‍ली में भारत की आन-बान व शान की रक्षा करने वाली सेनाओं ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया, वहीं इससे ठीक एक दिन पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में देश में एकता, समानता और बंधुत्‍व को तहस-नहस करने वाली राज ठाकरे की सेना ने भी अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। या कहें कि जहां देश में गणतंत्र दिवस का 61वां वर्षगांठ मनाया गया, वहीं एक दिन पूर्व मुंबई में ‘राज’तंत्र दिवस मनाया गया। इस बार गणतंत्र दिवस से पूर्व आतंकी वारदात की आशंका के मद्देनजर पूरे देश को हाईअलर्ट कर दिया गया था। चप्‍पे-चप्‍पे पर सेना व पुलिस बल के जवानों की नजर पैनी थी। यह सब देश में बाहर से संचालित आतंकियों के खिलाफ की गई सुरक्षा व्‍यवस्‍था थी। इसमें हमारा देश सफल भी रहा। बड़े शान से हमने गणतंत्र दिवस मनाया और आतंकियों के हर मंसूबे पर पानी फिर गया। लेकिन दूसरी तरफ देश के अंदर सक्रिय सफेदपोश गद्दारों से हम कब निपटेंगे, जो एकता, समानता और बंधुत्‍व को तहस-नहस करने पर तुले हैं। मुंबई के राज ठाकरे को क्‍या देश का एक सफेदपोश गद्दार कहना गलत होगा? जो मुंबई के गैर-मराठी भाषी टैक्‍सी ड्राइवरों को मराठी ककहरे की किताबें बांटते हुए खुलेआम यह धमकी देता है कि 40 दिनों के अंदर मराठी नहीं सीखे तो घर लौटने के लिए तैयार हो जाना। आखिर यह क्‍या है? यही नहीं इसके पक्ष में बड़े-बड़े बैनर-पोस्‍टर चिपकाए गये हैं। यह क्‍या भारतीय गणतंत्र का खुलेआम उल्‍लंघन नहीं?

राज ठाकरे को किस संविधान ने यह अधिकार दे दिया कि वह तय करें कि मुंबई में कौन रहेगा और कौन नहीं। सबसे बड़ी विडंबना तो यह कि कई दिनों से सोये हुए राज ठाकरे को यह मुद्दा महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री अशोक चौहान ने ही कुछ दिन पहले थाली में परोस कर दिया था, जब चौहान ने मुंबई के सभी टैक्‍सी ड्राइवरों के लिए मराठी बोलना, पढ़ना व लिखना अनिवार्य करने का बयान दिया था। हालांकि इस बयान पर उठे सवाल से डरकर चौहान ने दूसरे ही दिन यू-टर्न ले लिया। लेकिन राज ठाकरे को पका-पकाया मुद्दा मिल गया।

इस संदर्भ में एक और खबर देश में भाषाई भेदभाव को बढ़ावा देने वाली है। यह खबर गुजरात हाईकोर्ट के एक निर्णय से संबंधित है, जिसमें कहा गया कि हिन्‍दी देश की राष्‍ट्र भाषा नहीं है, इसलिए किसी कंपनी को बाध्‍य नहीं किया जा सकता है कि वे अपने उत्‍पादों के उपर विवरण हिन्‍दी में लिखे। सवाल है कि यदि देश के संविधान में हिन्‍दी को राष्‍ट्र भाषा का दर्जा प्राप्‍त नहीं है तो क्‍या यह जानकारी हमें कोर्ट में पीआईएल दायर करने के बाद होगी? पहली कक्षा से लेकर बाद के कई कक्षाओं तक भारतीय छात्रों को राष्‍ट्र भाषा‍ हिन्‍दी, हिन्‍दी के राष्‍ट्रीय कवि, राष्‍ट्रीय गान, राष्‍ट्रीय फूल, राष्‍ट्रीय पशु आदि की जानकारी दी जाती रही है। यदि हिन्‍दी राष्‍ट्र भाषा नहीं है तो इसे अब तक क्‍यों पढ़ाया जाता रहा है। दशकों से इतनी बड़ी भूल कैसे हो सकती है? जाहिर है ऐसी भूल नहीं हो सकती है, जो भाषा भारत देश का सहज स्‍वभाव हो, उसे संविधान में किस प्रकार से दर्जा मिला है, उसकी कानूनी व्‍याख्‍या से क्‍या अर्थ निकलता है, इसकी क्‍या परवाह करे कोई। हो सकता है कि गुजरात हाईकोर्ट की व्‍याख्‍या में यह सही हो, पर क्‍या हिन्‍दीभाषी पिता के वृद्ध हो जाने पर उसके अंग्रेजीदां पुत्र को पिताजी का दर्जा दे दिया जाता है? यदि न्‍यायपालिका महज अपने मुव्‍वकिल को जिताने के लिए चालाक वकीलों की तकनीकी दलीलों पर चलती है, तो यही समझा जाएगा कि न्‍यायपालिका को देश की राष्‍ट्रीय भावना से कोई सरोकार नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में महज राजनीतिक लाभ और सत्‍तासुख के लिए जनता के बीच कभी भाषा, तो कभी जाति, कभी क्षेत्र और कभी धर्म को मुद्दा बनाकर देश की एकता, समानता और बंधुत्‍व को तहस-नहस करने वाले राज ठाकरे सरीखे नेताओं को बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। तब यह कहना गलत नहीं होगा कि देश को जितना खतरा बाहर के आतंकवादियों से है, उससे कहीं ज्‍यादा खतरा देश के भीतर के गद्दार सफेदपोशों से भी है। आतंकियों से तो फिर भी हम निपट लेंगे, पर राज ठाकरे सरीखे घर के आतंकी से कैसे निपटा जाए?

इसबार भी नये साल में एक दर्द के साथ प्रवेश...

उदय केसरी  
2009 के अवसान पर अंतिम पोस्‍ट के रूप में कुछ लिखने का मन किया, लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि क्‍या लिखूं। सोचा, बस सबसे सुखद और सबसे दुखद की चर्चा कर आप सभी ब्‍लॉगर बंधुओं और सुधी पाठकों को नये साल का मुबारकबाद देते है।... 26/11 के दर्द को साथ लेकर आया साल 2009 के 12 महीनों में फिर कोई आतंकी हमला नहीं हुआ, यह सबसे सुखद याद है और इसके लिए गृहमंत्री पी। चिदंबरम को जरूर बधाई देनी चाहिए। वहीं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अमेरिकी राष्‍ट्रपति के पद पर पहली बार किसी अश्‍वेत बराक ओबामा की ताजपोशी का ऐतिहासिक दृश्‍य यादगार है। इन दोनों के अलावा दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी और कुछ इतना सुखद नहीं, जिसे यहां जोड़ूं।
हां, दुखद याद पर दिमाग घुमाते ही सबसे दुखद मुझे 26/11 के गुनहगारों के खिलाफ हमारे देश की धीमी कार्रवाई है, जो आज भी अंडर प्रोसेस है। दूसरी सबसे दुखद याद है महंगाई, जो 2009 के प्रारंभ से ही मुंह फैलाना शुरू की और साल के अंत तक सुरसा के मुंह को भी मात दे गई। और इसबार भी नये साल 2010 में प्रवेश एक दर्द या कहें बोझ के साथ होगी।
खैर, भविष्‍य को खुशहाल बनाने के लिए सदा सुखद यादों को याद रखनी चाहिए, इसलिए मैं इस साल अंतिम लेख में ज्‍यादा कड़वी बातें नहीं कर रहा हूं।....और आपको 2009 के चर्चित शादियों की सूची के साथ नव वर्ष की ढ़ेरों शुभकामनाएं देते जा रहा हूं। इस सूची में सबसे अंतिम पायदान पर आपको एक नाम मेरी शादी का भी मिलेगा, जिसे मैंने बस, स्‍वांत: सुखाय के लिए इसमें शामिल कर दिया। हां, इन नामों पर क्लिक करना न भूलें, शायद, ये नवविवाहित जोड़े आपको न्‍यू ईयर विश करना चाहते हों....
2009 की चर्चित शादियांशिल्‍पा शेट्टी संग राज कुंद्रा
और....अब

क्‍या आपके मन में रोष उत्‍पन्‍न नहीं होता?

उदय केसरी  
महंगाई खतरे के निशान के ऊपर
खाने की वस्तुओं की महंगाई खतरे के निशान के ऊपर जा रही है। नवंबर '09 के आखिरी हफ्ते में जारी थोक मूल्य सूचकांकों से पता चलता है कि पिछले दस वर्षों में कभी इतनी तेजी से महंगाई नहीं बढ़ी। इधर दालों की कीमत में 42 प्रतिशत, सब्जियों की कीमत में 31 प्रतिशत और आलू की कीमत में 102 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मंत्रियों को मुफ्त हवाई यात्रा भत्ता बढ़ाने संबंधी विधेयक पेश
मंत्रियों को खर्च में कटौती की नसीहत देने वाली सरकार ने अब उन्हें अपने नाते-रिश्तेदारों और साथियों को भी मुफ्त हवाई सफर कराने की छूट दे दी है। यही नहीं, देश के वित्त मंत्री रहे मौजूदा गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने मंत्रियों को मिलने वाली मुफ्त हवाई यात्रा भत्ता सुविधा बढ़ाने संबंधी विधेयक की आलोचनाओं को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया कि इससे सरकार पर कोई वित्तीय बोझ नहीं बढ़ेगा। --------------------------------------------------------------------------------------
उपर्युक्‍त दोनों खबरों को पढ़कर क्‍या आपके मन में रोष उत्‍पन्‍न होता है? हां और न भी। ज्‍यादातर का यही जवाब होगा। कुछ ही लोग कहेंगे इन खबरों को पढ़कर मेरा मन रोष से इतना भर उठता है कि ऐसी सरकार और ऐसे मंत्रियों को फिर कभी वोट न दूं, इनका खुलकर विरोध करूं, इनके खिलाफ लोगों को जागरूक करूं। लेकिन ऐसा रोष यदि आगे भी कुछ ही लोगों के मन में उठता रहा, तो वे चिल्‍लाते रह जाएंगे और महंगाई महामारी का रूप धारण कर लेगी। लोग मरेंगे, खाये बगैर या सड़े-गले खाकर। तब हवाई जहाज से यही मंत्री आयेंगे उन्‍हें देखने और आश्‍वासन देकर फिर चले जाएंगे हवाई जहाज से उड़कर मुफ्त में मिले अपने आलीशान बंगले में। आप कहेंगे हमने तो अपने क्षेत्र से उसे सांसद बनाया था मंत्री तो वह अपने तिकड़म से बना। तो आपको यह भी मालूम होगा कि संसद भवन परिसर में इन करोड़‍पति-अरबपति सांसदों को शानदार खाना मात्र 10-15 रूपये प्‍लेट में मिलता है। मं‍त्री-सांसदों को कम से कम पांच साल तक आप भूखमरी और महंगाई का एहसास तो नहीं करा सकते। यह एहसास तो आप-हम को करना है और दाल की जगह माढ़ और चावल की जगह खुद्दी (चावल के टुकड़े) खाना है।

केंद्र सरकार ने तो हाथ खड़े कर दिये हैं। बोल दिया, बारिश हुई नहीं, तो कहां से खाद्यान्‍नों की कीमतों को नियंत्रित करें। यह तो राज्‍य सरकारों को करना चाहिए। केंद्र सरकार की पूरी चिंता कोपेनहेगन में आयोजित जलवायु परिवर्तन को लेकर सम्‍मेलन पर है, या फिर अमेरिका से नए-नए समझौते करने पर है। मानों, घर की चिंता करने की जिम्‍मेदारी केंद्र नहीं, राज्‍यों की है! एक पुरानी कहावत है- न रहिये जी तो क्‍या खैहिये घी। अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बड़े-बड़े समझौते करके क्‍या वर्तमान में कोई बदलाव होने वाला है? नहीं न। तो बताइये, जब घर के लोग महंगाई से त्रस्‍त हों, तब केंद्र सरकार को खाद्यान्‍न आयात करने पर विचार करना चाहिए। तो नहीं, इसके जवाब में सरकार कहती है, अभी ऐसी परिस्थिति नहीं आई है। तो जब लोग मर ही जाएंगे तब उनके के लिए खाना आयात करने से क्‍या होगा? एक और बयान सरकार की तरफ से आता है कि वित्‍तीय बोझ अधिक है। तो ऐसी परिस्थिति में सरकार करीब तीन सौ मिलियन विदेशी मुद्रा भंडार को संजो कर क्‍या कर रही है?

क्‍या अब भी आपके मन में रोष उत्‍पन्‍न नहीं होता? देश की ऐसी स्‍ि‍थति के बावजूद माननीय गृह मंत्री पी। चिदंबरम मंत्रियों को मिलने वाली मुफ्त हवाई यात्रा भत्ता सुविधा बढ़ाने संबंधी विधेयक की आलोचनाओं को सिरे से खारिज करते हुए दावा करते हैं कि इससे सरकार पर कोई वित्तीय बोझ नहीं बढ़ेगा। आखिर इस बंदरबांट के एक हिस्‍सेदार वो भी तो हैं। एक और खबर आ रही हैं कि केंद्र सरकार देश में विशिष्ट लोगों के लाने-ले जाने के लिए तीन-तीन सौ करोड़ की लागत से एक दर्जन हेलिकाप्‍टर खरीदने की तैयारी कर रही है। अरे भाई, समझे नहीं, देश में महामारी होगी तो बड़े-बड़े नेता-मंत्री क्‍या पैदल आपको देखने आयेंगे। उसके लिए उड़नखटोला चाहिए कि नहीं। आप ही के लिए तो यह सब किया जा रहा है! आप पहले महामारी के शिकार तो होईये, देखियेगा कैसे ये नेता-मंत्री आपको देखने हेलिकाप्‍टर नहीं आते हैं!

मैं बस यही बताना चाहता हूं कि इस महंगाई और सरकारी लूट से हम-आप को कोई बचा नहीं सकता। हमें खुद ही इसके लिए खड़ा होना होगा। जब तक आपके पास दोगुने-तीनगुने-चारगुने दामों पर भूख मिटाने के स्रोत है, तब तक आपको तो कोई वैसी चिंता नहीं होगी, जैसी एक गरीब परिवार को हो रही है, लेकिन जरा सोचिए, आपके स्रोत कब तक आपका साथ देंगे? कभी अपने से नीचे स्‍तर पर जीवन बसर करने वालों के बारे में तो सोचिए, जो बेचारा आवाज भी नहीं उठा सकता। उसके मन में जरूर रोष का तूफान उठता होगा, लेकिन वह घर की भूख मिटाने के लिए मजदूरी करने जाए या विरोध का विगुल फूंके। ऐसे में, इन गरीबों से कुछ उपर वाले लोगों को ही तो आगे आना होगा। आखिर कब तक आप किसी नेता के आश्‍वासनों के फलीभूत होने के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे?

चुटकी का खेल बना पूर्वजन्‍म की यात्रा!

उदय केसरी  
पिछले एक हफ्ते से एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित रियलिटी शो ‘राज पिछले जन्‍म का’ पर पता नहीं क्‍यों मुझे विश्‍वास नहीं होता। कोई कैसे आधे घंटे के शो में किसी को उसकी एक नहीं दो-दो पूर्वजन्‍मों की याद दिला सकता है और वह भी फिल्‍म के दृश्‍य व कहानियों की तरह स्‍पष्‍ट। क्‍या आपको विश्‍वास होता है? ...मैंने इस शो के तीन-चार एपिसोड देखे हैं, जिसने मेरे जहन में अनेक सवाल खड़े कर दिये। इस शो में पूर्वजन्‍म की यात्रा कराने वाली डा. तृप्‍ती जैन के पास आखिर ऐसी कौन सी विद्या है, जो किसी आदमी को इतने कम समय में सैकड़ों साल पीछे ले जाती है? और फिर यदि यह मान भी लें कि आदमी को पिछले जन्‍मों में ले जाया सकता है, तो क्‍या पिछले जन्‍म की चेतना में प्रवेश कर चुका आदमी अपने इस जन्‍म की भाषा-बोली में सैकड़ों साल पुरानी बातें बता सकता है? सबसे आश्‍चर्यजनक यह कि डा. जैन सामने लेटे व्‍यक्ति से कभी-कभी ऐसे सवाल करती हैं, मानो पूर्वजन्‍म में सामने लेटा आदमी नहीं, खुद डा. जैन विचरण कर रही हों, जैसे भोपाल की एक महिला के मामले में डा. जैन जोर देकर पूछती हैं- देखो मृत पड़े सेलर के हाथ में एक घड़ी है, देखो उसमें क्‍या समय हुआ है? पिछले दिन मोनिका बेदी के मामले में भी ऐसा ही आश्‍चर्य हुआ- वह अचेतावस्‍था में अपने पिछले जन्‍म में विचरण कर रही थीं, पर जब उससे उसके पति का नाम पूछा गया, उसकी शक्‍ल-सूरत बताने को कहा गया, तो मोनिका ने बताने से मना कर दिया और कहा ‘बताना नहीं चाहती’, मानों वह अचेतावस्‍था में भी यह समझ रही हो कि इस सवाल का जवाब देने से उसकी वर्तमान जिंदगी में कोई प्रभाव पड़ सकता है। इन सब के अलावा एक बड़ा सवाल कि क्‍या मानव का पुनर्जन्‍म मानव रूप में ही होता है?

मेरे सवालों का सार यह है कि यदि पूर्वजन्‍म की यात्रा करना इतना आसान है, तो इसकी प्रामाणिकता का आधार क्‍या है? इससे तो विभिन्‍न धर्म ग्रंथों में उल्‍लेखित पूर्वजन्‍म व पुनर्जन्‍म संबंधी मान्‍यताओं पर भी सवाल खड़ा हो जाता है। मसलन, हिन्‍दू धर्मग्रंथों की मान्‍यताओं के मुताबिक चौरासी लाख यौनियों में जीवन पूरा करने के बाद ही किसी जीव को ईश्‍वर की कृपा से मानव शरीर प्राप्‍त होता है। इसीतरह, पूर्वजन्‍म पर विश्‍वास रखने वाले बौद्ध, जैन, सिख, तावो आदि धर्मों की भी अपनी-अपनी मान्‍यताएं हैं, जिसमें ज्‍यादातर हिन्‍दू धर्म की तरह ही कर्मफल पर आधारित हैं कि- अच्‍छे कर्म से अगला जन्‍म मानव रूप में संभव है, तो फिर राज पिछले जन्‍म के एक शो में कलाकार लिलिपुट के मामले को देखें, तो उसके बारे में कहा गया कि उसने पिछले जन्‍म में दो-दो लड़कियों के साथ प्‍यार का फरेब करके उनका दैहिक शोषण किया, तो ऐसे जीव का पुनर्जन्‍म मानव रूप में ही कैसे हुआ?

देखिये, पूर्वजन्‍म की अवधारणाओं के बारे यह मेरी सामान्‍य जानकारी है, जिसकी चर्चा करके मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरी समझ से एनडीटीवी के प्रोग्राम ‘राज पिछले जन्‍म का’ पर मुझे विश्‍वास नहीं होता है। और यदि वाकई में यह दर्शकों को धोखा देने वाला कार्यक्रम है, तो क्‍या इसे इस तरह से प्रसारित किया जाना चाहिए? क्‍या इससे अंधविश्‍वास को बढ़ावा नहीं मिलता? इस शो के होस्‍ट अभिनेता रविकिशन एक एपिसोड में यह कह रहे थे कि ‘सांप को मारने का श्राप पीढ़ी दर पीढ़ी भुगतना पड़ता है।'...इसे क्‍या कहेंगे?

अब एक और बात आपसे कहना चाहता हूं कि मैंने इस विषय पर यह पोस्‍ट लिखने से पहले इंटरनेट पर डा. तृप्‍ती जैन के बारे में पढ़ा- उन्‍होंने हैदराबाद के एक प्रसिद्ध पास्‍टलाइफ रिग्रेशन थेरेपिस्‍ट डा. न्‍यूटन कोंडावेती के अधीन रहकर यह विद्या या कहें सम्‍मोहन विद्या सीखी है। इस विद्या के माध्‍यम से प्राय: मा‍नसिक रोगियों का इलाज किया जाता है। डा. न्‍यूटन ने खुद किसी विदेशी थेरेपिस्‍ट से यह विद्या प्राप्‍त की है और अब हैदराबाद में अपनी लाइफ रिसर्च अकादमी चला रहे हैं। इस अकादमी का दावा है कि यहां मात्र चार दिनों में पूर्वजन्‍म की यात्रा कराने की विद्या सिखी जा सकती है। इनकी वेबसाइट का पता http://www.liferesearchacademy.com/ है। यानी पूर्वजन्‍म की यात्रा करना काफी आसान है! जब मैंने इंटरनेट पर थोड़ी और खोजबीन की, तो पाया कि इंटरनेट पर दर्जनों ऐसी वेबसाइट हैं, जो आपको पूर्वजन्‍म में ले जाने का दावा करती हैं, बस आप डॉलर में उन्‍हें पहले ‘पे’ कर दें। कुछ एक वेबसाइट तो ऐसी हैं, जिस पर बस जन्‍म की तारीख, महीना व साल पूछा जाता है और दूसरे ही पल में आपके पूर्वजन्‍म का विवरण आपके सामने होता है।...तो किसी वेबसाइट पर सीडी बेची जा रही है कि- आप घर बैठे सीडी सुनकर पूर्वजन्‍म की यात्रा करें। वाह! कितना आसान है यह सब! लेकिन जब मैंने इन वेबसाइटों के अंदर जाकर टर्म एंड कंडिशंस के पन्‍नों को पढ़ा, तो वहां लिखा पाया कि इसके घोषित परिणाम पूरी तरह सत्‍य हो यह जरूरी नहीं है। यह अलग-अलग व्‍यक्तियों पर अलग प्रभाव डाल सकता है। किसी भी बुरे प्रभाव के लिए आप खुद जिम्‍मेदार हैं। यही नहीं एक-दो वेबसाइटों पर तो इसे एक कंप्‍यूटर प्रोग्रामिंग का परिणाम बताया गया और यह भी कि यह परिणाम केवल आपके मनोरंजन के लिए है। ऐसे वेबसाइटों के लिंक मैं यहां चिपका रहा हूं, आप भी इनकी सच्‍चाई का पता लगा सकते हैं-