तो भारत क्‍यों नहीं, पीओके में घुसकर मार सकता?

उदय केसरी
^पाकिस्तान में घुसकर मारो^ यह आदेश है अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश का। बुश ने तालिबानी व अलकायदा के आतंकियों के खिलाफ अफगानिस्तान में तैनात अपनी सेना के कमांडरों को पहली बार यह अधिकार दिया है कि पाक के उत्तरी कबायली इलाके में गढ़ बना रखे आतंकियों को मारने के लिए किसी की इजाजत की जरूरत नहीं।...यहां तक कि अमेरिकी अधिकारियों ने इस आदेश के बाद कहा है कि अमेरिकी सेना अब पाक की धरती पर कार्रवाई करेगी और पाक को सिर्फ इसकी सूचना देगी, इजाजत नहीं मांगेगी। इस आदेश से पाक के होश उड़ गए हैं....
वाह! क्या अमेरिकी दादागिरी है।...अफसोस ऐसी दादागिरी भारत नहीं कर सकता। क्या कभी भारतीय फौज बिना किसी इजाजत के पाक अधिकृत कश्‍मीर (पीओके) में घुसकर भारत में खून की नदियां बहाने वाले आतंकियों को खदेड़ कर मार सकती है, बिल्कुल नहीं...हम तो शांतिप्रिय देश हैं...हम हमला नहीं करते...केवल बचाव करते हैं। भले ही कोई हमारी ही जमीन हथिया ले...वहां आतंकी गढ़ बना ले...और वहां से हमारे ही खिलाफ आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम दे।...और फिर अमेरिका जैसी दादागिरी करने से कहीं पाक से रिश्‍ता खराब हो गया तो रहा-सहा कश्‍मीर न हाथ से निकल जाए।...लेकिन अमेरिका को ऐसी कोई परवाह करने की जरूरत नहीं, क्योंकि वह विश्‍व का सबसे धनी व ताकतवर देश है, इसलिए वह सात समंदर पार से आकर भी अपने दुश्‍मनों से खोज-खोज के बदला ले सकता है...पर हम यानी भारत शायद गरीब और कम ताकतवर देश हैं, हम अपने सीने पर लोटते सांपों को भी कुचल नहीं सकते हैं...इतनी हिम्मत तो केवल अमेरिकी राष्ट्रपति ही कर सकता है...
आजकल मोहल्ले के दादाओं से दोस्ती करके चलने में ही भोले-भाले लोगों की भलाई समझी जाती है...भारत भी विश्‍व के मोहल्ले में भोला-भाला इंसान है, जिसे अमेरिका जैसे दादा से दोस्ती करके ही चलना पड़ेगा...सो वह पुरानी सारे घात भूल कर परमाणु करार के जरीये दोस्ती करने के लिए आतुर है...लेकिन जिस आतंकवाद से भारत अमेरिका से सालों पहले से जूझता रहा है, उसका एहसास अमेरिका को तब हुआ, जब गोली उसकी चमड़ी पर लगी, यानी 11 सितंबर 2001 को जब अमेरिका की नाक पेंटागन बिल्डिंग को अलकायदा के आतंकियों ने नेस्तनाबूद कर दिया। इससे बौखलाए अमेरिका ने बिना किसी की इजाजत के अफगानिस्तान पर कब्जा जमा रखे तालिबानियों पर हमला बोल दिया। लेकिन वह अब तक अपने सबसे बड़े दुश्‍मन ओसाम बिन लादेन को नहीं मार पाया है। इसलिए अफगानिस्तान में तालिबानियों को सत्ताच्यूत कर अपने पसंद की सरकार बना लेने के बाद भी चुप नहीं बैठा है। अफगानिस्तान में अपनी फौज को तैनात कर अलकायदा आतंकियों के विरुद्ध अभियान जारी रखे हुए है। और अब जब अमेरिकी खुफिया तंत्रों द्वारा यह पता चला कि अलकायदा और ऐसे आतंकी संगठन पाकिस्तान के उत्तरी कबायली इलाकों में स्थित अड्डों में अमेरिका के खिलाफ 9/11 जैसे हमले की साजिश रच रहे हैं, तब फिर अमेरिका बौखला गया है।...लेकिन इससे पहले चींख-चींखकर भारत अमेरिका को बताता रहा कि पाकिस्तान आतंकियों को अपनी धरती पर पनाह ही नहीं दे रहा, पैसे और हथियार से मदद भी कर रहा है, पर अमेरिका के कान में जूं तक नहीं रेंगा।...आखिर हमारे यानी भारत के दर्द की औकात ही क्या है कि जिसका फौरन बदला लिया जाए...इसलिए तो करगिल, संसद पर हमले जैसे पाकिस्तानी दुष्साहस के बाद भी भारत बस बचाव की मुद्रा में रहा। और आतंकी बड़े आराम से एलओसी में खा-पीकर, आतंकी प्रशिक्षण प्राप्त कर मुसटंडे बनते रहे और अब हमारे देश में बता-बताकर एक नहीं, बारंबार बम विस्फोट कर रहे हैं...क्या वाकई में हम कमजोर हो गए हैं या भारत की विदेश नीति में कोई भीरूपन है, जिसके कारण हमारे देश की सेना को केवल और केवल हमले का बहादुरी से जवाब देने का ही आदेश है। अमेरिका की तरह अमन के दुश्‍मनों को खोजकर मारने का नहीं, तो फिर क्योंकर हम विदेश नीति और इसके नियंताओं का विरोध न करें, जिसके कारण हमें अपने घर के अंदर ही विदेशी आतंकियों से लड़ना पड़ रहा है।...फिर भी हमारे देश की सरकार बौखला नहीं रही, ज्यादातर समय सत्ता की गंदी राजनीति में व्यस्त रहती है...और आतंकी धमाकों के बाद भी राहत और सुरक्षा के नाम पर केवल राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती है। राष्ट्रीय सम्‍प्रभुता को चुनौती दे रहे पाकिस्तानी आतंकियों से निपटने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती। पता नहीं क्या हो गया हमारे देश को...जिसका इतिहास दुश्‍मनों के छक्के छुड़ा देने की दास्तानों से अटा पड़ा है।

हम हिंदुस्तान वाले हैं, हिन्दी में बोलेंगे

उदय केसरी
पूरी दुनिया में जिस हिन्दी फिल्मों के लिए मुंबई प्रसिद्ध है, उसी हिन्दी के लिखने और बोलने पर बावेला मचाया जा रहा है। इस बावेले के शिकार सबसे पहले गैर मुंबईवासी या कह लें उत्तरप्रदेश व बिहार के लोग हुए, फिर मुंबई के ऐसे दुकानदार व व्यापारी हुए, जिनकी दुकानों के साइन बोर्ड हिन्दी में लिखे हुए थे, फिर अब बावेला में बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के परिवार को घसीटा जा रहा है। हाल के दिनों में यह सब घटनाएं सुर्खियां बनती रही हैं और इन सब घटनाओं के सूत्रधार हैं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे, जबकि इसके महासूत्रधार हैं शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे। उन्हें मराठी भाषा से अगाध प्रेम है। गैर-मराठी भाषी लोग, खासकर यूपी-बिहार वाले नापसंद हैं। यदि इनकी मर्जी चले तो मराठी भाषा नहीं जानने या बोलने वालों को फांसी पर लटका दें।
आगे कुछ कहने से पहले बाल ठाकरे के संबंध में कुछ तथ्यों पर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा, जैसे-मुंबई में शिव सेना का मुखपत्र सामना मराठी के अलावा हिन्दी में भी निकलता है। बाल ठाकरे ने अपने कैरियर की शुरुआत मुंबई में एक अंग्रेजी अखबार फ्रीप्रेस जर्नल में एक कार्टूनिस्ट के रूप में की। वे गैर-मराठियों में यूपी-बिहार के लोगों को ही नहीं, मुस्लिमों और बंगालियों के भी खिलाफ शुरू से मुखर रहे हैं। यहीं नहीं, 70 के दशक में उन्होंने ‘महाराष्ट्र केवल मराठियों के लिए’ आंदोलन चलाया और दक्षिण भारतीय लोगों को भी मुंबई छोड़ने की खुली धमकी दी। 6 मार्च 2008 को ठाकरे ने अपने मुखपत्र सामना में एक संपादकीय लिखी, जिसका शीर्षक था-एक बिहारी सौ बीमारी। 29 जनवरी 2007 में इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक साक्षात्कार में बाल ठाकरे ने हिटलर की प्रशंसा करते हुए कहा था- Hitler did very cruel and ugly things. But he was an artist, I love him.
अब कुछ तथ्य बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे के बारे में- राज ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत शिव सेना से की, लेकिन बाल ठाकरे (चाचा) के पुत्र उद्धव ठाकरे द्वारा शिव सेना से साइडलाइन लगाये जाने के बाद उन्होंने नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली। राज ठाकरे बाहरी, खासकर उत्तर भारतीयों के खिलाफ जमकर हिंसक राजनीति करते रहे हैं। यहां तक कि बिहार व उत्तर प्रदेश के लोगों की आस्था से जुड़ी छठ पूजा पर टिप्पणी करते हुए इसे ‘नाटक’ करार दिया।
अब सवाल है कि क्या मुंबई की प्रसिद्धि और विकास केवल मराठियों की देन है? मराठी क्या केवल मराठी हैं, भारतवासी नहीं? बिहार और उत्तर प्रदेश किसी दूसरे देश का नाम है? भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, तो क्या महाराष्ट्र राष्ट्र से बाहर है? इन सवालों के सही जवाब भारत के पांचवीं पास ही नहीं, फेल बच्चे को भी मालूम होगा। तो क्या मराठी बनाम हिन्दी के सूत्रधार व महासूत्रधार को इसके जवाब नहीं मालूम? यदि मालूम है, तो क्या यह क्षेत्र, भाषा व धर्म के नाम की जा रही महज कपट राजनीति नहीं? इस सवाल का जवाब आपको संभवतः स्वतः मिल गया होगा। ऐसी कपट राजनीति के बीच बाहरी होने के नाम पर पहले अमिताभ बच्चन के घर पर पत्थर फेंकवाया जाता है, फिर उनसे मराठी व मुंबई प्रेम प्रदर्शित करने की अपेक्षा की जाती है। तो क्या एमएनएस की स्थापना (9 मार्च 2006) के बाद अमिताभ बच्चन ने अपना घर मुंबई में बनवाया। और फिर यह बताने की जरूरत है कि कोई अपना घर कहां बनाता है। पर लगता है कि बाला साहब व राज ठाकरे को भावनाओं की भाषा समझ में नहीं आती है। यदि समझ में आती तो हिटलर उनके लिए हीरो नहीं होता। अब ऐसी दूषित अपेक्षाओं से चिढ़ी जया बच्चन अपने दिल की भड़ास कब तक दबाती, सो बोल दी, हम यूपी वाले हैं हिन्दी में बोलेंगे। लेकिन यह बोलते हुए जया बच्चन यह भूल गई कि वह एक जानी-मानी अभिनेत्री और महानायक अमिताभ की पत्नी होने के नाते देश की एक सम्मानित हस्ती हैं। इसलिए उन्हें भी वही राह नहीं पकड़नी चाहिए, जिस राह पर राज ठाकरे चल रहे हैं। यदि वह यह कहतीं कि हम हिन्‍दुस्तान वाले हैं, हिन्दी में बोलेंगे तो जरूर पूरा हिन्दुस्तान उन पर गर्व करता। ऐसी ही गलती बॉलीवुड के बादशाह शाहरूख खान ने भी की कि हम दिल्ली वाले हैं। यह वाकई चिंता का विषय है कि राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर की हस्तियां ऐसी गलती करके क्षेत्र, भाषा व धर्म की भ्रष्ट राजनीति करने वालों को बावेला मचाने के मौके दे रही हैं। जिसका दुष्परिणाम उन्हें तो कम साधारण आदमी को कहीं अधिक भुगतना पड़ता है।

मजाक है क्या पृथ्वी का अंत!!!

उदय केसरी
अपने देश में मीडिया ज्यादातर न्यूज चैनलों ने पत्रकारिता के मूल्यों से पूरी तरह से तौबा कर ली है, यह बात नई नहीं रही, लेकिन इसकी जगह टीआरपी पत्रकारिता की होड़ में न्यूज चैनल किस कदर गैर-जिम्मेदार हो गए हैं, इसका अंदाजा कल रात (7 सितंबर) इंडिया टीवी को देखकर लगा, जिसने टीआरपी की दौड़ में पिछले दिनों लंबी छलांग लगायी है। खबर: बुधवार (10 सितंबर) को ब्रह्मांड का अंत!...पाताल से निकलेगा दानव, बस कुछ दिन और...महाविनाश की घड़ी करीब...महाप्रलय में खत्म हो जाएगी पूरी दुनिया आदि-आदि...आपने भी यह खबर देखी होगी। सनसनी के पर्यायवाची और भी कई शब्द व पंक्तियों से भरी यह खबर न्यूज चैनल की महज टीआरपी पत्रकारिता को बेनकाब करने के लिए पर्याप्त है।
अब बात इस खबर के सच की, तो इस संदर्भ में मुझे याद है 1999 का वह वाक्‍या, जब दिल्ली से एक नई साप्ताहिक पत्रिका निकलनी शुरू हुई थी-महालक्ष्मी सम्राट। तब दिल्ली से ही प्रकाशित दिल्ली प्रकाशन की पत्रिका सरस सलिल, मामूली दाम और मसालेदार कहानियों व तस्वीरों के कारण हिन्दी प्रदेशों में काफी लोकप्रिय हो रही थी। इसी तर्ज पर महालक्ष्मी सम्राट पत्रिका निकाली गई, जिसके सामने सरस सलिल चुनौती के रूप में थी। शायद, इसी चुनौती का सामना करने के लिए महालक्ष्मी सम्राट ने सनसनी को अपना हथियार बनाया और उसके हाथ लगी एक आल टाइम हिट स्टोरी ‘महाप्रलय’। इस पत्रिका के अनुसार नात्रेदमश की भविष्यवाणी के मुताबिक 1999 के खत्म होते ही महाप्रलय आयेगा, जो पूरी पृथ्वी को तहस-नहस कर देगा...इस महातबाही में कोई भी नहीं बचेगा...आदि-आदि बातें...आप सोच सकते हैं कि ऐसी पत्रिका ज्यादातर साधारण पाठक पढ़ते हैं। उन पर ऐसी कहानी का क्या असर हुआ होगा...मैं तो अपने इलाके की बात कहूंगा, जो देखा है... लोग 31 दिसंबर 1999 को नये साल के आगमन की खुशी में बाहर जाकर पिकनिक मनाने के कार्यक्रम नहीं बना पा रहे थे। उस दिन बाहर का काम छोड़ ज्यादातर लोग घर के आसपास ही सहमे हुए थे...पूरा दिन निकल गया...कोई महाप्रलय नहीं...उस पत्रिका की भविष्यवाणी झूठी और बकवास साबित हुई। फिर बाद में उस पत्रिका से लोगों का विश्‍वास उठने लगा और मुझे जहां तक याद है कि कुछ ही महीने में उस इलाके में महालक्ष्मी सम्राट का बिकना लगभग बंद हो गया।
इस वाक्या की तरह ही एक बार फिर अब इंडिया टीवी सरीखे न्यूज चैनलों पर टीआरपी की कमाई करने के लिए ‘महाप्रलय’ की कहानी को सनसनी बनाकर पेश किया जा रहा है, जो पूरी तरह से अविश्‍सनीय है। इस बार महाप्रलय की वजह पिछले 14 सालों से जिनेवा स्थित परमाणु शोध प्रयोगशाला सर्न में धरती के 100 मीटर अंदर किये जा रहे एक वैज्ञानिक महाप्रयोग को बताया जा रहा है, जिसमें दुनिया के 40 देशों के नौ हजार से अधिक वैज्ञानिक लगे हैं और वे ब्रह्मांड की रचना की गुत्थी समझने के उद्देश्‍य से यह महाप्रयोग कर रहे हैं। गौतरलब है कि इस महाप्रयोग के सफल होने पर मानव के सामने सदियों से रहस्य बनी ब्रह्मांड की कई घटनाओं पर से परदा उठ सकता है और हम उनके वैज्ञानिक कारण को साफ तौर पर जान पायेंगे। इस महाप्रयोग के सफल होने से अनेक ऐसे फायदे भी होंगे, जिसकी अभी मात्र हम कल्पना करते हैं। इसी महाप्रयोग के आलोचकों द्वारा अपवाह उड़ाई गई है कि महाप्रयोग के संचालित होने से ब्‍लैक होल बन सकते हैं और पृथ्‍वी पर भूकंप आ सकता है। इंडिया टीवी सरीखे न्यूज चैनलों के लिए इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था। सो, ऐसे न्‍यूज चैनलों ने चींख-चींखकर महाप्रलय की मनगढंत आशंकाओं की कहानी सुनानी शुरू कर दी। हालांकि टीआरपी की प्रतिद्वंद्विता में ही सही, इस खबर के बाद जी न्यूज ने महाप्रयोग के दूसरे पक्ष यानी साकारात्मक पक्ष पर आधारित कहानी भी पेश की, जिसमें दो जाने-माने वैज्ञानिकों से जिनेवा के महाप्रयोग के विभिन्न पहलुओं पर विस्‍तृत चर्चा की गई, जिसमें उन दोनों वैज्ञानिकों ने ऐसी आशंका को वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा कि महाप्रलय की बात हास्यास्पद है। भारत के जाने-माने वैज्ञानिक व शिक्षाविद् प्रो. यशपाल ने भी महाप्रलय की आशंका को कोरी कल्‍पना कहा है।
अब यदि जी न्‍यूज पर आये दो वैज्ञानिकों और प्रो. यशपाल की बातें को झूठ भी मान लें, तो भी क्‍या यह सहज रूप से माना जा सकता है‍ कि सभी चालीस देशों के वैज्ञानिक, जो इस महाप्रयोग में दिन-रात लगे हैं, वे जानबूझकर महाप्रलय को दावत दे रहे हैं, क्‍या उन्‍हें खुद से, अपने देश से, समाज से, परिवार से और इस पृथ्‍वी से मोह नहीं। केवल महाप्रयोग की आलोचना करने वाले मुट्ठी भर औने-पौने लोग ही चतुर और भविष्यदृष्टा हैं, जिन्‍हें सच मान लिया जाए। यदि नहीं तो इंडिया टीवी सरीखे न्यूज चैनलों को इस खबर के केवल नकारात्‍मक व बेबुनियाद पक्ष को सनसनी बनाकर दर्शकों से खेलने का हक किसने दे दिया है।

मूर्ख भारत या धूर्त अमेरिका?

उदय केसरी
पुराने जमाने में सूदखोर साहूकार निर्धन ग्रामीण की ज़मीन हथियाने के लिए पहले उसे कम ब्याज पर बिन मांगे ऋण देता, उसका हाल-समाचार लेता, उसकी घर की समस्याओं में बढ़-चढ़कर मदद करता और फिर जब उस ग्रामीण पर ऋण और सूदखोर के अहसान का बोझ बहुत अधिक बढ़ जाते, तब वह अपने असल मक़सद की दिशा में चाल चलता कि ऋण का बोझ हल्का करने के लिए अपनी ज़मीन गिरवी रख दो...अहसानों व ऋण तले दबा गरीब ग्रामीण इसके लिए बाध्य हो जाता, जिसके लिए उसकी ज़मीन जीवनाधार है...पर उसे क्या मालूम सूदखोर के सारे अहसान बदनीयत थे और वह इसी वक्त की फिराक में यह सारा फ़रेबजाल बुन रहा था। ज़मीन गिरवी रखते ही सूदखोर दबंग हो जाता और निरक्षर, भोला-भाला ग्रामीण बेसहाय। और इस तरह ग्रामीण की ज़मीन सूदखोर हड़प लेता...यहां तक कि कई बार सूदखोर द्वारा हड़पी ज़मीन पर उसके वास्तविक मालिक को ही मजबूरन मजदूरी करनी पड़ती थी।
यदि इस प्रसंग पर हम आज के वैश्विक जमाने में गौर करें तो भाव एक जैसा ही प्रतीत होगा बस, अब पात्र व दौर का फर्क पायेंगे। अमेरिका को यदि विश्‍व का सबसे चतुर, चालाक बनिया या साहूकार माना जाता है, तो यह कोई मजाक नहीं है। अमेरिका के कृत्य ऐसे ही हैं, जो कभी तालिबानियों को अपने फायदे के लिए आतंक का रास्ता सुझाता है और काम निकल जाने या उसका बुरा परिणाम (9/11 के रूप में) खुद पर पड़ते ही आतंक को वैश्विक समस्या घोषित करने में एक पल भी देर नहीं करता। यहां तक कि बिना किसी की सहमति के अफगानिस्तान पर हमला बोल देता है।...ऐसा ही सद्दाम हुसैन के साथ किया। यही नहीं भारत-रूस दोस्ती पर अमेरिका की तल्खी भी जगजाहिर है और इसके नतीजे भी भारत को झेलने पड़े हैं। लेकिन इन सबके बावजूद जब से ग्लोबलाइजेशन की फील गुड संस्कृति की हवा चली है, तब से कौन बदनियत या धूर्त है और कौन भोला-भाला या मूर्ख, समझना मुश्किल हो गया है, क्योंकि इन सब सवालों पर सब्जबाग दिखाने वाली विश्‍व कल्याण की कोरी कल्पना हावी है।
ऐसे हालात में, अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु ऊर्जा करार कितना सही है? यह सवाल तो करार की प्रक्रिया शुरू होने के समय से ही प्रासंगिक है और इसी सवाल पर लंबे समय तक रार के बाद यूपीए सरकार के प्रमुख सहयोगी वाम दलों ने अपना समर्थन वापस ले लिया, जिसके परिणामस्‍वरूप केंद्र की राजनीति में ऐसी गंदी राजनीति बजबजाई कि उसकी दुर्गंध न केवल पूरे देश में फैली, बल्कि इसने संसद की मर्यादा को तार-तार करके रख दिया. केंद्र सरकार ने अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर मतदान की प्रक्रिया में किस तरह से जीत हासिल की, उसे इतनी जल्‍दी भुलाया नहीं जा सकता. उस पर से विडंबना यह कि यह सडांध उस करार के नाम पर फैलाई गई, जिसके बारे में किसी को कोई सही जानकारी नहीं थी. न इसका विरोध करने वालों को और न ही इसके पक्षधरों को. वाम दलों का चरम विरोध भी ज्‍यादातर अमेरिका अथवा पूंजीवाद विरोधी जन्‍मजात घुट्टी का नतीजा था. वहीं इसके घोर पक्षधर केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री या सोनिया मेमसाहब के मोहरे मनमोहन सिंह को भी अमेरिका के चतुरनार राष्‍ट्रपति जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश ने गुमराह कर रखा था कि करार के बाद भी भारत के परमाणु प‍रीक्षण कार्यक्रम पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जबकि सच्‍चाई इसके उलट है, जिसका खुलासा 4-5 सितंबर को वियेना में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की बैठक के ठीक पहले अमेरिका के ही प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्‍ट में किया गया है. दरअसल, करार संबंधी 26 पेज का दस्तावेज विदेश मामलों संबंधी कांग्रेस की स्थायी समिति के अध्यक्ष व करार विरोधी हावर्ड बरमैन ने सार्वजनिक किया है। इसमें करार को लेकर पूछे गए 45 सवालों पर जॉर्ज बुश प्रशासन के जवाब शामिल हैं। ये सवाल बरमैन के पूर्ववर्ती दिवंगत टॉम लैंटोस ने अक्टूबर में पूछे थे और बुश प्रशासन ने 16 जनवरी को इसका जवाब दिया था। तब भारत में करार को लेकर राजनीतिक विवाद के चलते अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने समिति से आग्रह किया था कि वे इसे सार्वजनिक न करें।
अब यह खुलासा करार के अंधे पक्षधरों के लिए शर्म से डूब मरने वाला है. लेकिन शर्म हो तब तो कोई असर पड़े, बजाए इसके, केंद्र के विदेश मंत्री ने चुप्‍पी साध ली है, वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह दुविधा में पड़ गए हैं और वाम दलों के लिए तो यह बिल्‍ली के भाग्‍य से छींका टूटने जैसा है.

बाढ़ और भूख से जूझती लाचार जिंदगी

उदय केसरी
कल रात (सोमवार 1 सितंबर 08) हर रोज की तरह ही अपने बेडरूम में आराम से बैठा मैं वीडियो गेम की तरह टीवी के रिमोट से चैनल-चैनल' खेल रहा था। (चैनल-चैनल...आजकल प्रायः लोग अपनी टीवी पर खेलते हैं...मनोरंजन, न्यूज व अन्य चैनलों को मिलाकर इतने सेटेलाइट चैनल हो गये हैं कि दर्शकों को समझ में नहीं आता कि किसे देखे और किसे न देखे...और रिमोट के बटन दबाते-दबाते व विभिन्न चैनलों की झलकी लेते-लेते ही सारा वक्त गुजर जाता है।) खैर, कल रात की बात... चैनल-चैनल खेलते हुए जी न्यूज के दृश्‍य ने मुझे स्तब्ध कर दिया। मैं हर रोज का खेल भूलकर एकटक देखता रहा- वे दृश्‍य विचलित करने वाले थे। कई दिनों से भूखे बाढ़ पीड़ितों के बीच थोड़े से अनाज के पैकेट आते ही उसे पाने के लिए जानवरों की तरह टूट पड़ते लोगों के दृश्‍य...छीनाझपटी में किसी को कुछ नहीं मिल पाना और फिर एक बूढ़ी मां द्वारा जमीन पर गिरे, अनेक पैरों तले कुचले, धूल-धूसरित अनाज के दानों को चुन-चुनकर अपने आंचल में रखना, ताकि वह अपने भूख से बिलखते बच्चों को कुछ खिला सके...आंखें भर देने वाले दृश्‍य थे...एक गांव के सौ से अधिक स्त्री-पुरूष व बच्चे एक स्कूल की छोटी सी छत पर पिछले चौदह दिनों से खुद को जिंदा रखे हुए हैं...जिन्हें इतने दिनों बाद बाहर निकालने के लिए रिस्क्यू टीम के केवल दो बोट आ पाये थे...जीटीवी के एक संवाददाता से लिपटकर बच्चों की तरह रोता एक अधेड़ ग्रामीण...मौत के तांडव के बीच दूधमुंहे बच्चे के मासूम चेहरे और उसके कोमल होठों पर भूख के निशान...बता नहीं सकते कितने दर्दनाक दृश्‍य थे...उन्हें शब्दों में स्पष्ट बयां नहीं किया जा सकता...जी न्यूज के इस कार्यक्रम में बाढ़ की विभीषिका और उससे हुए जान-माल के नुकसान और इसके लिए जिम्मेदार सरकारी तंत्र या दो इंजीनियरों की लापरवाही आदि कई सवालों पर भी पड़ताल की गई...लेकिन मेरे मन-मस्तिष्क में इन सवालों से कहीं अधिक भूख के वे भयावह दृश्‍य कौंध रहे थे और उस कार्यक्रम के खत्म होने के घंटों बाद भी उसकी याद आते ही वे दृश्‍य साफ दिखने लगते हैं और मेरी संवेदना एक अलग ही सवाल करती है...कि क्या ये लोग बाढ़ आने से पहले सुखी-संपन्न थे. बाढ़ पीड़ितों के दृश्‍यों को देख ऐसा कतई नहीं लगता. वे गरीब मजदूर, किसान व निर्धन ग्रामीण थे, जिनके लिए रोज भूख का निदान ढूंढना सबसे बड़ा काम होता है। ऐसे में, बाढ़ ने उनकी आधी जान तो ऐसे ही ले ली होगी, फिर भी यदि वे मौत से लड़ रहे हैं और जिंदा हैं, तो यह जरूर उनके पिछले जन्‍म के पुन्‍यकर्मों का फल होगा...अन्‍यथा चौदह दिनों तक एक ऐसी जगह पर भूखे रात-दिन बीताना, जहां प्रत्‍येक को बैठने तक की पर्याप्‍त जगह नहीं हो, कोई सामान्‍य बात नहीं है...बाढ़ से बचाव करने या आपदा प्रबंधन में लापरवाही करने वाले नौकरशाहों या फिर कोसी नदी पर बने तटबंध की जर्जर अवस्‍था को नजरअंदाज कर गए इंजीनियरों को महज 24 घंटे ऐसी विभीषिका के बीच रहने के लिए छोड़ दिया जाए, तब ही उन्‍हें अपनी लापरवाही का अंदाजा होगा और पश्‍चाताप भी.
इस गलती का नतीजा इतना भयावह होगा, शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. बिहार के मधेपुरा, अररिया और सुपौल ज़िले, जो बाढ़ के कहर से सबसे अधिक प्रभावित हैं, में खबरों के मु‍ताबिक 20 लाख स्‍त्री-पुरूष व बच्‍चे बाढ़ की गिरफ्त में मौत और भूख से जूझ रहे हैं. कोसी का तटबंध नेपाल के कुसाहा में 18 अगस्त को टूटा था और अब जैसे-जैसे विभीषिका बढ़ रही है, सरकार और नौकरशाह अपनी गलती की नैतिक जिम्‍मेदारी लेने के बजाय बड़ी बेशर्मी से एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में लगे हैं, जबकि इतने दिनों बाद भी राहत कार्य और खाद्य पदार्थों की पहुंच अपर्याप्‍त है. हैरानी की बात यह है कि इतनी दुर्व्‍यवस्‍था का आलम तब है, जब बाढ़ की समस्‍या बिहार के लिए नई बात नहीं...