इस दीपावली जरा सोचिए

सीधीबात के आप सभी सुधी पाठकों तथा ब्लॉगर समुदाय के तमाम लेखकों, पत्रकारों, पत्रकारिता के विद्यार्थियों व बुद्धिजीवियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

आज से मैं कुछ दिनों की छुट्टी पर जा रहा हूं, अपने घर, बरही(हजारीबाग), झारखंड। जाने से पहले मैं कुछ सवाल करना चाहता हूं, जिनपर आप और हम दीपावली के अवकाश में तमाम निजी सुख-स्वार्थ को परे रखकर इत्मिनान से विचार करें:-
  • यह कि, इस बार की दीपावली हम क्यों मनाने जा रहे हैं?
    कहते हैं दीपावली अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है...क्या हमने अंधकार मिटाने या उसे कम करने में कोई भूमिका अदा की है?
  • फिर आप या हरेक भारतवासी किसे अंधकार मानते हंै?....पर पहले हमें खुद से यह सवाल करना, हालांकि शर्मनाक, पर लाजिमी है कि हम अपने देश से कितना प्यार करते हैं?
  • यह भी कि अपनी मां और भारतमां में कितना फर्क महसूस करते है? क्या खुद को हम भारतमां के सच्चे सपूत मान पाते हैं?
  • देश की अखंडता और सांप्रदायिक सद्भावना से हम व्यक्तिगत तौर पर कितने सहमत हैं?
  • हमारी युवा सोच में ऐशो-आराम की नौकरी व जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण कोई लक्ष्य है?
  • देश के नेताओं को सत्ता की कुर्सी से अधिक प्यारा क्या है? जिन्हें हम वोट देते हंै या वोट न देकर मौन समर्थन करते हैं।
  • धर्म, भाषा, क्षेत्र के नाम पर आतंक, दंगा, नफरत व विवाद में आप किसी स्तर पर शामिल नहीं, तो इनका विरोध कैसे करते हैं?
  • अंत में, हम कैसे देशद्रोही नहीं है? और कैसे इस देश के जिम्मेदार नागरिक हैं?
    जरा सोचिए!
आपका,
उदय केसरी

अब बेखौफ क्षेत्रीय आतंकवाद और आतंकी-राज

उदय केसरी
भारत और भारतवासी आतंकियों से बुरी तरह से घिर चुके हैं। ऐसा लगता है जीना है तो सुकून को भूल जाओ...बाकी सभी वादों को छोड़कर आतंकवाद की शरण ले लो। वर्तमान भारत, एक तरफ अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के बारंबार धमाकों से, तो दूसरी तरफ धार्मिक आतंकवाद के दंगों से, तो तीसरी तरफ क्षेत्रीय आतंकवाद की गैरमराठी के खिलाफ दादागिरी, तो चैथी तरफ जातीय आतंकवाद की हिंसा से आक्रांत हैं...बच के कहां जाओगे आप?...क्योंकि असल में केंद्र समेत कोई भी सरकार जनता की नहीं, सत्ता की है। पुलिस फोर्स भी जनता की नहीं, नेताओं व सत्तासीनों की सुरक्षा के लिए है। खुफिया विभाग फेल है, यह विदित ही है और अब ऐसे में न्यायालय की क्या विसात, किसी को भी कोई भी उपाधि दे या चेतावनी देते रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता...चाहे, वह सरकार हो या नेता हो या अफसर।

सीधीबात पर सुकून या कहें भ्रम में चार दिनों तक देश की दशा पर चिंतन लिखने से बचा, सोचा...अगली बार किसी और विषय पर विचार करेंगे, जो मन को तसल्ली दे कि समस्याएं हैं, तो उसका हल भी करने वाले हैं...लेकिन कहते हैं कि आंखें मूंद लेने से आप हकीकत को झुठला नहीं सकते...और फिर, यदि मनोरंजन के लिए ही सीधीबात करनी हो, तो कम से कम देश के पाठकों के बीच अवसर की किल्लत कभी नहीं होती। क्योंकि हम हर मुश्किल में चमड़ी मोटी कर जीने के आदि हो चुके हैं...तभी तो एक नहीं, चारों तरफ से जब देश आतंकियों के निशाने पर है, तब भी हम बड़े मजे से क्रिकेट देखने, तो दीवाली की शॉपिंग करने में, जेट समेत अन्य एयरलाइंस के आर्थिक संकट से उत्पन्न हजार-दो हजार कर्मचारियों की नौकरी बचाने में, चंद्रयान प्रक्षेपण की करीब आती घड़ी पर खुशियां मनाने में और सबसे अधिक चुनावी राजनीति की गोटियां सेट करने-करवाने आदि में मस्त हैं।

रविवार को एक क्षेत्रीय आतंकवादी संगठन महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के आतंकियों ने गैरमराठी छात्रों पर हमला बोल दिया। वे केंद्रीय रेल विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा देने मुंबई गए थे। इस घटना के दृश्‍य आप सबों ने टीवी पर जरूर देखे होंगे...शर्मनाक घटना थी...आप भी सहमत होंगे...पर इसके बाद राज ठाकरे की गिरफ्तारी से पहले व बाद के राजनीतिक बयानों को जरा देखिए...यह भी आपको कम शर्मनाक नहीं लगेंगे...
मुझे गिरफ्तार करो, महाराष्ट्र जल उठेगा-राज ठाकरे,
एमएनएस ने नहीं हमने पीटा उत्तर भारतीयों को-शिवसेना,
सरकार अहिंसा की भाषा नहीं समझती-राज ठाकरे,
‘भैया जी’ लोगों से मराठी में बात करो -राज ठाकरे
राज की गिरफ्तारी महाराष्ट्र के लिए शर्म की बात-मनसे....

इस शर्मनाक घटना के दो दिनों बाद पुलिस राज ठाकरे की गिरफ्तारी करने की शक्ति जुटा पाई...वह शायद इसलिए कि देश में चुनावी मौसम शुरू हो गया है...इसलिए बढ़े राजनीतिक दबाव के कारण। लेकिन क्या गिरफ्तारी के बाद राज ठाकरे के उस बयान को गिदड़भभकी साबित करने में महाराष्ट्र पुलिस व सरकार सक्षम है कि ‘मुझे गिरफ्तार करो, महाराष्ट्र जल उठेगा’....शायद नहीं, क्योंकि गिरफ्तारी के दिन आ रही खबर की हेडिंग यही कहती है- राज ठाकरे की गिरफ्तारी के खिलाफ मचा महाबवाल....कितनी बेबस है हमारे देश की कानून-व्यवस्था! या फिर गैरजिम्मेदार, भ्रष्ट, अनैतिक हैं इसके संचालक। इसका फैसला करने की जिम्मेदारी जनता की होती है, पर वह कभी नहीं करती...क्यों? इसका जवाब तो पहले दिया जा चुका है-सितम के कोड़े खा-खाकर चमड़ी मोटी हो गई, अब कोई खास असर नहीं होता...

लघुकथा

सीधीबात पर पहली बार जलते सामयिक राष्‍ट्रीय मुद्दों, घटनाओं, भ्रष्‍टाचार, मीडिया की कारस्‍तानियों पर सतत बहस को एक लघुविराम दिया जा रहा है. हमारे कुछ पाठक मित्रों ने सुझाव दिया कि सीधीबात पर मन को सुकून देने वाली सामग्री भी प्रकाशित होनी चाहिए, सो, एडिटोरियल प्‍लस डेस्‍क द्वारा आज बहस व आलेख की जगह हमारे युवा पत्रकार मित्र मीतेन्‍द्र नागेश की यह कहानी प्रकाशित की जा रही है....हम आप पाठकों व लेखकों से भी आग्रह करेंगे कि आप भी हमें अपनी कोई साहित्यिक रचना भेजें, जिसे हम ऐसे ही बहसों के तनाव के बीच सुकून के लिए उसे प्रकाशित कर सके...प्रस्‍तुत है सीधीबात पर पहली कहानी: लघुकथा

मैं लघुकथा और उपन्यास में कभी अंतर समझ ही नहीं पाया था। उपेन्द्र दा के लाख समझाने पर भी मेरी बुद्धि में कुछ न बैठता। उपेन्द्र दा को गुस्सा तो बहुत कम आता था, मगर कभी-कभी वे खीज जाया करते- 'तू तो पूरा गधा है, तेरे भेजे में कुछ नहीं आएगा।' फिर थोड़ा शांत होकर कहते-'जिंदगी तुझे लघुकथा और उपन्यास में अंतर समझा देगी।'
सही कहा था उन्होंने...। उनकी जिदंगी ने मुझे इस अंतर को समझा दिया।
'देख गधे एक लघुकथा लिखी है'- फिर खुद उसको अभिनय के साथ पढ़कर सुनाते। कहानी सुनाने का अंदाज भी गजब का था। उनके शब्द आंखों के सामने चित्र खींचते चलते और सुनने वाला पात्रों में जीने लगता।
हंसमुख स्वभाव के उपेन्द्र दा हमेशा हंसी मजाक करते थे, लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा सजी रहने वाली हंसी जाने कहां खो गई...।
'देखना लोग मुझे सदियों तक याद करेंगे'- एक बार बड़े चहककर मुझसे कहा था उन्होंने। इस एक वाक्य में ही उनका सपना, महत्वाकांक्षा और जीवनलक्ष्य समाया हुआ था। सच, लोग उन्हें सदियों तक याद रखते, मगर...। ऊंची परवाज की ख्वाहिश रखने वालों के लिए आसमान छोटा पड़ ही जाता है। यही तो हुआ था उपेन्द्र दा के साथ। अपनी परवाज के लिए असीमित विस्तार की तलाश उन्हें शहर ले आई। यूं तो गांव में उनकी साख कम न थी। बच्चों-बच्चों की जुबान पर उनके लिखे गीत होते, तो युवाओं में उनके नाटकों के संवाद। बुजुर्गो में कहानियों की चर्चाएं भी कम न थी। जाने कौन उनके दिमाग में यह बात बैठा गया था कि उनकी जगह यहां नहीं है। उन्हें तो ऐसे शहर में होना चाहिए, जहां साहित्य का माहौल हो, जहां अन्य रचनाकारों के साथ उठना-बैठना हों, चर्चाएं हों, जहां मंच भी मिले और मान-सम्मान भी। इस छोटे से गांव के अनपढ़ लोगों की वाहवाही से क्या मिलता है, गांव के बाहर कौन जानता है आपको...बस उपेन्द्र दा शहर चले गए।
शहर से पहली बार लौटने के बाद उपेन्द्र दा के चेहरे की रंगत ही कुछ और थी। वे काफी खुश नजर आए थे। लेकिन उस दिन के बाद जब भी उनसे मुलाकात हुई, वह कभी खुश नहीं दिखे। उपेन्द्र दा की खासियत कहिए या कमजोरी, उनके दिल के भाव कभी छिपते नहीं थे। चेहरा सब कुछ बयान कर देता था. हमेशा वह मुझे उदास से लगे। उदासी ने उस हंसमुख चेहरे का भूगोल ही बदल डाला।
'वहां बड़े-बड़े लिखाड़ हैं, मैं तो कुछ भी नहीं।‘
'आप भी कुछ कम नहीं दादा'- मैंने उनका हौसला बढ़ाना चाहा था।
'वे देश के नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं।'
'फिर तो आप भी नामी-गिरामी हो जाएंगे, हमे भूलेंगे तो नहीं न दादा'
'फिर गधे जैसी बात करने लगा, तू कभी सुधरेगा नहीं'
और हम दोनों जोरदार ठहाका लगाकर हंस दिए। आज भी गूंजता है वह ठहाका और...।
और फिर मुझे वो दिन भी याद है, जब उपेन्द्र दा की बातों में न तो उत्साह था और न आवाजद् में खनक। बड़ी उदासी में उन्होंने मुझसे कहा था-
'दोस्त, मैं जब भी कहानी लिखने बैठता हूं, वह लघुकथा बनकर रह जाती है।'
'क्या दादा आप फिर लघुकथा लेकर बैठ गए, फिर आप उपन्यास की चर्चा करने लगेंगे'- मैंने चुटकी लेना चाहा, लेकिन दादा का गंभीर चेहरा देख मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। मैंने उनकी बातों को पूरी गंभीरता से सुना।
'लघुकथा भी अद्भुत विधा है, मगर उपन्यास की बात ही कुछ और है...,' और उस दिन जीवन के कई रंग देखे मैंने दादा की आंखों से। वे काफी त्रस्त थे, उनकी बातों से लगता जैसे वह अपने अस्तित्व को तलाशने की को‍शिश कर रहे हों। जैसे एक नदी, जो अपना रास्ता खुद बनाती आई हो, समुन्दर के अथाह जल में असहज महसूस कर रही थी।
'दादा लघुकथा भी तो कितनों को प्रेरणा दे जाती है, दिल में उतर जाती है।'- मैंने उनसे कहा था।
'पर, लघुकथाओं को कौन याद रखता है’
उनके इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था। मेरी जुबान जम गई।
मैं उन्हें जितना समझ पाया अगर वही सच हो, तो-‘वे अपनी जिन्दगी को उपन्यास की तरह विस्तार देना चाहते थे, जिसका एक-एक शब्द लोगों के दिल से गुजरे. जिसे लोग सदियों तक भूल न पाए, मगर..., मगर उनकी जिंदगी एक लघुकथा बनकर रह गई। आज समझ पाया मैं लघुकथा और उपन्यास में अंतर।
मैं नहीं जानता दादा आज कहां हैं. लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि उनका कहीं कोई जिक्र नहीं, न कहानी में, न उपन्यास में। पता नहीं दुनिया के किस अंधेरे कोने में होंगे दादा?
मीतेन्‍द्र नागेश, भोपाल
meetendra.nagesh@gmail.com

कुछ अनाम टिप्‍पणीकारों के नाम टिप्‍पणी

उदय केसरी
पहली बार मैं सीधीबात पर प्रकाशित किसी आलेख की टिप्‍पणियों के जवाब में अपनी टिप्‍पणी लिख रहा हूं। हालांकि मैं टिप्‍पणी-प्रतिटिप्‍पणी के नाम पर अभिव्‍यक्ति की मर्यादा को ताक पर रखकर बहस करने के खिलाफ हूं, जिसमें कई ब्‍लॉगरों का एक तपका शामिल है। उनके लिए भले ही एक-दूसरे के पोस्‍ट या कथित विचारों पर निजता की हदें पार कर प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करना बौद्धि‍क बहस हो, पर मैं इसे कलालीगप मानता हूं, जिसके मैं सख्त खिलाफ हूं...

मेरी यह टिप्‍पणी सीधीबात पर 14 अक्‍टूबर को प्रकाशित आलेख ‘खुद अपने घर जला रहे हैं ईसाई’ ...बेशर्मी की हद तो देखिए पर कुल छह टिप्‍पणियों के लेखकों को खासकर संबोधित है. इन टिप्‍प‍णीकारों में केवल एक का नाम (मनीष सिन्‍हा, दिल्‍ली) पता चल पाया. शेष की गुमनाम टिप्‍पणी मिली है, जिन्‍हें मैंने बिना किसी संशोधन के प्रकाशित कर दिया. बस केवल एक टिप्‍पणी में मैंने अपने ब्‍लॉग की मर्यादा को ध्‍यान में रखते हुए एक शब्‍द मिटाया, जो गाली था.

पहले, मैं इन सभी अनाम/सुनाम टिप्‍पणीकारों को धन्‍यवाद देता हूं कि आपने छुपकर ही सही सीधीबात पर प्रकाशित आलेख पढ़ा और अपने ‘बौद्धिक’ विचारों को व्‍यक्‍त भी किया. मगर मुझे आपकी टिप्‍पणियों को पढ़कर दुख नहीं हुआ, बल्कि आश्‍चर्य हुआ कि अपना नाम तक जाहिर करने की हिम्‍मत न रखने वाले ‘अपने हिन्‍दुत्‍व’ की रक्षा कैसे कर पायेंगे?

हां, सबसे ज्‍यादा दुख तो इस बात का हुआ कि उस आलेख के असल मर्म पर अपनी संवेदना व्‍यक्‍त करने वाली एक भी टिप्‍पणी किसी ने नहीं की. यदि किसी ने की होती, तो शायद मैं यह प्रतिटिप्‍पणी कतई नहीं लिखता.

तकलीफ यह सोचकर भी हुई कि क्‍या बजरंग दल, विश्‍व हिन्‍दू परिषद् आदि नफरत के सौदागर संगठनों द्वारा देश भर में फैलाया जा रहा भ्रम इस हद तक विस्‍तृत हो चला है कि लोग धार्मिक सहिष्‍णुता के मायने भूल गए हैं...कि वे भूल गए हैं कि भारत की आबोहवा में असल ताजिगी मंदिर की घंटी, मस्जिद की अजान, चर्च के घंटे और गुरूद्वारे की गुरूवाणी की आवाजों से ही है...कि देश की अस्मिता पर कोई दुश्‍मन देश जब कभी करगिल के रास्‍ते कुदृष्टि डालता है, तो क्‍या हिन्‍दू, मुसलमान, क्‍या ईसाई, पूरे हिन्‍दुस्‍तान का खून एक साथ खौलता है...कि भूल गए हैं गुलाम से आजाद भारत तक के सफर में जर, जमीन, जवानी व बुढ़ापा तक न्‍यौच्‍छावर करने वाले भारत के उन सभी जाति-धर्म व भाषा-बोली वाले असंख्‍य अमरशहीदों को, जिन्‍होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कुर्बानियां दीं, लेकिन क्‍या उन्‍होंने अंग्रेजों के धर्म ईसाईयत का कभी विरोध किया?...नहीं न...भारत के मूल चरित्र में कभी धार्मिक कट्टरता को बल नहीं दिया गया और न ही इसे सियासत का हथियार बनाने वाले शासकों को तहेदिल से कभी स्‍वीकार किया गया.

दरअसल धर्म किसी मानव का निजी, नैतिक व आध्‍यात्मिक संस्‍कार है, वैसे ही जैसे उसका रूप-रंग, भेष-भूसा, भाषा-बोली, जिस पर कोई प्रतिबंध लगाना, उसकी हत्‍या के बराबर है...क्‍या आपको कोई अपनी पसंद से कंघी करने से रोके, तो आप बर्दास्‍त करेंगे?....नहीं न तो, क्‍यों मानव की प्रकृति प्रदत्‍त धार्मिक आजादी की धज्जियां उड़ाई जा रही है, यदि किसी धर्म के अनुआई की बातों से प्रभावित होकर कोई अपना धर्म परिवर्तन करता है, तो इसमें बुरा क्‍या है? और यदि आप इसे घोर अपराध मानते हैं, तो पहले देश भर में सक्रिय सैकड़ों धर्मगुरूओं के अगल-अलग संगठनों व उनके अलग-अलग धर्म संस्‍कारों के प्रचार-प्रसार को रोका जाए। क्‍यों वे अपने-अपने तरीके से धर्म पुराणों की व्‍याख्‍या कर रहे हैं? क्‍यों वे केवल अपने-अपने ईष्‍ट देवों का अनुआई बनने का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं? क्‍या उनका करोड़ों का धर्म-उपदेश का कारोबार असल में धर्मसंगत है?

....और फिर भी यदि आपकी आंखें नहीं खुलती, तो पहले भगवान बुद्ध, महाराजा अशोक, साईं बाबा, कबीरदास, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर आदि कई ऐसे नाम हैं, जिन्‍होंने अपने जन्‍म से प्राप्‍त धर्मों का पालन न कर अपनी मर्जी से अलग धर्मों को अपनाया. उन महापुरूषों के विचारों को जबाव देने जितनी बौद्धिकता प्राप्‍त करने में अपनी ताकत व ऊर्जा का इस्‍तेमाल कीजिए...सच मानिए, फिर आपके विचार, लोगों में दंगा-फसाद करके समझाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, लोग खुद ब खुद आपके मत को अपना धर्म बना लेंगे...और आपकी पूजा करेंगे.

चुनावों से आपको क्‍या...तो भूखो मरो!

उदय केसरी
चुनावी मौसम की घोषणा हो चुकी है...अभी पांच राज्‍यों में, फिर पूरे देश में चुनावी मौसम आयेगा. पर आप तो किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता, या नेता तो नहीं, इसलिए आपको इससे क्‍या...हां, आप अगामी महीने में अपनी यात्रा या मनबहलाव कार्यक्रमों की तैयारियों को सुनिश्चित कर लें और यदि ऐसी कोई व्‍यस्‍तता नहीं हो, तो फिर कोई परेशानी नहीं...बस चुनावी दंगल का टीवी दर्शन कीजिए...फिर मतदान के दिन तो चद्दर तान कर सोना है ही...अरे, वोट तो गांव-देहात के निरक्षर व भोले-भाले लोग देते हैं और वह भी अलग-अलग पार्टी के विभिन्‍न आश्‍वासनों जैसे दारू-चखने की फुल व्‍यवस्‍था, लोन दिलाने में मदद, किसी आपराधिक मामले से निकलवाने अ‍ादि हर संभव-असंभव काम करवाने के नाम पर. आप इंटरनेट व टीवी वाले लोगों के लिए मतदान व चुनाव कोई मायने थोड़े रखता है...आप जैसे पढ़े-लिखों का मतलब तो चुनाव बाद आने वाले परिणामों से होता है...जीतने वाला पुराना ही आदमी है कि नहीं...कहीं कोई नया जीत गया तो फिर से सेटिंग जमानी पड़ेगी, नहीं तो धंधे व नौकरी की आफत समझो...आजकल टाटा टी वाले एक बेवकूफी भरा टीवी विज्ञापन करवा रहे है...ग्‍लास में चाय लेकर घुमते फिर रहे है और लोगों से पूछते हैं-आप सो क्‍यों रहे हैं...क्‍या बेहूदा सवाल है...चलते-फिरते लोगों को सोया कह रहे हैं...अंधे हैं क्‍या टाटा टी वाले...और जब एक महिला अपनी आंखें फाड़कर दिखाती है, तो कहते हैं, मतदान के दिन क्‍या अपना वोट डालने के लिए जागते हैं?..अरे मेरे एक वोट डालने या न डालने से क्‍या देश की सूरत बदल जाएगी...आजकल विज्ञापन के कुछ भी तरीके अपना रहे हैं ये समान बेचने वाले....
चुनावी मौसम और मतदान के बारे में उपर्युक्‍त बातें क्‍या आपकी सहज धारणा को अभिव्‍यक्‍त नहीं करती? यदि नहीं, तो देश की राजनीति इतनी गंदी क्‍यों हो चुकी है? इसकी सफाई की जिम्‍मेदारी और अधिकार आखिर किसके पास है? आप कहेंगे यह केवल कहने भर में अच्‍छा लगता है...व्‍यवहारिकता कुछ और है...नेताओं को खुद गंदगी साफ करनी होगी...पर क्‍या यह वर्तमान व भविष्‍य में किसी भी दृष्टि से संभव लगता है? नहीं न...तो क्‍या हमें जागना चाहिए? चलिए आपको अपने देश का एक ताजा सूरतेहाल बताते हैं, फिर अपने जागने पर विचार कीजिएगा....
बेचारा भारत !
भूख और कुपोषण के लिहाज से भारत की स्थिति ‘चिंताजनक’ है. भारत में 20 करोड़ से अधिक लोग ऐसी हालत में जी रहे हैं कि उन्हें सुबह उठ कर पता नहीं होता कि दिन में खाना मिल पाएगा या नहीं. भारत अब भी कुपोषण को दूर करने में कामयाब नही हुआ है. अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के 2008 ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार इस मोर्चे पर भारत की हालत अफ्रीका महाद्वीप के सहारा क्षेत्र के करीब 25 देशों से भी बदतर है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स के साथ पहली बार इंडिया हंगर इंडेक्स भी जारी किया गया है. इससे पता चलता है कि भारत का कोई भी राज्य ‘कम भूख’ या ‘मध्यम दर्जे की भूख’ वाली स्थिति से जुड़ी श्रेणियों में नहीं है. यानी इनकी स्थिति इससे भी नीचे है.
सबसे भूखा मध्‍यप्रदेश
देश में भूख के मोर्चे पर मध्यप्रदेश की सबसे बुरी गत है. इससे थोड़ी अच्छी स्थिति झारखंड और बिहार की है. इंडिया हंगर इंडेक्स में पंजाब और केरल की स्थिति सबसे अच्छी रही. इस इंडेक्स में तीन अहम पैमानों पर देशों की स्थिति तय की गई। ये तीन मानक थे- बाल कुपोषण की स्थिति, बाल मृत्यु दर और पर्याप्त कैलोरी वाले भोजन से वंचित लोगों का अनुपात. भारतीय राज्यों को जब 2008 ग्लोबल हंगर इंडेक्स में विभिन्न देशों के मुकाबले तौला गया, तो मध्यप्रदेश की जगह इथियोपिया और चाड के बीच में रही. इस इंडेक्स में सबसे अच्छी स्थिति में रहे राज्य पंजाब का स्थान गैबॉन, होंडुरास और वियतनाम के बाद आया. दरअसल इस खराब स्थिति की वजह भारत में कुपोषण के शिकार बच्चों और पर्याप्त कैलोरी वाले भोजन से वंचित लोगों की बड़ी तादाद है. भारत में बाल मृत्यु दर अफ्रीका के उप सहारा क्षेत्र के अधिकतर देशों से अधिक है.
सावधान हो जायें
आप यदि अब भी देश के सफेदपोश कर्णधारों के चुनाव में जागरूक भूमिका निभाने पर गंभीरता और निष्‍पक्षता से विचार नहीं करते हैं, तो मेरे ख्‍याल से आपको इस देश में रहने का कोई हक नहीं है और दुश्‍मन घुसपैठियों की तरह रहते भी हैं, तो कुछ ही सालों में आपकी भी तबाही निश्चित है...तब आपको किसी से शिकायत करने का भी हक नहीं होगा और यदि भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था की आड़ में आपको यह हक मिलता भी है, तो सुनवाई सिफर होगी यह तय मान लीजिए...