राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम

संजय दुबे
तीनों राज्यों में जहां वामपंथियों की सरकारें हैं इनका कांग्रेस से सांप-छछूंदर वाला बैर है. मगर इसके बाद भी केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार अगर बनी और बन के पिछले चार सालों से चल रही है तो इसके पीछे वामदलों का इसको दिया हुआ जीवनदायी सहारा है. विचारधारा की कोई समानता नहीं, कोई स्थाई हित नहीं, साथ होकर भी जनता को समय-समय पर दूरी का एहसास कराने की मजबूरी होने के बाद भी कहा गया कि ऐसा सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से बाहर रखने की वजह से किया नहीं जा रहा बल्कि करना पड़ रहा है. सारे देश को वामपंथियों का एहसानमंद होना चाहिए कि उन्होंने देश को कट्टरवादिता औऱ सांप्रदायिकता के राक्षसों का ग्रास होने से बचा लिया!
गठबंधन के पक्ष में एक तर्क ये भी था कि अगर कांग्रेस नीत गठबंधन पर वामपंथियों की लगाम रहेगी तो सरकार की नीतियां ज़्यादा जनोन्मुखी होंगीं और देश उदारवाद के नाम पर पूंजीवाद के चंगुल में फंसने से भी बचा रहेगा.
मगर पिछले कुछ महीनों से वामपंथियों की जनहित के प्रति प्रतिबद्धता सिंगूर और नंदीग्राम जैसी जगहों की वजह से खुल कर लोगों के सामने आ रही है. चलिए हो सकता है वामपंथियों की निगाह में जनहित वही हो जो वो वहां पर कर रहे हैं या करना चाह रहे थे या चाह रहे हैं. मगर सांप्रदायिकता के नाम पर सत्ता से दूर रहते हुए भी उसके सभी लाभों का मज़ा लेने वाले वामपंथी खुद कितने धर्मनिरपेक्ष हैं पिछले कुछ दिनों में इसका भी पता चल चुका है. पहले तो तस्लीमा नसरीन के मसले पर पश्चिम बंगाल सरकार का रुख जैसा था उसने राज्य सरकार की धर्मनिरपेक्षता के डंके बजाए. नंदीग्राम की घटना से बौखलाए मुसलमानों को मनाने के लिए सीपीएम ने तस्लीमा को बलि का बकरा बना दिया. अब सीपीएम पोलित ब्यूरो के सम्मानित सदस्य और इसके मज़दूर संगठन सीटू के महासचिव एम के पांधे के बयान ने रही सही कसर भी पूरी कर दी है.
पांधे ने अपने बयान में समाजवादी पार्टी को चेतावनी देते हुए कहा था कि उन्हें भारत-अमेरिकी परमाणु करार के मसले पर कांग्रेस का साथ देने से पहले अपने मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रखना चाहिए. उनका कहना था कि समाजवादी पार्टी का ज़्यादातर प्रभाव मुसलमानों में है इसलिए परमाणु करार उसके लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है क्योंकि अधिकतर मुसलमान अमेरिका की वजह से इसके पक्ष में नहीं हैं.
सवाल ये उठता है कि क्या पांधे का ऐसा कहना उस समाजवादी पार्टी को सांप्रदायिकता का जामा पहनाना नहीं हो गया जिसकी गलबहियों से वामदलों को कभी कोई गुरेज नहीं रहा और जिन्हें हमेशा वे धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बताते रहे हैं? क्या पांधे ये कहना चाहते थे कि भारतीय मुसलमान राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर कोई निर्णय लेते वक्त देश हित की बजाय किसी और ही बात पर ध्यान देते हैं?
देश के हित या अहित से जुड़े सवाल पर सवाल उठाना, उसके हानि-लाभ पर विचार कर उसका समर्थन या विरोध करना लोकतंत्र की एक बड़ी विशेषता ही नहीं बल्कि व्यवस्था भी है. मगर उसके पक्ष-विपक्ष में माहौल तैयार करने के लिए इस हद तक कुतर्क का सहारा लेना वामदलों के दोहरे चरित्र को ही उजागर करता है. एक देशहित से जुड़े मसले पर इसकी अच्छाई-बुराई के आधार पर समर्थन जुटाने के बजाय इसे हिंदू मुसलमान का मसला बनाना इस बात का द्योतक है कि राजनीति के हमाम में आज सभी नंगे हैं. न कोई धर्मनिरपेक्ष, न कोई सांप्रदायिक, न कोई वामपंथी न कोई दक्षिणपंथी, न कोई समाजवादी और न ही कोई पूंजीवादी...सत्ता का चरित्र अब किसी विचारधारा का गुलाम नहीं...देश की आज़ादी के साथ ही अब ये भी आज़ादखयाल बन चुका है. साभार: तहलका हिन्दी डॉट कॉम

भारत की आत्मा कहां रहती है?

रवीश कुमार
भारत की आत्मा अब गांवों में नहीं रहती है। पंद्रह साल पहले का सरकारी टेक्स्टबुक एलान करता था कि भारत की आत्मा गांवों में रहती है। जब भी गांव से शहर आता था लगता था कि गांव में आत्मा को अकेला छोड़ कर आ रहे हैं। शहर में आते ही लगता था यहां सब है मगर आत्मा नहीं क्योंकि आत्मा तो गांवों में रहती है। भूगोल का ज्ञान हुआ तो सोचने लगा कि भई अमेरिका या जापान की आत्मा कहां रहती होगी? क्या उधर की आत्मा भी गांव में रहती है या फिर सबर्ब या उपनगर में रहती है। जवाब किसी से नहीं मिलता। सवाल पूछता भी नहीं वरना लोग कहते बेवकूफ है। लिहाज़ा ख़ुद को बुद्धिमान कहलाते रहने के लिए ऐसे सवालों को ताक पर रख देता।
बिहार की राजधानी पटना से मोतिहारी ज़िला अपने गांव जाता था तो लगता था कि वहां आत्मा इंतज़ार कर रही होगी। टूटी सड़कें, बैलगाड़ियां, कभी न खड़े हो सकने वाले बिजली के खंभे आदि आदि। इन्हीं सब में आत्मा नहीं होती थी। ये तमाम समस्याएं आत्माओं के अभाव में बेजान पड़ी रहती थीं। आदमी चलते फिरते नज़र आते थे तो लगता था कि हां इन्हीं में है आत्मा। मगर शहर में भी तो आदमी चलते हैं। वहां आत्मा किधर रहती है। इतिहासकार भी तो बता रहा था कि बिहार बनने से सदियों पहले पाटलिपुत्र काल में पटना के आस पास गांव ही होंगे। जब गांव से शहर बना होगा तब क्या आत्माओं ने पटना छोड़ दिया होगा।
ख़ैर अच्छा हुआ मैंने इस सरकारी टेक्स्टबुक को दूसरी क्लास में नहीं पढ़ा। हमारे हिंदुस्तान में टेक्स्टबुक के साथ सबसे बड़ी ख़ूबी यही है। आपको एक साल के लिए ही झेलना पड़ता है। दूसरी क्लास में दूसरे टेक्स्टबुक आ जाते हैं। लेकिन ज़हन में गांवों में आत्मा के रहने का ख़्याल बना रहता था। अब तो यह कहा जा रहा है कि गांव से लोग शहर में आ रहे हैं। गांव के लोगों का काम आत्माओं से नहीं चल रहा। उन्हें कमाना है, खाना है और बच्चों को पढ़ाना है। इसके लिए आत्मा की विशेष ज़रूरत नहीं होती।
पिछले साल एक रिपोर्ट आई थी। कहा गया कि आज से २२ साल बाद यानी २०३० में भारत में शहर में रहने वालों की आबादी बढ़ जाएगी। इस समय कुल भारतीय आबादी का २८.४ फीसदी हिस्सा ही शहरों में रहता है। २२ साल बाद यह ४०.७६ फ़ीसदी हो जाएगा। यानी शहर बढ़ेंगे और गांव घटेंगे। दिल्ली के आस पास न जाने कितने गांवों को पांच साल के भीतर दफन होते देखा है। कई सारे गांवों को खत्म कर एनसीआर बन गया है। मुंबई भी आस पास के गांवों को निगलती जा रही है। शहर फैल रहे हैं और शहर में लोग आ रहे हैं। गांव के गांव खाली हो गए हैं। पुरानी सरकारी योजनाओं के तहत बनी सरकारी इमारतों में अब कोई नज़र नहीं आता। बीच बीच में आइडिया, वोडाफोन और एयरटेल के फोन की घंटी बजती रहती है। लगता है खंडहर होते गांवों में आत्माएं मिलकर कोई भुतहा नाच कर रही हैं। दिल्ली, मुंबई, सूरत और सतना से आवाज़ आती है। हैलो। हैलो। हां हां बोलो। घन्न घन्न आती आवाज़ सांय सांय की जगह ले रही है। गांव में बैठे बूढ़े मां बाप शहर गए बच्चों की आत्मा को फिक्स डिपोज़िट की तरह संभाल कर रखे होते हैं। उन्हें लगता है कि बेटा लौटेगा। कुछ दिन तक तो यह सिलसिला होली, दिवाली और छठ में चलता है। बाद में दिल्ली में पूर्वांचल समाज बन जाता है। कालोनी में गड्ढा खोद कर सूरज को अर्ध्य देने लगते हैं। यमुना नदी पर छठ से अनजान शीला दीक्षित छठ समारोह का औपचारिक उद्घाटन कर देती हैं। गांव वाली आत्मा इंतज़ार करती रहती है।
मुझे लगता है कि अब आत्माओं की सांवैधानिक जगह में बदलाव करने का वक्त आ गया है। सरकारी टेक्स्ट बुक को बदलना होगा। बोलना होगा कि भारत की आत्मा गांव से शहरों की तरफ बहुत तेज़ी से शिफ्ट हो रही है। गांवों में आत्माओं की संख्या में गिरावट देखी गई है। शहर में आत्माओं की संख्या बढ़ रही है। अब मुझे शहर में खालीपन नहीं लगता। गांव की याद नहीं आती। क्योंकि वहां रहने वाली आत्मा अब यहां आ गई है। अब उससे मिलने के लिए ट्रेन पकड़ कर नहीं जाना पड़ेगा।
साभार: तहलका हिन्दी डॉट कॉम

महंगाई की आंच

अशोक चक्रधर

उबली जन-मन भावना, महंगाई की आंच,
कीमत इतनी नुकीली, रस्ते पर ज्यों कांच।
रस्ते पर ज्यों कांच, बालकों को बहलाओ,
बटुआ लहूलुहान, न शॉपिंग करने जाओ।
चक्र सुदर्शन कहे— 'चाय है कैसी बबली?'
'गैस बचाने के चक्कर में आधी उबली।'

साभार: तहलका हिन्दी डॉट कॉम

तेल पर फिसलती देश की राजनीति

शांतनु गुहा रे

सरकार को ईंधन के दाम बढ़ाने ही बढ़ाने हैं मगर परेशानी ये है कि वो ये नहीं जानती कि ऐसा बिना वोटों को खोए कैसे किया जा सकता है...पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के सामने एक बड़ी दुविधा खड़ी है. ईंधन की कीमतें बढ़ाने के लिए उनके पास आर्थिक वजहें तो है पर राजनीतिक नहीं. उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. कई देशों ने इस स्थिति से निपटने के उपाय भी कर लिए हैं. मसलन इंडोनेशिया को अपने यहां ईंधन के मूल्य में 28 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी करनी पड़ी है जबकि श्रीलंका के लिए ये आंकड़ा 14 से 47 फीसदी तक है. उधर, बांग्लादेश तो कुछ पेट्रो पदार्थों की कीमतें 80 फीसदी तक बढ़ाने के लिए तैयार है. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां लगातार कीमतें बढ़ाए जाने की मांग कर रही हैं. ये स्वाभाविक भी है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ उनका नुकसान भी बढ़ रहा है. गौरतलब है कि आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस की बिक्री से रोजाना कुल 440 करोड़ रुपए का नुकसान होता है और अगर जल्द ही कोई इलाज नहीं किया गया तो इस वर्ष उनकी कमर टूट सकती है. तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर 16.34, प्रति लीटर डीजल पर 23.49, कुकिंग गैस के हर सिलिंडर पर 305.90 और प्रति लीटर केरोसीन पर 28.72 रुपयों का नुकसान होता है. दरअसल सरकार ईंधन पर जो सब्सिडी देती है उसकी मार इन तेल कंपनियों को झेलनी पड़ती है. मसलन तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर 16.34, प्रति लीटर डीजल पर 23.49, कुकिंग गैस के हर सिलिंडर पर 305.90 और प्रति लीटर केरोसीन पर 28.72 रुपयों का नुकसान होता है. सरकार इस नुकसान की भरपाई उन्हें ऑयल बांड्स जारी करके करती है. जिन्हें कंपनियां ज़रूरत पड़ने पर भुना सकती हैं. वर्तमान में कंपनियों के कुल नुकसान के 42.7 फीसदी की भरपाई इन बांड्स के जरिये ही की जा रही है जबकि उनका 33 फीसदी नुकसान, तेल मुहैया कराने वाली ओएनजीसी और गेल जैसी कंपनियां वहन करती हैं. देवड़ा मांग कर रहे हैं कि सरकार तेल कंपनियों को हो रहे कुल नुकसान के 42.7 फीसदी के बजाय 57.1 फीसदी के लिए बांड्स जारी करे. गौरतलब है कि पिछले साल इन कंपनियों को कुल 77,000 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ था और वित्तीय वर्ष 2008-09 में इस आंकड़े के 1,30,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.ऊपर से स्टील के दामों के बढ़ जाने की वजह से नए गैस कनेक्शन के लिए सिक्योरिटी डिपॉजिट में पहले ही 400 रुपये की बढ़ोतरी की जा चुकी है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सी रंगराजन के साथ हुई एक लंबी बैठक के बाद देवड़ा का कहना था, “अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के उछाल का ज्यादातर बोझ सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां उठा रही हैं. हमने कई विकल्पों पर चर्चा की मगर अभी कोई फैसला नहीं किया गया है.” उधर, पेट्रोलियम सचिव एम एस श्रीनिवासन तहलका से कहते हैं, “कीमतें बढ़ना तय है और फैसला जल्द ही लिया जाएगा.”दूसरी तरफ कांग्रेस की सहयोगी सीपीएम का मानना है कि सरकार को कच्चे तेल और पेट्रो उत्पादों पर उत्पाद और सीमा शुल्क को पुनर्व्यवस्थित करना चाहिए था. पार्टी महासचिव प्रकाश करात कहते हैं, “हम पिछले तीन साल से सरकार को प्रस्ताव दे रहे हैं. उन्हें कीमतें बढ़ाने की बजाय हमारे प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए.”मुंबई स्थित लेहमन ब्रदर्स में अर्थशास्त्री सोनल वर्मा कहती हैं, “राजनीतिक विरोध को देखते हुए साफ है कि तेल मंत्रालय जितने की मांग कर रहा है, बढ़ोतरी उससे कहीं कम की होगी. एक्सिस बैंक में कार्यरत अर्थशास्त्री सौगत भट्टाचार्य कहते हैं, “सरकार ईंधन की कीमतें तीन से पांच फीसदी तक बढ़ा सकती है. मगर ये काफी नहीं है.” जानकार कहते हैं कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी सत्ताधारी गठबंधन के चुनावी हितों पर बुरा असर डाल सकती है. मगर दीर्घकालिक हित में सरकार को इन दो विकल्पों में से एक को चुनना ही होगा--या तो वो खुद ईंधन की कीमतें बढ़ाए या फिर कीमतों का निर्धारण बाजार की ताकतों पर छोड़ दे. जानकार कहते हैं कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी सत्ताधारी गठबंधन के चुनावी हितों पर बुरा असर डाल सकती है. मगर दीर्घकालिक हित में सरकार को इन दो विकल्पों में से एक को चुनना ही होगा. चिंताएं कुछ और भी हैं. पेट्रोलियम और वित्त मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो सरकार शायद इसलिए भी बढ़ोतरी को टाल रही है क्योंकि मुद्रास्फीति की दर पहले ही करीब आठ फीसदी तक पहुंच चुकी है. अधिकारी ये भी कहते हैं कि वित्त मंत्री को आखिरकार और भी ऑयल बांड्स जारी करने और ईंधन पर कस्टम और एक्साइज ड्यूटी घटाने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा. पिछली बार ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी इसी साल फरवरी में हुई थी जब सरकार ने पेट्रोल की कीमत दो और डीजल की कीमत एक रुपये प्रति लीटर बढ़ा दी थी. फिलहाल भी सरकार के पास कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता. मॉर्गन स्टेनली के प्रबंध निदेशक चेतन अहाया कहते हैं, “हालात को देखते हुए कीमतें बढ़ाना ही एकमात्र सही विकल्प है. आम चुनाव में अब भी काफी वक्त है. उपभोक्ता के हितों की सुरक्षा अच्छी बात है मगर एक सीमा के बाद इससे देश के हित प्रभावित होने लगते हैं.” स्टेंडर्ड एंड पुअर के चीफ एशिया इकॉनामिस्ट सुबीर गोकर्ण भी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं, “कीमतों में वृद्धि चरणबद्ध तरीके से की जानी चाहिए. ये एक झटके में नहीं होनी चाहिए. क्योंकि इससे मुद्रास्फीति के दहाई तक पहुंचने का भी खतरा हो सकता है.”तेल विश्लेषकों के मुताबिक वर्तमान तेल संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संकट है. कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल से आगे जाते हुए 2015 तक 400 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. ऐसे में तेल कंपनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिए उनके घाटे की भरपाई करनी जरूरी होगी. तेल कंपनियों के अधिकारी कहते हैं कि अगर जल्द ही कोई निर्णय न लिया गया तो हो सकता है कि पेट्रोल पंपों पर तेल ही उपलब्ध न हो.पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने तहलका को बताया कि कुछ पेट्रोलियम उत्पादक देशों में द्विपक्षीय सौदों की संभावनाएं तलाश करने के लिए उच्चस्तरीय टीमें भेजे जाने पर भी विचार चल रहा है. उदाहरण के लिए साठ लाख बैरल प्रति दिन उत्पादन करने वाला वेनजुएला इसमें से दस लाख बैरल प्रति दिन भारत को भेजने पर सहमति दे चुका है.“इसी तरह कुछ दूसरे विकल्प भी तलाश किए जा सकते हैं.सरकार मुख्य तेल आयातक देशों जैसे अमेरिका, जापान, जर्मनी, चीन, फ्रांस और दक्षिण कोरिया के साथ एक खरीदार गठबंधन बनाने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है ताकि तेल उत्पादक देशों के साथ कीमतें घटाने के लिए मोलभाव किया जा सके”, एक अधिकारी बताते हैं.इसके अलावा तेल कंपनियों को राहत प्रदान करने के लिए कुछ दूसरी कवायदों के बारे में भी सोचा जा रहा है. इसमें आयकर और कॉरपोरेट कर पर अतिरिक्त अधिभार लगाने का प्रस्ताव भी शामिल है ताकि तेल सब्सिडी के कुछ हिस्से की भरपाई इससे आने वाली राशि से की जा सके. उदाहरण के लिए एक फीसदी का अधिभार लगाने से 3000 करोड़ रुपये के राजस्व की प्राप्ति हो सकती है. इसके साथ ही पेट्रोलियम मंत्रालय आयात कर को 7.5 फीसदी से घटाकर 2.5 फीसदी तक करने की भी सिफारिश कर रहा है.मगर सबसे पहले सरकार को कीमतों में बढ़ोतरी पर यथार्थवादी रवैया अपनाना होगा. साथ ही उसे तेल कंपनियों को वित्तीय संकट से उबारने के लिए करों में सुधार और बाकी चीज़ों के साथ उपभोक्ता को भी हालात की हकीकत से रूबरू करवाने की जरूरत है।
साभार : तहलका हिन्दी डॉट कॉम

रिंगटोन का बाज़ार और संस्कृति

प्रियदर्शन
बरसों पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘अजनबीपन’ - दिल्ली में अकेले रहते हुए रात को टेलीफोन बूथ से अपने घर फोन करने के अनुभव पर। मुझे याद है कि एसटीडी तारों के उलझे हुए दिनों में बड़ी मुश्किल से फोन मिला करते थे, लेकिन जब मिल जाया करते तो अचानक उनकी मशीनी ध्वनि बेहद मानवीय हो जाती। लगता था, जैसे बीप बीप की वह आवाज़ मुझे दिल्ली और रांची के बीच बिछे अनगिनत उलझे तारों के रास्ते 1200 मील दूर अपने घर के ड्राइंग रूम तक ले जाती है।
आज जब रिंगटोन और कॉलर ट्यून्स की एक रंगारंग दुनिया हमारे सामने है, तब भी मुझे रात ग्यारह बजे के आसपास बजती हुई वह बीप बीप याद आती है, क्योंकि इस ध्वनि से मेरी पहचान थी, वह मेरा धागा थी, जो मुझे दूसरों के साथ बांधती थी। आज वह ध्वनि मुझे नहीं मिलती, क्योंकि जब भी मैं किसी को फोन करता हूं, दूसरी तरफ कोई धुन, किसी फिल्मी गीत की कोई पंक्ति, या कोई बंदिश प्यार, इसरार, मनुहार या शृंगार बिखेरती हुई मेरी प्रतीक्षा की घड़ियों को मादक बना रही होती है।
दरअसल इन दिनों मोबाइल क्रांति ने ‘रिंगटोन’ और कॉलर ट्यून्स’ के जरिये जो नई सांगीतिक क्रांति की है, उसके कई पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है। आप किसी को फोन करें और आपको कोई अच्छी सी धुन या बंदिश सुनाई पड़े, इसमें कोई बुराई नहीं लगती। यही नहीं, जो लोग फोन पर अपनी पसंदीदा धुनें लगाकर रखते हैं, उनका एक तर्क यह भी हो सकता है कि इससे उनके व्यक्तित्व का भी कुछ पता चलता है।
लेकिन क्या संगीत का यह उपयोगितावाद क्या एक सीमा के बाद खुद संगीत के साथ अन्याय नहीं करने लगता... संगीत का काम सारी कला-विधाओं की तरह एक ऐसे आनंद की सृष्टि करना है, जिसके सहारे हमें अपने-आप को, अपनी दुनिया को कुछ ज्यादा समझने, कुछ ज्यादा खोजने में मदद मिलती है। लेकिन जब हम संगीत को ‘टाइम पास’ की तरह इस्तेमाल करते हैं तो उसको उसके मूल लक्ष्य से भटकाते हैं। किसी फोन कॉल पर किसी बड़े उस्ताद की पांच सेकंड से लेकर 15 या 30 सेकंड तक चलने वाली बंदिश जब तक आपकी पकड़ में आती है, ठीक उसी वक्त कोई आवाज इस बंदिश का गला घोंट देती है।
आप शिकायत नहीं कर सकते, क्योंकि आपने संगीत सुनने के लिए नहीं, बात करने के लिए किसी को फोन किया है। संगीत तो बस उस इंतज़ार के लिए बज रहा है, जो आपका फोन उठाए जाने तक आपको करना है। आप इस समय जम्हाई लें या बंदिश सुनें, किसी को फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता बंदिश को ज़रूर फर्क पडता है, क्योंकि पांच बार उसे पांच-दस या 20-30 सेकंड तक आप सुन चुके हैं और उसका जादू जा चुका है। छठी बार वह पूरी बंदिश सुनने भी आप बैठें तो उसका अनूठापन आपके लिए एक व्यतीत अनुभव है, क्योंकि आपको मालूम है कि इसे तो आपने अपने किसी दोस्त के मोबाइल पर सुन रखा है।
असल में हर फोन सिर्फ गपशप के लिए नहीं किया जाता, बल्कि सिर्फ गपशप जैसी कोई चीज नहीं होती - कोई न कोई सरोकार उस गपशप की प्रेरणा बनता है, कोई न कोई संवाद इसके बीच आता है, सुख या दुख के कुछ अंतराल होते हैं। जाहिर है, संगीत की कोई धुन या बंदिश इस संवाद में बाधा बनती है। आप किसी अफसोस या दुख की कोई खबर साझा करने बैठे हैं और आपको फोन पर कोई भैरवी या ठुमरी या चालू फिल्मी गाना सुनने को मिल रहा है तो आपको पता चले या नहीं, कहीं न कहीं, यह आपके दुख का उपहास भी है। यही बात सुखद खबरों के साथ कही जा सकती है।
संस्कृति एक बहुत बड़ी चीज है, उसे आप काटकर प्लेटों में परोस नहीं सकते, उसे टुकड़ा-टुकड़ा कर पैक नहीं कर सकते। लेकिन बाजा़र यही करने की कोशिश कर रहा है। वह मोत्सार्ट, बाख, रविशंकर, हरिप्रसाद चौरसिया और उस्ताद बिस्मिल्ला खां का जादू छीनकर उसे अपनी डिबिया में बंद कर रहा है और बेच रहा है। खरीदने वालों को भी संस्कृति का यह इत्र रास आ रहा है, क्योंकि इसके जरिये वह बता पा रहे हैं कि उनका नाता बड़ी और कलात्मक अभिव्यक्तियों से भी है।
दरअसल हर ध्वनि का अपना मतलब होता है, हर मुद्रा का अपना अर्थ। दरवाजे पर दस्तक देने की जगह कोई गाना गाने लगे तो इसे उसका कला प्रेम नहीं, उसकी सनक मानेंगे। ध्वनियों के सहारे हम हंसी को भी समझते हैं, रुलाई को भी। अगर हवा के बहने और पानी के गिरने की ध्वनियां किन्हीं दूसरे तरीकों से हम तक पहुंचने लगें तो समझिए कि कुदरत में कोई अनहोनी हुई है - या तो कोई भयावह तूफ़ान हमारे रास्ते में है या कोई विराट बाढ़ हमें लीलने को आ रही है। क्या मोबाइल क्रांति ने हमारी ध्वनि-संवेदना नहीं छीन ली है, वरना हम एक आ रहे तूफ़ान को पहचानने में इतने असमर्थ क्यों होते...? साभार : एन डी टी वी ख़बर डॉट कॉम